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जपजी साहिब (श्री गुरु नानक देव जी - मूल बाणी एवं हिन्दी अनुवाद)

Japji Sahib of Guru Nanak Dev Ji with Hindi Commentary

by श्री गुरु नानक देव जी

DevanagariHindipublished56 pages

२. पौड़ी १-१०: हुकम रज़ाई, नाम महिमा व सुणणै-मंनै

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तो मानव जीव की बुद्धि रत्न, जवाहर व माणिक्य जैसे पदार्थों से
परिपूर्ण हो जाए। हे गुरु जी ! मुझे सिर्फ यही बोध करवा दो कि
सृष्टि के समस्त प्राणियों को देने वाला निरंकार मुझ से विस्मृत न
हो ॥ ६ ॥
जे जुग चारे आरजा होर दसूणी होए ॥
नवा खंडा विच जाणीऐ नाल चलै सभ कोए ॥
चंगा नाउ रखाइ कै जस कीरत जग लेइ ॥
जे तिस नदर न आवई त वात न पुछै के ॥
कीटा अंदर कीट कर दोसी दोस धरे ॥
नानक निरगुण गुण करे गुणवंतेआ गुण दे ॥
तेहा कोए न सुझई ज तिस गुण कोए करे ॥७॥
यदि किसी मनुष्य अथवा योगी की योग-साधना करके चार युगों
से दस गुणा अधिक, अर्थात्-चालीस युगों की आयु हो जाए।
नवखण्डों (पौराणिक धर्म-ग्रन्थों में वर्णित इलावृत, किंपुरुष, भद्र,
भारत, केतुमाल, हरि, हिरण्य, रम्य और कुश) में उसकी कीर्ति
हो, सभी उसके सम्मान में साथ चलें। संसार में प्रख्यात पुरुष
बनकर अपनी शोभा का गान करवाता रहे। यदि अकाल पुरुष की
कृपादृष्टि में वह मनुष्य नहीं आया तो किसी ने भी उसकी क्षेम
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नहीं पूछनी। इतने वैभव तथा मान-सम्मान होने के बावजूद भी
ऐसा मनुष्य परमात्मा के समक्ष कीटों मे क्षुद्र कीट अर्थात् अत्यंत
अधम समझा जाता है, दोषयुक्त मनुष्य भी उसे दोषी समझेंगे। गुरु
नानक जी का कथन है कि वह असीम-शक्ति निरंकार गुणहीन
मनुष्यों को गुण प्रदान करता है और गुणी मनुष्यों को अतिरिक्त
गुणवान बनाता है। परंतु ऐसा कोई और दिखाई नहीं देता, जो उस
गुणों से परिपूर्ण परमात्मा को कोई गुण प्रदान कर सके ॥ ७ ॥
सुणिऐ सिध पीर सुर नाथ ॥
सुणिऐ धरत धवल आकास ॥
सुणिऐ दीप लोअ पाताल ॥
सुणिऐ पोहे न सकै काल ॥
नानक भगता सदा विगास ॥
सुणिऐ दूख पाप का नास ॥८॥
परमात्मा का नाम सुनने, अर्थात्-उसकी कीर्ति में अपने हृदय को
लगाने के कारण ही सिद्ध, पीर, देव तथा नाथ इत्यादि को परम-
पद की प्राप्ति हुई है। नाम सुनने से ही पृथ्वी, उसको धारण करने
वाले वृषभ (पौराणिक धर्म ग्रन्थों के अनुसार जो धौला बैल इस
भू-लोक को अपने सींगों पर टिकाए हुए है) तथा आकाश के

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स्थायित्व की शक्ति का ज्ञान प्राप्त हो जाता है। नाम सुनने से
शाल्मलि, क्रौंच, जम्बू, पलक आदि सप्त द्वीपः भूः भवः, स्वः
आदि चौदह लोक तथा अतल, वितल, सुतल आदि सातों
पातालों की अन्तर्यामता प्राप्त होती है। नाम सुनने वाले को काल
स्पर्श भी नहीं कर सकता। हे नानक ! प्रभु के भक्त में सदैव आनंद
का प्रकाश रहता है, परमात्मा का नाम सुनने से समस्त दुखों व
दुष्कर्मों का नाश होता है॥ ८॥
सुणिऐ ईसर बरमा इंद ॥
सुणिऐ मुख सालाहण मंद ॥
सुणिऐ जोग जुगत तन भेद ॥
