गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि
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Read in context- भगवतीगीता *
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घृणां वितत्य सर्वत्र पुत्रमित्रादिकेष्वपि।
वेदान्तादिषु शास्त्रेषु संनिविष्टमना भवेत्॥ ६८॥
कामादिकं त्यजेत्सर्वं हिंसां चापि विवर्जयेत्।
एवं कृत्वा परां विद्यां जानीते नात्र संशयः॥ ६९॥
यदैवात्मा महाराज प्रत्यक्षमनुभूयते।
तदैव जायते मुक्तिः सत्यं सत्यं ब्रवीमि ते॥ ७०॥
पुत्र-मित्रादिसे सम्बन्धोंमें अनासक्त होकर वेदान्तादि शास्त्रोंके अभ्यासमें दत्तचित्त रहना चाहिये। ऐसे साधकको काम-क्रोधादि विकारोंका तथा सभी प्रकारकी हिंसाका पूर्णरूपसे त्याग करना चाहिये। ऐसा करनेसे उसे निःसंदेह पराविद्याका ज्ञान प्राप्त हो जाता है। महाराज! जब इस आत्माकी प्रत्यक्षानुभूति होती है, उसी क्षण मुक्ति हो जाती है। यह निश्चित सत्य बात आपके लिये मैं बता रही हूँ॥ ६८—७०॥
किंत्वेतद्दुर्लभं तात मद्भक्तिविमुखात्मनाम्।
तस्माद्भक्तिः परा कार्या मयि यत्नान्मुमुक्षुभिः॥ ७१॥
किंतु पिताजी! मेरी भक्तिसे विमुख प्राणियोंके लिये यह प्रत्यक्षानुभूति अत्यन्त दुर्लभ है। इसलिये मोक्षसाधकोंको यत्नपूर्वक मेरी भक्तिमें ही संलग्न रहना चाहिये॥ ७१॥
त्वमप्येवं महाराज मयोक्तं कुरु सर्वदा।
संसारदुःखैरखिलैर्बाध्यसे न कदाचन॥ ७२॥
महाराज! आप भी मेरे बताये अनुसार करेंगे तो संसारके समस्त दुःखोंसे कभी बाधित नहीं होंगे॥ ७२॥
॥ इति श्रीदेवीपुराणे भगवतीगीतायां श्रीपार्वती-हिमालयसंवादे प्रथमोऽध्यायः॥ १॥