About this granth
Betal Pachisi (बेताल पच्चीसी), 'twenty-five tales of the vetala', is one of India's most popular story cycles. It goes back to the Sanskrit Vetalapanchavimshati, a version of which appears in the Kathasaritsagara of the eleventh-century Kashmiri poet Somadeva. In the frame story King Vikramaditya, at a mendicant's request, sets out to carry a corpse inhabited by a vetala down from a tree in the cremation ground. On the way the vetala tells him a story ending in a riddle; when the king answers correctly, the vetala flies back to the tree, and so the cycle of twenty-five tales unfolds.
This book tells the stories in order, from Padmavati and the three young Brahmins to the parrot and the myna, Viravara, Somaprabha, Princess Anangarati, Madanasena, Jimutavahana, Unmadini, Chandrasvami, Anangamanjari and Manivarma, the four Brahmin brothers and the ascetic.
The title page credits the original to Somadeva Bhatta. The Hindi retelling is by Ved Prakash Soni with illustrations by Shankar Nayak, published by Jan Sahitya Parishad, Delhi, in 2002, and runs to 151 pages.
बेताल की यह बात सुनकर राजा ने कुछ इस प्रकार उसका निराकरण किया—‘‘हे बेताल ! जो प्राणी दुर्बल होता है, वह भय के उपस्थित होने पर अपने प्राणों की रक्षा के लिए अपने माता-पिता को पुकारता है। उनके न होने पर राजा को पुकारता है क्योंकि आर्तजनों की रक्षा के लिए ही तो राजा बनाए जाते हैं। यदि उसे राजा का भी सहारा नहीं मिलता तो फिर वह अपने कुलदेवता का स्मरण करता है। उस बालक के तो सभी सहायक वहां उपस्थित थे लेकिन वे सब-के-सब प्रतिकूल हो गए थे। माता-पिता ने धन के लोभ में उस बालक के हाथ-पैर पकड़ रखे थे। राजा अपने प्राणों की रक्षा के लिए स्वयं उसका वध करने को उद्यत था और वहां देवता के रूप में जो ब्रह्मराक्षस था, वही उसका भक्षक था। जो शरीर नाशवान है, जिसका अंत कड़वा है तथा जो अधिकाधिक जर्जर है, उसके लिए भी उन मूढ़मति वाले लोगों की ऐसी विडम्बना देखकर उसे आश्चर्य हुआ। जिन शरीरों में ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र और शंकर का निवास होता है, वे भी अवश्य नष्ट हो जाते हैं और उसी शरीर को स्थिर बनाए रखने की इन सबमें कैसी विचित्र वासना है ! वह बालक उन लोगों की देह-ममता की यह विचित्रता देखकर अचरज में पड़ गया और अपनी अभिलाषा को पूर्ण जानकर प्रसन्न हुआ और इसी आश्चर्य व प्रसन्नता से वह हंस पड़ा था।’’
राजा विक्रमादित्य जब ऐसा कहकर चुप हो गए, तब वह बेताल अपनी माया के बल से विक्रमादित्य के कंधे से गायब होकर फिर अपनी जगह पर जा पहुंचा। राजा भी बिना आगा-पीछा देखे शीघ्रतापूर्वक पुनः उसके पीछे-पीछे चल पड़ा।
बड़े लोगों का हृदय समुद्र के समान होता है, उसे किसी भी तरह से क्षुब्ध नहीं किया जा सकता।
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इक्कीसवां बेताल: अनंगमंजरी व मणिवर्मा की कथा
इक्कीसवां बेताल
अनंगमंजरी व मणिवर्मा की कथा
राजा विक्रमादित्य फिर उसी शिंशपा-वृक्ष के निकट पहुंचा। बेताल की वृक्ष से उतारा और उसे कंधे पर लादकर लौट पड़ा। मार्ग में बेताल ने फिर राजा को एक रोचक कथा सुनाई।