सुणिऐ सासत सिम्रित वेद ॥
नानक भगता सदा विगास ॥
सुणिऐ दूख पाप का नास ॥९॥
परमात्मा का नाम सुनने से ही शिव, ब्रह्मा तथा इन्द्र आदि उत्तम
पदवी को प्राप्त कर सके हैं। मंदे लोग यानी कि बुरे कर्म करने वाले
मनुष्य भी नाम को श्रवण करने मात्र से प्रशंसा के लायक हो जाते
हैं। नाम के साथ जुड़ने से योगादि तथा शरीर के विशुद्ध,
मणिपूरक, मूलाधार आदि षट्-चक्र के रहस्य का बोध हो जाता
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है। नाम सुनने से षट्-शास्त्र, (सांख्य, योग, न्याय आदि), सत्ताईस
स्मृतियों (मनु, याज्ञवल्क्य स्मृति आदि) तथा चारों वेदों का ज्ञान
उपलब्ध होता है। हे नानक ! संत जनों के हृदय में सदैव आनंद
का प्रकाश रहता है। परमात्मा का नाम सुनने से समस्त दुखों व
दुष्कर्मों का नाश होता है ॥९॥
सुणिऐ सत संतोख ज्ञान ॥
सुणिऐ अठसठ का इसनान ॥
सुणिऐ पड़ पड़ पावहे मान ॥
सुणिऐ लागै सहज ध्यान ॥
नानक भगता सदा विगास ॥
सुणिऐ दूख पाप का नास ॥१०॥
नाम सुनने से मनुष्य को सत्य, संतोष व ज्ञान जैसे मूल धर्मों की
प्राप्ति होती है। नाम को सुनने मात्र से समस्त तीर्थों में श्रेष्ठ अठसठ
तीर्थों के स्नान का फल प्राप्त हो जाता है। निरंकार के नाम को
सुनने के बाद बार-बार रसना पर लाने वाले मनुष्य को उसके
दरबार में सम्मान प्राप्त होता है। नाम सुनने से परमात्मा में लीनता
सरलता से हो जाती है, क्योंकि इससे आत्मिक शुद्धि होकर ज्ञान
प्राप्त होता है। हे नानक ! प्रभु के भक्तों को सदैव आत्मिक आनंद
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का प्रकाश रहता है। परमात्मा का नाम सुनने से समस्त दुखों व
दुष्कर्मों का नाश होता है॥ १०॥
सुणिऐ सरा गुणा के गाह ॥
सुणिऐ सेख पीर पातिसाह ॥
सुणिऐ अंधे पावहे राहो ॥
सुणिऐ हाथ होवै असगाहो ॥
नानक भगता सदा विगास ॥
सुणिऐ दूख पाप का नास ॥११॥
नाम सुनने से गुणों के सागर श्री हरि में लीन हुआ जा सकता है।
नाम-श्रवण के प्रभाव से ही शेख, पीर और बादशाह अपने पद पर
शोभायमान हैं। अज्ञानी मनुष्य प्रभु-भक्ति का मार्ग नाम-श्रवण
करने से ही प्राप्त कर सकते हैं। इस भव-सागर की अथाह गहराई
को जान पाना भी नाम-श्रवण की शक्ति से सम्भव हो सकता है। हे
नानक ! सद्-पुरुषों के अंतर में सदैव आनंद का प्रकाश रहता है।
परमात्मा का नाम सुनने से समस्त दुखों व दुष्कर्मों का नाश होता
है।। ११।।
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मंने की गत कही न जाए ॥
जे को कहै पिछै पछुताए ॥
कागद कलम न लिखणहार ॥
मंने का बहे करन वीचार ॥
ऐसा नाम निरंजन होए ॥
जे को मंन जाणै मन कोए ॥१२॥
उस अकाल पुरुष का नाम सुनने के पश्चात उसे मानने वाले
अर्थात् उसे अपने हृदय में बसाने वाले मनुष्य की अवस्था कथन
नहीं की जा सकती। जो भी उसकी अवस्था का बखान करता है
तो उसे अंत में पछताना पड़ता है क्योंकि यह सच कर लेना सरल
नहीं है, ऐसी कोई रसना नहीं जो नाम से प्राप्त होने वाले आनन्द
का रहस्योद्घाटन कर सके। ऐसी अवस्था को यदि लिखा भी जाए
तो इसके लिए न कागज़ है, न कलम और न ही लिखने वाला
