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भक्तियोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

Bhakti Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)

by स्वामी विवेकानन्द / प्रा. डॉ. विद्याभास्कर शुक्ल

DevanagariHindipublished140 pages

भक्तियोग का ध्येय—प्रत्यक्षानुभूति २५

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भक्तियोग का ध्येय—प्रत्यक्षानुभूति २५

प्रत्येक मन की विशिष्ट आकांक्षाओं के अनुसार उपयोगिता का रूप भी बदलता रहता है। जिस व्यक्ति को जिस वस्तु की आवश्यकता होती है, उसे वही सबसे उपयोगी जान पड़ती है। अतः उन लोगों के लिए, जो खाने-पीने, वंशवृद्धि करने और फिर मर जाने के सिवा और कुछ नहीं जानते, इन्द्रिय-सुख ही एकमात्र लाभ करने योग्य वस्तु है! ऐसे लोगों के हृदय में उच्चतर विषय के लिए थोड़ीसी भी स्पृहा जगने के लिए अनेक जन्म लग जायँगे। पर जिनके लिए आत्मोन्नति के साधन ऐहिक जीवन के क्षणिक सुख-भोगों से अधिक महत्वपूर्ण हैं, जिनकी दृष्टि में इन्द्रियों की तुष्टि केवल एक नासमझ बच्चे के खिलवाड़ के समान है, उनके लिए भगवान और भगवत्प्रेम ही मानव-जीवन का सर्वोच्च एवं एकमात्र प्रयोजन है। ईश्वर की कृपा है कि आज भी यह घोर भोगलिप्सापूर्ण संसार ऐसे महात्माओं से बिलकुल शून्य नहीं हो गया है।

पहले कहा जा चुका है कि भक्ति दो प्रकार की होती है, ‘गौणी’ और ‘परा’। ‘गौणी’ का अर्थ है साधन-भक्ति, अर्थात् जिसमें हम भक्ति को एक साधन के रूप में लेते हैं, और ‘परा’ इसी की परिपक्वावस्था है। क्रमशः हम समझ सकेंगे कि इस भक्तिमार्ग में अग्रसर होने के लिए साधनावस्था में कुछ बाह्य सहायता लिए बिना काम नहीं बनता। और वास्तव में सभी धर्मों के पौराणिक और रूपक भाग आप ही आ उपस्थित होते हैं तथा उन्नति-कामी आत्मा की प्रारम्भिक अवस्था में उसे ईश्वर की ओर बढ़ने में सहायता देते हैं। यह भी एक महत्वपूर्ण बात है कि बड़े-बड़े धर्मात्मा उन्हीं धर्मसम्प्रदायों में हुए हैं, जिनमें पौराणिक भावों और क्रिया-अनुष्ठानों की