जपजी साहिब (श्री गुरु नानक देव जी - मूल बाणी एवं हिन्दी अनुवाद)
Japji Sahib of Guru Nanak Dev Ji with Hindi Commentary
श्री गुरु नानक देव जी द्वारा
४. पौड़ी २१-३०: तीरथ, तप व आदि अनहद नाद
JAPJI SAHIB HINDI SIKHIZM.COM
बंद खलासी भाणै होए ॥
होर आख न सकै कोए ॥
जे को खाएक आखण पाए ॥
ओहो जाणै जेतीआ मुहे खाए ॥
आपे जाणै आपे देए ॥
आखह सि भि केई केए ॥
जिस नो बखसे सिफत सालाह ॥
नानक पातसाही पातसाहो ॥२५॥
उसके उपकार इतने अधिक हैं कि उनको लिखने की समर्था
किसी में भी नहीं। वह अनेक बख्शिशें करने वाला होने के कारण
बड़ा है किंतु उसे लोभ तिनका मात्र भी नहीं है। कई अनगिनत
शूरवीर उसकी कृपा-दृष्टि की चाहना रखते हैं। उनकी संख्या की
तो बात ही नहीं हो सकती। कई मानव निरंकार द्वारा प्रदत पदार्थों
को विकारों हेतु भोगने के लिए जूझ-जूझ कर मर जाते हैं। कई
अकाल पुरुष द्वारा दिए जाने वाले पदार्थों को लेकर मुकर जाते हैं
। कई मूढ़ व्यक्ति परमात्मा से पदार्थ ले लेकर खाते रहते हैं, कभी
उसे स्मरण नहीं करते। कईयों को दुख व भूख की मार सदैव
पड़ती रहती है, क्योंकि यह उनके कर्मों में ही लिखा होता है।
किन्तु ऐसे सज्जन ऐसी मार को उस परमात्मा की बख्शिश ही
34 | P a g e sikhizm.com
JAPJI SAHIB HINDI
SIKHIZM.COM
मानते हैं। इन्हीं कष्टों के कारण ही मानव जीव को वाहिगुरु का
स्मरण होता है। मनुष्य को माया-मोह के बंधन से छुटकारा भी
ईश्वर की आज्ञा में रहने से ही मिलता है। इसके लिए कोई अन्य
विधि हो, कोई भी नहीं कह सकता; अर्थात्-ईश्वर की आज्ञा में
रहने के अतिरिक्त माया के मोह-बंधन से छुटकारा पाने की कोई
अन्य विधि कोई नहीं बता सकता। यदि अज्ञानता वश कोई
व्यक्ति इसके बारे में कथन करने की चेष्टा करे तो फिर उसे ही
मालूम पड़ेगा कि उसे अपने मुँह पर यमों आदि की कितनी चोटें
खानी पड़ी हैं। परमात्मा संसार के समस्त प्राणियों की जरूरतों
को जानता है और उन्हें स्वयं ही प्रदान भी करता है। संसार में
सभी जीव कृतघ्न ही नहीं हैं, कई व्यक्ति ऐसे भी हैं जो इस बात
को मानते हैं परमात्मा प्रसन्न होकर जिस व्यक्ति को अपनी स्तुति
को गाने की शक्ति प्रदान करता है। हे नानक ! वह बादशाहों का
भी बादशाह हो जाता है ; अर्थात्- उसे ऊँचा व उत्तम पद प्राप्त हो
जाता है॥ २५ ॥
अमुल गुण अमुल वापार ॥
अमुल वापारीए अमुल भंडार ॥
अमुल आवह अमुल लै जाहे ॥
अमुल भाए अमुला समाहे ॥
35 | Page
sikhizm.com
अमुल धरम अमुल दीबाण ॥
अमुल तुल अमुल परवाण ॥
अमुल बखसीस अमुल नीसाण ॥
