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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 861 of 1416

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Page 861

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ८२९

कल्याणसुन्दररस ।

सिन्दूरमभ्रं तारं च ताम्रं हेम च हिङ्गुलम् ।
सर्वं खल्वतले क्षिप्त्वा मर्दयेद्वह्निवारिणा ॥ ४६ ॥
हस्तिशुण्डाम्भसा पश्चाद्भावयित्वा च सप्तधा ।
गुञ्जामात्रां वटीं कृत्वा कोष्णतोयेन दापयेत् ॥ ४७ ॥
उरस्तोयं च हृद्रोगं वक्षोवातमुरोऽस्रकम् ।
फुफ्फुसान्हन्ति रोगांश्च रसः कल्याणसुन्दरः ॥ ४८ ॥

रससिन्दूर, अभ्रक, चाँदी, ताँबा, सोना और हिंगुल इन सबको समान भाग लेकर खरलमें रक्खे, फिर उसमें चीतेका क्वाथ डालकर घोटे। पश्चात् हाथीशुण्डीके क्वाथकी सात बार भावना देकर उत्तम प्रकारसे घोटे। तदनन्तर एक एक रत्तीकी गोली बनाकर रखले। प्रतिदिन मन्दोष्ण जलके साथ एक एक गोली भक्षण करे तो उरस्तोय, हृदयरोग, वक्षःस्थलकी वात, उरोरक्तस्राव तथा फुफ्फुससम्बन्धी अनेक प्रकारके रोग नष्ट होते हैं ॥ ४६-४८ ॥

वल्लभघृत ।

मुख्यं शतार्द्धं च हरीतकीनां सौवर्चलस्यापि पलद्वयं च ।
पक्वं घृतं वल्लभकेति नाम्ना हृद्रोगशूलोदरमारुतघ्नम् ॥ ४९ ॥

बीजरहित उत्तम हरड ५० और कालानमक ८ तोले इन दोनोंके साथ पकाये हुए घृतको पान करनेसे हृदयरोग, शूल, उदररोग और वातरोग दूर होते हैं। यह वल्लभनामसे प्रसिद्ध है ॥ ४९ ॥

श्वदंष्ट्राद्यघृत ।

श्वदंष्ट्रोशीरमञ्जिष्ठा बला काश्मर्यकत्तृणम् ।
दर्भमूलं पृथक्पर्णी पलाशर्षभकौ स्थिरा ॥ ५० ॥
पलिकान्साधयेत्तेषां रसे क्षीरे चतुर्गुणे ।
कल्हैः स्वगुप्तर्षभकमेदाजीवन्तिजीवकैः ॥ ५१ ॥
शतावर्युद्धिर्माद्वीकाशर्कराश्रावणीबिसैः ।
प्रस्थं सिद्धो घृताद्वातपित्तहृद्रोगशूलनुत् ॥ ५२ ॥
मूत्रकृच्छ्रप्रमेहार्शःश्वासकासक्षयापहः ।
धनुःस्त्रीमद्यभाराध्वखिन्नानां बलमांसदः ॥ ५३ ॥

गोखुरू, खस, मंजीठ, खिरेंटी, कुम्मेर, सुगन्धित तृण, कुशाकी मूल, पृश्निपर्णी, ढालकी छाल, ऋषभक और शालपर्णी इनको पृथक् पृथक् चार चार तोले लेकर