विशालपुर नाम की एक नगरी में पद्मनाम नामक एक महाप्रतापी राजा राज करता था। उसकी नगरी में अर्थदत्त नाम का एक व्यापारी भी रहता था, जिसने अपने वाणिज्य-कौशल से अकूत सम्पदा एकत्रित की हुई थी। अर्थदत्त की एक ही संतान थी—अनंगमंजरी नाम की एक अजीब सुन्दर कन्या। अनंगमंजरी जब विवाह योग्य हुई तो उसके पिता ने ताम्रलिप्ति नगर के एक संभ्रान्त व्यापारी युवक मणिवर्मा से उसका विवाह कर दिया। अपनी पुत्री से अधिक स्नेह करने के कारण अर्थदत्त ने उसे उसकी ससुराल नहीं भेजा बल्कि अपने दामाद को वहीं रहने के लिए बुला लिया। जैसे किसी रोगी को कड़वी व तीखी दवाएं अप्रिय लगती हैं, उसी प्रकार अनंगमंजरी को अपना पति मणिवर्मा भी अप्रिय जान पड़ता था, लेकिन मणिवर्मा को अपनी पत्नी प्राणों से भी अधिक प्रिय थी। वह हर समय इसी प्रयास में लगा रहता था कि उसकी अतीव सुन्द पत्नी को कोई कष्ट न होने पाये।
एक बार अपने माता-पिता से मिलने के लिए मणिवर्मा ताम्रलिप्ति चला गया और काफी दिन तक वहीं रहता रहा। उन्हीं दिनों एक बार जब अनंगमंजरी अपनी विश्वस्त सखियों के साथ अपने भवन के एक ऊंचे झरोखे में बैठी थी। उसने नीचे एक गली में एक सुन्दर और तरुण ब्राह्मण कुमार को आते देखा। उसके चेहरे का तेज देखकर वह उसकी ओर आकर्षित हो गई। वह राजपुरोहित का पुत्र था और उसका नाम था—कमलाकर। कमलाकर ने भी ऊंचे झरोखे में बैठी अनंगमंजरी को देखा तो वह उसके रूप पर मुग्ध हो गया। वह कुछ क्षण उसी की ओर टकटकी लगाए देखता रहा, फिर एक मनोहारी मुस्कान उसकी ओर फेंकता हुआ वह वहां से चला गया। अनंगमंजरी उसकी मधुर मुस्कान पर जैसे मर मिटी। कमलाकर उसके मन पर काम-बाण चला गया था। उस दिन से सारी सुध-बुध खोकर वह उसी की याद में विदग्ध रहने लगी। उसका खाना-पीना छूट गया और वह लज्जा, भय एवं विरहोन्माद में दुबली तथा पीली पड़ गई।
प्रिय मिलन बड़ा कठिन था। अनंगमंजरी निराश-सी हो गई थी। कमलाकर को पाने की लालसा में वह एक दिन इतनी व्याकुल हो गई कि उसने प्राण त्यागने का ही निश्चय कर डाला। एक रात वह चुपके से अपनी कुलदेवी चामुंडा के मंदिर में पहुंची और वहां देवी के सम्मुख हाथ जोड़कर विनती की—'हे देवी ! इस जन्म में तो मैं कमलाकर को पति रूप में
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पा नहीं सकती किंतु मुझे आशीर्वाद दो कि अगले जन्मो मे वह मेरा ही पति हो।"
देवी के सम्मुख ऐसा कहकर उसने अपनी पिछौरी से एक फंदा तैयार किया और उसे एक अशोक-वृक्ष की शाखा में लटका दिया। इसी बीच महल मे जब उसकी अंतरंग सखी मालतिका की नींद खुली और उसने अनंगमंजरी को वहां न देखा तो वह उसे ढूंढने निकल पड़ी। मंदिर के समीप जब उसने अनंगमंजरी को अपनी गरदन में फंदा डालते देखा तो वह घबरा उठी और दौड़ती हुई उसके समीप जा पहुंची। उसने उसके गले में फांसी का फंदा निकाला और व्यग्र स्वर में अनंगमंजरी से पूछा—"सखी, ऐसी क्या बात हो गई जिसके कारण तुम अपनी जान देने पर तैयार हो गई। देखो, मैं तुम्हारी सखी हूं, तुम्हारी हितैषी। मुझे अपना दुख बता दो, मैं अपने प्रयास से तुम्हारा दुख दूर करने की कोशिश करूंगी।"
तब अनंगमंजरी ने अपने मन की सारी व्यथा सुनाकर उससे कहा—"सखी, मेरे हृदय में उस तरुण के न मिलने से विरह की अग्नि जल रही है। यदि तुम मुझे जीवित देखना चाहती हो तो मुझे मेरे प्रियतम से मिला दो।"
