गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि
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- गीता-संग्रह *
पूजायज्ञादिकं कुर्याद्यथाविधिविधानतः।
श्रुतिस्मृत्युदितैः सम्यक् स्ववर्णाश्रमवर्णितैः॥ ६२॥
सर्वयज्ञतपोदानैर्मामेव हि समर्चयेत्।
ज्ञानात्सञ्जायते मुक्तिर्भक्तिर्ज्ञानस्य कारणम्॥ ६३॥
धर्मात्सञ्जायते भक्तिर्धर्मो यज्ञादिको मतः।
तस्मान्मुमुक्षुर्धर्मार्थं ममेदं रूपमाश्रयेत्॥ ६४॥
उसे श्रुति तथा स्मृतिमें बताये गये अपने वर्णाश्रमधर्मके अनुसार विधि-विधानसे मेरी पूजा और यज्ञ आदि सम्पन्न करने चाहिये। सभी यज्ञ, तप और दानसे मेरी ही अर्चना करनी चाहिये। ज्ञानसे मुक्ति होती है और भक्तिसे ज्ञान होता है। धर्मसे भक्तिका उदय होता है और यज्ञ-यागादि धर्मके ही रूप हैं, इसलिये मोक्षार्थीको धर्मरूपी यज्ञार्चन आदिके लिये मेरे इस रूपका आश्रय लेना चाहिये॥ ६२-६४॥
सर्वाकाराहमेवैका सच्चिदानन्दविग्रहा।
मदंशेन परिच्छिन्ना देहाः स्वर्गौकसां पितः॥ ६५॥
तस्मान्मामेव विध्युक्तैः सकलैरैव कर्मभिः।
विभाव्य प्रयजेद्भक्त्या नान्यथा भावयेत्सुधीः॥ ६६॥
पिताजी! सभी आकारोंमें एकमात्र मैं ही विद्यमान हूँ और स्वर्गके देवता मुझ सच्चिदानन्दरूपाके अंशसे ही उत्पन्न हैं। इसलिये वेदोक्त सभी कर्मोंसे भक्तिपूर्वक मेरा ही अर्चन करना चाहिये। बुद्धिमान् व्यक्तिको अन्य कोई विचार नहीं करना चाहिये॥ ६५-६६॥
एवं वियुक्तकर्माणि कृत्वा निर्मलमानसः।
आत्मज्ञानसमुद्युक्तो मुमुक्षुः सततं भवेत्॥ ६७॥
इस प्रकार अनासक्तभावसे कर्मोंको सम्पन्न करके विशुद्ध अन्तःकरणवाले मोक्षार्थी साधकको आत्मज्ञानकी प्राप्तिमें निरन्तर प्रयत्नशील होना चाहिये॥ ६७॥