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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

About this granth

The Bhaishajya Ratnavali (भैषज्य रत्नावली) of Kaviraj Govind Das Sen is an Ayurvedic treatise on therapeutics, widely used by practitioners as a trusted collection of formulations. As the introduction to this edition points out, it gathers tested preparations of both kinds: herbal ones such as decoctions, powders, linctuses, asavas and arishtas, and mineral and metallic preparations from rasashastra, so that physicians of every level can use it.

The work proceeds disease by disease. Under each condition it gives the relevant formulations, for example decoctions of the five roots and the ten roots for fever, linctuses such as kutajavaleha, medicated ghee and oils, and remedies for hiccup and other ailments, with quantities of ingredients and methods of preparation.

This edition gives the verses with a Hindi commentary in prose order, enlarged, revised and translated by the late Vaidya Shankarlal, described as the author and commentator of many books. It was printed by Khemraj Shrikrishnadas at the Shri Venkateshwar Steam Press, Bombay, in Samvat 2009 (1952). At 1416 pages it is a reference work for students and practitioners.

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चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ८१३


पापडा, नागरमोथा, सोंठ, चिरचिटा और पाठ इनके क्वाथमें भावना देवे । फिर धूपमें सुखाकर चूर्ण करलेवे । इन चूर्णको नित्यप्रति चार चार रत्ती, हरडके साथ सेवन करे । यह गुल्मकालानलरस वातिक, पैत्तिक, श्लैष्मिक, सन्निपातज, त्रिदोषज और विशेषकर वातगुल्मको तत्काल नष्ट करती है । संसारकी भलाईके लिये श्रीमान् गहनानन्दनाथने इसको बनाया है ॥६७-७१॥

बृहद्गुल्मकालानलरस ।

अभ्रं लौहं रसं गन्धं टङ्कणं कटुकं वचाम् ।
द्विक्षारं सैन्धवं कुष्ठं त्र्यूषणं सुरदारु च ॥ ७२ ॥
पत्रमेलां त्वचं नागं खादिरं सारमेव च ।
गृहीत्वा समभागेन श्लक्ष्णचूर्णं प्रकल्पयेत् ॥ ७३ ॥
जयन्तीचित्रकोन्मत्तकेशराजदलं तथा ।
निष्पीड्य स्वरसं दत्त्वा भावयेत्कुशलो भिषक् ॥ ७४ ॥
चतुर्गुञ्जाप्रमाणेन वटिका कारयेत्ततः ।
उत्थाय भक्षयेत्प्रातरनुपानं जलं पयः ॥ ७५ ॥

अभ्रक, लोहा, पारा गन्धक, सुहागा, कुटकी, वच, जवाखार, सज्जी, सैंधानमक, कूट, सोंठ, मिरच, पीपल, देवदारु, तेजपात, इलायची, दारचीनी, नागकेशर और खैरसार इनको समान भाग लेकर बारीक चूर्ण करलेवे । फिर जयन्ती (जैती-घास), चीता, धतूरा और भाङ्गरा इनके पत्तोंके रसमें क्रमशः खरल करके चार चार रत्तीकी गोलियाँ बनावे । प्रतिदिन प्रातःकाल उठकर इस रसकी एकएक गोली जल या दूधके साथ भक्षण करे ॥७२-७५॥

गुल्मं पञ्चविधं हन्ति यकृत्प्लीहोदराणि च ।
कामलां पाण्डुरोगं च शोथं चैव सुदारुणम् ॥ ७६ ॥
हलीमकं रक्तपित्तं मन्दाग्निमरुचिं तथा ।
ग्रहणीमार्द्रवं कार्श्यं जीर्णे च विषमज्वरम् ॥ ७७ ॥

यह पाँचों प्रकारके गुल्म, यकृत, तिल्ली, उदररोग, कामला, पाण्डुरोग, दारुण शोथ, हलीमक, रक्तपित्त, मन्दाग्नि, अरुचि, संग्रहणी, आर्द्रव, कृशता, जीर्णता और विषमज्वर इत्यादि रोगोंको दूर करता है ॥ ७६-७७ ॥

महागुल्मकालानलरस ।

गन्धकं तालकं ताम्रं तथैव तीक्ष्णलौहकम् ।
समांशं मर्दयेद्गाढं कन्यानीरेण यत्नतः ॥ ७८ ॥

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८१४ भैषज्यरत्नावली । [गुल्मरोग-


संपुटं कारयेत्पश्चात् सन्धिलेपं च कारयेत् ।
ततो गजपुटं दत्त्व स्वाङ्गशीतं समुद्धरेत् ॥ ७९ ॥
द्विगुञ्जां भक्षयेद् गुल्मे शृङ्गवेरानुपानतः ।
सर्वगुल्मं निहन्त्याशु भास्करस्तिमिरं यथा ॥ ८० ॥

शुद्ध गन्धक, हरताल, ताम्रभस्म और तीक्ष्णलोह इनको सम भाग लेकर घीक्वारके रसमें विधिपूर्वक खरल करे । फिर इसको सम्पुटमें रख सन्धिस्थानोंको बन्द करके गजपुटमें पकावे । जब स्वांगशीतल होजाय तब निकालकर चूर्ण करलेवे । इसको प्रतिदिन दो दो रत्ती प्रमाण अदरकके रसके साथ खाय । जैसे सूर्य अन्धकारको हरताहै वैसेही यह रस सर्वप्रकारके गुल्मोंको अल्पकालमें ही नष्ट करता है ॥ ७८-८० ॥