अमुल करम अमुल फुरमाण ॥
अमुलो अमुल आखिआ न जाए ॥
आख आख रहे लिव लाए ॥
आखहे वेद पाठ पुराण ॥
आखहे पड़े करह वखिआण ॥
आखहे बरमे आखहे इंद ॥
आखहे गोपी तै गोविंद ॥
आखहे ईसर आखहे सिध ॥
आखहे केते कीते बुध ॥
आखहे दानव आखहे देव ॥
आखहे सुर नर मुन जन सेव ॥
केते आखहे आखण पाहे ॥
केते कह कह उठ उठ जाहे ॥
एते कीते होर करेहे ॥
ता आख न सकह केई केए ॥
जेवड भावै तेवड होए ॥
नानक जाणै साचा सोए ॥
JAPJI SAHIB HINDI SIKHIZM.COM
जे को आखै बोलुविगाड़ ॥
ता लिखीऐ सिर गावारा गावार ॥२६॥
निरंकार के जिन गुणों को कथन नहीं किया जा सकता वे अमूल्य
हैं, और इस निरंकार का सुमिरन अमूल्य व्यापार है । यह सुमिरन
रूपी व्यापार का मार्गदर्शन करने वाले संत भी अमूल्य व्यापारी हैं
और उन संतों के पास जो सद्गुणों का भण्डार है वह भी अमूल्य है
। जो व्यक्ति इन संतों के पास प्रभु-मिलाप हेतु आते हैं वे भी
अमूल्य हैं और इनसे जो गुण ले जाते हैं वे भी अमूल्य हैं । परस्पर
गुरु-सिख का प्रेम अमूल्य है, गुरु के प्रेम से आत्मा को प्राप्त होने
वाला आनंद भी अमूल्य है । अकाल-पुरुष का न्याय भी अमूल्य
है, उसका न्यायालय भी अमूल्य है । अकाल पुरुष की न्याय करने
वाली तुला अमूल्य है, और जीवों के अच्छे-बुरे कर्मों को तोलने
हेतु परिमाण (तौल) भी अमूल्य है । अकाल पुरुष द्वारा प्रदान
किए जाने वाले पदार्थ भी अमूल्य हैं और उन पदार्थों का चिन्ह
भी अमूल्य है । निरंकार की जीव पर होने वाली कृपा भी अमूल्य
है तथा उसका आदेश भी अमूल्य है । वह परमात्मा अति अमूल्य
है उसका कथन घनिष्ठता से कर पाना असम्भव है । परंतु फिर भी
अनेक भक्त जन उसके गुणों का व्याख्यान करके अर्थात् उसकी
स्तुति कर-करके भूत, भविष्य व वर्तमान काल में उसमें लिवलीन
37 | Page sikhizm.com
JAPJI SAHIB HINDI SIKHIZM.COM
हो रहे हैं। चारों वेद व अठ्ठारह पुराणों में भी उसकी महिमा कही
गई है। उनको पढ़ने वाले भी अकाल-पुरुष का व्याख्यान करते हैं
। सृष्टिकर्ता ब्रह्मा व स्वर्गाधिपति इन्द्र भी उसके अमूल्य गुणों को
कथन करते हैं। गिरिधर गोपाल कृष्ण तथा उसकी गोपियाँ भी
उस निरंकार का गुणगान करती हैं। महादेव तथा गोरख आदि
सिद्ध भी उसकी कीर्ति को कहते हैं। उस सृष्टिकर्ता ने इस जगत् में
जितने भी बुद्धिमान किए हैं वे भी उसके यश को कहते हैं।
समस्त दैत्य व देवतादि भी उसकी महिमा को कहते हैं। संसार के
सभी पुण्य-कर्मी मानव, नारद आदि ऋषि-मुनि तथा अन्य भक्त
जन उसकी प्रशंसा के गीत गाते हैं। कितने ही जीव वर्तमान में
