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भक्तियोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

Bhakti Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)

स्वामी विवेकानन्द / प्रा. डॉ. विद्याभास्कर शुक्ल द्वारा

DevanagariHindipublished140 पृष्ठ

१२ भक्तियोग

१२ भक्तियोग

.. पतंजलि के 'ईश्वरप्रणिधानाद्वा' सूत्र की व्याख्या करते हुए भोज कहते हैं, "प्रणिधान वह भक्ति है, जिसमें इन्द्रियभोग आदि समस्त फलाकांक्षाओं का त्याग कर सारे कर्म उन परम गुरु परमात्मा को समर्पित कर दिए जाते हैं।" * भगवान व्यास ने भी इसकी व्याख्या करते हुए कहा है, "प्रणिधान वह भक्ति है जिससे उस योगी पर परमेश्वर का अनुग्रह होता है और उसकी सारी आकांक्षाएँ पूर्ण हो जाती हैं।" † शाण्डिल्य के मतानुसार "ईश्वर में परमानुरक्ति ही भक्ति है।" ‡ पर भक्ति की सर्वश्रेष्ठ व्याख्या तो वह है, जो भक्तराज प्रह्लाद ने दी है—"जैसी तीव्र आसक्ति अविवेकी पुरुषों की इन्द्रिय-विषयों में होती है, (तुम्हारे प्रति) उसी प्रकार की (तीव्र) आसक्ति तुम्हारा स्मरण करते समय कहीं मेरे हृदय से चली न जाय !" § यह


भजताम् प्रीतिपूर्वकम्। ददामि बुद्धियोगम् तम् येन माम् उपयान्ति ते" इति, "प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थम् अहम् स च मम प्रियः" इति च। अतः साक्षात्काररूपा स्मृतिः, स्मर्यमाणात्यर्थप्रियत्वेन स्वयम् अपि अत्यर्थप्रिया यस्य, स एव परमात्मना वरणीयः भवति इति तेन एव लभ्यते परमात्मा इति उक्तम् भवति। एवंरूपा ध्रुवा अनुस्मृतिः एव भक्तिशब्देन अभिधीयते।—ब्रह्मसूत्र, रामानुजभाष्य, प्रथम सूत्र का भाष्य।

* प्रणिधानं तत्र भक्तिविशेषविशिष्टम् उपासनम् सर्वक्रियाणाम् अपि तत्र अर्पणम्। विषयसुखादिकं फलम् अनिच्छन् सर्वाः क्रियाः तस्मिन् परमगुरौ अर्पयति।—पातंजल दर्शन, प्रथम अध्याय, समाधिपाद, २३ वें सूत्र की भोजवृत्ति।

† प्रणिधानात् भक्तिविशेषात् आवर्जितः ईश्वरः तम् अनुगृह्णाति अभिध्यानमात्रेण इत्यादि—पातंजल दर्शन, प्रथम अध्याय, समाधिपाद, २३ वां व्यासभाष्य।

‡ 'सा परा अनुरक्तिः ईश्वरे'—शाण्डिल्यसूत्र, १।२

§ या प्रीतिरविवेकानां विषयेष्वनपायिनी।
त्वामनुस्मरतः सा मे हृदयान्मापसर्पतु॥—विष्णुपुराण, १।२०।१९

