भक्तियोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)
Bhakti Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)
स्वामी विवेकानन्द / प्रा. डॉ. विद्याभास्कर शुक्ल द्वारा
२० भक्तियोग
२० भक्तियोग
जहाँ न प्रमाता है, न प्रमेय और न प्रमाण, जहाँ 'कौन किसको देखे'--वे पुरुष सबसे अतीत हो गए हैं और वहाँ पहुँच गए हैं, जहाँ 'न वाणी पहुँच सकती है, न मन' और जिसे श्रुति 'नेति, नेति' कहकर पुकारती है। परन्तु जो इस अवस्था की प्राप्ति नहीं कर सकते, अथवा जो उसकी इच्छा नहीं करते, वे उस एक अविभक्त ब्रह्म को प्रकृति, आत्मा और इन दोनों में ओत-प्रोत एवं इनके आश्रयस्वरूप ईश्वर--इस त्रिधा-विभक्त रूप में देखेंगे। जब प्रह्लाद अपने आपको भूल गए, तो उनके लिए न तो सृष्टि रही और न उसका कारण; रह गया केवल नाम-रूप से अविभक्त एक अनन्त तत्व। पर ज्योंही उन्हें यह बोध हुआ कि मैं प्रह्लाद हूँ, त्योंही उनके सम्मुख जगत् और कल्याणमय अनन्त गुणागार जगदीश्वर प्रकाशित हो गए। यही अवस्था बड़भागी, नन्दनन्दनगतप्राणा गोपियों की भी हुई थी। जब तक वे 'अहं'-ज्ञान से शून्य थीं, तब तक वे मानो कृष्ण ही हो गईं थीं। पर ज्योंही वे कृष्ण को उपास्य-रूप में देखने लगीं, बस त्योंही वे फिर से गोपी की गोपी हो गई, और तब "उनके सम्मुख पिताम्बरधारी, माल्यविभूषित, साक्षात् मन्मथ के भी मन को मथ देनेवाले मृदुहास्यरंजित कमलमुख श्रीकृष्ण प्रकट हो गए।"॥
अब हम आचार्य शंकर की बात लें। वे कहते हैं, "अच्छा, जो लोग सगुण ब्रह्मोपासना के बल से परमेश्वर के साथ एक हो जाते हैं, पर साथ ही जिनका मन अपना पृथक् अस्तित्व बनाए रखता है, उनका ऐश्वर्य ससीम होता है या असीम? यह
॥ तासाम् आविर्भूत् शौरिः स्मयमानमुखाम्बुजः ।
पीताम्बरधरः स्रग्वी साक्षात् मन्मथमन्मथः ॥
—श्रीमद्भागवत, १०।३२।२
ईश्वर का स्वरूप २१
संशय आने पर पूर्वपक्ष उपस्थित होता है कि उनका ऐश्वर्य असीम है, क्योंकि शास्त्रों का कथन है, 'उन्हें स्वराज्य प्राप्त हो जाता है,' 'सब देवता उनकी पूजा करते हैं,' 'सारे लोकों में उनकी कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं।' इसके उत्तर में व्यास कहते हैं, 'हाँ, जगत् की सृष्टि आदि की शक्ति को छोड़कर।' मुक्तात्मा को सृष्टि, स्थिति और प्रलय की शक्ति के अतिरिक्त अन्य सब अणिमादि शक्तियाँ प्राप्त हो जाती हैं। रहा जगत् का नियन्तृत्व, वह तो केवल नित्यसिद्ध ईश्वर का होता है। कारण कि शास्त्रों में जहाँ-जहाँ पर सृष्टि आदि की बात आई है, उन सभी स्थानों में ईश्वर की ही बात कही गई है। वहाँ पर मुक्तात्माओं का कोई प्रसंग नहीं है। जगत् के परिचालन में केवल उन्हीं परमेश्वर का हाथ है। सृष्टि आदि सम्बन्धी सारे श्लोक उन्हीं का निर्देश करते हैं। फिर 'नित्यसिद्ध' विशेषण भी दिया गया है। शास्त्र यह भी कहते हैं कि अन्य जनों की अणिमादि शक्तियाँ ईश्वर की उपासना तथा ईश्वर के अन्वेषण से ही प्राप्त होती हैं। ये शक्तियाँ असीम नहीं हैं। अतएव, जगन्नियन्तृत्व में उन लोगों का कोई स्थान नहीं। फिर, वे अपने मन का पृथक् अस्तित्व बनाए रखते हैं, इसलिए यह सम्भव है कि उनकी इच्छाएँ अलग-अलग हों। हो सकता है कि एक सृष्टि की इच्छा करे, तो दूसरा विनाश की। यह द्वन्द्व दूर करने का एकमात्र उपाय यही है कि वे सब इच्छाएँ अन्य किसी एक इच्छा के अधीन कर दी जायँ। अतः सिद्धान्त यह निकला कि मुक्तात्माओं की इच्छाएँ परमेश्वर की इच्छा के अधीन हैं।''†
† ये सगुणब्रह्मोपासनात् सह एव मनसा ईश्वरसायुज्यं व्रजन्ति, किम् तेषाम् निरवग्रहम् ऐश्वर्यम् भवति, आहोस्वित् सावग्रहम् इति संशयः ।