गुल्मशार्दूलरस ।

रसं गन्धं शुद्धलौहं गुग्गुलुः पिप्पलः पलम् ।
त्रिवृत्ता पिप्पली शुण्ठी शठी धान्यकजीरकम् ॥ ८१ ॥
प्रत्येकं पलिकं ग्राह्यं पलार्द्धं कानकं फलम् ।
सञ्चूर्ण्य वटिका कार्या घृतेन वल्लमानतः ॥
वटीद्वयं भक्षयेच्चार्द्रकोष्णाम्बु पिबेदनु ॥ ८२ ॥

शुद्ध पारा, गन्धक, लोहा, गूगल, पीपलके वृक्षकी छाल, निसोत, पीपल, सोंठ, कचूर, धनियाँ और जीरा ये प्रत्येक एक एक पल तथा जमालगोटे दो तोले लेवे । सबको एकत्र घृतमें खरल करके तीन तीन रत्तीकी गोलियाँ प्रस्तुत कर नित्यप्रति दो गोली अदरकके रसके साथ खाय और ऊपरसे गरमजल पीवे ॥

हन्ति प्लीहयकृद्गुल्मकामलोदरशोथकम् ।
वातिकं पैत्तिकं गुल्मं श्लैष्मिकं रौधिरं तथा ॥ ८३ ॥
गहनानन्दनाथोक्तो रसोऽयं गुल्मशार्दूलः ॥ ८४ ॥

इससे प्लीहा, यकृत्, गुल्म, कामला, पेटकी पीडा, सूजन, वातिक, पैत्तिक, श्लैष्मिक तथा रक्तजगुल्म नष्ट होते हैं । श्रीमान् गहनानन्दनाथ महाराजने इस गुल्मशार्दूलनामक रसको निर्मित किया है ॥ ८३-८४ ॥

सर्वेश्वररस ।

ताम्रं दशगुणं स्वर्णात्स्वर्णपादं कटुत्रिकम् ।
त्रिकटु त्रिफला तुल्या त्रिफलार्द्धमयोरजः ॥ ८५ ॥

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८१६ | भैषज्यरत्नावली । | [गुल्मरोग-]

यता, निसोत, दन्ती, नीमकी छाल, सेंधानमक और अभ्रकभस्म इन सब ओषधि-धियोंको दो दो तोले कुटापिसा चूर्ण तथा लोहभस्म ८ तोले और घृत १६ तोले डालकर यथाविधि पकावे । इस रसनामृत लोहको सब रोगमें प्रयोग करना चाहिये ॥ ८९-९२ ॥

गुल्मं पञ्चविधं हन्ति यकृत्प्लीहोदराणि च ।
कामलां पाण्डुरोगं च शोथं जीर्णज्वरं तथा ॥
रोगान्सर्वांन्निहन्त्याशु भास्करस्तिमिरं यथा ॥ ९३ ॥

सूर्यनारायण जैसे अन्धकारके समूहको नष्ट करते हैं वैसेही यह ओषधि पाँच प्रकारके गुल्म, जिगर, तिल्ली, उदररोग, कमलवाय , पाण्डु, शोथ, जीर्ण ज्वर और अन्यान्य सर्व प्रकारके रोगोंको शीघ्र नाश करती है ॥ ९३ ॥

दन्तीहरीतकी ।

जलद्रोणे विपक्तव्या विंशतिः पञ्च चाभया ।
दन्त्याः पलानि तावन्ति चित्रकस्य तथैव च ॥ ९४ ॥
तेनाष्टभागशेषेण पचेद्दन्तीसमं गुडम् ।
ताश्चाभयास्त्रिवृच्चूर्णं तैलाच्चापि चतुःपलम् ॥ ९५ ॥
पलमेकं कणाशुण्ठ्योः सिद्धे लेहे च शीतलम् ।
क्षौद्रं तैलसमं दद्याच्चातुर्जातपलं तथा ॥ ९६ ॥

पोटलीमें बँधीहुई हरड २५ पल, दन्तीकी जड २५ पल और चीतेकी जड २५ पल लेवे । सबको एकत्र ३२ सेर जलमें पकावे । जब पकते पकते ४ सेर जल शेष रहजाय तब उतारकर छानलेवे और पोटलीमेंसे हरडोंको निकालकर गुठली निकाल डाले । तदनन्तर गुड २५ पल, काढेमेंसे निकालीहुई सब हरड निसोतका चूर्ण १६ तोले, तिलका तेल १६ तोले, पीपल और सोंठ चार चार तोले इन सबको पूर्वोक्त क्वाथमें डालकर अच्छे प्रकार पकावे । जब पककर अवलेहकी समान गाढा होजाय तब उतारले, शीतल होजानेपर उसमें शहद १६ तोले और चातुर्जातकका चूर्ण चार तोले मिलादेवे ॥ ९४-९६ ॥

