भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
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Read in context| ७८ | भैषज्यरत्नावली । | [ चिकित्सा- |
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भक्त्या मातुः पितुश्चैव गुरूणां पूजनेन च ।
ब्रह्मचर्येण तपसा पुराणश्रवणेन च ॥ १८ ॥
जपहोमप्रदानेन सत्येन नियमेन च ।
ज्वराद्विमुच्यते शीघ्रं साधूनां दर्शनेन च ॥ १९ ॥
नन्दी, भृङ्गी आदि अनुचरवर्ग, चन्द्रमा और षोडशमातृकाओंसहित शिव और पार्वतीका भक्तिपूर्वक पूजन करनेसे मनुष्य विषमज्वरसे शीघ्र मुक्त हो जाता है। तथा चराचरके स्वामी सहस्रशीर्ष विष्णुभगवान्का षोडशोपचार पूजन करने और विष्णुसहस्रनामका पाठ करनेसे सर्वप्रकारके ज्वर दूर होजाते हैं। एवं ब्रह्मा, अश्विनी-कुमार, इन्द्र, अग्नि, हिमालय, गङ्गा, मरुद्गण और अपने इष्टदेवका अर्चन करनेसे और माता, पिता, गुरु आदि पूज्य पुरुषोंका भक्तिपूर्वक सत्कार तथा सेवा शुश्रूषादि पूजन करनेसे ज्वर दूर होता है। इसी प्रकार ब्रह्मचर्यधारण करने, तप करने, पुराणादि धर्मशास्त्रोंका श्रवण करने, जप, होम, दान, सदानुष्ठान, और साधु महात्माओंका दर्शन करनेसे भी ज्वर शीघ्र नष्ट होजाता है ॥ १८-१९ ॥
अष्टाङ्गधूप ।
पलङ्कषा निम्बपत्रं वचा कुष्ठं हरीतकी ।
सर्षपाः सयवाः सर्पिर्धूपनं ज्वरनाशनम् ॥ ४२० ॥
गूगल, नीमके पत्ते, वच, कूट, हरड, सफेद सरसों, जौ और घी इन सबकी धूप बनाकर देनेसे विषमज्वर नष्ट होता है ॥ ४२० ॥
अपराजिताधूप ।
पुरध्यामवचासर्जन्निम्बार्कागुरुदारुभिः ।
सर्वज्वरहरो धूपः कार्योऽयमपराजितः ॥ २१ ॥
गूगल, गन्धेजघास, वच, राल, नीमके पत्ते, आक, अगर, देवदारु इन सबको एकत्र करके धूप देवे तो सम्पूर्ण ज्वर दूर होजाते हैं। यही अपराजिता धूप है ॥ २१ ॥
माहेश्वरधूप ।
हिङ्गुलं देवकाष्ठं च श्रीवेष्टं घृतमेव च ।
गव्यास्थीनि तथाऽऽध्यामं निर्माल्यं कटुरोहिणी ॥ २२ ॥
सर्षपं निम्बपत्राणि पिच्छा हिकंचुकं तथा ।
मार्जारविष्ठा गोशृङ्गं मदनस्य फलानि च ॥ २३ ॥