हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)
Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary
गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा
प्रारंभिक पृष्ठ एवं श्रीराधावल्लभ सम्प्रदाय भूमिका
श्री
हित
चौरासी
रसिकमनरञ्जिनी टीका
टीकाकार : परम भागवत स्वामी श्री हितदास जी महाराज
।। श्रीहित ।।
हित चौरासी
(श्री मन्महाप्रभुपाद गोस्वामी श्रीहित हरिवंशचन्द्र कृत)
रसिक मन रञ्जिनी टीका सहित
• टीकाकार •
परम भागवत स्वामी श्रीहितदास जी महाराज
हित साहित्य प्रकाशन • वृन्दावन
▢ प्रकाशक
हित साहित्य प्रकाशन
श्रीहिताश्रम सत्संग भूमि
गाँधी मार्ग, वृन्दावन-२८११२१
दूरभाष : ०५६५-२४४२१६१
▢ प्रथम संस्करण
श्रीहितोत्सव, सं. २०६५ वि.
सन् २००८
▢ न्योछावर
१०० रुपये
▢ मुद्रण-संयोजन
श्रीहरिनाम प्रेस
बाग बुन्देला, लोई बाजार, वृन्दावन-२८११२१
✆ : ०५६५-२४४२४१५
॥ श्री हित ॥
समर्पण
श्रीवृन्दावनाधिकारिणि नित्य किशोरी !
हित चौरासी की यह केलि गान माला,
तुम्हें समर्पित करते हुए मैं कितनी प्रसन्न हूँ ?
कैसे बताऊँ ? इसे और मुझे सदा
अपनी समझे रहो, बस यही मेरे लिये
परम सौभाग्य की बात होगी।
- तुम्हारी
हित दासी नेह लता
अनुक्रमणिका
निवेदन ५
श्रीमन्महाप्रभु श्रीहित हरिवंशचन्द्र-प्रशस्ति ७
श्रीहित चौरासी वाणी प्रशस्ति १४
मंगलाचरण १६
श्री गुरु वन्दना १७
श्री इष्टदेव वन्दना १७
लेखक के भावोद्गार १८
प्राक्कथन २३
हित चौरासी ५९
।। श्रीहित ।।
निवेदन
श्रीवृन्दावन रस प्राकट्यकर्ता वंशीस्वरूप रसिकाचार्य महाप्रभु श्रीहित
हरिवंश चन्द्र जी महाराज द्वारा उद्गलित श्री हित चतुरासी श्री वृन्दावन रस
की वाङगमय मूर्ति है। जिस रूप को वेदों ने रसो वै सः कहकर संकेत मात्र
किया उसे ही उसी रस ने श्रीहित हरिवंश के रूप में प्रगट होकर जीवों पर कृपा
करने के लिए वाणी का विषय बनाया जिसे हम श्रीहित चतुरासी, स्फुट वाणी
एवं श्रीराधा रस सुधा निधि के रूप में जानते हैं। यह वाणी समुद्र की तरह
अगाध एवं अपार है जिसे उनकी कृपा से ही समझा जा सकता है। यद्यपि कोई
भी टीका मूल का स्थान नहीं ले सकती है फिर भी महापुरुषों ने कृपा करके
जन सामान्य के समझने एवं रसास्वादन करने के लिए पदों में निहित भावों
को यथाशक्य प्रकट करने का प्रयास किया है। श्रीहित चतुरासी की कई
टीकाएं हैं जिनमें कुछ एक प्रकाशित भी हो चुकी हैं। हमारे गुरुवर्य प्रातः
स्मरणीय श्रीहित कृपा मूर्ति परम भागवत स्वामी श्रीहितदास जी महाराज
रसोपासना के मर्मज्ञ अधिकारी विद्वान् थे, उनके द्वारा की गई श्रीहित चतुरासी
की 'रसिक मंन रञ्जिनी" टीका हृदय स्पर्शी एवं बड़ी ही रोचक है। इसमें कई