अनंगमंजरी के ऐसा कहने पर मालतिका ने उसे आश्वासन दिया—"सखी, आज तो बहुत रात हो गई है। सवेरा होने पर मैं कुछ प्रबंध करूंगी और तुम्हारे प्रियतम को इसी जगह बुला दूंगी। इस बीच तुम धीरज धरो और अपने घर जाओ।"
सवेरा होने पर मालतिका छिपती-छिपाती कमलाकर के पास पहुंची। वह उस समय बगीचे में एक वृक्ष के नीचे चन्दन जल से भीगे कमल-पत्रों की शय्या पर लेटा हुआ था। उसका एक घनिष्ठ मित्र, जो उसके सारे रहस्य जानता था, काम-ज्वाला में जलते हुए अपने मित्र को केले के पत्ते से हवा कर रहा था। यह दृश्य देखकर मालतिका ने सोचा कि 'क्या मेरी सखी अनंगमंजरी के विरह में ही इसकी यह दशा हो रही है?' ऐसा सोचकर वह सत्य का पता लगाने के लिए एक वृक्ष के पीछे छिप गई।
उसी समय कमलाकर के उस मित्र ने कहा—"मित्र, जरा देर तुम इस सुहावने बगीचे को देखकर अपना जी बहलाओ और अपने हृदय में जलती हुई विरह-वेदना की आग को ठंडा करने की कोशिश करो। मैं अभी आता हूं।" ऐसा कहकर उसका मित्र जाने के लिए उद्यत हुआ लेकिन उसे रोककर कमलाकर ने कहा—"मित्र, कैसे बहलाऊं अपने मन को। उस व्यापारी की कन्या ने मेरे मन को चुराकर मुझे सूना कर दिया है। मेरे सूने हृदय को कामदेव ने अपने बाणों का तरकस बना दिया है इसलिए तुम कोई ऐसा उपाय करो, जिससे मैं उसे पा सकूं।"
कमलाकर की ऐसी बातें सुनकर मालतिका का संदेह जाता रहा। वह अपने छिपे स्थान से निकली और कमलाकर के समीप जाकर बोली—"भद्र, मुझे अनंगमंजरी ने आपके पास भेजा है। उसने संदेश दिया है कि यदि शीघ्र ही आप उससे न मिले तो वह अपने प्राण त्याग देगी। आपके विरह में उसकी बहुत बुरी दशा हो रही है। शरीर सूख गया है और उसके चेहरे की कांति आभाहीन हो गई है। यदि
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आप उसे बचाना चाहते है तो जैसा मै कहू वैसा ही करे। ''
इस पर विरह की आग में जलते हुए कमलाकर पर मानो अमृत की वर्षा हो गई। उसने तुरंत उससे अपनी सहमति व्यक्त कर दी।
तब मालतिका ने कहा—''आज रात को मै गुप्त रूप से अनंगमंजरी को उसके महल के बगीचे में ले आऊंगी। आप वहीं बाहर ठहरियेगा, उसके बाद मैं कोई उपाय करके आपको भी भीतर बुला लूगी और इस तरह आप दोनो का मनचाहा मिलन हो सकेगा। ''
इस प्रकार मालतिका ने अपनी बातों से उस ब्राह्मण-पुत्र को प्रसन्न किया ! अपना काम पूरा करके वह वापस लौटी और उसने अनंगमंजरी को भी आनंदित किया।
उस रात जब वह कामी और उत्कंठित कमलाकर सज-धजकर अपनी प्रिया के गृहोद्यान के दरवाजे पर पहुंचा तो मालतिका उसे युक्तिपूर्वक उस उद्यान में ले गई। कमलाकर ने अनंगमंजरी को एक आम्रकुंज की छाया में बैठे हुए देखा। बटोही जिस प्रकार छाया को देखकर खिल उठता है, वैसा ही कुछ हाल उस समय कमलाकर का हुआ। उसे देखकर कमलाकर का चेहरा खिल उठा। वह आगे बढ़ ही रहा था कि अनंगमंजरी ने उसे देख लिया। काम के आवेग ने उसकी लज्जा नष्ट कर दी थी। उसने दौड़कर कमलाकर को गले से लगा लिया—''कहां जाते हो ? मैंने तुम्हें पा लिया है ! '' ऐसा कहकर अनंगमंजरी प्रलाप करने लगी। अत्यधिक प्रसन्नता के मारे उसकी सांस रुक गई और उसके प्राण जाते रहे।
वायु से छिन्न लता के समान वह धरती पर गिर पड़ी। अहा ! प्रेम का पंथ भी निराला है, जिसका परिणाम सदा दुखदायी ही होता है। यह आकस्मिक और भयावह वज्रपात देखकर—''हाय-हाय, यह क्या हो गया ?'' कहता हुआ कमलाकर भी मूर्छित होकर गिर पड़ा। कुछ क्षणों बाद जब उसे चेतना आई, तब उसने अपनी प्रिया को गोद में ले लिया और उसका आलिंगन तथा चुम्बन करता हुआ अनेक प्रकार से विलाप करने लगा।
