भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
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Read in contextप्रकरणम् ] भाषाटीकासहिता । ७५
कर्णस्य मलजालेन वर्तिं कृत्वा प्रयत्नतः ।
ज्वालयेत्तिलतैलेन कज्जलं ग्राहयेच्छनैः ॥
अञ्जयेन्नेत्रयुगलं त्र्याहिकज्वरशान्तये ॥ ९९ ॥
कानके मैलकी बत्ती बनाकर उसे तिलके तेलमें भिजोकर जलावे । फिर उसका कज्जल बनाकर नेत्रोंमें आँजे, इससे तृतीयकज्वर शान्त होता है ॥ ९९ ॥
मूलं जयन्त्याः शिरसा धृतं सर्वज्वरापहम् ॥ ४०० ॥
सफेद अरणीकी जड़को सिरमें बाँधनेसे सब प्रकारके पुराने ज्वर दूर होते हैं ॥ ४०० ॥
शिरीषपुष्पस्वरसो रजनीद्वयसंयुतः ।
नस्यं सर्पिःसमायोगात् ज्वरं चातुर्थिकं जयेत् ॥
चातुर्थिकहरं नस्यं मुनिद्रुमदलाम्बुना ॥ ४०१ ॥
सिरसके फूलोंके स्वरसमें हल्दी और दारुहल्दीका चूर्ण मिलाकर और उसमें थोड़ा घी डालकर नस्य देनेसे चातुर्थिकज्वर दूर होता है । अथवा अगस्तियाके पत्तोंके स्वरसका नस्य देनेसे चातुर्थिकज्वर नष्ट होता है ॥ ४०१ ॥
शैलूषमण्डनरजः पुरुषानुरूपं
शुक्लाङ्गवत्ससुरभीपयसा निपीतम् ।
आदित्यवारभवपालिदिने नराणां
चातुर्थिकं हरति कष्टमपि क्षणेन ॥ २ ॥
रविवारके दिन ज्वरकी बारी होनेपर रोगीकी अवस्थानुसार शुद्ध हरतालके चूर्णको सफेद बछड़ेवाली गायके दूधके साथ सेवन करावे । इससे दुस्साध्य भी चातुर्थिकज्वर क्षणभरमें शान्त होजाता है ॥ २ ॥
श्वेतार्ककरबीजस्य चाश्विन्यां मूलमुद्धरेत् ।
पीतं तण्डुलतोयेन पृथक् चातुर्थनाशनम् ॥ ३ ॥
अश्विनीनक्षत्रमें सफेद आक अथवा सफेद कनेरकी जड़को उखाड़कर चावलोंके जलमें पीसकर पान करनेसे चातुर्थिक (चौथिया) दूर होता है। ये दोनों औषधि विषैली हैं. इसलिये एक रत्ती या आधी रत्तीसे अधिक एकमात्रामें नहीं देनी चाहिये. विशेषकर सफेद कनेरका व्यवहार तो बड़ी सावधानीसे करना चाहिये ॥ ३ ॥