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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

About this granth

The Bhaishajya Ratnavali (भैषज्य रत्नावली) of Kaviraj Govind Das Sen is an Ayurvedic treatise on therapeutics, widely used by practitioners as a trusted collection of formulations. As the introduction to this edition points out, it gathers tested preparations of both kinds: herbal ones such as decoctions, powders, linctuses, asavas and arishtas, and mineral and metallic preparations from rasashastra, so that physicians of every level can use it.

The work proceeds disease by disease. Under each condition it gives the relevant formulations, for example decoctions of the five roots and the ten roots for fever, linctuses such as kutajavaleha, medicated ghee and oils, and remedies for hiccup and other ailments, with quantities of ingredients and methods of preparation.

This edition gives the verses with a Hindi commentary in prose order, enlarged, revised and translated by the late Vaidya Shankarlal, described as the author and commentator of many books. It was printed by Khemraj Shrikrishnadas at the Shri Venkateshwar Steam Press, Bombay, in Samvat 2009 (1952). At 1416 pages it is a reference work for students and practitioners.

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प्रकरणम् ] भाषाटीकासहिता । ६९

मध्यभाङ्ग्यार्दि ।

भाङ्गर्यब्दपर्पटकपुष्करशृंगबेर-
पथ्याकणाह्वदशमूलकृतः कषायः ।
सद्यो निहन्ति विषमज्वरसन्निपात-
जीर्णज्वरश्वयथुशीतकवह्निसादान् ॥ ६६ ॥

भारंगी, नागरमोथा, पित्तपापडा, पुहकरमूल, सोंठ, हरड, पीपल और दशमूल इन ओषधियोंका बनायाहुआ क्वाथ पान करनेसे विषमज्वर, सन्निपातज्वर, जीर्ण-ज्वर, सूजन, शीत और मन्दाग्नि इन सब रोगोंको शीघ्र दूर करता है ॥ ६६ ॥

बृहद्भाङ्गर्यादि ।

भाङ्गीं पथ्यां कटू कुष्ठं पर्पटं मुस्तकं कणा ।
अमृता दशमूलं च नागरं क्वाथयेद्भिषक् ॥ ६७ ॥
हन्ति धातुगतं सर्वं बहिःस्थं शीतसंयुतम् ।
प्लीहानं यकृतं गुल्मं श्वयथुं च विनाशयेत् ॥
एष भाङ्गर्यादिको नाम सर्वज्वरहरः परः ॥ ६८ ॥

भारंगी, हरड, कुटकी, कूठ, पित्तपापडा, नागरमोथा, पीपल, गिलोय, दशमूल, और सोंठ इन सबको समानभागलेकर क्वाथ बनाकर पान करनेसे सब प्रकारके धातुगतज्वर, बाहरीत्वचामें रहनेवाले और शीतयुक्त विषमज्वर, प्लीहा, यकृत, गुल्म और सूजनयुक्त ज्वर तथा सन्निपातादिज्वर नष्ट होते हैं । यह भाङ्ग्यादिक्वार्थ सर्व-प्रकारके ज्वरोंको हरनेवाला है ॥ ६७ ॥ ६८ ॥

दास्यादि ।

दासीदारुकलिङ्गलोहितलताश्यामाकपाठाशठी-
शुण्ठ्योशीरकिरातकुञ्जरकणात्रायन्तिकापद्मकैः ।
वञ्जीधान्यकनागराब्दसरलैः शिग्र्वम्बुसिंहीशिवा-
व्याघ्रीपर्पटदर्भमूलकटुकानन्तामृतापुष्करैः ॥ ६९ ॥
धातुस्थं विषमं त्रिदोषजनितं चैकाहिकं द्व्याहिकं
कामैः शोकसमूद्भवं च विविधं यच्छर्द्दियुक्तं नृणाम् ।
पीतो हन्ति क्षयोद्भवं सततकं चातुर्थिकं भूतजं
योगोऽयं मुनिभिः पुरा निगदितो जीर्णज्वरे दुस्तरे ३७०

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७० भैषज्यरत्नावली । [ चिकित्सा-

नीला पियाबाँसा, देवदारु, इन्द्रजौ, मंजीठ, श्यामाकघास, पाठ, कचूर, सोंठ, खस, चिरायता, गजपीपल, त्रायमाणा, पद्माख, थूहरकी जड, धनियाँ, सोंठ, नागरमोथा, धूपसरल, सहिंजनेकी छाल, सुगन्धवाला, बड़ी कटेरी, हरड, कटेरी, पित्तपापडा, कुशाकी जड़, अनन्तमूल, गिलोय और पुहकरमूल इन समस्त ओषधियोंका काढा बनाकर सेवन करनेसे मनुष्योंके धातुगत ज्वर, विषमज्वर, त्रिदोषजनितज्वर तथा ऐकाहिक, द्वयाहिक अथवा काम, क्रोध, शोक, आदिसे उत्पन्न, होनेवाले विविधप्रकारके ज्वर, बमनयुक्त ज्वर, क्षयजनित ज्वर, सततज्वर, चातुर्थिकज्वर और भूतबाधाजन्य ज्वर ये सब प्रकारके ज्वर नाशको प्राप्त होते हैं। इस प्रयोग को पूर्वकालमें मुनियोंने वर्णन किया है। यह दारुण जीर्णज्वरमें भी विशेष उपकार करता है ॥ ६९ ॥ ३७० ॥

दाव्यादि ।

दार्वीकलिङ्गमञ्जिष्ठाव्याघ्रीदारुगुडूचिकाः ।
भूधात्री पर्पटं श्यामा तगरं करिपिप्पली ॥ ७१ ॥
क्षुद्रा निम्बं घनं व्याधि नागरं पद्मकं शठी ।
रामाटारूषः सरलं त्रायमाणास्थिसन्धिकम् ॥ ७२ ॥
भूनिम्बारुष्करं पाठा कुशाकटुकरोहिणी ।
मागधी धान्यकं चेति क्वाथं मधुयुतं पिबेत् ॥७३॥

दारुहल्दी, इन्द्रजौ, मंजीठ, बड़ी कटेरी, देवदारु, गिलोय, भुईंआमला, पित्तपापडा, अनन्तमूल, तगर, गजपीपल, कटेरी, नीमकी छाल, नागरमोथा, कूठ, सोंठ, पद्माख, कचूर, रामवाँसा, धूपसरल, त्रायमाणा, हडसंहारी, चिरायता, भिलावे, पाठ, कुशाकी जड़, कुटकी, पीपल और धनियाँ इन सब ओषधियोंका यथाविधि क्वाथ बनाकर शहद डालकर पान करे ॥ ७१-७३ ॥

वातिकं पैत्तिकं चापि श्लैष्मिकं सान्निपातिकम् ।
द्वन्द्वजं विषमं घोरं सतताद्यं सुदारुणम् ॥ ७४ ॥
अन्तःस्थं च बहिःस्थं च धातुस्थं च विशेषतः ।
सर्वज्वरं निहन्त्याशु तथा वै दैर्घरात्रिकम् ॥ ७५ ॥
ग्रहणीमतिसारं च कासं श्वासं सकामलम् ।
शोषं हन्यात्तथा शोथं मन्दाग्नित्वमरोचकम् ॥ ७६ ॥

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प्रकरणम् ] भाषाटीकासहिता । ७१

शूलमष्टविधं हन्ति प्रमेहानपि विंशतिम् ।
प्लीहानमग्रमांसं च यकृतं च हलीमकम् ॥ ७७ ॥
पृथग्दोषांश्च विविधान् समस्तान् विषमज्वरान् ।
तान् सर्वान् नाशयेत्याशु वृक्षमिन्द्राशनिर्यथा ॥ ७८ ॥