कठोर दुख की अधिकता से वह इतना विकल हो गया कि पलक झपकते ही उसका हृदय फट गया और उसकी भी मृत्यु हो गई। मृत्यु को प्राप्त हुए दोनों प्रेमियों के लिए मालतिका जब शोक कर रही थी, तब मानो शोक के कारण ही रात भी समाप्त हो गई।
सवेरा होने पर, बगीचे के रखवालो से सारा समाचार जानकर उन दोनों के परिवार के लोग लज्जा, आश्चर्य, दुख और मोह से विकल होते हुए वहां आए। खेद से मस्तक झुकाए दोनों पक्ष के लोग बहुत देर तक इस दुविधा में पड़े रहे कि अब क्या करना चाहिए। सच है, बुरी स्त्रियां कुल को बिगाड़ने वाली और सन्तापदायक ही होती है।
इसी बीच उसका पति मणिवर्मा, अनंगमंजरी के लिए उत्कंठित, ताम्रलिप्ति से लौट आया।
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पत्नी को याद करता हुआ वह भी बगीचे में जा पहुंचा। वहां उसने अपनी स्त्री को पर-पुरुष के निकट मरी हुई देखा। फिर भी उस पर अत्यंत अनुराग होने के कारण हृदय मे शोक की अग्नि जल उठी और उसने भी वहीं पर अपने प्राण त्याग दिए।
तत्पश्चात्, वहां इकट्ठे हुए लोगों की चीख-पुकार सुनकर नगर के सभी लोगों को सारा वृत्तांत मालूम हो गया और वे विस्मित होते हुए वहां आ पहुंचे। अनंगमंजरी के पिता ने चामुंडा देवी का जो मंदिर बनवाया था, वह निकट ही था। यह दृश्य देखकर गणों ने देवी से निवेदन किया—'‘हे देवी ! अर्थदत्त ने ही यहां आपकी प्रतिष्ठा की है। यह व्यापारी सदा से ही आपका भक्त रहा है। अतः इस दुख के समय इस पर दया करें।’'
गणों की प्रार्थना सुनकर देवी ने उन्हें पुनर्जीवित होने का आशीर्वाद प्रदान कर दिया। देवी की कृपा से वे तीनों ही इस प्रकार जीवित हो उठे मानो सोते से जाग पड़े हों। अब उनके काम-विकार भी नष्ट हो चुके थे।
यह आश्चर्यजनक घटना देखकर वहां उपस्थित सभी लोग बहुत आनंदित हुए। कमलाकर लज्जा से मस्तक झुकाकर अपने घर चला गया। अर्थदत्त भी लजाई हुई अपनी कन्या को उसके पति सहित घर ले गया।
उस रात को मार्ग में जाते हुए बेताल ने यह कथा सुनाकर पृथ्वीपति विक्रमादित्य से पुनः पूछा— “राजन, अब तुम मेरी इस शंका का समाधान करो कि प्रेम में अंधे बने हुए उन तीनों में से किसकी आसक्ति अधिक थी ? अनंगमंजरी को कमलाकर की अथवा अनंगमंजरी के पति मणिवर्मा की ? यदि जानते हुए भी तुमने मेरी शंका का समाधान नहीं किया तो मेरा वही शाप तुम पर फट पड़ेगा।”
बेताल की यह बातें सुनकर राजा ने उत्तर दिया—‘‘हे बेताल ! मुझे तो इन तीनों में से मणिवर्मा ही अधिक मोहान्ध जान पड़ता है। कारण यह कि शेष दोनों तो एक-दूसरे के प्रति अनुरक्त थे और समय पाकर उनकी आसक्ति पक्की हो चुकी थी, अतः उन दोनों ने प्राण त्याग दिए, तो ठीक ही था; लेकिन मणिवर्मा तो बहुत ही मोहान्ध था। उसको तो पर-पुरुष के प्रति आसक्त अपनी पत्नी पर क्रोध करना चाहिए था। लेकिन ऐसा न करके उसकी प्रीति के कारण शोक से उसने अपने प्राण ही त्याग दिए थे, अतः सबसे ज्यादा मोहान्ध वही हुआ। उसी की आसक्ति सबसे अधिक थी।‘’
राजा का उत्तर बिल्कुल सटीक था, अतः बेताल संतुष्ट हो गया और पहले की ही भांति अपनी माया से राजा के कंधे से उतरकर अन्तर्ध्यान हो गया। तत्पश्चात् फिर वह उसी शिंशपा-वृक्ष पर जाकर उलटा लटक गया। दृढ़ निश्चयी राजा विक्रमादित्य भी पुनः उसे लाने के लिए उस शिंशपा-वृक्ष की ओर दौड़ चला।
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136 ▢ बेताल पच्चीसी
