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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 854 of 1416

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Page 854
८२३भैषज्यरत्नावली ।[ हृद्रोग-

पिप्पत्येला वचा हिङ्गु यवक्षारोऽथ सैन्धवम् ।
सौवर्चलमथो शुण्ठी अजमोदा च चूर्णितम् ॥ २ ॥
फलधान्याम्लकौलत्थदधिमद्यासवादिभिः ।
पाययेच्छुद्धदेहं च स्नेहेनान्यतमेन वा ॥ ३ ॥

वमन विरेचनादिके द्वारा शुद्ध हुए रोगीको पीपल, इलायची, वच, हींग, जवाखार, सैंधानमक, कालानमक, सोंठ और अजमोद इन ओषधियोंके समान भाग चूर्णको एकत्र करके बिजौरेनीम्बूके रस, काँजी, कुलथीके यूष, दही, मद्य, आसव या अन्य घृतादि स्निग्ध पदार्थोंके साथ मिश्रितकर पान करावे ॥

नागरं वा पिबेदुष्णं कषायं चाग्निवर्द्धनम् ।
कासश्वासानिलहरं शूलहृद्रोगनाशनम् ॥ ४ ॥

सोंठके मन्दोष्ण क्वाथको पान करनेसे अग्नि बढ़ती है तथा खाँसी, श्वास, वायुविकार, शूल और हृदयरोग दूर होता है ॥ ४ ॥

श्रीपर्णीमधुकक्षौद्रसितागुडजलैर्वमेत् ।
पित्तोपसृष्टे हृदये सेवेत मधुरैः शृतम् ॥
घृतं कषायांश्चोद्दिष्टान् पित्तज्वरविनाशनान् ॥ ५ ॥

पित्तोत्पन्न हृदयरोगमें कुम्हेरके फल, मुलहठी इनके अर्द्धपक्व क्वाथमें शहद, मिश्री और गुड मिलाकर रोगीको पान कराकर वमन करावे । एवं मधुर पदार्थोंके साथ सिद्ध किया हुआ घी और पित्तज्वरनाशक क्वाथ सेवन करे ॥ ५ ॥

शीताः प्रदेहाः परिषेचनानि तथा विरेको हृदि पित्तदुष्टे ।
द्राक्षासिताक्षौद्रपरूषकैः स्याच्छुद्धे च पित्तापहमन्नपानम् ॥
पिष्ट्वा पिबेद्वापि सिताजलेन यष्ट्याह्वयं तिक्तकरोहिणीं च ॥ ६ ॥

पित्तज हृदयरोगमें चन्दनादि शीतल पदार्थोंका प्रलेप, शीतल जलका सेचन और विरेचनादि क्रिया करे । एवं वमन विरेचनादिसे शरीरकी शुद्धि हो जानेपर, दाख, मिश्री, शहद और फालसे इत्यादि द्रव्योंके साथ पित्तनाशक अन्न तथा पान सेवन करे । मुलहठी और कुटकीको जलमें पीसकर मिश्री डालकर पान करे तों पित्तका हृद्रोग दूर होता है ॥ ६ ॥

अर्जुनस्य त्वचा सिद्धं क्षीरं योज्यं हृदामये ।
सितया पञ्चमूल्या वा बलया मधुकेन वा ॥ ७ ॥