कोई जिज्ञासु, जो वाहिगुरु में लिवलीन होने वाले का विचार कर
सकें। परमात्मा का नाम सर्वश्रेष्ठ व मायातीत है। यदि कोई उसे
अपने हृदय में बसा कर उसका चिन्तन करे ॥१२ ॥
मंनै सुरत होवै मन बुध ॥
मंनै सगल भवण की सुध ॥
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मंनै मुहे चोटा ना खाए ॥
मंनै जम कै साथ न जाए ॥
ऐसा नाम निरंजन होए ॥
जे को मंन जाणै मन कोए ॥१३॥
परमात्मा का नाम सुनकर उसका चिन्तन करने से मन और बुद्धि
में उत्तम प्रीति पैदा हो जाती है। चिन्तन करने से सम्पूर्ण सृष्टि का
ज्ञान-बोध होता है। चिन्तन करने वाला मनुष्य कभी सांसारिक
कष्टों अथवा परलोक में यमों के दण्ड का भोगी नहीं होता।
चिन्तनशील मनुष्य अंतकाल में यमों के साथ नरकों में नहीं
जाता, बल्कि देवगणों के साथ स्वर्ग-लोक को जाता है। परमात्मा
का नाम बहुत ही श्रेष्ठ एवं मायातीत है। यदि कोई उसे अपने हृदय
में लीन करके उसका चिन्तन करे॥ १३॥
मंनै मारग ठाक न पाए ॥
मंनै पत सिओ परगट जाए ॥
मंनै मग न चलै पंथ ॥
मंनै धरम सेती सनबंध ॥
ऐसा नाम निरंजन होए ॥
जे को मंन जाणै मन कोए ॥१४॥
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निरंकार के नाम का चिन्तन करने वाले मानव जीव के मार्ग में
किसी प्रकार की कोई बाधा नहीं आती। चिन्तनशील मनुष्य
संसार में शोभा का पात्र होता है। ऐसा व्यक्ति दुविधापूर्ण मार्ग
अथवा साम्प्रदायिकता को छोड़ धर्म-पथ पर चलता है।
चिन्तनशील का धर्म-कार्यों से सुदृढ़ सम्बन्ध होता है। परमात्मा
का नाम बहुत ही श्रेष्ठ एवं मायातीत है। यदि कोई उसे अपने हृदय
में लीन करके उसका चिन्तन करे॥ १४ ॥
मंनै पावहे मोख दुआर ॥
मंनै परवारै साधार ॥
मंनै तरै तारे गुर सिख ॥
मंनै नानक भवहे न भिख ॥
ऐसा नाम निरंजन होए ॥
जे को मंन जाणै मन कोए ॥१५॥
प्रभु के नाम का चिन्तन करने वाले मनुष्य मोक्ष द्वार को प्राप्त कर
लेते हैं। चिन्तन करने वाले अपने समस्त परिजनों को भी उस नाम
का आश्रय देते हैं। चिन्तनशील गुरसिख स्वयं तो इस भव-सागर
को पार करता ही है तथा अन्य संगियों को भी पार करवा देता है।
चिन्तन करने वाला मानव जीव, हे नानक ! दर-दर का भिखारी
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नहीं बनता। परमात्मा का नाम बहुत ही श्रेष्ठ एवं मायातीत है। यदि
कोई उसे अपने हृदय में लीन करके उसका चिन्तन करे ॥ १५॥
पंच परवाण पंच परधान ॥
पंचे पावहे दरगहे मान ॥
पंचे सोहहे दर राजान ॥
पंचा का गुर एक ध्यान ॥
जे को कहै करै वीचार ॥
करते कै करणै नाही सुमार ॥
धौल धरम दया का पूत ॥
संतोख थाप रखिआ जिन सूत ॥
जे को बुझै होवै सचिआर ॥
धवलै उपर केता भार ॥
धरती होर परै होर होर ॥
तिस ते भार तलै कवण जोर ॥
जीअ जात रंगा के नाव ॥
सभना लिखिआ वुड़ी कलाम ॥
एहो लेखा लिख जाणै कोए ॥
लेखा लिखिआ केता होए ॥
केता ताण सुआलिहो रूप ॥
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केती दात जाणै कौण कूत ॥
कीता पसाओ एको कवाओ ॥
तिस ते होए लख दरीआओ ॥
कुदरत कवण कहा वीचार ॥
वारिआ न जावा एक वार ॥
जो तुध भावै साई भली कार ॥