पदों के नवीन भाव भी दिये हैं। हमारे सम्प्रदाय में पहले से ही रसिकों के द्वारा
दो प्रकार से मूल की टीका करने की परम्परा चली आ रही है। एक जिसमें मूल
के अर्थ को सुरिक्षत रखते हुए ब्रजलीला सम्बन्धित पदों को निकुंज लीला की
पृष्ठ भूमि में रखते हुए अर्थ करना और दूसरी जिसमें मूल का सिर्फ निकुंज
लीला परक ही अर्थ करना। ये दोनों परम्परायें स्वस्थ रूप से अब भी विद्यमान
हैं। मेरे गुरुवर्य श्री महाराज जी ने पहली परम्परा का ही अनुसरण किया है जो
उनको रुचिकर था। यद्यपि प्रेमी भक्तों के आग्रह पर यह टीका सन् 1950
६ • • हित चौरासी
में की गई थी परन्तु पीछे पूज्य महाराज जी इसके प्रकाशन से विरत हो गये।
यह टीका रसिक प्रेमियों के लिए उपयोगी सिद्ध होगी इस भावना से हम
प्रकाशित कर रहे हैं। इससे किसी भी प्रेमी उपासक को थोड़ा भी लाभ हुआ तो
हम अपना प्रयास सफल मानेंगे।
ग्रन्थ के प्रकाशन का श्रेय एकमात्र मेरे गुरुभ्राता संत श्री मृदुल माधव
दास जी को ही जाता है। उनकी इस सेवा से वे अपने गुरु के और निकट एवं
प्रिय हो गये हैं। इसी तरह पूज्य महाराज जी के अन्य ग्रन्थों को प्रकाशित करने
में रुचि लेते रहें ऐसी उनसे प्रार्थना है। हम श्रीहरिनाम प्रेस के भी आभारी हैं
जिन्होंने अपने सौहार्दपूर्ण व्यवहार से ग्रन्थ को शीघ्र प्रकाशित कर दिया।
– श्रीकमल दास
।। श्रीराधावल्लभो जयति ।।
।। श्रीहरिवंशचन्द्रो जयति ।।
श्रीमन्महाप्रभुपाद श्रीहित हरिवंशचन्द्र-प्रशस्ति
श्री सेवक जी
जै जै श्री हरिवंश व्यास कुल मंडना।
रसिक अनन्यनि मुख्य गुरु जन भय खण्डना।।
श्री वृन्दावन बास रास रस भूमि जहाँ।
क्रीड़त स्यामा स्याम पुलिन मंजुल तहाँ।।
पुलिन मंजुल परम पावन त्रिविध तहाँ मारुत बहै।
कुञ्ज भवन विचित्र सोभा मदन नित सेवत रहै।।
तहाँ सन्तत व्यास नन्दन रहत कलुष विहण्डना।
जै जै श्री हरिवंश व्यास कुल मण्डना।।१।।
जय जय श्री हरिवंश चन्द्र उदित सदा।
द्विज कुल कुमुद प्रकास विपुल सुख सम्पदा।।
पर उपकार विचार सुमति जग विस्तरी।
करुनासिन्धु कृपालु काल भय सब हरी।।
हरी सब कलिकाल की भय कृपा रूप जु वपु धर्यौ।
करत जे अनसहन निन्दक तिनहुँ पै अनुग्रह कर्यौ।।
निरभिमान निर्वैर निरुपम निष्कलंक जु सर्वदा।
जय जय श्री हरिवंश चन्द्र उदित सदा।।२।।
जय जय श्री हरिवंश प्रसंशित सब दुनी।
सारासार विवेकत कोविद बहु गुनी।।
गुप्तरीति आचरण प्रकट सब जग दिये।
ज्ञान धर्म व्रत कर्म भक्ति किंकर किये।।
भक्ति हित जे सरन आये द्वन्द्व दोष जु सब घटे।
कमल कर जिन अभय दीने कर्म बन्धन सब कटे।।
परम सुखद सुशील सुन्दर पाहि स्वामिन् मम धनी।