बाईसवां बेताल: चार ब्राह्मण भाइयों की कथा
बाईसवां बेताल
चार ब्राह्मण भाइयों की कथा
राजा विक्रमादित्य ने फिर उस शिशपा-वृक्ष के निकट जाकर बेताल को नीचे उतारा और पहले की भांति उसे अपने कंधे पर लादकर चल पड़ा।
कुछ दूर चलने पर बेताल ने पुनः मौन भंग किया और कहा—‘‘राजन ! आप सज्जन और महापराक्रमी है और संसार का हर व्यक्ति सज्जन और पराक्रमी व्यक्ति का सम्मान करता है। आप परिश्रम भी बहुत कर रहे है अतः परिश्रम को भुलाने के लिए मैं तुम्हें एक और नई कथा सुनाता हूं।’’
प्राचीन काल में इस आर्यावर्त्त में कुसुमपुर नाम का एक नगर था। उस नगर के स्वामी धरणीवराह नाम के एक राजा थे। ब्राह्मण बहुल उनके राज्य में ब्राह्मणों को दान स्वरूप दिया गया, ब्रह्मस्थल नाम का एक गांव था।
उस गांव में विष्णुस्वामी नाम का एक ब्राह्मण रहता था। विष्णुस्वामी के चार पुत्र थे। जब उसके वे पुत्र वेदों का अध्ययन कर चुके तो उसी बीच विष्णुस्वामी और उसकी पत्नी का देहान्त हो गया।
माता-पिता के जीवित न रहने पर उन चारो भाइयों की आर्थिक स्थिति बहुत डांवाडोल हो गई क्योकि उनके सगे-संबंधियों ने उनका सब कुछ हड़प कर लिया था। तब उन चारों ने आपस मे सलाह की कि—‘‘यहा अब हमारी गुजर-बसर नहीं हो सकती। अब तो हमें अपने नाना के यहां, ब्रह्मस्थल नाम के गांव में चले जाना चाहिए।’’
ऐसा निश्चय करके, राह में मांगते-खाते वे बहुत दिनो मे अपने नाना के घर जा पहुंचे। वहां नाना के न रहने पर भी उनके मामाओं ने उन्हें आश्रय दिया। उनके यहां खाते-पीते और वेदों का अध्ययन और अभ्यास करते हुए वे रहने लगे।
समय बीतने लगा तो उनके मामाओं ने उनकी उपेक्षा करनी आरंभ कर दी। मामों से भी उपेक्षित उन चारों ने एक दिन पास मे विचार-विमर्श किया। उनमें से जो सबसे बड़ा भाई था, वह बोला—‘‘भाइयो, हम लोगों को ऐसी हालत मे क्या करना चाहिए ? यह सब तो विधाता के ऊपर निर्भर है क्योंकि मनुष्य के किए से तो यहां कभी कुछ नही हो सकता। आज उद्विग्न होकर घूमता हुआ जब मैं श्मशान पहुंचा तो वहा मैने एक मरे हुए पुरुष का शरीर देखा। उसे देखकर मैं उसकी दशा की सराहना करने लगा कि यह धन्य है, जो दुख का सारा भार उतारकर इस प्रकार विश्राम कर रहा है। ऐसा सोचकर मैने भी उसी समय मरने का निश्चय किया। मैं एक वृक्ष की डाली मे फंदा डालकर उससे लटक गया। मै अचेत तो हो गया किंतु मेरे प्राण नहीं
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निकले थे। इसी समय फंदा टूट गया और मैं भूमि पर गिर पड़ा। जब मुझे चेतना
आई तो मैंने देखा कि कोई कृपालु पुरुष वस्त्र से शीघ्रतापूर्वक हवा करके मुझे सचेत
करने का प्रयत्न कर रहा है।
“एक क्षण रुककर वह फिर बोला—‘उस व्यक्ति ने मुझसे कहा—‘अरे भाई,
विद्वान होकर भी तुम किसके लिए इतना खेद कर रहे हो? मनुष्य को उसके सुकर्मों
से सुख और दुष्कर्मों से दुख मिलता है। अतः यदि तुम दुखों से घबरा गए हो तो
सत्कर्म करो। तुम आत्महत्या करके नरक के दुख की कामना क्यों करते हो?’ यह
कहकर मुझे समझाकर वह व्यक्ति वहां से चला गया। मैं भी इस कारण मरने का
इरादा छोड़कर यहां चला आया। स्पष्ट है कि विधाता की इच्छा न होने पर मनुष्य
कुछ भी नहीं कर सकता। अतः अब मैं किसी तीर्थस्थान पर जाकर तपस्या करूंगा
और इस प्रकार शरीर का त्याग करूंगा कि फिर मुझे निर्धनता का दुख न भोगना
पड़े।”
बड़े भाई के ऐसा कहने पर उसके छोटे भाई उससे यह बोले—‘‘आर्य, आप