भक्ति के लक्षण १३

आसक्ति किसके प्रति ? उन्हीं परम प्रभु ईश्वर के प्रति । किसी-अन्य पुरुष (चाहे वह कितना ही बड़ा क्यों न हो) के प्रति आसक्ति को कभी भक्ति नहीं कह सकते । इसके समर्थन में एक प्राचीन आचार्य को उद्धृत करते हुए अपने श्रीभाष्य में रामानुज कहते हैं, "ब्रह्मा से लेकर एक तृण पर्यन्त संसार के समस्त प्राणी कर्मजनित जन्म-मृत्यु के वश में हैं, अतएव अविद्यायुक्त और परिवर्तनशील होने के कारण वे इस योग्य नहीं कि ध्येय-विषय के रूप में वे साधक के ध्यान में सहायक हों ।" * शाण्डिल्य के 'अनुरक्ति' शब्द की व्याख्या करते हुए भाष्यकार स्वप्नेश्वर कहते हैं, 'उसका अर्थ है--'अनु' यानी पश्चात्, और 'रक्ति' यानी आसक्ति, अर्थात् वह आसक्ति जो भगवान के स्वरूप और उनकी महिमा के ज्ञान के पश्चात् आती है। † अन्यथा स्त्री, पुत्र आदि किसी भी व्यक्ति के प्रति अन्ध आसक्ति को ही हम 'भक्ति' कहने लगें ! अतः हम स्पष्ट देखते हैं कि आध्यात्मिक अनुभूति के निमित्त किए जानेवाले मानसिक प्रयत्नों की परम्परा या क्रम ही भक्ति है, जिसका प्रारम्भ साधारण पूजा-पाठ से होता है और अन्त ईश्वर के प्रति प्रगाढ़ एवं अनन्य प्रेम में ।


* आब्रह्मस्तंबपर्यन्ताः जगदन्तर्व्यवस्थिताः ।
प्राणिनः कर्मजनितसंसारवशवर्तिनः ॥
यतस्ततो न ते ध्याने ध्यानिनाम् उपकारकाः ।
अविद्यान्तर्गताः सर्वे ते हि संसारगोचराः ॥
† भगवन्महिमादिज्ञानादनु पश्चाज्जायमानत्वादनुरक्तिरित्युक्तम् ।
--शाण्डिल्यसूत्र, स्वप्नेश्वर टीका, १।२

ईश्वर का स्वरूप

ईश्वर कौन हैं ? "जिनसे विश्व का जन्म, स्थिति और प्रलय होता है," * वे ही ईश्वर हैं। वे "अनन्त, शुद्ध, नित्यमुक्त, सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञ, परमकारुणिक और गुरुओं के भी गुरु हैं," और सर्वोपरि, "वे ईश्वर अनिर्वचनीय प्रेमस्वरूप हैं।" †

यह सब व्याख्या अवश्य सगुण ईश्वर की है। तो क्या ईश्वर दो हैं ? एक सच्चिदानन्दस्वरूप, जिसे ज्ञानी 'नेति नेति' करके प्राप्त करता है और दूसरा, भक्त का यह प्रेममय भगवान ? नहीं, वह सच्चिदानन्द ही यह प्रेममय भगवान है, वह सगुण और निर्गुण दोनों है। यह सदैव ध्यान में रखना चाहिए कि भक्त का उपास्य सगुण ईश्वर, ब्रह्म से भिन्न अथवा पृथक् नहीं है। सब कुछ वही एकमेवाद्वितीय ब्रह्म है। पर हाँ, ब्रह्म का यह निर्गुण स्वरूप अत्यन्त सूक्ष्म होने के कारण प्रेम व उपासना के योग्य नहीं। इसीलिए भक्त ब्रह्म के सगुण भाव अर्थात् परम नियन्ता ईश्वर को ही उपास्य के रूप में ग्रहण करता है। उदाहरणार्थ, ब्रह्म मानो मिट्टी या उपादान के सदृश है, जिससे नाना प्रकार की वस्तुएँ निर्मित हुई हैं। मिट्टी के रूप में तो वे सब एक हैं, पर उनका बाह्य आकार अलग-अलग होने से वे भिन्न-भिन्न प्रतीत होती हैं। उत्पत्ति के पूर्व वे सब-की-सब मिट्टी में गूढ़ भाव से विद्यमान थीं। उपादान की दृष्टि से अवश्य वे सब एक हैं, पर जब वे भिन्न-भिन्न आकार धारण कर लेती हैं और जब तक वह आकार बना रहता है, तब तक तो वे पृथक्-पृथक्


