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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 855 of 1416

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Page 855

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ८२३


अर्जुनवृक्षकी छाल २ तोले, दूध ८ तोले और जल ३२ तोले सबको एकत्र कर पकावे। जब ८ तोले जल शेष रहजाय तब शीतल होजानेपर उस दूधको मिश्री मिलाकर पीवे। इसी प्रकार पञ्चमूल, खिरेंटी या मुलहठीके क्वाथसे सिद्ध किये हुए दूधको चीनी डालकर पीवें तो पित्तज हृदयरोग दूर होय ॥ ७ ॥

घृतेनदुग्धेन गुडाम्भसा वा पिबन्ति चूर्णं ककुभत्वचो ये ।
हृद्रोगजीर्णज्वररक्तपित्तं हत्वा भवेयुश्चिरजीविनस्ते ॥ ८ ॥
जो हृदयरोगी घृत, दुग्ध अथवा गुडके शर्बतके साथ अर्जुनकी छालका चूर्ण सेवन करे तो वह हृदयरोग, जीर्णज्वर और रक्तपित्तरोगको नष्ट करके दीर्घजीवी होता है ॥ ८ ॥

वचानिम्बकषायाभ्यां वान्तं हृदि कफोत्थिते ।
वातहृद्रोगनुच्चूर्णं पिप्पल्यादिं च पाययेत् ॥ ९ ॥
कफजन्य हृदयरोगमें वच और नीमकी छालका क्वाथ पान कराकर वमन करावे। फिर वातजहृदयरोगको नष्ट करनेवाला पिप्पल्यादिगणका चूर्ण सेवन करे ॥ ९ ॥

त्रिदोषजे लंघनमादितः स्यादन्नं च सर्वेषु हितं विधेयम् ।
हीनातिमध्यत्वमवेक्ष्य चैव कार्यं त्रयाणामपि कर्म शस्तम् ॥
त्रिदोषजहृदयरोगमें पहले लंघन करावे, फिर त्रिदोषनाशक तथा हितकारी अन्न-पान देवे। इसमें तीनों दोषोंकी प्रबलता, समता अथवा हीनताको अच्छे प्रकार विचारकर चिकित्सा करनी चाहिये ॥ १० ॥

चूर्णं पुष्करजं लिह्यान्माक्षिकेण समायुतम् ।
हृच्छूलश्वासकासघ्नं क्षयहिक्कानिवारणम् ॥ ११ ॥
पोहकरमूलके चूर्णको शहदमें मिलाकर चाटे तो हृदयशूल, श्वास, खाँसी, क्षय और हिचकी आदि रोग दूर होते हैं ॥ ११ ॥

तैलाज्यगुडविपक्वं चूर्णं गोधूमपार्थजं चापि ।
पिबति पयोऽनु च यः स भवेज्जितसकलहृदामयः पुरुषः १२ ॥
गेहूँ और अर्जुनकी छालके चूर्णको तेल, घी और गुडके द्वारा पकाकर दूधके साथ पीवे। इससे सर्वप्रकारका हृदयरोग नष्ट होता है ॥ १२ ॥

मूलं नागबलायास्तु चूर्णं दुग्धेन पाययेत् ।
हृद्रोगश्वासकासघ्नं ककुभस्य च वल्कलम् ॥ १३ ॥
रसायनं परं बल्यं वातजिन्मासयोजितम् ।
संवत्सरप्रयोगेण जीवेद्वर्षशतं ध्रुवम् ॥ १४ ॥