यह क्वाथ-वातज, पित्तज, कफज, त्रिदोषज, द्विदोषज, सतत, अत्यन्त विषम, आभ्यन्तर, बाह्य और धातुगतज्वर, विशेषकर दैर्घरात्रिक (बहुतदिनोंतक रहनेवाला) ज्वर इन सब प्रकारके ज्वरोंको शीघ्र नष्ट करता है । तथा संग्रहणी, अतिसार, खाँसी, श्वास, कामला, शोष, शोथ, मन्दाग्नि, अरुचि, आठ प्रकारका शूल, बीसप्रकारका प्रमेह, प्लीहा, अग्रमांस, यकृद्रोग, हलीमक, वातादि भिन्नभिन्न दोषोंसे होनेवाले विविध प्रकारके ज्वर और सब प्रकारके विषमज्वरोंको इस प्रकार शीघ्र नष्ट करता है जैसे वज्र वृक्षोंको तत्काल नष्ट करदेता है ॥ ७४-७८ ॥

ऐकाहिकज्वरमें पटोलादिक्वाथ ।

पटोलारिष्टमृद्वीकाः श्यामाकं त्रिफला वृषम् ।
क्वाथ ऐकाहिकं हन्ति शर्करामधुयोजितः ॥ ७९ ॥

परवल, नीमकी छाल, दाख, अनन्तमूल, त्रिफला और अडूसा इनका क्वाथ खांड और शहद मिलाकर पान करनेसे ऐकाहिकज्वर दूर होता है ॥ ७९ ॥

गुडूच्यादि ।

गुडूचीमुस्तधात्रीणां कषायं वा समाक्षिकम् ।
प्रातःकालनिषेवेण विषमज्वरनाशनम् ॥ ३८० ॥

गिलोय, नागरमोथा और आमले इनका एकत्र क्वाथ बनाकर उसमें शहद डालकर प्रतिदिन प्रातःकाल सेवन करनेसे विषमज्वर दूर होता है ॥ ३८० ॥

सन्ततज्वरमें कलिंगादिक्वाथ ।

कलिंगकं पटोलस्य पत्रं कटुकरोहिणी ।
पिबेत् सन्ततके नित्यं किञ्चित्क्षौद्रेण संयुतम् ॥ ८१ ॥

सन्ततज्वरमें-इन्द्रजौ, पटोलपात और कुटकी इनके क्वाथको थोड़ासा शहद मिलाकर पान करनेसे विशेष लाभ होता है ॥ ८१ ॥

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( ७२ ) भैषज्यरत्नावली । [ चिकित्सा-


सततज्वरमें पटोलादिक्वाथ ।

पटोलं सारिवा मुस्तं पाठा कटुकरोहिणी ।
क्वाथं कृत्वा पिबेत्प्रातर्ज्वरी सततपीड़ितः ॥ ८२ ॥
सततज्वरसे पीड़ित रोगीको प्रतिदिन प्रातःकाल परवल, अनन्तमूल, नागरमोथा, पाठ और कुटकी इनका क्वाथ बनाकर पीना चाहिये ॥ ८२ ॥

अन्येद्युष्कज्वरमें निम्बादिक्वाथ ।

निम्बं पटोलं त्रिफला मृद्वीका मुस्तवत्सकौ ।
एषां क्वाथोऽन्येद्युष्कज्वरहारी विनिश्चितः ॥ ८३ ॥
नीमके पत्ते, परवल, हरड, बहेडा, आमला, दाख, नागरमोथा और इन्द्रजौ इन ओषधियोंका क्वाथ अन्येद्युष्क (दूसरे दिन आनेवाले) ज्वरको निस्सन्देह दूर करता है ॥ ८३ ॥

तृतीयकज्वरमें किरातादिक्वाथ ।

किराततिक्तममृता चन्दनं विश्वभेषजम् ।
क्वाथमेषां पिबेत्प्रातस्तृतीयज्वरनाशनम् ॥ ८४ ॥
चिरायता, गिलोय, लालचन्दन और सोंठ इनका काढ़ा बनाकर प्रतिदिन प्रातः काल पान करनेसे घोर तृतीयक (तिजारी) ज्वर नष्ट होता है ॥ ८४ ॥

महौषधादिक्वाथ ।

महौषधामृतामुस्तचन्दनोशीरधान्यकैः ।
क्वाथस्तृतीयकं हन्ति शर्करामधुयोजितः ॥ ८५ ॥
सोंठ, गिलोय, नागरमोथा, लालचन्दन, खस और धनियाँ इन ओषधियोंके द्वारा बनायाहुआ क्वाथ खाँड़ और शहद डालकर पीनेसे तृतीयक ज्वरको दूर करता है ॥ ८५ ॥

उशीरादिक्वाथ ।

उशीरं चन्दनं मुस्तं गुडूचीधान्यनागरम् ।
अम्भसा क्वथितं पेयं शर्करामधुयोजितम् ॥
ज्वरे तृतीयके देयं तृष्णादाहसमन्विते ॥ ८६ ॥
तृतीयकज्वरमें तृषा और दाहके होनेपर खस, लालचन्दन, नागरमोथा, गिलोय, धनियाँ और सोंठ इन ओषधियोंका क्वाथ बनाकर खाँड़ और शहद मिलाकर पान करना चाहिये ॥ ८६ ॥

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प्रकरणम् ] भाषाटीकासहिता । ५३


चातुर्थिकज्वरमें वासादि क्वाथ ।

वासाधात्रीस्थिरादारुपथ्यानागरसाधितः ।
सितामधुयुतः क्वाथश्चातुर्थिकविनाशनः ॥ ८७ ॥

अड़ूसेकी छाल, आमले, शालपर्णी, देवदारु, हरड और सोंठ इनके द्वारा सिद्ध कियाहुआ क्वाथ मिश्री और शहद मिलाकर सेवन करनेसे चातुर्थिक ( चौथिया ) ज्वर नष्ट होता है ॥ ८७ ॥

मुस्तादिक्वाथ ।

मुस्तापाठाशिवाक्वाथश्चातुर्थिकज्वरापहः ।
दुग्धेन त्रिफला पीता हन्ति चातुर्थिकं ज्वरम् ॥ ८८ ॥

नागरमोथा, पाठ और हरड इन तीनोंका क्वाथ चातुर्थिकज्वरको दूर करता है । अथवा दूधके साथ त्रिफलेका क्वाथ पान करनेसे चातुर्थिक ज्वर दूर होता है ॥८८॥

पथ्यादिक्वाथ ।

पथ्यास्थिरानागरदेवदारुधात्रीवृषैरुक्तकथितः कषायः ।
सितोपलामाक्षिकसप्रयुक्तश्चातुर्थिकं हन्त्यचिरेणपीतः॥८९॥

हरड, शालपर्णी, सोंठ, देवदारु, आमले और अडूसा इन सबका क्वाथ बनाकर मिश्री और शहद डालकर पानकरनेसे चातुर्थिक ज्वर शीघ्र दूर होतां है ॥ ८९ ॥

अम्भोदरादिक्वाथ ।

अम्भोधरं छिन्नरुहा क्वाथश्चामलकी तथा ।
चातुर्थिकं ज्वरं घोरं नाशयेदेष निश्चयः ॥ ३९० ॥

नागरमोथा, गिलो । आर आमले इनका क्वाथ भयकर चातुर्थिक ज्वरको निश्चय दूर करता है ॥ ३९० ॥

अजाजी गुडसंयुक्ता विषमज्वरनाशिनी ।
अग्निसादं जयेत्सम्यग् वातरोगांश्च नाशयेत् ॥ ९१ ॥