* जन्मादि अस्य यतः।—ब्रह्मसूत्र, १।१।२
† स ईश्वर अनिर्वचनीयप्रेमस्वरूपः।

ईश्वर का स्वरूप १५

ही प्रतीत होती हैं। एक मिट्टी का चूहा कभी मिट्टी का हाथी नहीं हो सकता, क्योंकि गढ़े जाने के बाद उनकी आकृति ही उनमें विशेषत्व पैदा कर देती है, यद्यपि आकृतिहीन मिट्टी की दशा में वे दोनों एक ही थे। ईश्वर उस निरपेक्ष सत्ता की उच्चतम अभिव्यक्ति हैं, या यों कहिए, मानव-मन के लिए जहाँ तक निरपेक्ष सत्य की धारणा करना सम्भव है, बस वही ईश्वर है। सृष्टि अनादि है, और उसी प्रकार ईश्वर भी अनादि हैं।

वेदान्तसूत्र के चतुर्थ अध्याय के चतुर्थ पाद में यह वर्णन करने के पश्चात् कि मुक्तिलाभ के उपरान्त मुक्तात्मा को एक प्रकार से अनन्त शक्ति और ज्ञान प्राप्त हो जाता है, व्यासदेव एक दूसरे सूत्र में कहते हैं, 'पर किसी को सृष्टि, स्थिति और प्रलय की शक्ति प्राप्त नहीं होगी,' क्योंकि यह शक्ति केवल ईश्वर की ही है।* इस सूत्र की व्याख्या करते समय द्वैतवादी भाष्यकारों के लिए यह दर्शाना सरल है कि परतन्त्र जीव के लिए ईश्वर की अनन्त शक्ति और पूर्ण स्वतन्त्रता प्राप्त करना नितान्त असम्भव है। कट्टर द्वैतवादी भाष्यकार मध्वाचार्य ने वराहपुराण से एक श्लोक लेकर इस श्लोक की व्याख्या अपनी पूर्वपरिचित संक्षिप्त शैली से की है।

इसी सूत्र की व्याख्या करते हुए भाष्यकार रामानुज कहते हैं, "ऐसा संशय उपस्थित होता है कि मुक्तात्मा को जो शक्ति प्राप्त होती है, उसमें क्या परम पुरुष की जगत्सृष्टि आदि-असाधारण शक्ति और सर्वनियन्तृत्व भी अन्तर्भूत हैं? या कि, उसे यह शक्ति नहीं मिलती और उसका ऐश्वर्य

* जगद्व्यापारवर्जम्, प्रकरणात् असंनिहितत्वात् च।
—ब्रह्मसूत्र, ४।४।१७

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भक्तियोग

केवल इतना ही रहता है कि उसे परम पुरुष के साक्षात् दर्शन भर हो जाते हैं ? तो इस पर पूर्वपक्ष यह उपस्थित होता है कि मुक्तात्मा का जगन्नियन्तृत्व प्राप्त करना युक्तियुक्त है; क्योंकि शास्त्र का कथन है, 'वह शुद्धरूप होकर (परम पुरुष के साथ) परम एकत्व प्राप्त कर लेता है' (मुण्डक उपनिषद्, ३।१।३)। अन्य स्थान पर यह भी कहा गया है कि उसकी समस्त वासना पूर्ण हो जाती है। अब बात यह है कि परम एकत्व और सारी वासनाओं की पूर्ति परम पुरुष की असाधारण शक्ति जगन्नियन्तृत्व बिना सम्भव नहीं। इसलिए जब हम यह कहते हैं कि उसकी सब वासनाओं की पूर्ति हो जाती है तथा उसे परम एकत्व प्राप्त हो जाता है, तो हमें यह मानना ही चाहिए कि उस मुक्तात्मा को जगन्नियन्तृत्व की शक्ति प्राप्त हो जाती है। इस सम्बन्ध में हमारा उत्तर यह है कि मुक्तात्मा को जगन्नियन्तृत्व के अतिरिक्त अन्य सब शक्तियाँ प्राप्त हो जाती हैं। जगन्नियन्तृत्व का अर्थ है—विश्व के सारे स्थावर और जंगम के रूप, उनकी स्थिति और वासनाओं का नियन्तृत्व। पर मुक्तात्माओं में यह जगन्नियन्तृत्व की शक्ति नहीं रहती। हाँ उनकी परमात्मदृष्टि का आवरण अवश्य दूर हो जाता है और उन्हें प्रत्यक्ष ब्रह्मानुभूति हो जाती है—बस यही उनका एकमात्र ऐश्वर्य है। यह कैसे जाना ? शास्त्रवाक्य के बल पर। शास्त्र कहते हैं कि जगन्नियन्तृत्व केवल परब्रह्म का गुण है। जैसे—'जिससे यह समुदाय उत्पन्न होता है, जिसमें यह समुदाय स्थित रहता है और जिसमें प्रलयकाल में यह समुदाय लीन हो जाता है, तू उसी को जानने की इच्छा कर—वही ब्रह्म है।' यदि यह जगन्नियन्तृत्व-शक्ति मुक्तात्माओं का भी एक साधारण गुण