जय जय श्री हरिवंश प्रसंसित सब दुनी॥३।
जय जय श्री हरिवंश नाम गुन गाइ है।
प्रेम लक्षना भक्ति सुदृढ़ करि पाइ है॥
अरु बाढ़ै रसरीति प्रीति चित ना टरै।
जीति विषम संसार कीरति जग बिस्तरै॥
बिस्तरै सब जग विमल कीरति साधु संगति ना टरै।
वास वृन्दाविपिन पावै श्रीराधिका जु कृपा करै॥
चतुर युगल किसोर सेवक दिन प्रसादहिं पाइ है।
जय जय श्री हरिवंश नाम गुन गाइ है॥४।
श्रीहित पद पद्मैकनिष्ठ श्रीहरिराम व्यास
राधावल्लभ व्यास के इष्ट मित्र गुरुदेव।
श्री हरिवंश प्रगट कियौ, कुंज महल रस भेव॥
व्यास आस हरिवंश की, तिनहीं को बड़ भाग।
वृन्दावन की कुंज में, सदा रहत अनुराग॥
हित हरिवंश कृपा बिना, निमिष नहीं कहुँ ठौर।
व्यासदास की स्वामिनी, प्रगटी सब सिरमौर॥
गो. श्री कृष्णचन्द्रजी:
स्फुरद् वदन पंकजः कनककूट देहद्युतिः।
प्रशस्त सुख सम्पदां निधिरपूर्व मानप्रदः॥
सकृष्ण वृषभानुजा चरणमाधुरी चंचुरः।
सदा मधुर वाक्पटुर्जयति साधुवैयासकिः॥
प्रेमानन्दो पुलकित गात्रौ विद्युद्धाराधर समकान्तिः।
राधा कृष्णौ मनसि दधानं वन्देऽहं श्रीहित हरिवंशम्॥
श्रीहित वृन्दावनैकनिष्ठ श्रीप्रबोधानन्द सरस्वती :
त्वमसिहि हरिवंश श्यामचन्द्रस्य वंशः।
परम रमद नादै मोहिताशेष विश्वः॥
हित चौरासी • • ६
अनुपम गुणरत्नै र्निर्मितोऽसिद्विजेन्द्र।
मम हृदि तव गाथाश्चित्रलेखवेलग्ना।।
श्रीहरिलाल जी व्यास
राधैवेष्टं सम्प्रदायैककर्त्ताचार्य्यो राधा मन्त्रदः सद्गुरुश्च।
मंत्रो राधा यस्य सर्वात्मनैवं वन्दे राधापादपद्मप्रधानम्॥
श्री नाभा जी का छप्पय
श्रीराधा चरन प्रधान हृदय अति सुदृढ़ उपासी।
कुंज केलि दंपति तहाँ की करत खवासी॥
सर्बसु महा प्रसाद प्रसिद्ध ताके अधिकारी।
विधि निषेध नहिं दासि अनन्य उत्कट ब्रत धारी॥
श्रीव्यास सुवन पथ अनुसरै सोइ भले पहिचानि है।
(श्री) हरिवंश गुसाँई भजन की रीति सकृत कोउ जानि है॥
श्री स्वामी चतुर्भुजदास जी
हरिवंश चरण बिनु बल गहौं काकौ।
कुँवरि कुँवरवर केलि समागम वृन्दाविपिन सुखद धन जाकौ॥
मन क्रम वच सुमिरौं व्यासनन्दन मुरलीधरन इष्ट है जाकौ।
कृपा करैं श्रीराधा रानी छत्रभुज जानि गह्यौ यह नाकौ॥
श्री नागरीदास जी
प्यारौ श्री हरिवंश न होतौ।
तौ रसरीति समीति प्रीति कौ भेद भजन अधिकारी को तौ॥
लाड़िलीलाल विमल जस रस विनु जग अंधेर पर्यौ हुतौ सोतौ।
नागरीदास प्रभु प्रगट पुकार्यौ अविवेकिन कौं अजहूँ अछोतौ॥१॥
बिना कृपा राधा रानी की क्यौंव शरण हित तू की पावै।
जाकौ नाम सुनत परवस ह्वै श्याम सहित श्यामा उठि धावै॥
दम्पति रूप रसासव पीवत धर्मी धर्म बिनु और न भावै।
नागरीदास श्रीव्याससुवन बल नित्यबिहार औरनि दरसावै॥२॥
१० • • हित चौरासी
श्री हरिवंश चरण विश्राम।
