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ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

Jnana Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)

by स्वामी विवेकानन्द

DevanagariHindipublished332 pages

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Page 13

माया

९

जाता है, “हम जगत् के गुप्त रहस्य को क्यों नहीं जान पाते ?” और इसका इस प्रकार निगूढ़ भाव व्यञ्जक उत्तर प्राप्त होता है:— “हम सब व्यर्थ जल्पना करते है, हम इन्द्रिय-सुख से परितृप्त होने वाले और वासनापर है, अतएव इस सत्य को नीहारावृत करके रखने हैं”—

“नीहारेण प्रावृता जल्प्पा चासुतृप उक्थशासश्चरन्ति !” १

यहाँ पर माया शब्द का व्यवहार तो विल्कुल ही हुआ नहीं, किंतु इससे यही भाव प्रकट होता है कि हमारी अज्ञता का जो कारण निर्धारित हुआ है वह इस सत्य और हमारे बीच कुज्झटिका के समान वर्तमान है। अब इसके बहुत समय के वाद, अपेक्षाकृत आधुनिक उपनिषदो मे माया शब्द का फिर आविर्भाव देखने मे आता है। किन्तु इसी बीच मे इसका प्रभूत रूपान्तर हो चुका है; उसके साथ कई नये अर्थ संयोजित हो गये है; नाना प्रकार के मतवाद प्रचारित और पुनरुक्त हुये है; और अन्त मे माया विषयक धारणा एक स्थिर रूप प्राप्त कर चुकी है। हम श्वेताश्वतर उपनिषद् में पढते हैं—

“मायन्तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनन्तु महेश्वरम् ।”

—माया को ही प्रकृति समझो और मायी को महेश्वर जानो। भगवान शंकराचार्य के पूर्ववर्ती दार्शनिक पण्डितों ने इसी माया शब्द का विभिन्न अर्थों में व्यवहार किया है। मालूम होता है, बौद्धों ने भी माया शब्द या मायावाद को कुछ रञ्जित किया है। किन्तु बौद्धों ने इसको प्रायः विज्ञानवाद २


१ ऋग्वेद-दशम मण्डल, ८२ सूक्त, ऋक्।

२ हमारी इन्द्रियों से ग्राह्य समस्त जगत् हमारे मन की ही विभिन्न अनुभूतिमात्र है, इसकी वास्तविक सत्ता नहीं है, इसी मत को विज्ञानवाद या Idealism कहते हैं।