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भक्तियोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

Bhakti Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)

by स्वामी विवेकानन्द / प्रा. डॉ. विद्याभास्कर शुक्ल

DevanagariHindipublished140 pages

७४ भक्तियोग

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७४ भक्तियोग

में होनेवाली एक घटना मात्र है। सम्भव है, कहीं थोड़ा द्वन्द्व छिड़े, अथवा कोई थोड़ा फिसल जाय, पर ये सब उस परम-प्रेम में आरोहण के सोपान मात्र हैं। चाहे जितने द्वन्द्व छिड़ें, चाहे जितने संघर्ष आएँ, पर तुम साक्षी होकर बस एक ओर खड़े रहो। ये द्वन्द्व तुम्हें तभी खटकेंगे, जब तुम संसार-प्रवाह में पड़े होगे। परन्तु जब तुम उसके बाहर निकल आओगे और केवल एक दर्शक के रूप में खड़े रहोगे, तो देखोगे कि प्रेमस्वरूप भगवान अपने आपको अनन्त प्रकार से प्रकाशित कर रहे हैं।

"जहाँ कहीं थोड़ासा भी आनन्द है, चाहे वह घोर विषय-भोग का ही क्यों न हो, वहाँ उस अनन्त आनन्दस्वरूप भगवान का ही अंश है।" नीच-से-नीच आसक्ति में भी ईश्वरी प्रेम का बीज निहित है। संस्कृत भाषा में प्रभु का एक नाम 'हरि' है। उसका अर्थ यह है कि वे सबको अपनी ओर आकर्षित कर रहे हैं। असल में वे ही हमारे प्रेम के एकमात्र उपयुक्त पात्र हैं। यह जो हम लोग नाना दिशाओं में आकृष्ट हो रहे हैं, तो हम लोगों को खींच कौन रहा है? वे ही! —वे ही हमें अपनी गोद में लगातार खींच रहे हैं। निर्जीव जड़ क्या कभी चेतन आत्मा को खींच सकता है? नहीं—कभी नहीं। मान लो, एक सुन्दर मुखड़ा देखकर कोई उन्मत्त हो गया। तो क्या कुछ जड़ परमाणुओं की समष्टि ने उसे पागल कर दिया है? नहीं, कभी नहीं। इन जड़ परमाणुओं के पीछे अवश्य ईश्वरी शक्ति और ईश्वरी प्रेम का 'खेल चल रहा है। अज्ञ मनुष्य यह नहीं जानता। परन्तु फिर भी, जाने या अनजाने, वह उसी के द्वारा आकृष्ट हो रहा है। अतएव 'नीच-से-नीच आसक्ति भी अपनी आकर्षण की शक्ति स्वयं भगवान से ही पाती है।

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भक्त का वैराग्य—प्रेमजन्य ७५

"हे प्रिये, कोई स्त्री अपने पति को पति के लिए प्यार नहीं करती; पति के अन्तरस्थ आत्मा के लिए ही पत्नी उसे प्यार करती है।"* प्रेमिका पत्नियाँ चाहे यह जानती हों अथवा नहीं, पर है यह सत्य। "हे प्रिये, पत्नी के लिए पत्नी को कोई प्यार नहीं करता परन्तु पत्नी के अन्तरस्थ आत्मा के लिए ही पति उसे प्यार करता है।"† इसी प्रकार, संसार में जब कोई अपने बच्चे अथवा अन्य किसी से प्रेम करता है, तो वह वास्तव में उसके अन्तरस्थ आत्मा के लिए ही उससे प्रेम करता है। भगवान मानो एक बड़े चुंबक हैं और हम सब लोहे की रेत के समान हैं। हम लोग उनके द्वारा सतत खींचे जा रहे हैं। हम सभी उन्हें प्राप्त करने का प्रयत्न कर रहे हैं। संसार में हम जो नानाविध प्रयत्न करते हैं, वे सब केवल स्वार्थ के लिए नहीं हो सकते। अज्ञानी लोग जानते नहीं कि उनके जीवन का उद्देश्य क्या है। वास्तव में वे लगातार परमात्मारूप उस बड़े चुम्बक की ओर ही अग्रसर हो रहे हैं। हमारे इस अविराम, कठोर जीवन-संग्राम का लक्ष्य है—अन्त में उनके निकट पहुँचकर उनके साथ एकीभूत हो जाना।

भक्तियोगी इस जीवन-संग्राम का अर्थ भलीभाँति जानता है। वह ऐसे संग्रामों की एक लम्बी परम्परा में से पार हो चुका है और वह जानता है कि उनका लक्ष्य क्या है। उनसे होनेवाले द्वन्द्वों से छुटकारा पाने की उसकी तीव्र आकांक्षा रहती


* न वा अरे पत्युः कामाय पतिः प्रियो भवति, आत्मनः तु कामाय पतिः प्रियो भवति। —बृहदारण्यक उपनिषद्, २।४

† न वा अरे जायायै कामाय जाया प्रिया भवति, आत्मनः तु कामाय जाया प्रिया भवति। —बृहदारण्यक उपनिषद्, २।४