जीरेका चूर्ण छः माशे, पुराना गुड छः माशे दोनोंको एकत्र मिलाकर सेवन करनेसे विषमज्वर मन्दाग्नि और समस्त वातरोग नष्ट होते हैं ॥ ९१ ॥

रसोनकल्कं तिलतैलमिश्र योऽश्नाति नित्यं विषमज्वरार्तः ।
विमुच्यते सोऽप्यचिराज्ज्वरेण वातामयश्चापि सुघोररूपैः ९२

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७४ | भैषज्यरत्नावली । | [ चिकित्सा-

यदि विषमज्वरका रोगी प्रतिदिन लहसुनके कल्कको तिलके तेलमें भूनकर सेवन करे तो वह अल्पकालमें ही विषमज्वर और घोर वातरोगसे मुक्त हो जाता है ॥९२॥

गुडप्रगाढां त्रिफलां पिबेद्वा विषमार्दितः ॥ ९३ ॥

अथवा विषमज्वरवाला मनुष्य हरड, बहेडा, आमला इनके समानभाग चूर्णको पुराने गुडमें मिलाकर सेवन करे तो विषमज्वर दूर होता है ॥ ९३ ॥

मूलिकाधारणादिकप्रयोग ।

काकजङ्घा बला श्यामा ब्रह्मदण्डी कृताञ्जलिः ।
पृश्निपर्णी त्वपामार्गस्तथा भृङ्गरजोऽष्टमम् ॥ ९४ ॥
एषामन्यतमं मूलं पुष्येणोद्धृत्य यत्नतः ।
रक्तसूत्रेण संवेष्ट्य बद्धमैकाहिकं जयेत् ॥ ९५ ॥

काकजंघा ( मसी ), खिरैंटी, अनन्तमूल, ब्रह्मदण्डी, लज्जावन्ती, पिठवन, चिरचिटा और भाँगरा इन आठोंमेंसे किसी एककी जड़को पुष्यनक्षत्रमें उखाडकर लालडोरेमें बाँधकर हाथमें या गलेमें बाँधनेसे ऐकाहिक ( रोजआनेवाला ) ज्वर दूर होता है ॥ ९४-९५ ॥

अपामार्गजटा कट्यां लोहितैः सप्ततन्तुभिः ।
बद्धा वारे रवेस्तूर्णं ज्वरं हन्ति तृतीयकम् ॥ ९६ ॥

रविवारके दिन चिरचिटेकी जड़को उखाड़कर लालरंगके सात डोरोंसे बाँधकर कमरमें बाँधनेसे तृतीयकज्वर शीघ्र दूर होता है ॥ ९६ ॥

उलूकदक्षिणं पक्षं सितसूत्रेण वेष्टयेत् ।
बध्नीयाद्वामकर्णे तु हरत्येकाहिक ज्वरम् ॥ ९७ ॥

उल्लूके दहने पंखको सफेद डोरेसे बाँधकर बायें कानमें बाँधनेसे ऐकाहिक ज्वर नष्ट होता है ॥ ९७ ॥

कर्कटस्य बिलोद्भूतमृदा तत्तिलकं कृतम् ।
ऐकाहिकं ज्वरं हन्ति नात्र कार्या विचारणा ॥ ९८ ॥

केंकड़ेके बिलकी मिट्टीको लेकर उसका तिलक लगानेसे ऐकाहिकज्वर निस्सन्देह दूर होता है ॥ ९८ ॥

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प्रकरणम् ] भाषाटीकासहिता । ७५

कर्णस्य मलजालेन वर्तिं कृत्वा प्रयत्नतः ।
ज्वालयेत्तिलतैलेन कज्जलं ग्राहयेच्छनैः ॥
अञ्जयेन्नेत्रयुगलं त्र्याहिकज्वरशान्तये ॥ ९९ ॥
कानके मैलकी बत्ती बनाकर उसे तिलके तेलमें भिजोकर जलावे । फिर उसका कज्जल बनाकर नेत्रोंमें आँजे, इससे तृतीयकज्वर शान्त होता है ॥ ९९ ॥

मूलं जयन्त्याः शिरसा धृतं सर्वज्वरापहम् ॥ ४०० ॥
सफेद अरणीकी जड़को सिरमें बाँधनेसे सब प्रकारके पुराने ज्वर दूर होते हैं ॥ ४०० ॥

शिरीषपुष्पस्वरसो रजनीद्वयसंयुतः ।
नस्यं सर्पिःसमायोगात् ज्वरं चातुर्थिकं जयेत् ॥
चातुर्थिकहरं नस्यं मुनिद्रुमदलाम्बुना ॥ ४०१ ॥
सिरसके फूलोंके स्वरसमें हल्दी और दारुहल्दीका चूर्ण मिलाकर और उसमें थोड़ा घी डालकर नस्य देनेसे चातुर्थिकज्वर दूर होता है । अथवा अगस्तियाके पत्तोंके स्वरसका नस्य देनेसे चातुर्थिकज्वर नष्ट होता है ॥ ४०१ ॥

शैलूषमण्डनरजः पुरुषानुरूपं
शुक्लाङ्गवत्ससुरभीपयसा निपीतम् ।
आदित्यवारभवपालिदिने नराणां
चातुर्थिकं हरति कष्टमपि क्षणेन ॥ २ ॥
रविवारके दिन ज्वरकी बारी होनेपर रोगीकी अवस्थानुसार शुद्ध हरतालके चूर्णको सफेद बछड़ेवाली गायके दूधके साथ सेवन करावे । इससे दुस्साध्य भी चातुर्थिकज्वर क्षणभरमें शान्त होजाता है ॥ २ ॥

श्वेतार्ककरबीजस्य चाश्विन्यां मूलमुद्धरेत् ।
पीतं तण्डुलतोयेन पृथक् चातुर्थनाशनम् ॥ ३ ॥
अश्विनीनक्षत्रमें सफेद आक अथवा सफेद कनेरकी जड़को उखाड़कर चावलोंके जलमें पीसकर पान करनेसे चातुर्थिक (चौथिया) दूर होता है। ये दोनों औषधि विषैली हैं. इसलिये एक रत्ती या आधी रत्तीसे अधिक एकमात्रामें नहीं देनी चाहिये. विशेषकर सफेद कनेरका व्यवहार तो बड़ी सावधानीसे करना चाहिये ॥ ३ ॥

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७६ | भैषज्यरत्नावली । | [ चिकित्सा-

अम्लोटजसहस्रेण दलेन सुकृतां पिबेत् ।
पेयां घृतप्लुतां व्याधिचातुर्थिकहरीं त्र्यहम् ॥ ४ ॥
अम्लोट ( अमरूत ) क एक हजार पत्तोंके साथ दुगुने चावलोंकी पेया बनाकर उसमें घृत डालकर तीन दिनतक पान करनेसे चातुर्थिकज्वर शमन होता है ॥ ४ ॥

काकमाचीभवं मूलं कर्णे बद्धं निशाजवरम् ।
निहन्ति नात्र सन्देहो यथा सूर्योदयस्तमः ॥ ५ ॥
मकोयकी जड़को कानमें बाँधनेसे रात्रिमें आनेवाला ज्वर इस प्रकार निस्सन्देह दूर होजाता है, जैसे सूर्यका उदय होनेसे अन्धकार ॥ ५ ॥

मूलकं केशराजस्य कृत्वा तत्सप्तखण्डकम् ।
आर्द्रकैः सह भुञ्जीत सर्वज्वरविनाशनम् ॥ ६ ॥
भाँगरेकी जड़के सात टुकड़े करके उनमेंसे एक एक टुकड़ा अदरखके साथ खानेसे सर्वप्रकारके ज्वर नष्ट होते हैं ॥ ६ ॥