ततो लेहपलं लीढ्वा जग्ध्वा चैकां हरीतकीम् ।
सुखं विरिच्यते स्निग्धो दोषप्रस्थमनामयः ॥ ९७ ॥
प्लीहश्वयथुगुल्मार्शोहृत्पाण्डुग्रहणीगदाः ।
शाम्यन्त्युत्क्लेशविषमज्वरकुष्ठान्यरोचकाः ॥ ९८ ॥

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चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ८१७

इसमेंसे प्रतिदिन चार तोले अवलेह और एक हरड सेवन करे तो इससे कोठा स्निग्ध होकर सुखपूर्वक दस्त होने लगते हैं तथा प्लीहा, सूजन, गुल्म, बवासीर, हृदयरोग, पाण्डु, संग्रहणी, वमन, विषमज्वर, कुष्ठ और अरुचि आदि रोग शमन होते हैं ॥ ९७ ॥ ९८ ॥

पञ्चपलकघृत ।
पिप्पल्याः पिचुरर्द्धार्द्धो दाडिमाद्द्विपलं पलम् ।
धान्यात्पञ्च घृताच्छुण्ठ्याः कर्षं क्षीरं चतुर्गुणम् । ९९॥
सिद्धमेतद् घृतं सद्यो वातगुल्मं चिकित्सति ।
योनिशूलं शिरःशूलमर्शांसि विषमज्वरम् ॥ १०० ॥
पीपल ३ तोले, अनारके बीज ८ तोले, धनियाँ ४ तोले, घृत २० तोले, सोंठ २ तोले और दूध चौगुना लेवे । सबको एकत्रकर अच्छेप्रकार घृतको सिद्ध करे । यह घृत वातगुल्म, योनिशूल, शिरःशूल, अर्श और विषमज्वर इन रोगोंको शीघ्र दूर करता है ॥ ९९ ॥ १०० ॥

भल्लातकाद्यघृत ।
भल्लातकात्कल्ककषायपक्वं सर्पिः पिबेच्छर्करया विमिश्रम् ।
तद्रक्तगुल्मं विनिहन्ति पीतं बलासगुल्मं मधुना समेतम् ॥
भिलावोंके कल्क और क्वाथके द्वारा घृतको पकावे । जब पककर शीतल हो जाय तब मिश्री डालकर पान करे । इससे रक्तगुल्म तत्काल दूर होता है और शहदके साथ पान करनेसे कफजन्य गुल्मरोग नष्ट होता है ॥ १०१ ॥

त्रायमाणाद्यघृत ।
जले दशगुणे साध्यं त्रायमाणाचतुःपलम् ।
पञ्चभागस्थितं पूतं कल्कैः संयोज्य कार्षिकैः ॥ १०२॥
रोहिणीकटुकामुस्तत्रायमाणादुरालभाः ।
कल्कास्त्रामलकीवीराजीवन्तीचन्दनोत्पलैः ॥ १०३ ॥
रसस्यामलकानां च क्षीरस्य च घृतस्य च ।
पलानि पृथगष्टाष्टौ दत्त्वा सम्यग्विपाचयेत् ॥१०४॥


१-“पलोल्लेखागते माने न द्वैगुण्यमिहेष्यते ।
चत्वारिंशत्पलं तेन तोयं दशगुणं भवेत् ॥”
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८२०भेषज्यरत्नावली ।[ गुल्मरोग-

यथाविधि घृतको सिद्ध करे। गुल्मरोगीको यह घृत शर्करा और सेंधानमक डालकर पान करनेसे विशेष उपकार करता है ॥ १६ ॥

द्राक्षाद्यघृत !

द्राक्षामधुकखर्जूरं विदारीं सशतावरीम् ।
परूषकाणि त्रिफलां साधयेत्पलसम्मिताम् ॥ १७ ॥
जलाढके पादशेषे रसमामलकस्य च ।
घृतमिक्षुरसं क्षीरमभयाकल्कपादिकम् ॥ १८ ॥
साधयेत्तु घृतं सिद्धं शर्कराक्षौद्रपादिकम् ।
प्रयोगात्पित्तगुल्मघ्नं सर्वपित्तविकारनुत् ॥ १९ ॥
“साहचर्यादिह पृथक् घृतादेः क्वाथतुल्यता ॥”

दाख, महुआ, खजूर, विदारीकन्द, शतावर, फालसे और त्रिफला ये प्रत्येक चार चार तोले लेकर आठ सेर जलमें पकावे । जब पकते पकते दो सेर जल शेष रहजाय तब उतारकर छानलेवे । फिर इस क्वाथमें आमलोंका रस २ सेर, घृत २ सेर, ईखका रस २ सेर, दूध २ सेर और हरड़का कल्क आधा सेर लेकर डालदेवे । सबोंको अच्छे प्रकार मिलाकर घृतको सिद्ध करे। जब सिद्ध होकर शीतल होजाय तब खाँड और शहद आध आध सेर मिलादेवे । इस घृतको सेवन करनेसे पित्तोत्पन्न गुल्म एवं अन्यान्य प्रकारके पित्तके सब विकार नाश होते हैं ॥ १७–१९ ॥