कह रहे हैं, तथा कितने ही भविष्य में कहने का यत्न करेंगे।
कितने ही जीव भूतकाल में कहते हुए अपना जीवन समाप्त कर
चुके हैं। इतने तो हम गिन चुके हैं यदि इतने ही और भी साथ
मिला लिए जाएँ। तो भी कोई किसी साधन से उसकी अमूल्य
स्तुति कह नहीं सकता। जितना स्व-विस्तार चाहता है उतना ही
विस्तृत हो जाता है। श्री गुरु नानक देव जी कहते हैं कि वह सत्य
स्वरूप निरंकार ही अपने अमूल्य गुणों को जानता है। यदि कोई
निरर्थक बोलने वाला परमेश्वर का अंत कहे कि वह इतना है तो
उसे महामूर्खों में अंकित किया जाता है॥ २६ ॥
38 | P a g e sikhizm.com
JAPJI SAHIB HINDI SIKHIZM.COM
सो दर केहा सो घर केहा जित बह सरब समाले ॥
वाजे नाद अनेक असंखा केते वावणहारे ॥
केते राग परी सिओ कहीअन केते गावणहारे ॥
गावह तुहनो पौण पाणी बैसंतर गावै राजा धरम दुआरे ॥
गावह चित गुपत लिख जाणह लिख लिख धरम वीचारे ॥
गावह ईसर बरमा देवी सोहन सदा सवारे ॥
गावह इंद इदासण बैठे देवतेआ दर नाले ॥
गावह सिध समाधी अंदर गावन साध विचारे ॥
गावन जती सती संतोखी गावह वीर करारे ॥
गावन पंडित पड़न रखीसर जुग जुग वेदा नाले ॥
गावहे मोहणीआ मन मोहन सुरगा मछ पयाले ॥
गावन रतन उपाए तेरे अठसठ तीरथ नाले ॥
गावहे जोध महाबल सूरा गावह खाणी चारे ॥
गावहे खंड मंडल वरभंडा कर कर रखे धारे ॥
सेई तुधनो गावह जो तु भावन रते तेरे भगत रसाले ॥
होर केते गावन से मै चित न आवन नानक क्या वीचारे ॥
सोई सोई सदा सच साहिब साचा साची नाई ॥
है भी होसी जाए न जासी रचना जिन रचाई ॥
रंगी रंगी भाती कर कर जिनसी माया जिन उपाई ॥
कर कर वेखै कीता आपणा जिव तिस दी वडिआई ॥
39 | Page sikhizm.com
JAPJI SAHIB HINDI SIKHIZM.COM
जो तिस भावै सोई करसी हुकम न करणा जाई ॥
सो पातसाहो साहा पातसाहिब नानक रहण रजाई ॥२७॥
उस प्रतिपालक ईश्वर का द्वार तथा घर कैसा है, जहाँ बैठकर वह
सम्पूर्ण सृष्टि को सम्भाल रहा है ? (यहाँ पर सतिगुरु जी इस प्रश्न
की निवृति में उत्तर देते हैं) हे मानव! उसके द्वार पर नाना प्रकार के
असंख्य वादन गूंज रहे हैं और कितने ही उनको बजाने वाले
विद्यमान हैं। कितने ही राग हैं जो रागिनियों के संग वहाँ गान
किए जा रहे हैं और उन रागों को गाने वाले गंधर्व आदि रागी भी
कितने ही हैं। उस निरंकार का यश पवन, जल तथा अग्नि देव गा
रहे हैं तथा समस्त जीवों के कर्मों का विश्लेषक धर्मराज भी उसके
द्वार पर खड़ा उसकी महिमा को गाता है। जीवों द्वारा किए जाने
वाले कर्मों को लिखने वाले चित्र-गुप्त भी उस अकाल-पुरुष का
यशोगान करते हैं तथा धर्मराज चित्रगुप्त द्वारा लिखे जाने वाले
