गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि
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Read in context* भगवतीगीता * ४३५
नीलोत्पलदलश्यामं वनमालाविभूषितम्।
शङ्खचक्रगदापद्ममभिव्यक्तं चतुर्भुजम्॥ ३४॥
श्रीमहादेवजी बोले—अपने पिता पर्वतराजके द्वारा ऐसा कहनेपर जगदम्बा पार्वतीने अपने उस रूपको भी समेटकर एक दिव्य रूप धारण किया। नीलकमलके समान सुन्दर श्यामवर्ण एवं वनमालासे विभूषित उस रूपकी चारों भुजाओंमें शङ्ख, चक्र, गदा और पद्म सुशोभित थे॥ ३३-३४॥
एवं विलोक्य तद्रूपं शैलानामधिपस्ततः।
कृताञ्जलिपुटः स्थित्वा हर्षेण महता युतः॥ ३५॥
स्तोत्रेणानेन तां देवीं तुष्टाव परमेश्वरीम्।
सर्वदेवमयीमाद्यां ब्रह्मविष्णुशिवात्मिकाम्॥ ३६॥
उनके उस रूपको देखकर शैलराज हाथ जोड़कर अत्यन्त हर्षपूर्वक ब्रह्मा, विष्णु तथा शिवस्वरूपा सर्वदेवमयी उन आदिशक्ति जगदम्बाका इस स्तोत्रसे स्तवन करने लगे—॥ ३५-३६॥
हिमालय उवाच
मातः सर्वमयि प्रसीद परमे विश्वेशि विश्वाश्रये
त्वं सर्वं नहि किञ्चिदस्ति भुवने तत्त्वं त्वदन्यच्छिवे।
त्वं विष्णुर्गिरिशस्त्वमेव नितरां धातासि शक्तिः परा
किं वर्ण्यं चरितं त्वचिन्त्यचरिते ब्रह्माद्यगम्यं मया॥ ३७॥
हिमालय बोले—माता! आप प्रसन्न हों, आप परम शक्ति हैं, आपमें सब कुछ सन्निहित है, आप ही इस चराचर जगत्की अधिष्ठात्री और परम आश्रय हैं। शिवे! आप ही सब कुछ हैं, इस त्रिभुवनमें आपके अतिरिक्त अन्य कोई तत्त्व विद्यमान नहीं है। आप ही ब्रह्मा, विष्णु और महेश हैं और आप ही पराशक्ति हैं। आपकी अचिन्त्य