विद्वान होकर भी धन हीनता के कारण दुखी क्यों हो रहे हो? क्या आप नहीं जानते
कि धन तो शरद के मेघों की तरह चंचल होता है। दुर्जन की मित्रता, वेश्या और
लक्ष्मी—ये तीनों ही अंत में आंखें फेर लेती हैं। इनकी चाहे जितनी रखवाली की
जाए, चाहे जितनी सावधानी रखी जाए, ये कभी किसी के होकर नहीं रहते। अतः
मनस्वी पुरुष को यल करके कोई ऐसा गुण अर्जित करना चाहिए जो धन रूपी हिरण
को बलपूर्वक बार-बार बांधकर ला सके।”
छोटे भाइयों की यह बातें सुनकर बड़े भाई ने शीघ्र ही धैर्य धारण करते हुए
कहा—‘‘तो फिर अर्जन करने योग्य कौन-सा गुण हो सकता है?” बाद में, वे सभी
सोच-विचार करके एक-दूसरे से कहने लगे—‘‘सारी दुनिया को छानकर हम लोग
कोई विशेष ज्ञान अर्जित करेंगे।” ऐसा निश्चय करके और लौटकर मिलने का एक
ठिकाना बताकर वे चारों, चार अलग-अलग दिशाओं में चले गए।
समय पाकर वे चारों निश्चित किये हुए ठिकाने पर आ मिले और एक दूसरे से
यह बताने लगे कि किसने क्या सीखा है।
उनमें से एक ने कहा—‘‘मैंने तो ऐसी विद्या सीखी है कि मुझे जिस किसी प्राणी
की हड्डी का एक टुकड़ा मिल जाए, तो मैं अपनी विद्या से क्षण-भर में उसमें उस प्राणी
के योग्य मांस तैयार कर दूं।”
इस पर दूसरे ने कहा—‘‘मैं उसके अनुकूल चमड़ी और रोम तैयार कर सकता हूं।”
इस पर तीसरे ने कहा—‘‘चमड़ी, मांस और रोएं हो जाने पर मै उस प्राणी के
अवयव और आकृति बना सकता हूं।”
अब चौथे की बारी थी, उसने कहा—‘‘अवयव और आकृति बन जाने पर मै
उस प्राणी में प्राण का संचार कर देना जानता हूं।”
138 ▢ बेताल पच्चीसी
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इस प्रकार, उन चारों भाइयों ने जब अपनी-अपनी विद्या के प्रभाव का वर्णन कर लिया, तब वे उसकी सिद्धि के लिए हड्डी का कोई टुकड़ा ढूंढ़ने के लिए वन में गए।
संयोग से उन्हें वहां सिंह की एक टूटी हड्डी का टुकड़ा मिल गया। उसके बारे में बिना कुछ जाने-सुने उन्होंने उसे उठा लिया।
तब एक ने उस हड्डी में उसके योग्य मांस बना दिया। दूसरे ने उसमें उसके अनुकूल चमड़ी और रोम तैयार कर दिए। तीसरे ने उसके सारे अंग ज्यों के त्यों बना दिए और चौथे ने उसमें प्राण का संचार कर दिया।
अनन्तर, भयानक दिखने वाला, भयानक मुख और तीखे नखों के अंकुश वाला, वह सिंह उठ खड़ा हुआ।
उसने झपटकर अपने चारों ब्राह्मणों को मार डाला और अपना पेट भरकर, तृप्त होकर वन में चला गया। इस प्रकार वे ब्राह्मण सिंह को जीवित करने की गलती के कारण मारे गए। भला दुष्ट प्राणी को जगाकर कौन मनुष्य स्वयं सुखी होता है ?
यदि विधाता वाम होता है, तो यत्नपूर्वक सीखे हुए गुण भी सुखकर नहीं होते बल्कि दुख का कारण बन जाते हैं। पौरुष का वृक्ष तभी फल देता है, जब भाग्य-रूपी उसकी जड़ विकार रहित (अनुकूल) हो। वह नीति के थावले में स्थित हो और ज्ञान के जल से सींचा गया हो।
रात में मार्ग में चलते हुए राजा विक्रमादित्य के कंधे पर बैठे हुए बेताल ने उसको यह कथा सुनाकर पूछा—‘‘राजन्, अब यह बतलाओ कि उन चारों में से सिंह को बनाने का वास्तविक अपराध किसका था ? यदि जानते हुए भी तुम नहीं बतलाओगे, तो पहले कहा हुआ शाप तुम पर पड़ेगा।’’