गुल्मरोगमें पथ्य ।

स्नेहः स्वेदो विरेकश्च वस्तिर्बाहुशिराव्यधः ।
लङ्घनं वर्त्तिरभ्यङ्गः स्नेहः पक्के तु पाटनम् ॥ १२० ॥
संवत्सरसमुत्पन्नाः कलाया रक्तशालयः ।
खडः कुलत्थयूषश्च धन्वमांसरसं सुरा ॥ २१ ॥
गवामजायाश्च पयो मृद्वीका च परूषकम् ।
खर्जूरं दाडिमं धात्री नागरङ्गाम्लवेतसम् ॥ २२ ॥
तक्रमैरण्डतैलं च लशुनं बालमुस्तकम् ।
पत्तूरो वास्तुकं शिग्रु यवक्षारो हरीतकी ॥ २३ ॥
रामठं मातुलुङ्गं च त्र्यूषणं सुरभीजलम् ।
यदन्नं स्निग्धमुष्णं च बृंहणं लघु दीपनम् ॥
वातानुलोमनं चैव पथ्यं गुल्मे नृणां भवेत् ॥ २४ ॥

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चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ८२१


स्नेह ( घृत तैलादि ) पान, स्वेददेना, विरेचन ( जुल्लाब ), पिचकारी लगाना, बाहोंकी अधःस्थ शिराको वेदना, लंघन, गुदामें बत्ती चढ़ाना, तेलकी मालिश, स्निग्ध द्रव्योंका प्रयोग, पाटन ( पकनेपर नस्तरसे चीरना ), पुरानी मटर, शालिके चावल, खडयूष, कुलत्थीका यूष, धन्वदेशके जीवोंका मांसरस, मदिरा, गौका व बकरीका दूध, दाख, फालसे, खजूर, अनार, आमले, नारङ्गी, अमलवेत, मट्ठा, अण्डीका तेल, लहसन, कच्चीमूली, शान्तिशाक, बथुआ, सहिंजनेकी फली, जवा-खार, हरड़, हींग, बिजौरानींबू, सोंठ, मिरच, पीपल, गोमूत्र एवं स्निग्ध, गरम, पुष्टि-कर, हलका, अग्निवर्द्धक और वायुको अनुलोमन करनेवाला भोजन ये सब पदार्थ गुल्मरोगीको हितकारी हैं ॥ १२०-१२४ ॥

गुल्मरोगमें अपथ्य ।

वातकारीणि सर्वाणि विरुद्धान्यशनानि च ।
वल्लूरं मूलकं मत्स्यान्मधुराणि फलानि च ॥ १२५ ॥
शुष्कशाकं शमीधान्यं विष्टम्भीनि गुरूणि च ।
अधोवातशकृन्मूत्रश्रमश्वासाश्रुधारणम् ॥
वमनं जलपानं च गुल्मरोगी परित्यजेत् ॥ १२६ ॥

गुल्मरोगी वायुवर्द्धक समस्त पदार्थ, विरुद्ध भोजन, सूखामांस मूली, मछली, मीठे फल, सूखे शाक, समेके चावल, विष्टम्भकारक, भारी पदार्थ तथा अपानवायु, मल, मूत्र, परिश्रम, श्वास और आँसू इनके वेगको रोकना, वमन और जलपान करना सबको त्याग देवे, क्योंकि ये सब गुल्मरोगमें अपथ्य हैं ॥ १२५-१२६ ॥

इति भैषज्यरत्नावल्यां गुल्मरोगचिकित्सा ।


हृद्रोगकी चिकित्सा ।

वातोपसृष्टे हृदये वामयेत्स्निग्धमातुरम् ।
द्विपञ्चमूलीक्वाथेन सस्नेहलवणेन च ॥ १ ॥

वातजन्य हृदयरोगमें—तैलादिके द्वारा स्निग्धशरीरंवाले रोगीको दशमूलके क्वाथमें घृत, लवण और मैनफलका चूर्ण डालकर वमन करावे ॥ १ ॥

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८२३भैषज्यरत्नावली ।[ हृद्रोग-

पिप्पत्येला वचा हिङ्गु यवक्षारोऽथ सैन्धवम् ।
सौवर्चलमथो शुण्ठी अजमोदा च चूर्णितम् ॥ २ ॥
फलधान्याम्लकौलत्थदधिमद्यासवादिभिः ।
पाययेच्छुद्धदेहं च स्नेहेनान्यतमेन वा ॥ ३ ॥

वमन विरेचनादिके द्वारा शुद्ध हुए रोगीको पीपल, इलायची, वच, हींग, जवाखार, सैंधानमक, कालानमक, सोंठ और अजमोद इन ओषधियोंके समान भाग चूर्णको एकत्र करके बिजौरेनीम्बूके रस, काँजी, कुलथीके यूष, दही, मद्य, आसव या अन्य घृतादि स्निग्ध पदार्थोंके साथ मिश्रितकर पान करावे ॥

नागरं वा पिबेदुष्णं कषायं चाग्निवर्द्धनम् ।
कासश्वासानिलहरं शूलहृद्रोगनाशनम् ॥ ४ ॥

सोंठके मन्दोष्ण क्वाथको पान करनेसे अग्नि बढ़ती है तथा खाँसी, श्वास, वायुविकार, शूल और हृदयरोग दूर होता है ॥ ४ ॥

श्रीपर्णीमधुकक्षौद्रसितागुडजलैर्वमेत् ।
पित्तोपसृष्टे हृदये सेवेत मधुरैः शृतम् ॥
घृतं कषायांश्चोद्दिष्टान् पित्तज्वरविनाशनान् ॥ ५ ॥

