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गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि

DevanagariHindipublished675 pages

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Page 445

४४४ * गीता-संग्रह *


दूसरा अध्याय

ब्रह्मविद्याका उपदेश तथा अनासक्तयोगका वर्णन

हिमालय उवाच

विद्या वा कीदृशी मातर्यतो मुक्तिः प्रजायते।
आत्मा वा किं स्वरूपश्च तन्मे ब्रूहि महेश्वरि॥ १॥

हिमालय बोले—माता! वह कैसी विद्या है, जिससे मुक्ति प्राप्त होती है? महेश्वरी! आत्मा क्या है तथा उसका स्वरूप क्या है? यह मुझे बताइये॥ १॥

श्रीपार्वत्युवाच

शृणु तात प्रवक्ष्यामि या संसारनिवर्तिका।
विद्या तस्याः स्वरूपं हि संक्षेपेण महामते॥ २॥

श्रीपार्वतीजी बोलीं—तात! महामते! सुनिये, संसारसे मुक्ति दिलानेवाली जो विद्या है, उसके स्वरूपका मैं संक्षेपमें वर्णन कर रही हूँ॥ २॥

बुद्धिप्राणमनोदेहाहंकृतीन्द्रियतः पृथक्।
अद्वितीयश्चिदात्माहं शुद्ध एवेति निश्चितम्॥ ३॥
संवेत्ति येन ज्ञानेन विद्या तद्ध्यानमुच्यते।
आत्मा निरामयः शुद्धो जन्मनाशादिवर्जितः॥ ४॥

बुद्धि, प्राण, मन, देह, अहंकार और इन्द्रियोंसे अलग शुद्ध और अद्वितीय चित्स्वरूप आत्मा मैं ही हूँ। ऐसा पूर्णतः निश्चित है। जिस ज्ञानके द्वारा आत्मस्वरूपका सम्यक् अवबोध होता है, वही विद्या है और उसी विद्याको ध्यान भी कहा जाता है। आत्मा निर्विकार, विशुद्ध तथा जन्म-मरण आदिसे रहित है॥ ३-४॥

बुद्ध्याद्युपाधिरहितश्चिदानन्दात्मको मतः।
आनन्दः सुप्रभः पूर्णः सत्यज्ञानादिलक्षणः॥ ५॥