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गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि

DevanagariHindipublished675 pages

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* भगवतीगीता * ४४१


चरणकमलोंकी शरणमें हूँ। मा! क्योंकि आप कालकी भी काल हैं, इसलिये आपको लोग महाकाली कहते हैं। आप मुझे कृपापूर्वक उस उत्तम ब्रह्मविद्याकी शिक्षा दें, जिससे मैं इस अपार संसारसागरको सरलतापूर्वक पार कर जाऊँ॥ ५५–५७॥

श्रीपार्वत्युवाच

शृणु तात प्रवक्ष्यामि योगसारं महामते।
यस्य विज्ञानमात्रेण देही ब्रह्ममयो भवेत्॥ ५८॥

श्रीपार्वतीजी बोलीं— पिताजी! महामते! सुनिये, मैं उस योगका सार बताती हूँ, जिसके जाननेमात्रसे प्राणी ब्रह्मस्वरूप हो जाता है॥ ५८॥

गृहीत्वा मम मन्त्रान्वै सद्गुरोः सुसमाहितः।
कायेन मनसा वाचा मामेव हि समाश्रयेत्॥ ५९॥

सद्गुरुसे मेरे मन्त्रको ग्रहण करके स्थिरचित्त हो साधकको शरीर, मन और वाणीसे मेरा ही आश्रय ग्रहण करना चाहिये॥ ५९॥

मच्चित्तो मद्गतप्राणो मन्नामजपतत्परः।
मत्प्रसङ्गो मदालापो मद्गुणश्रवणे रतः॥ ६०॥
भवेन्मुमुक्षू राजेन्द्र मयि भक्तिपरायणः।
मदर्चाप्रीतिसंसक्तमानसः साधकोत्तमः॥ ६१॥

मुमुक्षुको चाहिये कि वह मेरेमें ही चित्त और प्राणको लगाये रखे, तत्परतापूर्वक मेरे नामका जप करता रहे, मेरे गुण और लीला-कथाओंके श्रवणमें लगा रहे, वह मुझसे वार्तालाप करनेवाला हो और मुझसे शाश्वत सम्बन्ध बनाये रखे तथा राजेन्द्र! वह उत्तम साधक मेरी भक्तिमें परायण होकर अपना चित्त मेरी पूजाके प्रति अनुरक्त रखे॥ ६०-६१॥