गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि
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लीलाका वर्णन मैं कैसे करूँ? जिसका ब्रह्मादि भी पार नहीं पा सकते॥ ३७॥
त्वं स्वाहाखिलदेवतृप्तिजननी विश्वेशि त्वं वै स्वधा
पितॄणामपि तृप्तिकारणमसि त्वं देवदेवात्मिका।
हव्यं कव्यमपि त्वमेव नियमो यज्ञस्तपो दक्षिणा
त्वं स्वर्गादिफलं समस्तफलदे देवेशि तुभ्यं नमः॥ ३८॥
विश्वेश्वरी! आप ही स्वाहारूपसे सभी देवताओंकी तृप्तिकारिका, स्वधारूपसे पितरोंकी तृप्तिका कारण और महादेवप्रिया हैं। आप ही हव्य और कव्य हैं। आप ही नियम, यज्ञ, तप और दक्षिणा हैं। आप ही स्वर्गादि लोकोंको प्रदान करनेवाली हैं तथा समस्त कर्मोंका फल प्रदान करनेमें आप ही समर्थ हैं। महादेवी! आपको प्रणाम है॥ ३८॥
रूपं सूक्ष्मतमं परात्परतरं यद्योगिनो विद्यया
शुद्धं ब्रह्ममयं वदन्ति परमं मातः सुदृप्तं तव।
वाचा दुर्विषयं मनोऽतिगमपि त्रैलोक्यबीजं शिवे
भक्त्याहं प्रणमामि देवि वरदे विश्वेश्वरि त्राहि माम्॥ ३९॥
माता! जिस आपके परसे भी परतर सूक्ष्मतम रूपका योगिजन शुद्ध ब्रह्मके रूपमें वर्णन करते हैं, शिवे! वह आपका मोहक रूप मन और वाणीके लिये अगम्य और त्रैलोक्यका मूल कारण है। वरदायिनी भगवती! मैं आपको भक्तिपूर्वक प्रणाम करता हूँ। विश्वेश्वरी! मेरी रक्षा करें॥ ३९॥
उद्यत्सूर्यसहस्रभां मम गृहे जातां स्वयं लीलया
देवीमष्टभुजां विशालनयनां बालेन्दुमौलिं शिवाम्।
उद्यत्कोटिशशाङ्ककान्तिनयनां बालां त्रिनेत्रां परां
भक्त्या त्वां प्रणमामि विश्वजननीं देवि प्रसीदाम्बिके॥ ४०॥
जगदम्बे! आप सहस्रों उदीयमान सूर्योंके समान आभावाली, आठ