बेताल की बात सुनकर राजा ने सोचा कि ‘बेताल मेरा मौन तुड़वाकर फिर चला जाना चाहता है तो चला जाए, मैं लौटकर फिर इसे पकड़ लाऊंगा।’ मन-ही-मन ऐसा सोचकर उसने बेताल से कहा—‘‘बेताल, जिस ब्राह्मण ने उस सिंह को प्राणदान दिया, वही उन चारों में से इस पाप का भागी है। बिना यह जाने कि यह कौन-सा प्राणी है, उन्होंने अपनी विद्या से चमड़ा, मांस, रोम और दूसरे अंग दिए, उनका दोष इस कारण नहीं है कि उन्हें वास्तविकता का ज्ञान नहीं था किंतु जिसने सिंह का आकार देखकर भी अपनी विद्या का प्रभाव दिखाने की उत्कंठा से उसमें प्राण डाले, वस्तुतः ब्रह्महत्या उसी ने की।’’
उस मायावी बेताल-श्रेष्ठ ने जब राजा की यह बातें सुनीं, तब वह उसके कंधे से उतरकर फिर अपनी जगह चला गया। बेताल को पकड़ने के लिए कटिबद्ध राजा भी पहले की भांति उसे पकड़ने के लिए उसके पीछे-पीछे चल पड़ा।
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140 ❒ बेताल पच्चीसी
तेईसवां बेताल: अघोरी तपस्वी की कथा
तेईसवां बेताल
अघोरी तपस्वी की कथा
भूत-प्रेतो से भरे उस महाश्मशान में राजा विक्रमादित्य फिर से उस शिंशपा-वृक्ष के नीचे पहुंचा। यद्यपि बेताल ने अपने अनेक रूप दिखलाए किंतु राजा ने उसे वृक्ष से नीचे उतार लिया और उसे अपने कंधे पर लादकर चुपचाप मार्ग पर चलते रहे। तब बेताल ने राजा विक्रमादित्य से कहा—"राजन ! न करने योग्य इस काम में भी तुम्हारा ऐसा आग्रह है, जिसे रोका नही जा सकता। अतः मैं तुम्हारी थकावट दूर करने के लिए एक अन्य कथा सुनाता हूं, सुनो।"
कलिंगा देश में स्वर्गपुरी के समान भव्य नगरी थी, जहां उत्तम आचरण वाले लोग रहते थे। वहां ऐश्वर्य और पराक्रम के लिए प्रद्युम्न के समान प्रसिद्ध, प्रद्युम्न नाम का राजा शासन करता था। उस नगर के एक छोर पर यज्ञस्थल नाम का एक गांव था जिसे राजा प्रद्युम्न ने ब्राह्मणों को दान स्वरूप दिया था। उसी गांव में यज्ञसोम नाम का एक वेदज्ञ ब्राह्मण भी रहता था, जो अत्यंत धनवान था। वह अग्निहोत्री था तथा अतिथि-देवों का सम्मान करने वाला था।
जब उस ब्राह्मण का यौवन बीत गया, तब सौ-सौ मनोरथों के बाद, उसके ही योग्य उसकी पत्नी के एक पुत्र उत्पन्न हुआ। उत्तम लक्षणों वाला वह बालक पिता के घर में बढ़ने लगा। ब्राह्मणों ने विधिपूर्वक उसका नाम देवसोम रखा। वह बालक, जिसने अपनी विद्या, विनय आदि गुणों से लोगों को वशीभूत कर लिया था, जब सोलह वर्ष का हुआ, तब अचानक ज्वर के कारण मृत्यु को प्राप्त हो गया। उसके पिता यज्ञसोम ने स्नेह के कारण अपनी पत्नी सहित उस मरे हुए पुत्र को आलिंगन में बांधे रखा और बहुत देर तक उसके शव को दाह-क्रिया के लिए नहीं जाने दिया।
बाद में, वहां इकट्ठे हुए बड़े-बूढ़ों ने उसे इस प्रकार समझाया—"ब्राह्मण, आप तो भूत और भविष्य को जानने वाले हैं। आप क्या जल के बबूले के समान क्षण-भंगुर इस संसार की गति नहीं जानते ? इस संसार में ऐसे भी राजा थे, जो उन मनोहर राजमहलों में रत्नजडित पलंगों पर बैठते, जहां संगीत की झंकार भरी रहती थी, अपने शरीर पर चन्दन का लेप करते थे और अपने को अमर समझकर उत्तम स्त्रियों से घिरे रहते और सुख भोगते थे। ऐसे महापराक्रमियों को भी काल ने अपना ग्रास बना लिया। वे भी अकेले ही उस श्मशान में पहुंचे जहां उनके अनुयायी और प्रेत रो रहे थे और आसपास शृगाल चीत्कार कर रहे थे। चिता पर सोये उनके शरीर का मांस भी पक्षी, पशुओं और अग्नि ने खा डाला। जब उन्हें भी मरने और नष्ट होने से कोई नहीं बचा सका, तब और की तो बात ही क्या है ? अतः हे विद्वान ! तुम यह
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बतलाओ कि कि इस शव को कलेजे से लगाए रखकर तुम क्या करोगे ?"