साधन आराधन पुरुषारथ श्री हरिवंश चरन सुख धाम।।
सीतल रसद विसद गुन गन मय श्री हरिवंश भजन निहिकाम।
श्री हरिवंश सेइवौ स्वारथ सुधा विमल वानी अभिराम।।
जो चाहै वृन्दाविपिन माधुरी श्री हरिवंश सुमिर वरनाम।
श्री हरिवंश रति कियें नागरीदास सदा सुगम सुख स्याम स्याम।।३।।
श्रीध्रुवदास जी
प्रगट प्रेम कौ रूप धरि, श्री हरिवंश उदार।
श्रीराधावल्लभ लाल कौ, प्रगट कियौ रस सार।।१।।
करुणानिधि अरु कृपानिधि, श्रीहरिवंश उदार।
वृन्दावन रस कहन कौं, प्रगट धर्यौ अवतार।।२।।
प्रथम नाम हरिवंश हित, रटि रसना दिन रैन।
प्रीति रीति तब पाइयै, अरु वृन्दावन ऐन।।३।।
हरिवंश चरण उर धरनि धरि, मन बच करि विश्वास।
कुँवरि कृपा ह्वै है तबहि, अरु वृन्दावन वास।।४।।
अगम तें अगम अगाध अति, पहुँचत नहिं मन वेद,
श्री हरिवंश प्रताप बल, पावत सुगम सुभेद।।५।।
श्री कल्याण पुजारी जी
जाके सिर ऊपर श्री व्यासनन्द से धनी हैं
ताहि न परवाह कछू काहू और ठौर की।
चलत सु पथ साधु लक्षन तें जानियत
वानी मुख कहत रसिक सिरमौर की।।
श्रवन सुनत नैन देखत हैं रूप मन
ध्यावत स्वरूप शोभा-सिन्धु में झकोर की।
सदाई कल्याण रस फूले फिरैं प्रेमी जन
गुनन गम्भीर धीर मिटी सब रौर की।।१।।
हित चौरासी • • ११
श्रीवंशी अली जी
श्री हरिवंश की यह वानि।।
करत जे अनसहन निन्दक तिनहिं हित सरसान।।
जान रस वस आस राधा वास महल निदान।
कुंज सेवा पुंज विलसत गुंज गहि गहि पान।।
सूर्य तनया निकट निजपुर नूत पल्लव वान।
सखीजन की भीर भाजन लियें वहु विधि आन।।
चरण चंचल पलक अचंल ढाँकि प्यारी पान।
वदत वंशी अलिहि अंशी मत्त मुख रसखान।।
श्रीकिशोरी अली जी
हित विन कैसौ विपिन विहार।
हित राजत प्यारी पिय के हिय हित ही सकल सुखन आधार।
हित ही सौं सिंगार करावत हित ही भूषन वसन अपार।
छिन छिन चोंज होत हितही के जुगल खिलौना हित खिलवार।
हित की सेज बिराजत दोऊ हित कौ नवल निकुंज अगार।
हित सौं फूलि रहीं बेली तरु शुक कोकिल गावत हितसार।
यमुना पुलिन रास रचनादिक फैलि रह्यौ हित कौ विस्तार।
श्री वनमें हित व्यापि रह्यौ है हित सौं हित ही कौ व्यौहार।
सोई प्रगट भयौ हित हरि कौ सकल जगत कीनौ उद्धार।
हित हरिवंश नाम के ऊपर अली किशोरी वलि वलिहार।
श्रीप्रियादास जी गौड़िया
श्रीहरिवंश गोसाई भजौ।। कुंजकेलि रस ही में सजौ।।
हितजू की रीति कोऊ लाखनि में एक जानैं,
राधा ही प्रधान मानै पाछै कृष्ण ध्याइयै।
निपट विकट भाव, होत न सुभाव ऐसौ,
उनहीं की कृपा दृष्टि नेंकु क्यौं हूँ पाइयै।।
१२ • • हित चौरासी
बिधि औ निषेध छेदि डारे; प्रान प्यारे
हिये जिये निज दास निसिदिन वहै गाइयै।
सुखद चरित्र, सब रसिक बिचित्रन के
जानत प्रसिद्ध, कहा कहिकैं सुनाइयै॥
