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गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि

DevanagariHindipublished675 pages

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Page 438
  • भगवतीगीता * ४३७

भुजाओंसे युक्त, विशाल नेत्रोंवाली एवं मस्तकपर चन्द्ररेखासे सुशोभित हैं तथा आप कल्याणकारिणीने लीलापूर्वक स्वयं ही मेरे घरमें जन्म लिया है। उदीयमान करोड़ों चन्द्रमाओंकी शीतल कान्तिसे युक्त नयनोंवाली, त्रिनेत्रा, बालस्वरूपा आप भगवती जगन्माताको मैं भक्तिपूर्वक प्रणाम करता हूँ, आप प्रसन्न हों॥ ४०॥

रूपं ते रजताद्रिकान्तिविमलं नागेन्द्रभूषोज्ज्वलं
घोरं पञ्चमुखाम्बुजत्रिनयनैर्भीमैः समुद्भासितम्।
चन्द्रार्धाङ्कितमस्तकं धृतजटाजूटं शरण्ये शिवे
भक्त्याहं प्रणमामि विश्वजननि त्वां त्वं प्रसीदाम्बिके ॥ ४१ ॥

शिवे ! आपका रूप चाँदीके पर्वतकी कान्तिके समान उज्ज्वल है, आपने सर्पराजका सुन्दर आभूषण धारण किया है। दुर्जनोंके लिये भय उत्पन्न करनेवाले पाँच मुखकमलों और भयानक तीन नयनोंसे आप सुशोभित हैं। अर्धचन्द्रसहित जटाजूटको आपने मस्तकपर धारण कर रखा है। शरणदात्री विश्वजननी ! आपको भक्तिपूर्वक मैं प्रणाम करता हूँ। अम्बिके ! आप प्रसन्न हों॥ ४१॥

रूपं शारदचन्द्रकोटिसदृशं दिव्याम्बरं शोभनं
दिव्यैराभरणैर्विराजितमलं कान्त्या जगन्मोहनम्।
दिव्यैर्बाहुचतुष्टयैर्युतमहं वन्दे शिवे भक्तितः
पादाब्जं जननि प्रसीद निखिलब्रह्मादिदेवस्तुते ॥ ४२ ॥

भवानी ! कोटिशरच्चन्द्रके समान उज्ज्वल रूप और दिव्य वस्त्राभरणोंसे आप सुशोभित हैं। आपका जगन्मोहनरूप चार दिव्य भुजाओंसे युक्त है, ब्रह्मादि समस्त देवगण आपकी स्तुति करते हैं। माता ! आपके चरणकमलोंमें मैं भक्तिपूर्वक प्रणाम करता हूँ, आप प्रसन्न हों॥ ४२॥

रूपं ते नवनीरदद्युतिरुचिफुल्लाब्जनेत्रोज्ज्वलं
कान्त्या विश्वविमोहनं स्मितमुखं रत्नाङ्गदैर्भूषितम्।