पित्तोत्पन्न हृदयरोगमें कुम्हेरके फल, मुलहठी इनके अर्द्धपक्व क्वाथमें शहद, मिश्री और गुड मिलाकर रोगीको पान कराकर वमन करावे । एवं मधुर पदार्थोंके साथ सिद्ध किया हुआ घी और पित्तज्वरनाशक क्वाथ सेवन करे ॥ ५ ॥

शीताः प्रदेहाः परिषेचनानि तथा विरेको हृदि पित्तदुष्टे ।
द्राक्षासिताक्षौद्रपरूषकैः स्याच्छुद्धे च पित्तापहमन्नपानम् ॥
पिष्ट्वा पिबेद्वापि सिताजलेन यष्ट्याह्वयं तिक्तकरोहिणीं च ॥ ६ ॥

पित्तज हृदयरोगमें चन्दनादि शीतल पदार्थोंका प्रलेप, शीतल जलका सेचन और विरेचनादि क्रिया करे । एवं वमन विरेचनादिसे शरीरकी शुद्धि हो जानेपर, दाख, मिश्री, शहद और फालसे इत्यादि द्रव्योंके साथ पित्तनाशक अन्न तथा पान सेवन करे । मुलहठी और कुटकीको जलमें पीसकर मिश्री डालकर पान करे तों पित्तका हृद्रोग दूर होता है ॥ ६ ॥

अर्जुनस्य त्वचा सिद्धं क्षीरं योज्यं हृदामये ।
सितया पञ्चमूल्या वा बलया मधुकेन वा ॥ ७ ॥

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चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ८२३


अर्जुनवृक्षकी छाल २ तोले, दूध ८ तोले और जल ३२ तोले सबको एकत्र कर पकावे। जब ८ तोले जल शेष रहजाय तब शीतल होजानेपर उस दूधको मिश्री मिलाकर पीवे। इसी प्रकार पञ्चमूल, खिरेंटी या मुलहठीके क्वाथसे सिद्ध किये हुए दूधको चीनी डालकर पीवें तो पित्तज हृदयरोग दूर होय ॥ ७ ॥

घृतेनदुग्धेन गुडाम्भसा वा पिबन्ति चूर्णं ककुभत्वचो ये ।
हृद्रोगजीर्णज्वररक्तपित्तं हत्वा भवेयुश्चिरजीविनस्ते ॥ ८ ॥
जो हृदयरोगी घृत, दुग्ध अथवा गुडके शर्बतके साथ अर्जुनकी छालका चूर्ण सेवन करे तो वह हृदयरोग, जीर्णज्वर और रक्तपित्तरोगको नष्ट करके दीर्घजीवी होता है ॥ ८ ॥

वचानिम्बकषायाभ्यां वान्तं हृदि कफोत्थिते ।
वातहृद्रोगनुच्चूर्णं पिप्पल्यादिं च पाययेत् ॥ ९ ॥
कफजन्य हृदयरोगमें वच और नीमकी छालका क्वाथ पान कराकर वमन करावे। फिर वातजहृदयरोगको नष्ट करनेवाला पिप्पल्यादिगणका चूर्ण सेवन करे ॥ ९ ॥

त्रिदोषजे लंघनमादितः स्यादन्नं च सर्वेषु हितं विधेयम् ।
हीनातिमध्यत्वमवेक्ष्य चैव कार्यं त्रयाणामपि कर्म शस्तम् ॥
त्रिदोषजहृदयरोगमें पहले लंघन करावे, फिर त्रिदोषनाशक तथा हितकारी अन्न-पान देवे। इसमें तीनों दोषोंकी प्रबलता, समता अथवा हीनताको अच्छे प्रकार विचारकर चिकित्सा करनी चाहिये ॥ १० ॥

चूर्णं पुष्करजं लिह्यान्माक्षिकेण समायुतम् ।
हृच्छूलश्वासकासघ्नं क्षयहिक्कानिवारणम् ॥ ११ ॥
पोहकरमूलके चूर्णको शहदमें मिलाकर चाटे तो हृदयशूल, श्वास, खाँसी, क्षय और हिचकी आदि रोग दूर होते हैं ॥ ११ ॥

तैलाज्यगुडविपक्वं चूर्णं गोधूमपार्थजं चापि ।
पिबति पयोऽनु च यः स भवेज्जितसकलहृदामयः पुरुषः १२ ॥
गेहूँ और अर्जुनकी छालके चूर्णको तेल, घी और गुडके द्वारा पकाकर दूधके साथ पीवे। इससे सर्वप्रकारका हृदयरोग नष्ट होता है ॥ १२ ॥

मूलं नागबलायास्तु चूर्णं दुग्धेन पाययेत् ।
हृद्रोगश्वासकासघ्नं ककुभस्य च वल्कलम् ॥ १३ ॥
रसायनं परं बल्यं वातजिन्मासयोजितम् ।
संवत्सरप्रयोगेण जीवेद्वर्षशतं ध्रुवम् ॥ १४ ॥

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८२६भैषज्यरत्नावली ।[ शूलरोग-