शुभाशुभ कर्मों का विचार करता है। परमात्मा द्वारा प्रतिपादित
शिव, ब्रह्मा व उनकी देवियों (शक्ति) जो शोभायमान हैं, सदैव
उसका स्तुति-गान करते हैं। हे निरंकार ! समस्त देवताओं व स्वर्ग
का अधिपति इन्द्र अपने सिंहासन पर बैठा अन्य देवताओं के
साथ मिलकर तुम्हारे द्वार पर खड़ा तुम्हारा यश गा रहे हैं। सिद्ध
लोग समाधियों में स्थित हुए तुम्हारा यश गाते हैं, जो विचारवान
40 | P a g e sikhizm.com
साधु हैं वे विवेक से यशोगान करते हैं। तुम्हारा स्तुतिगान यति,
सती और संतोषी व्यक्ति भी गाते हैं तथा पराक्रमी योद्धा भी
तुम्हारी महिमा का गान करते हैं। संसार के समस्त विद्वान व
महान् जितेन्द्रिय ऋषि-मुनि युगों-युगों से वेदों को पढ़-पढ़ कर उस
अकाल पुरुष का यशोगान कर रहे हैं। मन को मोह लेने वाली
समस्त सुन्दर स्त्रियां स्वर्ग लोक, मृत्यु लोक व पाताल लोक में
तुम्हारा गुणगान कर रही हैं। निरंकार द्वारा उत्पन्न किए हुए चौदह
रत्न, संसार के अठसठ तीर्थ तथा उन में विद्यमान संत जन (श्रेष्ठ
जन) भी उसके यश को गाते हैं। सभी योद्धा, महाबली, शूरवीर
अकाल पुरुष का यश गाते हैं, उत्पत्ति के चारों स्रोत (अण्डज,
जरायुज, स्वेदज व उदभिज्ज) भी उसके गुणों को गाते हैं।
नवखण्ड, मण्डल व सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड, जो उस सृजनहार ने बना-
बना कर धारण कर रखे हैं, वे सभी तेरी स्तुति गाते हैं। वास्तव में
वे ही तेरी कीर्ति को गा सकते हैं जो तेरी भक्ति में लीन हैं, तेरे नाम
के रसिया हैं, और जो तुझे अच्छे लगते हैं। अनेकानेक और भी
कई ऐसे जीव मुझे स्मरण नहीं हो रहे हैं, जो तुम्हारा यशोगान
करते हैं, हे नानक ! मैं कहाँ तक उनका विचार करूँ, अर्थात्
यशोगान करने वाले जीवों की गणना मैं कहाँ तक करूँ। वह
सत्यस्वरूप अकाल पुरुष भूतकाल में था, वही सद्गुणी निरंकार
वर्तमान में भी है। वह भविष्य में सदैव रहेगा, वह सृजनहार
JAPJI SAHIB HINDI SIKHIZM.COM
परमात्मा न जन्म लेता है और न ही उसका नाश होता है । जिस
सृष्टि रचयिता ईश्वर ने रंग-बिरंगी, तरह-तरह के आकार वाली व
अनेकानेक जीवों की उत्पत्ति अपनी माया द्वारा की है । अपनी
इस उत्पत्ति को कर-करके वह अपनी रुचि अनुसार ही देखता है
अर्थात् उनकी देखभाल अपनी इच्छानुसार ही करता है । जो भी
उस अकाल पुरुष को भला लगता है वही कार्य वह करता है और
भविष्य में करेगा, इसके प्रति उसको आदेश करने वाला उसके
समान कोई नहीं है । गुरु नानक जी का फुरमान है कि हे मानव !
