Skip to content
SarvaKosh
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 113 of 1416

Read in context
Page 113

प्रकरणम् ] भाषाटीकासहिता । ८१


मन्दाग्नि, अर्दित और पीनस रोगमें विशेष उपकार होता है । इस क्वाथको प्रायः ऊर्ध्वगत रोगोंमें सायंकाल सेवन करना चाहिये । और उसी प्रकार रात्रिज्वरमें इस क्वाथको सायङ्कालमें सेवन करना चाहिये तथा अन्यान्य रोगोंमें प्रातःसमय सेवन करना चाहिये और पित्तप्रधानरोगोंमें इसमें पीपलके चूर्णको न डालकर केवल शहद डालकर पीना चाहिये ॥ ६ ॥ ७ ॥

रात्रिज्वरमें गुडूच्यादिक्वाथ ।

गुडूची मुस्तभूनिम्बं धात्री क्षुद्रा च नागरम् ।
बिल्वादिपञ्चमूलं च कटुकेन्द्रयवासकम् ॥ ८ ॥
निशाभवं ज्वरं वातकफपित्तसमुद्भवम् ।
चिरोत्थं द्वन्द्वजं हन्ति सकणं मधुसंयुतम् ॥ ९ ॥

गिलोय, नागरमोथा, चिरायता, आमले, कटेरी, साँठ, बेलकी छाल, शोनापाठे की छाल, कुम्भेरीकी छाल, पाढलकी छाल, अरणीकी छाल, कुटकी इन्द्रजौ और जवासा इन ओषधियोंके क्वाथमें पीपलका चूर्ण और शहद मिलाकर पान करनेसे वातज, पित्तज, कफज, द्विदोषज और चिरकालसे उत्पन्न हुआ रात्रिज्वर निवृत्त होता है ॥ ८ ॥ ९ ॥

द्राक्षादि ।

द्राक्षाऽमृता शठी शृङ्गी मुस्तकं रक्तचन्दनम् ।
नागरं कटुका पाठा भूनिम्बः सदुरालभः ॥ १० ॥
उशीरं धान्यकं पद्मं बालकं कण्टकारिका ।
पुष्करं पिचुमर्दश्च दशाष्टाङ्गमिदं स्मृतम् ॥
जीर्णज्वरारुचिश्वासकासश्वयथुनाशनम् ॥ ११ ॥

दाख, गिलोय, कचूर, काकड़ासिंगी, नागरमोथा, लालचन्दन, साँठ, कुटकी, पाठ, चिरायता, धमासा, खस, धनियां, पद्माख, सुगन्धबाला, कटेरी, पुष्करमूल और नीमकी छाल, इन ओषधियोंको अष्टादशाङ्ग कहते हैं। इनका बनायाहुआ क्वाथ जीर्णज्वर, अरुचि, श्वास, खाँसी, सूजन आदि रोगोंको दूर करता है ॥ १० ॥ ११ ॥

प्लीहज्वरमें निदिग्धिकादि ।

निदिग्धिकागणः पथ्या तथा रोहितको मतः ।
क्वाथं कृत्वा क्षिपेत्तत्र यवक्षारं कणायुतम् ॥