कृष्णाम्बरदृढाबद्धगुग्गुलूलूकपुच्छजः ।
धूपश्चातुर्थिकं हन्यात् तमः सूर्य इवोदितः ॥ ७ ॥
भाँगरेके रसमें कपड़ेको काला रंगकर उसमें गूगल और उल्लूकी पूँछको दृढतासे बाँधकर उसकी धूप देनेसे चातुर्थिक ज्वर सूर्योदयसे अन्धकारके समान शीघ्र दूर होजाता है ॥ ७ ॥

“ गङ्गाया उत्तरे तीरे अपुत्रस्तापसो मृतः ।
तस्मै तिलोदकं दद्यान्मुञ्चत्वैकाहिको ज्वरः ॥ ”
एतन्मंत्रेण चाश्वत्थपत्रहस्तेन तपयेत् ॥ ८ ॥
“गंगाय उत्तरे तीरे-गंगाके उत्तर तटपर जो पुत्रहीन तपस्वी मरगया है, उसके लिये तिलाञ्जलि देवे ” इस मंत्रसे पीपलका पत्ता हाथमें लेकर तर्पण करे इससे ऐकाहिक ज्वर दूर होता है ॥ ८ ॥

“ ॐ बाणयुद्धे महाघोरे द्वादशार्कसमप्रभे ।
जातोऽसौ सुमहावीर्यो मुञ्चत्वैकाहिको ज्वरः ॥ ”
लिखित्वाऽश्वत्थपत्रे तु बाहौ मंत्रं प्रधापयेत् ॥ ९ ॥
“ ॐ बाणयुद्धे ” इत्यादि मंत्रको पीपलके पत्तेपर लिखकर पाठ करनेके पश्चात बाहुमें बाँधनेसे ऐकाहिकज्वर दूर होता है ॥ ९ ॥

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प्रकरणम् ] भाषाटीकासहिता । ७७


“ समुद्रस्योत्तरे तीरे द्विविदो नाम वानरः । ”
ऐकाहिकं ज्वरं हन्ति लिखितं यस्तु पश्यति ॥ ४१० ॥
“ ओम् समुद्रस्य ” इत्यादि मन्त्रको पीपलके पत्तेपर लिखकर जो मनुष्य देखता है तो उसका ऐकाहिक ज्वर नष्ट होजाता है ॥ ४१० ॥

कर्म साधारणं जह्यात् तृतीयकचतुर्थकौ ।
आगन्तुरनुबन्धो हि प्रायशो विषमज्वरे ॥ ११ ॥
साधारण कर्म करने अर्थात् जप, होम, स्तुतिपाठ आदि मांगलिक कार्य करनेसे और क्वाथ आदि औषधियोंके सेवनसे तृतीयक और चातुर्थिक ज्वर दूर होता है । क्योंकि, विषमज्वर प्रायः आगन्तुक ( भूतादिकी बाधा ) से हुआ करता है इसलिये दैविक क्रियाद्वारा विषमज्वरकी चिकित्सा करनी चाहिये ॥ ११ ॥

“ ॐ नमो भगवते छिन्धि छिन्धि अमुकस्य
ज्वरस्य शिरः प्रज्वलितपरशुपाणये पुरुषाय फट् ॥ ”
भूर्जे विलिख्य बाहौ तु धारणात्क्षणमात्रतः ।
एतन्मन्त्रस्य महात्म्यात् ज्वरः सर्वो विनश्यति ॥ १२ ॥
इस मन्त्रको भोजपत्रपर लिखकर हाथमें बाँधनेसे सब प्रकारका ज्वर क्षणभरमें ही दूर होता है ॥ १२ ॥

“ ॐ विद्युदानन ह्रीं फट् स्वाहा ” ॥ १३ ॥
एतन्मन्त्रं चूर्णलिप्ते ताम्बूलीपत्रे लिखित्वा तत्पत्रं संचर्व्य
भक्षयतो दिनत्रयाभ्यन्तरे ज्वरशान्तिर्भवति ॥ १४ ॥
उक्त मन्त्रको चूनेसे लिप्त ताम्बूल पत्रपर लिखकर उस पानको खूब चबाकर खानेसे तीनदिनमें ज्वर शान्त होजाता है ॥ १३ ॥ १४ ॥

सोमं सानुचरं देवं समातृगणमीश्वरम् ।
पूजयन्प्रयतः शीघ्रं मुच्यते विषमज्वरात् ॥ १५ ॥
विष्णुं सहस्रमूर्द्धानं चराचरपतिं विभुम् ।
स्तुवन्नामसहस्रेण ज्वरं सर्वं व्यपोहति ॥ १६ ॥
ब्रह्माणमश्विनाविन्द्रं हुतभक्ष्यं हिमाचलम् ।
गङ्गां मरुद्गणांश्चिष्टान् पूजयेज्जयति ज्वरम् ॥ १७ ॥

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७८भैषज्यरत्नावली ।[ चिकित्सा-

भक्त्या मातुः पितुश्चैव गुरूणां पूजनेन च ।
ब्रह्मचर्येण तपसा पुराणश्रवणेन च ॥ १८ ॥
जपहोमप्रदानेन सत्येन नियमेन च ।
ज्वराद्विमुच्यते शीघ्रं साधूनां दर्शनेन च ॥ १९ ॥

नन्दी, भृङ्गी आदि अनुचरवर्ग, चन्द्रमा और षोडशमातृकाओंसहित शिव और पार्वतीका भक्तिपूर्वक पूजन करनेसे मनुष्य विषमज्वरसे शीघ्र मुक्त हो जाता है। तथा चराचरके स्वामी सहस्रशीर्ष विष्णुभगवान्‌का षोडशोपचार पूजन करने और विष्णुसहस्रनामका पाठ करनेसे सर्वप्रकारके ज्वर दूर होजाते हैं। एवं ब्रह्मा, अश्विनी-कुमार, इन्द्र, अग्नि, हिमालय, गङ्गा, मरुद्गण और अपने इष्टदेवका अर्चन करनेसे और माता, पिता, गुरु आदि पूज्य पुरुषोंका भक्तिपूर्वक सत्कार तथा सेवा शुश्रूषादि पूजन करनेसे ज्वर दूर होता है। इसी प्रकार ब्रह्मचर्यधारण करने, तप करने, पुराणादि धर्मशास्त्रोंका श्रवण करने, जप, होम, दान, सदानुष्ठान, और साधु महात्माओंका दर्शन करनेसे भी ज्वर शीघ्र नष्ट होजाता है ॥ १८-१९ ॥

अष्टाङ्गधूप ।

पलङ्कषा निम्बपत्रं वचा कुष्ठं हरीतकी ।
सर्षपाः सयवाः सर्पिर्धूपनं ज्वरनाशनम् ॥ ४२० ॥

गूगल, नीमके पत्ते, वच, कूट, हरड, सफेद सरसों, जौ और घी इन सबकी धूप बनाकर देनेसे विषमज्वर नष्ट होता है ॥ ४२० ॥

अपराजिताधूप ।

पुरध्यामवचासर्जन्निम्बार्कागुरुदारुभिः ।
सर्वज्वरहरो धूपः कार्योऽयमपराजितः ॥ २१ ॥

गूगल, गन्धेजघास, वच, राल, नीमके पत्ते, आक, अगर, देवदारु इन सबको एकत्र करके धूप देवे तो सम्पूर्ण ज्वर दूर होजाते हैं। यही अपराजिता धूप है ॥ २१ ॥