आए गृह त्यागि, राग बढ्यौ प्रिया प्रीतम सों,
बिप्र बड़भाग हरि आग्या दई हरि जानियै।
तेरी उभै सुता, ब्याहि देवौ लेवौ नाम मेरौ,
इनिकौ जौ बंस प्रसंश जग जानियै॥
ताही द्वार सेवा बिस्तार निज भक्तिनि की
अगतिन गति, सो प्रसिद्धि पहिचानियै।
मानि प्रिय बात गह गह्यौ सुख लह्यौ तब,
कह्यौ कैसें जात यह मन मन आनियै॥
राधिका बल्लभ लाल आग्या सो रसाल दई
सेवा मो प्रकास औ बिलास कुंज धाम कौ।
सौई बिस्तार सुखसार दृग रूप पियौ,
दियौ रसिकनि जिनि लियौ पक्ष बाम कौ॥
निसदिन गान रस माधुरी कौ पान उर
अंतर सिहान एक काम स्यामा स्याम कौ।
गुन सो अनूप कहि, कैसे कै सरुप कहैं
लहै मनमोद; जैसे ओर नहीं नाम कौ॥
श्रीभगवत मुदित जी गौड़िया
जै जै श्री हरिवंश हंस हित कोबिद वानी।
ललिता ललित प्रशंस केलि कल दशा बखानी॥
जयति जयति वन जयति जयति श्री राधारवनी।
जयति जयति ललितादिक जयति हित कौतिक कवनी॥
हित चौरासी • • १३
चाचा श्रीहित वृन्दावनदास जी
रसिक सभा-भूषण द्विजवर-कुल,
व्यासनंद-पद सुरतरू रस कौ।
भाग्य भलौ जग प्रगट प्रकाश्यौ,
किधौं चिन्तामणि राधा-जस कौ॥
परम अलौकिक कामधेनु मनु,
दाइक मिथुन गुपत-गुण गंस कौ।
वृन्दावन हित रूप जाऊँ बलि,
दियौ कर सीस प्रेम पारस कौ॥
को दाता नित्यविहार कौ।
श्री हरिवंश उभय रस मूरति बिनु को जग उपकार कौ॥
को वपुरा गुन गुपत कहैगौ वन रस रसिक उदार कौ।
को भेदी हिय हिलग मिथुन कौ बिनु उहि परिकर लार कौ॥
जननि भाग कौ उद्भव जानौ कलि वंशी अवतार कौ।
वृन्दावन हित जिहिं दत प्रापति कुंज केलि सुख सार कौ॥
श्रीप्रियादास जी रीवाँ
जापै कृपा करै श्री हरिवंश सु तापै दयाल सदा हरि राधा।
जाकौ नहीं हित सौं हित है टुक ताकी न मेटि सकें हरि बाधा॥
याकौ तौ भेद अनन्य लखैं अरु औरन कौं अति गूढ़ अगाधा।
प्रियादास कृपा हित की तें मिल्यौ रस कुंज कौ दर्श पुरी मन साधा॥
श्रीरतनदास जी
नमो नमो जै श्री हरिवंश।
जुगल मूल रस फूल झूल लगे गौर श्याम हित हेत निसंस॥
नेति नेति रस सबनि जु गायौ खोजत किनहुँ न पाई गंस।
करी कृपा वपु प्रेम रूप धरि दियौ दरशाय यह गूढ़ प्रसंस॥
चरण शरण जे हित के अनुसरे तोरि जगत सब माया फंस।
सबनि लहे अरु अबहू लहंत हैं नित नवीन यह प्रेम सतंश॥
१४ • • हित चौरासी
गुरु सहचरि गोवर्धन स्वामिनि परस्यौ पदनि कृपा भयौ हंश।
प्रेम पुलक तन मन आनन्दित रतनदास के हिय अवतंश॥
परम भागवत स्वामी श्री हितदास जी महाराज
वन्दे तारा तनय मुदारम।
आगम निगम अलक्ष्य अगोचर,
प्रगटित विसद सु विपिन विहारम्॥
रसिक सभा मंडन रस भूषण,
निज हित रीति प्रीति विस्तारम्।
श्रीराधा रति केलि कुंज रस,
रसिक अनन्य वहन रसभारम्॥
निरभिमान करुना-वरुनालय,