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भक्तियोग

है। वह संघर्षों से दूर ही रहना चाहता है और सीधे समस्त आकर्षणों के मूलकारणस्वरूप 'हरि' के निकट चला जाना चाहता है। यही भक्त का त्याग है। भगवान के प्रति इस प्रबल आकर्षण से उसके अन्य सब आकर्षण नष्ट हो जाते हैं। उसके हृदय में इस प्रबल अनन्त ईश्वर-प्रेम के प्रवेश कर जाने से फिर वहाँ अन्य किसी प्रेम की तिल मात्र भी गुंजाइश नहीं रह जाती। और रहे भी कैसे ? भक्ति उसके हृदय को ईश्वर-रूपी प्रेम-सागर के दैवी जल से भर देती है और इस प्रकार उसमें फिर क्षुद्र प्रेमों के लिए स्थान ही नहीं रह जाता। तात्पर्य यह कि भक्त का वैराग्य अर्थात् भगवान को छोड़ समस्त विषयों में अनासक्ति भगवान के प्रति परम अनुराग से उत्पन्न होती है।

पराभक्ति की प्राप्ति के लिए यही सर्वोच्च साधन है—यही आदर्श तैयारी है। जब यह वैराग्य आता है, तो पराभक्ति के राज्य का प्रवेश-द्वार खुल जाता है, जिससे आत्मा पराभक्ति के गम्भीरतम प्रदेशों में पहुँच सके। तभी हम यह समझने लगते हैं कि पराभक्ति क्या है। और जिसने पराभक्ति के राज्य में प्रवेश किया है, उसी को यह कहने का अधिकार है कि प्रतिमा-पूजन अथवा बाह्य अनुष्ठान आदि अब और अधिक आवश्यक नहीं हैं। उसी ने प्रेम की उस परम अवस्था की प्राप्ति कर ली है, जिसे हम साधारणतया विश्वबन्धुत्व कहते हैं; दूसरे लोग तो विश्वबन्धुत्व की कोरी बातें ही करते हैं। उसमें फिर भेदभाव नहीं रह जाता। वह अथाह प्रेमसिन्धु में निमग्न हो जाता है। तब उसे मनुष्य में मनुष्य नहीं दिखता, वरन् सर्वत्र उसे अपना प्रियतम ही दिखाई देता है। प्रत्येक

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भक्त का वैराग्य—प्रेमजन्य ७७

मुख में उसे 'हरि' ही दिखाई देते हैं। सूर्य, अथवा चन्द्र का प्रकाश उन्हीं की अभिव्यक्ति है। जहाँ कहीं सौन्दर्य और महानता दिखाई देती है, उसकी दृष्टि में वह सब भगवान की ही है। ऐसे भक्त आज भी इस संसार में विद्यमान हैं। संसार उनसे कभी रिक्त नहीं होता। ऐसे भक्तों को यदि साँप भी काट ले, तो वे कहते हैं, "मेरे प्रियतम का एक दूत आया था।" ऐसे ही पुरुषों को विश्वबन्धुत्व की बातें करने का अधिकार है। उनके हृदय में क्रोध, घृणा अथवा ईर्ष्या कभी प्रवेश नहीं कर पाती। सारा बाह्य, इन्द्रियग्राह्य जगत् उनके लिए सदा के लिए लुप्त हो जाता है। वे तो अपने प्रेम के बल से अतीन्द्रिय सत्य को सारे समय देखते रहते हैं। तो फिर उनमें क्रोध भला आए कैसे ?


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भक्तियोग की स्वाभाविकता

और

उसका रहस्य

भगवान् श्रीकृष्ण से अर्जुन पूछते हैं, "हे प्रभो, जो सतत युक्त हो तुम्हें भजता है, और जो अव्यक्त, निर्गुण का उपासक है, इन दोनों में कौन श्रेष्ठ है?"* श्रीभगवान् कहते हैं, "हे अर्जुन, मुझमें मन को एकाग्र करके जो नित्ययुक्त हो परम श्रद्धा के साथ मेरी उपासना करता है, वही मेरा श्रेष्ठ उपासक है, वही श्रेष्ठ योगी है। और जो इन्द्रिय-समुदाय को पूर्ण वश में करके, मन-बुद्धि से परे, सर्वव्यापी, अव्यक्त और सदा एकरस रहनेवाले नित्य, अचल, निराकार, अविनाशी, सच्चिदानन्दघन


* **अर्जुन उवाच—**एवं सततयुक्ता ये भक्ताः त्वां पर्युपासते ।
ये चाप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योगवित्तमाः ॥
**भगवान् उवाच—**मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते ।
श्रद्धया परयोपेताः ते मे युक्ततमाः मताः ॥
ये त्वक्षरम् अनिर्देश्यम् अव्यक्तं पर्युपासते ।
सर्वत्रगम् अचिन्त्यं च कूटस्थं अचलं ध्रुवम् ॥
संनियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः ।
ते प्राप्नुवन्ति माम् एव सर्वभूत हितेरताः ॥
क्लेशोऽधिकतरस्तेषाम् अव्यक्तासक्तचेतसाम् ।
अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते ॥
ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्यमत्पराः ।
अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते ॥
तेषाम् अहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात् ।
भवामि न चिरात् पार्थ मय्यावेशितचेतसाम् ॥
—गीता, १२।१-७