वह ईश्वर शाहों का शाह अर्थात् शहंशाह है, उसकी आज्ञा में
रहना ही उचित है॥ २७ ॥
मुंदा संतोख सरम पत झोली ध्यान की करह बिभूत ॥
खिंथा काल कुआरी काया जुगत डंडा परतीत ॥
आई पंथी सगल जमाती मन जीतै जग जीत ॥
आदेस तिसै आदेस ॥
आद अनील अनाद अनाहत जुग जुग एको वेस ॥२८॥
गुरु जी कहते हैं कि हे मानव योगी ! तुम संतोष रूपी मुद्राएँ,
दुष्कर्मों से लाज रूपी पात्र, पाप रहित होकर लोक-परलोक में
बनाई जाने वाली प्रतिष्ठा रूपी चोली ग्रहण कर तथा शरीर को
42 | Page sikhizm.com
JAPJI SAHIB HINDI SIKHIZM.COM
प्रभु की नाम-सिमरन रूपी विभूति लगाकर रख । मृत्यु का स्मरण
करना तेरी गुदड़ी है, शरीर का पवित्र रहना योग की युक्ति है,
अकाल पुरुष पर दृढ़ विश्वास तुम्हारा डण्डा है । इन सब सदाचारों
को ग्रहण करना ही वास्तविक योगी भेष है । संसार के समस्त
जीवों में तुम्हारा प्रेम हो अर्थात् उनके दुख-सुख को तुम अपना
दुख-सुख अनुभव करो, यही तुम्हारा आई पंथ (योगियों का श्रेष्ठ
पंथ ) है । काम आदिक विकारों से मन को जीत लेना जगत् पर
विजय प्राप्त कर लेने के समान है । नमस्कार है, सिर्फ उस सर्गुण
स्वरूप निरंकार को नमस्कार है । जो सभी का मूल, रंग रहित,
पवित्र स्वरूप, आदि रहित, अनश्वर व अपरिवर्तनीय स्वरूप है॥
२८ ॥
भुगत ज्ञान दया भंडारण घट घट वाजह नाद ॥
आप नाथ नाथी सभ जा की रिध सिध अवरा साद ॥
संजोग विजोग दुए कार चलावहे लेखे आवहे भाग ॥
आदेस तिसै आदेस ॥
आद अनील अनाद अनाहत जुग जुग एको वेस ॥२९॥
हे मानव ! निरंकार की सर्व-व्यापकता के ज्ञान का भण्डार होना
तुम्हारा भोजन है, तुम्हारे हृदय की दया भण्डारिन होगी, क्योंकि
43 | Page sikhizm.com
दया-भाव रखने से ही सद्गुणों की प्राप्ति होती है। घट-घट में जो
चेतन सत्ता प्रकट हो रही है वह नाद बजने के समान है। जिसने
सम्पूर्ण सृष्टि को एक सूत्र में बांध रखा है, वही सृजनहार परमात्मा
नाथ है, सभी ऋद्धियों-सिद्धियाँ अन्य प्रकार का स्वाद हैं। संयोग
व वियोग रूपी नियम दोनों मिलकर इस सृष्टि का कार्य चला रहे
हैं, कर्मानुसार ही जीवों को अपने-अपने भाग्य की प्राप्ति होती है।
नमस्कार है, सिर्फ उस सर्गुण स्वरूप निरंकार को नमस्कार है। जो
सभी का मूल, रंग रहित, पवित्र स्वरूप, आदि रहित, अनश्वर व
अपरिवर्तनीय स्वरूप है॥ २९ ॥
एका माई जुगत विआई तेन चेले परवाण ॥
इक संसारी इक भंडारी इक लाए दीबाण ॥
जिव तिस भावै तिवै चलावै जिव होवै फुरमाण ॥
ओहो वेखै ओना नदर न आवै बहुता एहो विडाण ॥
आदेस तिसै आदेस ॥
आद अनील अनाद अनाहत जुग जुग एको वेस ॥३०॥
एक ब्रह्म की किसी रहस्यमयी युक्ति द्वारा माया की प्रसूति से तीन
पुत्र पैदा हुए। इन में से एक ब्रह्मा सृष्टि रचयिता, एक विष्णु संसार
का पोषक, और एक शिव संहारक के रूप में दरबार लगाकर बैठ
44 | P a g e
sikhizm.com