छायाशुष्का वटी कार्या नाम्नेदमर्जुनाह्वयम् ।
हृद्रोगं सर्वशूलाशहृल्लासच्छर्द्यरोचकान् ॥ २७ ॥
अतीसारमग्निमान्द्यं रक्तपित्तं क्षतक्षयम् ।
शोथोदराम्लपित्तं च विषमज्वरमेव च ॥
हन्त्यन्यानपि रोगांश्च बल्यं वृष्यं रसायनम् ॥ २८ ॥
हजार पुटों द्वारा शुद्ध कीहुई वज्राभ्रकभस्मको अर्जुनवृक्षकी छालके क्वाथमें सात दिनतक उत्तम प्रकारसे खरल करके छायामें सुखाकर गोलियाँ बनालेवे । यह नागार्जुन नामकी अभ्रक हृदयरोग, सर्वप्रकारक शूल, अर्श, हृल्लास, वमन, अरुचि एवं अन्य नाना प्रकारकी व्याधियोंको शीघ्र नष्ट करती है तथा बल्य, पुष्टिकर और रसायन है ॥ २६–२८ ॥

हृदयार्णवरस !

सूतार्कगन्धकं क्वाथे वराया मर्दयेद्दिनम् ।
काकमाच्या वटीं कृत्वा चणमात्रां च भक्षयेत् ।
हृदयार्णवनामाऽयं हृद्रोगदलनो रसः ॥ २९ ॥
शुद्ध पारा, ताँबा और शुद्ध गन्धक इनको समान भाग लेकर त्रिफलेके क्वाथ और मकोयके रसमें एक दिनतक विधिपूर्वक खरल करके चनेकी बराबर गोलियाँ बनालेवे । नित्यप्रति एक एक गोली सेवन करनेसे हृदयार्णवनामवाला यह रस हृदय रोगको नष्ट करताहै ॥ २९ ॥

पञ्चाननरस ।

सूतगन्धौ द्रवैर्धात्र्या मर्दयेद्गोस्तनीद्रवैः ।
यष्टिखर्जूरसलिलैर्दिनं च परिमर्दयेत् ॥
धात्रीचूर्णं सितां चानु पिबेद्धृद्रोगशान्तये ॥ ३० ॥
पारे और गन्धकको बराबर २ लेकर आमलोंके रसमें खरल करके दाख मुलहठी और खजूरके क्वाथमें एक दिनतक यथाविधि खरल करे । इस रसको प्रतिदिन दो दो रत्तीभर, आमलोंके चूर्ण और मिश्रीके साथ मिलाकर सेवन करनेसे हृदयरोग शान्त होताहै ॥ ३० ॥

प्रभाकरवटी ।

माक्षिकं लोहमभ्रं च तुगाक्षीरं शिलाजतु ।
क्षिप्त्वा खल्लोदरे पश्चाद्भावयेत्पार्थवारिणा ॥ ३१ ॥

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चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ८२७

वल्लद्वयमितां कुर्याद्वटीं छायाविशोषिताम् ।
प्रभाकरवटी सेयं हृद्रोगान्निखिलाञ्जयेत् ॥ ३२ ॥

सोनामाखी, लोहेकी भस्म, अभ्रकभस्म, वंशलोचन और शिलाजीत ये सब औषधि समान भाग लेवे। सबको खरलमें रख अर्जुनवृक्षकी छालके क्वाथको डालकर अच्छे प्रकार खरल करे। फिर छायामें सुखाकर दो दो रत्तीकी गोलियाँ बना-लैवे। यह प्रभाकरवटी यथानियम सेवन करनेसे समस्त हृदयसम्बन्धी रोगोंको दूर करती है ॥ ३१ ॥ ३२ ॥

चिन्तामणिरस ।

पारदं गन्धकं चाभ्रं लौहं वङ्गं शिलाजतु ।
समं समं गृहीत्वा च स्वर्णं सूताङ्घ्रिसम्मितम् ॥ ३३॥
स्वर्णस्य द्विगुणं रौप्यं सर्वमेकत्र मर्दयेत् ।
चित्रकस्य द्रवेणापि भृङ्गराजाम्भसा ततः ॥ ३४ ॥
पार्थस्याथ कषायेण सप्तकृत्वो विभावयेत् ।
ततो गुञ्जामिताः कुर्याद्वटीश्छायाप्रशोषिताः ।
एकैकां दापयेदासां गोधूमक्वाथवारिणा ॥ ३५ ॥

शुद्ध पारा, गन्धक, अभ्रक, लोहा, वङ्ग और शिलाजीत ये प्रत्येक एक एक तौला एवं सुवर्णभस्म तीन मासे, चाँदीके भस्म ६ मासे लेवे, सबको एकत्रकर चीता, भाँगरा और अर्जुनवृक्षकी छालके क्वाथमें ७ बार खरल करके छायामें सुखा-कर एक एक रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे। इसमेंसे प्रतिदिन प्रातःसमय एक एक गोली गेहूँके क्वाथके साथ सेवन करे ॥ ३४-३६ ॥

हृद्रोगान्निखिलान् हन्ति व्याधीन् फुफ्फुसजानपि ।
प्रमेहान्विंशतिं श्वासान् कासानपि सुदुस्तरान् ॥ ३६ ॥
बलपुष्टिकरो हृद्यो रसश्चिन्तामणिः स्मृतः ॥ ३७ ॥