तू सदा सलामत निरंकार ॥१६॥
जिन्होंने प्रभु-नाम का चिन्तन किया है वे श्रेष्ठ संतजन निरंकार के
द्वार पर स्वीकृत होते हैं, वे ही वहाँ पर प्रमुख होते हैं। ऐसे गुरुमुख
प्यारे अकाल पुरुष की सभा में सम्मान पाते हैं। ऐसे सद्-पुरुष राज
दरबार में शोभावान होते हैं। सद्गुणी मानव का ध्यान उस एक
सतगुरु (निरंकार) में ही दृढ़ रहता है। यदि कोई व्यक्ति उस
सृजनहार के बारे में कहना चाहे अथवा उसकी रचना का लेखा
करे तो उस रचयिता की कुदरत का आकलन नहीं किया जा
सकता। निरंकार द्वारा रची गई सृष्टि धर्म रूपी वृषभ (धौला बैल)
ने अपने ऊपर टिका कर रखी हुई है जो कि दया का पुत्र है
(क्योंकि मन में दया-भाव होगा तभी धर्म-कार्य इस मानव जीव से
सम्भव होगा।) जिसे संतोष रूपी सूत्र के साथ बांधा हुआ है। यदि
कोई परमात्मा के इस रहस्य को जान ले तो वह सत्यनिष्ठ हो
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सकता है। यदि कोई ईश्वर के इस कौतुक को नहीं मानता तो उसके
मन में यही शंका उत्पन्न होगी कि उस शरीर धारी बैल पर इस
धरती का कितना बोझ है, वह कितना बोझ उठाने की समर्था
रखता है। क्योंकि इस धरती पर सृजनहार ने जो रचना की है वह
परे से परे है, अनन्त है। फिर उस बैल का बोझ किस शक्ति पर
आश्रित है। सृजनहार की इस रचना में अनेक जातियों, रंगों तथा
अलग-अलग नाम से जाने जाने वाले लोग मौजूद हैं। जिनके
मस्तिष्क पर परमात्मा की आज्ञा में चलने वाली कलम से कर्मों
का लेखा लिखा गया है। किन्तु यदि कोई जन-साधारण इस कर्म-
लेख को लिखने की बात कहे तो वह यह भी नहीं जान पाएगा
कि यह लिखा जाने वाला लेखा कितना होगा। लिखने वाले उस
परमात्मा में कितनी शक्ति होगी, उसका रूप कितना सुन्दर है।
उसकी कितनी दात है, ऐसा कौन है जो उसका सम्पूर्ण अनुमान
लगा सकता है। अकाल पुरुष के मात्र एक शब्द से समस्त सृष्टि
का प्रसार हुआ है। उस एक शब्द रूपी आदेश से ही सृष्टि में एक
से अनेक जीव-जन्तु, तथा अन्य पदार्थों के प्रवाह चल पड़े हैं।
इसलिए मुझ में इतनी बुद्धि कहाँ कि मैं उस अकथनीय प्रभु की
समर्था का विचार कर सकूं। हे अनन्त स्वरूप ! मैं तुझ पर एक
बार भी कुर्बान होने के लायक नहीं हूँ। जो तुझे भला लगता है
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वही कार्य श्रेष्ठ है। हे निरंकार ! हे पारब्रह्म ! तू सदा शाश्वत रूप हैं
॥ १६॥
असंख जप असंख भाओ ॥
असंख पूजा असंख तप ताओ ॥
असंख ग्रंथ मुख वेद पाठ ॥
असंख जोग मन रहहे उदास ॥
असंख भगत गुण ज्ञान वीचार ॥
असंख सती असंख दातार ॥
असंख सूर मुह भख सार ॥
असंख मोन लिव लाए तार ॥
कुदरत कवण कहा वीचार ॥
वारिआ न जावा एक वार ॥
जो तुध भावै साई भली कार ॥
तू सदा सलामत निरंकार ॥१७॥
इस सृष्टि में असंख्य लोग उस सृजनहार का जाप करते हैं,
असंख्य ही उसको प्रीत करने वाले हैं। असंख्य उसकी अर्चना
करते हैं, असंख्य तपी तपस्या कर रहे है। असंख्य लोग धार्मिक
ग्रंथों व वेदों आदि का मुंह द्वारा पाठ कर रहे हैं। असंख्य ही योग-
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