माहेश्वरधूप ।

हिङ्गुलं देवकाष्ठं च श्रीवेष्टं घृतमेव च ।
गव्यास्थीनि तथाऽऽध्यामं निर्माल्यं कटुरोहिणी ॥ २२ ॥
सर्षपं निम्बपत्राणि पिच्छा हिकंचुकं तथा ।
मार्जारविष्ठा गोशृङ्गं मदनस्य फलानि च ॥ २३ ॥

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प्रकरणम् ] भाषाटीकासहिता । ७९


द्वे बृहत्यौ वचा चैव कार्पासास्थि तुषास्तथा ।
छागगोमायुविट् चैव हस्तिदन्तस्तथैव च ॥ २४ ॥
एतत्सर्वं समाहृत्य छागमूत्रेण भावयेत् ।
उलूखले तु संकुट्य स्थापयेन्मृन्मये शुभे ॥ २५ ॥
सिंगरफ, देवदारु धूप, सरल, (लोबान) गायका घी, गौकी अस्थि, सुगन्धतृण, शिवका निर्माल्य, कुटकी, सफेद सरसों, नीमके पत्ते, मोरका पंख, साँपकी केंचली, बिलावकी विष्ठा, गौका सींग, मैनफल, कटेरी, बडी कटेरी, वच, कपासके बीज (बिनौले), धानोंकी भूसी, बकरेकी और गीदडकी विष्ठा और हाथीदाँत इन सबको एकत्र करके बकरेके मूत्रमें भावना देवे। फिर ओखलीमें कूटकर मिट्टीके उत्तम पात्रमें भरकर रखदेवे ॥ २२-२५ ॥

"ॐ नमो भगवते रुद्राय उमापतये सम्पन्नताय
नन्दिकेश्वराय" इति मन्त्रेणाभिमन्त्रयेत् ॥
घ्राणमात्रेण धूपोऽयं दीयते यत्र वेश्मनि ।
न तत्र सर्पास्तिष्ठन्ति न पिशाचा न राक्षसाः ॥ २६ ॥
एष माहेश्वरो धूपः सर्वज्वरविनाशनः ।
ऐकाहिकं द्व्याहिकं च त्र्याहिकं च चतुर्थकम् ॥
एवमादीन् ज्वरान्सर्वान् नाशयेन्नात्र संशयः ॥ ४२७ ॥
पश्चात् "ॐ नमो भगवते रुद्राय" इत्यादि मन्त्रसे अभिमन्त्रित करके इसकी धूप देने मात्रसेही उस घरमेंके समस्त साँप, पिशाच, राक्षस, भूतप्रेत आदि भाग जाते हैं। यह माहेश्वर धूप ऐकाहिक, द्व्याहिक, तिजारी, चौथिया आदि सब प्रकारके ज्वरोंको निस्सन्देह दूर करती है ॥ ४२६-४२७ ॥

इति सामान्यज्वरचिकित्सा ।

जीर्णज्वरकी चिकित्सा ।

पिप्पलीचूर्णसंयुक्तः क्वाथश्छिन्नरुहोद्भवः ।
जीर्णज्वरकफध्वंसी पंचमूलीकृतोऽथवा ॥ १ ॥
गिलोयके क्वाथमें पीपलका चूर्ण डालकर अथवा बृहत्पंचमूल (बेलकी छाल, सोनापाठेकी छाल, कुम्भेरीकी छाल, पाढलकी छाल और अरणीकी छाल) के काढेमें पीपलका चूर्ण डालकर पानकरनेसे पुराना ज्वर और कफ दूर होता है ॥ १ ॥

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८० | भैषज्यरत्नावली । | [ चिकित्सा-

पिप्पलीमधुसम्मिश्रं गुडूचीस्वरसं पिबेत् ।
जीर्णज्वरकफप्लीहकासारोचकनाशनम् ॥ २ ॥
गिलोयके स्वरसमें पीपलका चूर्ण और शहद मिलाकर पान करनेसे जीर्णज्वर, कफ, प्लीहा ( तिल्ली ), खाँसी, अरुचि आदि सब रोग दूर होते हैं ॥ २ ॥

अस्थिकर्कटपञ्चाङ्गं शुंठ्या चिरज्वरप्रणुत् ॥ ३ ॥
“अस्थिकर्कटस्य मूलवल्कलपत्रपुष्पफलं संक्षुद्य पोटलीं बद्ध्वा दग्ध्वा रसं गृहीत्वा शुण्ठ्या पेयः ।”
अस्थिकर्कट वृक्षके पंचांग ( जड, छाल, पत्ते, फल, पुष्प ) इस पंचाङ्गको एकत्र कूटकर उसको कपडेकी पोटलीमें बाँधकर पुटपाककी विधिसे अग्निमें पकावे । उसमेंसे जो रस निकले उसको लेकर उसमें सोंठका चूर्ण डालकर पान करनेसे बहुत कालका पुराना जीर्णज्वर दूर होता है ॥ ३ ॥

गुडूचीपर्पटो भेकपर्णी च हिलमोचिका ।
पटोलं पुटपाकेन रस एषां मधुप्लुतः ॥ ४ ॥
वातपित्तज्वरं हन्ति चिरोत्थमपि दारुणम् ।
मधुना सर्वज्वरनुच्छेफालीदलजो रसः ॥ ५ ॥
गिलोय, पित्तपापडा, मण्डूकपर्णी, हुलहुल और परवल इन सबको एकत्र पुटपाककी विधिसे पकाकर और उसका रस निकालकर शहद डालकर पान करे । यह प्रयोग बहुत पुराने और दारुण वातपित्तजन्य ज्वरको नष्ट करता है । इसी प्रकार हारसिंगारके पत्तोंके रसमें शहद डालकर पान करनेसे सब प्रकारके ज्वर नष्ट होते हैं ॥ ४-५ ॥

निदिग्धिकादि क्वाथ ।

निदिग्धिकानागरकामृतानां क्वाथं पिबेन्मिश्रितपिप्पलीकम् ।
जीर्णज्वरारोचककासशूलश्वासाग्निमान्द्यार्दितपीनसेषु॥ ६ ॥
हन्त्यूर्द्धनामयं प्रायः सायं तेनोपयुज्यते ।
एतद्रात्रिज्वरे सायमन्यथा प्रातरिष्यते ॥
पित्तानुबन्धे सन्त्यज्य पिप्पलीं प्रक्षिपेन्मधु ॥ ७ ॥
कटेरी, सोंठ और गिलोय इन तीनों ओषधियोंका एकत्र क्वाथ बनाकर उसमें पीपलका चूर्ण डालकर पान करनेसे जीर्णज्वर, अरुचि, खाँसी, शूल, श्वास,

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प्रकरणम् ] भाषाटीकासहिता । ८१


मन्दाग्नि, अर्दित और पीनस रोगमें विशेष उपकार होता है । इस क्वाथको प्रायः ऊर्ध्वगत रोगोंमें सायंकाल सेवन करना चाहिये । और उसी प्रकार रात्रिज्वरमें इस क्वाथको सायङ्कालमें सेवन करना चाहिये तथा अन्यान्य रोगोंमें प्रातःसमय सेवन करना चाहिये और पित्तप्रधानरोगोंमें इसमें पीपलके चूर्णको न डालकर केवल शहद डालकर पीना चाहिये ॥ ६ ॥ ७ ॥

रात्रिज्वरमें गुडूच्यादिक्वाथ ।

गुडूची मुस्तभूनिम्बं धात्री क्षुद्रा च नागरम् ।
बिल्वादिपञ्चमूलं च कटुकेन्द्रयवासकम् ॥ ८ ॥
निशाभवं ज्वरं वातकफपित्तसमुद्भवम् ।
चिरोत्थं द्वन्द्वजं हन्ति सकणं मधुसंयुतम् ॥ ९ ॥