आरत सरनागत प्रतिपारम्।
'नेहलता हित' देहि दयामय,
निज पद-पल्लव रसघन सारम्॥
श्री हित चौरासी वाणी प्रशस्ति
गो. श्री हित रूपलाल जी महाराज
भव-जल-निधि कौ नाव काम पावक कौ पानी।
प्रेम-भक्ति कौ मूल मोद मंगल सुखदानी॥
निगम सार सिद्धांत संत विश्राम मधुर वर।
रसिकन कौ रस-सार सकल अक्षर रस कौ घर॥
चौरासी (श्री) 'हरिवंश' कृत पढ़ै सुनै निसि-भोर।
छुटै-चौरासी भ्रमनि तें निरखै जुगल किशोर॥
निरखै जुगल किशोर भोर अरु रैन न जानै।
पियै रूप रस मत्त भयौ कछु मनहि न आनै॥
प्रेम लक्षना भक्ति होय हिय आनन्द कारी।
अरु वृन्दावन वास सखी सुख कौ अधिकारी॥
कुञ्ज महल की टहल सुख सम्पत्ति दम्पति पाइहै।
(जयश्री) रूप लाल हित प्रीति सौ जो चौरासी गाइहै॥
हित चौरासी • • १५
श्रीनेही नागरीदास जी
गिरा गंभीर गुननि गरबीली।
सुजन सनेहिन के मन आवै, औरन कौ ओरठ अरबीली।।
श्री हरिवंश वचन वर कल, कढ़ी स्वच्छ सुछंद सुछैल छबीली।
नागरीदास मकरंद माधुरी रूप रंग रस रसिनि रसीली।।
वानी विमल लाड़ की परावधि।
श्री हरिवंश वचन वर निकसी बड़भागिनु जो आवै कहाँ सधि।।
रूप रंग रस कुसल कुलाहल जामहि अमित-अगाध लवधि लधि।
नागरिदास भजन कौ मरमी सुख निधि-व्याससुवन पद आरधि।।
श्री हरिवंश गिरा पद अष्टक।
कहत सुनत ताकौ मन सुधरै कपटी होइ कुटिल खलु निष्टक।।
प्रबल प्रताप ध्वंस असुभ निकर रहत न पावै कंटक किष्टक।
सदगद नागरीदास रसिक मनि कैसेहूँ करि-रमै मिटै मति भिष्टक।।
श्री किशोरी अलीजी
जय श्री चतुरासी रस रासी।
हित हरिवंश चन्द्र तैं प्रगटी दम्पति-प्रेम प्रकासी।।
ललित केलि की सरिता मानौं उमड़ि चली अनयासी।
रसिक उपासक रुचि सौं पीवत जीवत श्रीवन बासी।।
वक्ता-श्रोता कौ अपनावै नवल निकुंज विलासी।
ताही छिन परिकर तन दैकै करत किशोरी दासी।।
श्रीहित कल्याण पुजारी जी
श्री हरिवंश गिरा घन बरसै।
प्रेमी रसिक उपासक सींचे, सरस सुजस मन करषै।।
छिन-छिन चौप कोंप उर बाढ़ति, भजन भावना हरषै।
यह 'कल्याण' प्रेम जल उमग्यौ, नेम-मरजादनि न रखै।।
॥ श्रीहित ॥
॥ श्रीराधा वल्लभो जयति ॥
मङ्गलाचरण
नवल चंद प्रिया बदन, अति अनूप रूप सदन,
हँसनि नवल मंद चपल चितवन सुखदाई।
नवल अधर सरस लाल दसन झलक छबि रसाल,
छिन छिन छबि होत नवल मन नहिं ठहराई॥
निरखत सोभा गँभीर बिसरे पिय नैन चीर,
मनहुँ कमल रहे फूलि तरनि उदय माई।
नवल प्रिया नव किसोर नवल सखी चहूँ ओर,
विमल प्रेम ऊपर 'हित ध्रुव' बलि जाई॥
- हितदास
निभृत निकुञ्ज विलासी
ठाकुर श्रीश्रीराधावल्लभलालजी महाराज
वंशी अवतार, प्रेमस्वरूप, रसिकाचार्य
अनन्त श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु जी महाराज
रसिकावतंश
श्रीदामोदरदासजी महाराज
(श्रीसेवकजी)