यह चिन्तामणि रस सम्पूर्ण हृदयरोग, फुफ्फुसजन्यरोग, बीस प्रकारके प्रमेह, श्वास, दुस्तर खाँसी, अन्य सर्वप्रकारके रोगोंको, तत्काल नष्ट करता है एवं बल और पुष्टिकारक तथा हृदयको अत्यन्त हितकारी है ॥ ३६ ॥ ३७ ॥

विश्वेश्वररस ।

स्वर्णाभ्रलोहवङ्गानां रसगन्धकयोरपि ।
वैक्रान्तस्य च संगृह्य भागांस्तोलकसम्मितान् ॥ ३८ ॥

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८२८भैषज्यरत्नावली ।[ हृद्रोग •

कर्पूरसलिलेनाथ भावयित्वा यथाविधि ।
रक्तिकैकप्रमाणेण विदध्याद्वटिकास्ततः ॥ ३९ ॥
अयं विश्वेश्वरो नाम रसः फुप्फुसजान् गदान् ।
हृद्रोगांश्च जयेत्सर्वान् संशयोऽत्र न विद्यते ॥ ४० ॥

सोना, अभ्रक, लोहा, वङ्ग, शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक और वैक्रान्तमणि इन सब द्रव्योंकी भस्मको एक एक तोला लेकर कपूरके जलमें विधिपूर्वक खरल करके एक एक रत्ती की गोलियाँ बनालेवे । प्रतिदिन नियमानुसार सेवन करनेसे यह विश्वेश्वर-नामक रस फुप्फुससे उत्पन्न हुए रोगों और समस्त हृदयरोगोंको शीघ्र जीतता है । इसमें कुछ सन्देह नहीं है ॥ ३८-४० ॥

शङ्करवटी ।

रसस्य भागाश्चत्वारो बलेरष्टौ तथा मताः ।
त्रयो लौहस्य नागस्य द्वावित्येकत्र मर्दयेत् ॥ ४१ ॥
भावयेत्काकमाच्याश्च चित्रकस्यार्द्रकस्य च ।
स्वरसेन जयन्त्याश्च वासाया बिल्वपार्थयोः ॥ ४२ ॥
ततो गुञ्जाद्वयमितां विदध्याद्वटिकां भिषक् ।
एकैकां दापयेदासामीषदूष्णेन वारिणा ॥ ४३ ॥

शुद्ध पारा ४ तोले, शुद्ध गन्धक ८ तोले, लोहा ३ तोले और शीशा दो तोले इन सबको एकत्रितकर मकोय, चीता, अदरख, जयन्ती, अडूसा, बेलकी छाल और अर्जुनवृक्षकी छालके क्वाथमें यथाक्रम भावना देकर अच्छी तरह खरल करे । फिर दो दो रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । इनमेंसे हररोज एक एक गोली सुखोष्ण जलके साथ सेवन करे ॥ ४१–४३ ॥

जयेदियं फुप्फुसजान् रोगान् हृदयसम्भवान् ।
जीर्णज्वरं तथा घोरं प्रमेहानपि विंशतिम् ॥ ४४ ॥
कासश्वासामवातांश्च ग्रहणीमपि दुस्तराम् ।
वटी श्रीशङ्करप्रोक्ता बलपुष्टिविवर्द्धिनी ॥ ४५ ॥

यह वटी फुप्फुसजन्यरोग, हृदयगतरोग, पुराना ज्वर, बीसों प्रमेह, खाँसी, श्वास, आमवात और दुस्तर संग्रहणी आदि रोगोंको तत्काल नष्ट करती है । यह वटी श्रीशङ्कर भगवान्ने की है । यह अतिबलकारक और पुष्टिकर है ॥ ४४ ॥ ४५ ॥

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चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ८२९

कल्याणसुन्दररस ।

सिन्दूरमभ्रं तारं च ताम्रं हेम च हिङ्गुलम् ।
सर्वं खल्वतले क्षिप्त्वा मर्दयेद्वह्निवारिणा ॥ ४६ ॥
हस्तिशुण्डाम्भसा पश्चाद्भावयित्वा च सप्तधा ।
गुञ्जामात्रां वटीं कृत्वा कोष्णतोयेन दापयेत् ॥ ४७ ॥
उरस्तोयं च हृद्रोगं वक्षोवातमुरोऽस्रकम् ।
फुफ्फुसान्हन्ति रोगांश्च रसः कल्याणसुन्दरः ॥ ४८ ॥

रससिन्दूर, अभ्रक, चाँदी, ताँबा, सोना और हिंगुल इन सबको समान भाग लेकर खरलमें रक्खे, फिर उसमें चीतेका क्वाथ डालकर घोटे। पश्चात् हाथीशुण्डीके क्वाथकी सात बार भावना देकर उत्तम प्रकारसे घोटे। तदनन्तर एक एक रत्तीकी गोली बनाकर रखले। प्रतिदिन मन्दोष्ण जलके साथ एक एक गोली भक्षण करे तो उरस्तोय, हृदयरोग, वक्षःस्थलकी वात, उरोरक्तस्राव तथा फुफ्फुससम्बन्धी अनेक प्रकारके रोग नष्ट होते हैं ॥ ४६-४८ ॥