गिलोय, नागरमोथा, चिरायता, आमले, कटेरी, साँठ, बेलकी छाल, शोनापाठे की छाल, कुम्भेरीकी छाल, पाढलकी छाल, अरणीकी छाल, कुटकी इन्द्रजौ और जवासा इन ओषधियोंके क्वाथमें पीपलका चूर्ण और शहद मिलाकर पान करनेसे वातज, पित्तज, कफज, द्विदोषज और चिरकालसे उत्पन्न हुआ रात्रिज्वर निवृत्त होता है ॥ ८ ॥ ९ ॥

द्राक्षादि ।

द्राक्षाऽमृता शठी शृङ्गी मुस्तकं रक्तचन्दनम् ।
नागरं कटुका पाठा भूनिम्बः सदुरालभः ॥ १० ॥
उशीरं धान्यकं पद्मं बालकं कण्टकारिका ।
पुष्करं पिचुमर्दश्च दशाष्टाङ्गमिदं स्मृतम् ॥
जीर्णज्वरारुचिश्वासकासश्वयथुनाशनम् ॥ ११ ॥

दाख, गिलोय, कचूर, काकड़ासिंगी, नागरमोथा, लालचन्दन, साँठ, कुटकी, पाठ, चिरायता, धमासा, खस, धनियां, पद्माख, सुगन्धबाला, कटेरी, पुष्करमूल और नीमकी छाल, इन ओषधियोंको अष्टादशाङ्ग कहते हैं। इनका बनायाहुआ क्वाथ जीर्णज्वर, अरुचि, श्वास, खाँसी, सूजन आदि रोगोंको दूर करता है ॥ १० ॥ ११ ॥

प्लीहज्वरमें निदिग्धिकादि ।

निदिग्धिकागणः पथ्या तथा रोहितको मतः ।
क्वाथं कृत्वा क्षिपेत्तत्र यवक्षारं कणायुतम् ॥

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८२ | भैषज्यरत्नावली । | [ चूर्ण-


एतस्य पानमात्रेण प्लीहज्वरविनाशनम् ॥ १२ ॥
( निदिग्धिकागणः--स्वल्पपञ्चमूलम् । )

शालपर्णी, पृष्ठपर्णी, बडी कटेरी, छोटी कटेरी, गोखुरु, हरड और रोहिडा वृक्षकी छाल इन औषधियोंका क्वाथ बनाकर उसमें जवाखार और पीपलका चूर्ण डालकर पान करनेसे प्लीहज्वर ( तिल्ली ) दूर होता है ( निदिग्धिकादि गणको लघु पंचमूल कहते हैं ) ॥ १२ ॥

इति भैषज्यरत्नावल्यां चिकित्साप्रकरणम् ।


अथ चूर्णप्रकरणम् ।

सुदर्शनचूर्ण ।

कालीयकं तु रजनी देवदारु वचा घनम् ।
अभया धन्वयासश्च शृङ्गीक्षुद्रामहौषधम् ॥ १ ॥
त्रायन्ती पर्पटं निम्बं ग्रान्तिकं बालकं शठी ।
पौष्करं मागधी मूर्वा कुटजं मधुयष्टिका ॥ २ ॥
शिग्रूत्पलं सेन्द्रयवं वरी दार्वी कुचन्दनम् ।
पद्मकं सरलोशीरं त्वचं सौराष्ट्रिका स्थिरा ॥ ३ ॥
यमान्यतिविषा बिल्वं मरिचं गन्धपत्रकम् ।
धात्री गुडूची कटुकं सचित्रकपठोलकम् ॥ ४ ॥
कलसी चैव सर्वाणि समभागानि कारयेत् ।
सर्वद्रव्यस्य चार्धं तु कैरातं संप्रकल्पयेत् ।
एतत्सुदर्शनं नाम-

काली अगर, हल्दी, देवदारु, वच, नागरमोथा, हरड, धमासा, काकडासिंगी, कटेरी, सोंठ, त्रायमाण, पित्तपापडा, नीमकी छाल, पिपलामूल, सुगन्धवाला, कचूर, पुष्करमूल, पीपल, मूर्वा, कुडेकी छाल, मुलहठी, सहिजनेके बीज, कुमुद, इन्द्रजौ, शतावर, दारुहल्दी, लालचन्दन, पद्माख, धूपसरल, खस, दालचीनी, गोपीचंदन, शालपर्णी, अजवायन, अतीस, बेलकी छाल, मिरच, गन्धेजघास, आमले, गिलोय, कुटकी, चीता, पटोलपात, और, पृश्निपर्णी इन सब ओषधियोंको समान भाग लेवे और सबसे आधाभाग चिरायता लेकर सबका एकत्र बारीक चूर्ण करके कपडेमें छानलेवे इसको सुदर्शनचूर्ण कहते हैं ॥ १-५ ॥

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प्रकरणम् ] भाषाटीकासहिता । ८३


ज्वरान् हन्ति न संशयः ।
पृथग्दोषांश्च विविधान् समस्तान् विषमज्वरान् ॥ ६ ॥
प्राकृतं वैकृतं चैव सौम्यं तीक्ष्णमथापि वा ।
अन्तर्गतं बहिःस्थं च निरामं साममेव च ॥ ७ ॥
ज्वरमष्टविधं हन्ति साध्यासाध्यमथापि वा ।
नानादेशोद्भवं चैव वारिदोषभवं तथा ॥ ८ ॥
विरुद्धभेषजैर्भूतं ज्वरमाशु व्यपोहति ।
प्लीहानं यकृतं गुल्मं हन्त्यवश्य न संशयः ॥ ९ ॥
यथा सुदर्शनं चक्रं दानवानां निषूदनम् ।
तथा ज्वराणां सर्वेषामिदमेव निगद्यते ॥ १० ॥

इस चूर्णको नित्य ३-४ माशे परिमाण सेवन करनेसे ये सब प्रकारके ज्वरोंको निस्सन्देह दूर करता है । वात, कफ आदि पृथक् पृथक् दोषोंसे अथवा सम्पूर्ण दोषोंसे उत्पन्नहुए सर्व प्रकारके विषमज्वर तथा प्राकृत, वैकृत, सौम्य अथवा तीक्ष्णज्वर, आभ्यन्तरज्वर, बाह्यज्वर, निराम और आमयुक्तज्वर इन आठों प्रकारके ज्वरोंको यह चूर्ण नष्ट करदेता है, चाहे यह ज्वर साध्य हों अथवा असाध्य हों तथा देशदेशान्तरोंके दोषसे होनेवाले अथवा जलके दोषसे होनेवाले और प्रकृति व देश काल विरुद्ध ओषधियोंके सेवनसे होनेवाले ज्वरोंको शीघ्र शमन करता है । प्लीहा, यकृत, गुल्मादि रोगोंको भी निस्सन्देह दूर करदेता है । जैसे-सुदर्शनचक्र दैत्यदानवोंका सहार करनेके लिये प्रसिद्ध है, उसी प्रकार यह सुदर्शनचूर्ण भी सम्पूर्ण ज्वरोंका विघातक कहाजाता है ॥ ६-१० ॥

ज्वरभैरवचूर्ण ।

नागरं त्रायमाणा च पिचुमर्दो दुरालभा ।
पथ्या मुस्तं वचा दारु व्याघ्री शृङ्गी शतावरी ॥ ११ ॥
पर्पटी पिप्पलीमूलं विशाला पुष्करं शठी ।
मूर्वा कृष्णा हरिद्रे द्वे लोध्रचन्दनमुष्ककम् ॥ १२ ॥
कुटजस्य फलं वल्कं यष्टीमधुकचित्रकम् ।
शोभाञ्जनं बला चातिविषा च कटुरोहिणी ॥ १३ ॥