ईश्वर का स्वरूप

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रहे, तो उपर्युक्त श्लोक फिर ब्रह्म का लक्षण नहीं हो सकता, क्योंकि उसके जगन्नियन्तृत्व-गुण से ही उसका लक्षण प्रतिपादित हुआ है। असाधारण गुणों के द्वारा ही किसी वस्तु की व्याख्या होती है, उसका लक्षण प्रतिपादित होता है। अतः निम्नलिखित शास्त्रवाक्यों में यह प्रतिपादित हुआ है कि परमपुरुष ही जगन्नियमन का कर्ता है, और इन वाक्यों में ऐसी किसी बात का उल्लेख नहीं, जिससे मुक्तात्मा का जगन्नियन्तृत्व स्थापित हो सके। शास्त्रवाक्य ये हैं—'वत्स, आदि में एकमेवाद्वितीय ब्रह्म ही था। उसमें इस विचार का स्फुरण हुआ कि मैं बहु सृजन करूँगा। उसने तेज की सृष्टि की।' 'आदि में केवल ब्रह्म ही था। उसकी उत्क्रान्ति हुई। उससे क्षत्र नामक एक सुन्दर रूप प्रकट हुआ। वरुण, सोम, रुद्र, पर्जन्य, यम, मृत्यु, ईशान—ये सब देवता क्षत्र हैं।' 'पहले आत्मा ही थी; अन्य कुछ भी क्रियाशील नहीं था। उसे सृष्टि-सृजन का विचार आया और फिर उसने सृष्टि कर डाली।' 'एकमात्र नारायण ही थे, न ब्रह्मा थे, न ईशान, न द्यावा-पृथिवी, नक्षत्र, जल, अग्नि, सोम और न सूर्य। अकेले उन्हें आनन्द न आया। ध्यान के अनन्तर उनके एक कन्या हुई—दश-इन्द्रिय।' 'जो पृथिवी में वास करते हुए भी पृथिवी से अलग हैं,...जो आत्मा में रहते हुए...' इत्यादि।'" ¶ दूसरे सूत्र की व्याख्या करते हुए रामानुज कहते

कि मुक्तस्य ऐश्वर्यम् जगत्सृष्ट्यादि परमं पुरुष असाधारणम् सर्वेश्वरत्वम् अपि, उत तद्रहितम् केवलपरमपुरुषानुभवविषयम् इति संशयः। किम् युक्तम् ? जगदीश्वरत्वम् अपि इति। कुतः ? "निरञ्जनः परमम् साम्यम् उपैति" इति परमपुरुषेण परमसाम्यापत्तिश्रुतेः सत्यसंकल्पत्वश्रुतेः च। न हि परमसाम्य-सत्यसंकल्पत्वे सर्वेश्वरासाधारणजगन्नियमनेन बिना उपपद्यते;

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