वल्लभघृत ।

मुख्यं शतार्द्धं च हरीतकीनां सौवर्चलस्यापि पलद्वयं च ।
पक्वं घृतं वल्लभकेति नाम्ना हृद्रोगशूलोदरमारुतघ्नम् ॥ ४९ ॥

बीजरहित उत्तम हरड ५० और कालानमक ८ तोले इन दोनोंके साथ पकाये हुए घृतको पान करनेसे हृदयरोग, शूल, उदररोग और वातरोग दूर होते हैं। यह वल्लभनामसे प्रसिद्ध है ॥ ४९ ॥

श्वदंष्ट्राद्यघृत ।

श्वदंष्ट्रोशीरमञ्जिष्ठा बला काश्मर्यकत्तृणम् ।
दर्भमूलं पृथक्पर्णी पलाशर्षभकौ स्थिरा ॥ ५० ॥
पलिकान्साधयेत्तेषां रसे क्षीरे चतुर्गुणे ।
कल्हैः स्वगुप्तर्षभकमेदाजीवन्तिजीवकैः ॥ ५१ ॥
शतावर्युद्धिर्माद्वीकाशर्कराश्रावणीबिसैः ।
प्रस्थं सिद्धो घृताद्वातपित्तहृद्रोगशूलनुत् ॥ ५२ ॥
मूत्रकृच्छ्रप्रमेहार्शःश्वासकासक्षयापहः ।
धनुःस्त्रीमद्यभाराध्वखिन्नानां बलमांसदः ॥ ५३ ॥

गोखुरू, खस, मंजीठ, खिरेंटी, कुम्मेर, सुगन्धित तृण, कुशाकी मूल, पृश्निपर्णी, ढालकी छाल, ऋषभक और शालपर्णी इनको पृथक् पृथक् चार चार तोले लेकर

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८३२ भैषज्यरत्नावली । [ मूत्रकृच्छ्र- ]


पित्तजनित मूत्रकृच्छ्रमें रोगीके शरीरपर जल छिड़कना, शीतलजलमें घुसकर स्नान करना, चन्दन, खसादि शीतल पदार्थोंका प्रलेप, ग्रीष्मकालके अनुसार शीतल उपचार करना, पिचकारी लगाना, दुग्धपान, विरेचन ( जुलाब ) देना और दाख, विदारीकन्द तथा ईखके रसके साथ घृतपान करना इत्यादि सब कृत्य करने चाहिये २

क्षारोष्णतीक्ष्णौषधमन्नपानं स्वेदो यवान्नं वमनं निरूहाः ।
तक्रं सतिक्तौषधसिद्धतैलमभ्यङ्गपानं कफमूत्रकृच्छ्रे ॥ ३ ॥

कफजन्यमूत्रकृच्छ्रमें क्षार, गरम तथा तीक्ष्ण औषधि, अन्नपान, पसीना निकलवाना, जौके आटेका बना भोजन, वमन, निरूहवस्ति, मट्ठा, कडुवी और उष्ण औषधियोंसे पकाये हुए तेलकी मालिश अथवा पान करावे ॥ ३ ॥

सर्वं त्रिदोषप्रभवे च वायोः स्थानानुपूर्व्या प्रसमीक्ष्य
कार्यम् । त्रिभ्योऽधिके प्राग्वमनं कफे स्यात्पित्ते विरेकः
पवने च वस्तिः ॥ ४ ॥

तीनों दोषोंसे उत्पन्न मूत्रकृच्छ्रमें वायुके स्थानसे लेकर कफपर्यन्त जो विधि कही हैं उन सबोंको मिलकर इसमें चिकित्सा करे । विशेष करके दोषोंकी अवस्थाको देखकर मिश्रित उपचार करे । त्रिदोषज मूत्रकृच्छ्रमें कफकी अधिकता होनेपर वमन, पित्ताधिक्यमें विरेचन, वातकी आधिक्यमें वस्ति देवे ॥ ४ ॥

तथाऽभिघातजे कुर्यात्सद्यो व्रणचिकित्सितम् ।
मूत्रकृच्छ्रे सदा कार्या वातरोगहरी क्रिया ॥
स्वेदचूर्णक्रियाभ्यङ्गवस्तयः स्युः पुरीषजे ॥ ५ ॥

चोट आदिके लगनेसे प्रगटहुए मूत्रकृच्छ्रमें शीघ्रही व्रणरोगकी समान समस्त वातजमूत्रकृच्छ्रनाशक चिकित्सा करे । मलके रोकनेसे जो मूत्रकृच्छ्र उत्पन्न हुआ होय तो स्वेद प्रयोग, या विरेचन औषधियोंका चूर्ण नलीमें भरकर गुदामें प्रवेश करना, तैलादिकी मालिश अथवा वस्तिकर्म करे ॥ ५ ॥

क्रिया हिता त्वश्मरीशर्करायां या मूत्रकृच्छ्रे कफमारुतोत्थे ।

वायु और कफसे जो मूत्रकृच्छ्र हुआ हो तो अश्मरी तथा शर्करारोगमें कही हुई विधिके अनुसार चिकित्सा करे ॥

लेह्यं शुक्रविबन्धोत्थे शिलाजतु समाक्षिकम् ।
वृष्यैर्बृंहितधातोश्च विधेया प्रमदोत्तमा ॥ ६ ॥