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८४भैषज्यरत्नावली[ चूर्ण-

मुशली पद्मकाष्ठं च यमानी शालपर्णिका ।
मरिचं चामृता बिल्वं बालं पङ्कस्य पर्पटी ॥ १४ ॥
तेजपत्रं त्वचं धात्री पृश्निपर्णी पटोलकम् ।
गन्धकं पारदं लौहमभ्रकं च मनःशिला ॥ १५ ॥
एतेषां समभागेन चूर्णमेव विनिर्दिशेत् ।
तदर्द्धं प्रक्षिपेत्तत्र चूर्णं भूनिम्बसम्भवम् ॥ १६ ॥

सोंठ, त्रायमाणा, नीमकी छाल, धमासा, हरड, नागरमोथा, वच, देवदारु, कटेरी, काकड़ासिंगी, शतावर, पित्तपापडा, पीपलामूल, इन्द्रायनकी जड, पुहकर-मूल, कचूर, मूर्वा, पीपल, हल्दी, दारुहल्दी, लोध, रक्तचन्दन, मोखावृक्ष, इन्द्रजौ, कुडेकी छाल, मुलहठी, चीता, सहिंजनेके बीज, खिरेंटी, अतीस, कुटकी, मुसली, पद्माख, अजवायन, शालपर्णी, कालीमिर्च, गिलोय, बेलकी छाल, सुगन्ध-वाला, पङ्कपर्पटी, तेजपात, दारचीनी, आमले, पृश्निपर्णी, पटोलपात, गन्धक और पारेकी कज्जली, लोहभस्म, अभ्रकभस्म और मैनसिलकी भस्म इन सब ओषधियों को समानभाग लेकर बारीक चूर्ण कर लेवे और उसमें समस्त चूर्णसे आधाभाग चिरायतेका चूर्ण मिलाकर सबको बारीक पीसकर कपडछान करके रखलेवे॥ ११-१६॥

मात्रामस्य प्रयुञ्जीत दृष्ट्वा दोषबलाबलम् ।
चूर्णं भैरवसंज्ञं तु ज्वरान् हन्ति न संशयः ॥ १७ ॥
पृथग् दोषांश्च विविधान् समस्तान्विषमज्वरान् ।
द्वन्द्वजान् सन्निपातोत्थान् मानसानपि नाशयेत् ॥ १८ ॥
प्राकृतं वैकृतं चैव सौम्यं तीक्ष्णमथापि वा ।
अन्तर्गतं बहिःस्थं च निरामं साममेव च ॥१९॥
ज्वरमष्टविधं हन्ति साध्यासाध्यं न संशयः ।
नानादेशोद्भवं चैव वारिदोषभवं तथा ॥ २० ॥
विरुद्धभेषजैर्जातं ज्वरमाशु व्यपोहति ।
अग्निमान्द्यं यकृत्प्लीहपाण्डुरोगमरोचकम् ॥ २१ ॥
उदराणयन्त्रवृद्धिं च रक्तपित्तं त्वगामयम् ।
श्वयथुं च शिरःशूलं वातामयरुजापहम् ॥
ज्वरभैरवसंज्ञं तु भैरवेण कृतं शुभम् ॥ २२ ॥

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प्रकरणम् ] भाषाटीकासहिता । ८५


इस चूर्णको दोषोंका बलाबल देखकर उचित मात्रासे प्रयोग करना चाहिये यह भैरवनामक चूर्ण सर्व प्रकारके ज्वरों अर्थात् वातज, पित्तज, कफज, द्वन्द्वज, त्रिदोषज, विषमज्वर, जीर्णज्वर और मानसिक ज्वरको नष्ट करता है तथा प्राकृत, वैकृत, सौम्य, तीक्ष्ण, अन्तर्गत, बहिर्गत निराम, साम इन आठों प्रकारके ज्वरोंको तथा साध्यासाध्य ज्वरोंको भी यह अवश्य दूर करता है तथा अनेक देशोंके जलवायुके दोषसे उत्पन्न हुए और विरुद्ध औषधियोंको सेवन करनेसे उत्पन्नहुए ज्वरोंको शीघ्र नष्ट करता है एवं मन्दाग्नि, यकृत् विकार, प्लीहावृद्धि, पाण्डुरोग, अरुचि, उदरसम्बन्धीरोग, अन्त्रवृद्धि, रक्तपित्त, त्वचाके रोग, सूजन, शिरकी पीडा और सर्व प्रकारके वातरोगोंको भी नष्ट करता है। इस उत्तम, चूर्णको श्रीभैरवाचार्यने निर्माण किया है ॥ १७-२२ ॥

ज्वरनागमयूरचूर्ण ।

लौहाभ्रटङ्कणं ताम्रं तालकं वङ्गमेव च ।
शुद्धसूतं गन्धकं च शिग्रुबीजं फलत्रिकम् ॥ २३ ॥
चन्दनातिविषा पाठा वचा च रजनीद्वयम् ।
उशीरं चित्रकं देवकाष्ठं च सपटोलकम् ॥ २४ ॥
जीवकर्षभकाजाज्यस्तालीशं वंशलोचना ।
कण्टकार्याः फलं मूलं शठी पत्रं कटुत्रयम् ॥ २५ ॥
गुडूचीसत्त्वधन्याकं कटुकाक्षेत्रपर्पटी ।
मुस्तकं बालकं बिल्वं यष्टीमधु समं समम् ॥ २६ ॥
भागाच्चतुर्गुणं देयं कृष्णजीरस्य चूर्णकम् ।
तत्समं तालपुष्पं च चूर्णं दण्डोत्पलाभवम् ॥ २७ ॥
कैरातं तत्समं देयं तत्समं चपलाभवम् ।
एतच्चूर्णं समाख्यातं ज्वरनागमयूरकम् ॥ २८ ॥

लोहभस्म, अभ्रकभस्म, सुहागा, ताम्रभस्म, हरतालभस्म, वंगभस्म, शुद्ध पारद, और शुद्ध गन्धककी कज्जली, सहिंजनेके बीज, त्रिफला, लालचन्दन, अतीस, पाठ, बच, दारुहल्दी, हल्दी, खस, चीतेकी जड, देवदारु, पटोलपात, जीवक, ऋषभक, कालाजीरा, तालीसपत्र, वंशलोचन, कटेरीके फल, कटेरीकी जड, कचूर, तेजपात, त्रिकुटा, गिलोयका सत्व, धनियाँ, कुटकी, पित्तपापडा, नागरमोथा, सुगन्धवाला, बेलकी छाल और मुलहठी इन सब औषधियोंको समानभाग लेकर बारीक चूर्ण

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८६भैषज्यरत्नावली ।[ चूर्णप्र० ]

करके कपडेम छानलेवे। फिर इस चूर्णमें कालेजीरेका चूर्ण, ताडकी जटाओंका क्षार, श्वेतदण्डोत्पल, चिरायता और भाँग इन प्रत्येकका चूर्ण उपर्युक्तचूर्णसे चौगुना मिलाकर शीशीमें भरकर रखदेवे। इसको ज्वरनागमयूरचूर्ण कहते हैं ॥ २३-२८ ॥

