Skip to content
SarvaKosh
गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि

DevanagariHindipublished675 pages

Page 439 of 675

Read in context
Page 439

४३८ * गीता-संग्रह *


विभ्राजद्वनमालयाविलसितोरस्कं जगत्तारिणि
भक्त्याहं प्रणतोऽस्मि देवि कृपया दुर्गे प्रसीदाम्बिके ॥ ४३ ॥

दुर्गे ! जलधरकी आभायुक्त नवीन और खिले हुए कमलके समान उज्ज्वल नेत्रवाला आपका रूप अपनी कान्तिसे विश्वको विमोहित करनेवाला है। आपके मुखपर मुसकान सुशोभित है, आपके गलेमें वनमाला और अंगोंपर रत्नजटित अंगद आदि आभूषण सुशोभित हो रहे हैं। जगत्का उद्धार करनेवाली देवी ! मैं आपको भक्तिपूर्वक प्रणाम करता हूँ, अम्बिके! कृपा करके आप प्रसन्न हों ॥ ४३ ॥

मातः कः परिवर्णिंतुं तव गुणं रूपं च विश्वात्मकं
शक्तो देवि जगत्त्रये बहुगुणैर्देवोऽथवा मानुषः।
तत् किं स्वल्पमतिर्ब्रवीमि करुणां कृत्वा स्वकीयैर्गुणै-
र्नो मां मोहय मायया परमया विश्वेशि तुभ्यं नमः ॥ ४४ ॥

जगदम्बे ! आपके विश्वात्मक रूप और गुणको सर्वात्मना वर्णन करनेमें तीनों लोकोंमें देवता अथवा मनुष्य कोई भी सक्षम नहीं है। फिर मैं अल्पमति उसका कैसे वर्णन करूँ ? आप अपने स्वाभाविक गुणोंसे मुझपर दया करते हुए अपनी परम मायासे मुझे मोहित न करें। विश्वेश्वरि ! आपको नमस्कार है ॥ ४४ ॥

अद्य मे सफलं जन्म तपश्च सफलं मम।
यत्त्वं त्रिजगतां माता मत्पुत्रीत्वमुपागता ॥ ४५ ॥
धन्योऽहं कृतकृत्योऽहं मातस्त्वं निजलीलया।
नित्यापि मद्गृहे जाता पुत्रीभावेन वै यतः॥ ४६ ॥
किं ब्रुवे मेनकायाश्च भाग्यं जन्मशतार्जितम्।
यतस्त्रिजगतां मातुरपि माता भवेत्तव ॥ ४७ ॥

आज मेरा जन्म और तप सफल हुआ, जो त्रिलोकजननी आप मेरी पुत्रीके रूपमें आयीं। मा! मैं धन्य और कृतार्थ हुआ, जो कि