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गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि

DevanagariHindipublished675 pages

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* गीता-संग्रह *


श्रीदेव्युवाच
त्वया मातस्तथा पित्राप्यनेनाराधिता ह्यहम्।
महोग्रतपसा पुत्रीं लब्धुं मां परमेश्वरीम् ॥ ५२ ॥
युवयोस्तपसस्तस्य फलदानाय लीलया।
नित्या लब्धवती जन्म गर्भे तव हिमालयात् ॥ ५३ ॥
**श्रीदेवीजी बोलीं—**माता! आपने और पिताजीने उग्र तपस्यासे मुझ परमेश्वरीको पुत्रीरूपमें पानेके लिये आराधना की थी। आप दोनोंके उस तपका फल देनेके लिये ही लीलापूर्वक मैंने नित्या प्रकृति होकर भी हिमालयके द्वारा आपके गर्भसे जन्म लिया है॥ ५२-५३ ॥

श्रीमहादेव उवाच
ततो गिरीन्द्रस्तां देवीं प्रणिपत्य पुनः पुनः।
पप्रच्छ ब्रह्मविज्ञानं प्राञ्जलिर्मु निसत्तम ॥ ५४ ॥
**श्रीमहादेवजी बोले—**मुनिश्रेष्ठ! तब गिरिराज हिमालयने उन देवीको बारम्बार प्रणाम करके हाथ जोड़कर ब्रह्मविज्ञान (ब्रह्मविषयक अपरोक्षानुभूति-सम्बन्धी ज्ञान)-की जिज्ञासा की॥ ५४ ॥

हिमालय उवाच
मातस्त्वं बहुभाग्येन मम जातासि कन्यका।
ब्रह्माद्यैर्दुर्लभा योगिदुर्गम्या निजलीलया ॥ ५५ ॥
अहं तव पदाम्भोजं प्रपन्नोऽस्मि महेश्वरि।
यथाञ्जसा तरिष्यामि संसारापारवारिधिम् ॥ ५६ ॥
यस्मात्कालस्य कालस्त्वं महाकालीति गीयसे।
तस्मात्त्वं शाधि मातर्मां ब्रह्मविज्ञानमुत्तमम् ॥ ५७ ॥
**हिमालय बोले—**मा! आप बड़े भाग्यसे मेरी पुत्रीके रूपमें आयी हैं, यह आपकी लीला ही है; क्योंकि आप ब्रह्मादि देवगण और योगियोंके लिये भी अगम्य और दुर्लभ हैं। महेश्वरी! मैं आपके