प्रतिमाषमितं खाद्यं युक्त्या वा त्रुटिवर्द्धनम् ।
सन्ततादिज्वरं हन्ति साध्यासाध्यं न संशयः ॥ २९ ॥
क्षयोद्भवं च धातुस्थं कामशोकोद्भवं ज्वरम् ।
भूतावेशज्वरं चैवमभिचारसमुद्भवम् ॥ ३० ॥
दाहशीतज्वरं घोरं चातुर्थ्यादिविपर्ययम् ।
जीर्णं च विषमं सर्वं प्लीहानमुदरं तथा ॥ ३१ ॥
कामलां पाण्डुरोगं च शोथं हन्ति न संशयः ।
भ्रमं तृष्णां च कासं च शूलानाहौ क्षयं तथा ॥ ३२ ॥
यकृतं गुल्मशूलं च आमवातं निहन्ति च ।
त्रिकपृष्ठ कटी जानुपार्श्वानां शूलनाशनम् ॥
अनुपानं शीतजलं न देयमुष्णवारिणा ॥ ३३ ॥

इस चूर्णको प्रतिदिन एक-एक माशा परिमाण अथवा दोषोंके बलाबलके अनुसार मात्रामें युक्तिपूर्वक न्यूनाधिकता करके सेवन करे। इसपर शीतलजलका अनुपान करे, उष्ण जलका इसपर कदापि अनुपान न करे। यह चूर्ण साध्य अथवा असाध्य सन्तत आदि ज्वर, क्षयोत्पन्नज्वर, धातुगत अथवा काम शोकादिसे उत्पन्नहुए ज्वर, भूतबाधा या अभिचार आदिजन्यज्वर, घोर दाह और शीतयुक्त-ज्वर, चातुर्थिकज्वर, जीर्णज्वर, सब प्रकारके विषमज्वर तथा प्लीहा रोग, उदर-रोग, कामला, पाण्डुरोग, शोथ, भ्रम, तृषा, खाँसी, शूल, आनाह, क्षय, यकृत्-रोग, गुल्मशूल, आमवात एवं त्रिकस्थान, पृष्ठवंश, कमर, जानु और पार्श्वभाग (पसली) इन स्थानोंकी पीडा इत्यादि समस्त रोगोंको शीघ्र नष्ट करता है ॥ २९-३३ ॥

इति भैषज्यरत्नावल्यां चूर्णप्रकरणम् ।

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प्रकरणम् ] भाषाटीकासहिता । ८७


अथ रसप्रकरणम् ।

नवज्वरआदिमें रसोंका प्रयोग ।

न दोषाणां न रोगाणां न पुंसां च परीक्षणम् ।
न देशस्य न कालस्य कार्यं रसचिकित्सिते ॥ १ ॥

रसद्वारा चिकित्सा करनेपर वातादिदोष, रोग, रोगी मनुष्य, देश और काल इनका कुछ भी विचार नहीं करना चाहिये ॥ १ ॥

सर्वशास्त्रार्थतत्त्वज्ञो न जानाति रसं यथा ।
सर्वं तस्योपहासाय धर्महीनो यथा बुधः ॥ २ ॥

जो मनुष्य सम्पूर्ण शास्त्रोंके मर्मको भलीभाँति जानता है, किन्तु रसचिकित्सासे अनभिज्ञ है, वह धर्महीन पण्डितके समान हास्यास्पद होता है ॥ २ ॥

अनुपानै रसा योज्या देशकालानुसारिभिः ।
दोषघ्नैर्मधुना वापि केवलेन जलेन वा ॥ ३ ॥

रसादि ओषधियोंको देश, काल, पात्र और दोषोंके बलाबलके अनुसार दोषनाशक द्रव्योंके अनुपानके साथ अथवा शहद या केवल शीतल जलके अनुपानसे सेवन करना चाहिये ॥ ३ ॥

ये रसाः पित्तसंयुक्ताः प्रोक्ताः सर्वत्र शम्भुना ।
जलसेकावगाहाद्यैर्बलिनस्ते तु नान्यथा ॥ ४

जो रस मत्स्य आदिके पित्तकी भावना देकर सिद्ध किये हैं, उनके सेवन करनेके पश्चात् जलसेचन ( जलका सींचना ) और अवगाहन ( नदी आदिमें स्नान करना ) आदि क्रियाओंके करनेसे उनके गुण बढजाते हैं और इन क्रियाओंके न करनेसे वे रस प्रायः गुणहीन हो जाते हैं ॥ ४ ॥

रसजनितविदाहे शीततोयाभिषेको
मलयजघनसारालपनं मन्दवातः
तरुणदधि सिताढ्यं नारिकेलीफ़लाम्भो
मधुरशिशिरपानं शीतमन्यच्च शस्तम् ॥ ५ ॥

रसोंके सेवनसे दाह उत्पन्न होनेपर शरीरपर शीतलजलका अभिषेक, श्रीखण्ड, चन्दन, कपूर आदिका प्रलेप, शीतल मन्द वायुका सेवन, मिश्री मिलाकर ताजे दधिका

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८८भैषज्यरत्नावली ।[ रस-

सेवन, नारियलके कच्चेफलका जलपान, मधुर और शीतल ऐसे पदार्थोंका सेवन और इसी प्रकार अन्यान्य शीतोपचार करने उपयोगी हैं ॥ ५ ॥

हिंगुलेश्वर ।

तुल्यांशं मर्दयेत्खल्वे पिप्पलीं हिङ्गुलं विषम् ।
द्विगुञ्जा मधुना देया वातज्वरनिवृत्तये ॥ ६ ॥

पीपल, सिंगरफ और शुद्ध मीठा तेलिया इन तीनोंको समान भाग लेकर खरलमें डालकर जलके साथ खरल करके दो दो रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । इनमेंसे एक एक गोली शहदके साथ देनेसे वातजज्वर निवृत्त होता है ॥ ६ ॥

बृहद्धिंगुलेश्वर ।

हिङ्गुलं च विषं व्योषं टङ्कणं नागगाह्वयम् ।
जयपालसमायुक्तं सद्योज्वरविनाशनम् ॥ ७ ॥

शुद्ध सिंगरफ, शुद्ध मीठातेलिया, सोंठ, मिरच, पीपल, सुहागा, सोंठ और जमालगोटा सबको समानभाग लेकर जलके योगसे खरलकरके एकएक रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । इन गोलियोंको शीतलजलके अनुपानसे सेवन करनेपर नवीनज्वर शीघ्र नष्ट होता है ॥ ७ ॥

शीतभंजीरस ।

रसहिङ्गुलगन्धं च जैपालं सम्मितं त्रिभिः ।
दन्तीक्वाथेन सम्मर्द्य रसो ज्वरहरः परः ॥ ८ ॥
आर्द्रकस्वरसेनाथा दापयेद्रक्तिकाद्वयम् ।
नवज्वरं महाघोरं नाशयेद्याममात्रतः ॥ ९ ॥
शर्करादधिभक्तं च पथ्यं देयं प्रयत्नतः ।
शीततोयं पिबेच्चानु इक्षुर्मुद्गरसो हितः ॥
शीतभञ्जी रसो नाम्ना सर्वज्वरकुलान्तकृत् ॥ १० ॥

पारा, गन्धक और सिंगरफ ये प्रत्येक एक तोला और शुद्ध जमालगोटा तीन तोले लेकर सबको दन्तीके क्वाथके साथ खूब खरल करके दो दो रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । इस रसकी एक एक गोली अदरखके स्वरसके या मधुके साथ देनेसे सब प्रकारका नवीन ज्वर दूर होता है । यह रस अत्यन्त भयंकर नवीनज्वरको एक प्रहरमें ही दूर करदेता है । इस रसको सेवन करनेके पश्चात् दही और मिश्री मिलाकर भातका पथ्य देना चाहिये तथा इसपर शीतलजल, ईखका रस तथा मूँगका यूष-पान