इस तरह समझाने-बुझाने के बाद किसी तरह अपने मरे हुए पुत्र को छोड़ा और शव को नहलाया-धुलाया। तब उसे एक पालकी में रखकर, आंसू बहाते तथा रोते-पीटते वे बन्धु-बांधव, जो वहां इकट्ठे थे, श्मशान ले गए।
उस श्मशान में कुटिया बनाकर एक बूढ़ा तपस्वी रहता था। वह पाशुपत मत का योगी (अघोरी) था। अधिक अवस्था और कठोर तपस्या के कारण उसका शरीर अत्यंत कृश हो गया था। जब वह चलता था तो ऐसा लगता जैसे अब गिरा कि तब गिरा।
उसका नाम शिव था। उसका सारा शरीर भस्म लगे श्वेत रोमों से भरा हुआ था। उसका पीला जटाजूट बिजली के समान जान पड़ता था। वह स्वयं दूसरे शिव जैसा प्रतीत होता था।
उस तपस्वी के साथ उसकी कुटिया में एक शिष्य भी रहता था। योगी ने कुछ ही देर पहले उसे बुरा-भला कहा था, जिससे वह चिढ़ा हुआ था। वह मूर्ख और दुष्ट था। ध्यान और योग आदि क्रियाओं में लगा रहने के कारण उसे अहंकार हो गया था। वह भीख में मिले हुए अन्न को खाकर निर्वाह करता था। बाहर दूर से आते हुए इस जन-कोलाहल को सुनकर योगी ने उससे कहा—"बाहर जाकर झटपट यह तो देखकर आओ कि इस श्मशान में ऐसा शोरगुल क्यों हो रहा है, जैसा इससे पहले कभी नहीं सुना गया।"
गुरु के ऐसा कहने पर उस शिष्य ने उत्तर दिया—"मैं नहीं जाऊंगा, आप ही जाइए। मेरी भिक्षा की बेला बीती जा रही है।"
यह सुनकर योगी बोला—"अरे पेटू, धिक्कार है तुझे। आधा दिन बीत जाने पर यह तेरी कैसी भिक्षा की बेला है ?"
इस पर उस क्रुद्ध तपस्वी ने कहा—"अरे बुड्ढे, धिक्कार मुझे नहीं तुझ पर है। आज से न तो मैं तेरा शिष्य हूं और न तू मेरा गुरु। मैं दूसरी जगह जा रहा हूं। तू संभाल अपना यह कमंडल।" यह कहकर वह उठा और उस तपस्वी के सम्मुख दंड-कमंडल रखकर वहां से चलता बना।
कुछ देर बाद, वह तपस्वी हंसता हुआ अपनी कुटिया से बाहर निकलकर वहां पहुंचा जहां ब्राह्मणकुमार को दाह-कर्म के लिए लाया गया था। उसने देखा कि लोग तरुणाई के द्वार पर खड़े उस बालक के लिए शोक कर रहे हैं। बुढ़ापे से क्षीण उस योगी ने बालक के शरीर में प्रवेश करने का निश्चय किया। झटपट एकान्त में जाकर पहले तो वह जी खोलकर रोया, फिर अंगों के उचित संचालन के साथ शीघ्रता से नाचने लगा। पल-भर बाद यौवन की इच्छा रखने वाले उस तपस्वी ने अपना शरीर छोड़कर उस ब्राह्मण-पुत्र के शरीर में प्रवेश किया।
बात ही बात में सजाई हुई चिता पर वह ब्राह्मण-पुत्र जीवित होकर जम्हाई लेता हुआ उठ बैठा। यह देखकर वहां उपस्थित सभी लोग आश्चर्यचकित रह गए। ब्राह्मण-पुत्र के
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शरीर मे प्रविष्ट उस योगी ने जो योगों का स्वामी था और अपने तमाम व्रतों को छोड़ना नहीं चाहता था, बातें बनाते हुए कहा—"मरकर जब मैं परलोक पहुंचा तो भगवान शिव ने प्रकट होकर मुझे जीवनदान दिया और कहा कि तुम्हें पाशुपत (अघोरी) व्रत लेना है। मुझे इसी समय एकान्त में जाकर यह व्रत ग्रहण करना है। यदि मैं ऐसा नहीं करूंगा तो जीवित नहीं रहूंगा। इसलिए आप सब लोग वापस लौट जाइए, मैं जा रहा हूं।"
इस प्रकार उस तपस्वी ने, जिसने व्रत का दृढ़ निश्चय कर रखा था, वहां एकत्र हुए हर्ष और शोक से विह्वल सब लोगों को समझा-बुझाकर, घर लौटा दिया। तत्पश्चात् उसने उस जगह जाकर, जहां उसका पहला शरीर पड़ा हुआ था, वह मृत शरीर एक गड्ढे में डाला और व्रत धारण करके युवा शरीर में वह महायोगी कहीं अन्यत्र चला गया।
राजा विक्रमादित्य को यह कथा सुनाकर बेताल ने उससे पुनः कहा—"राजन, अब तुम मुझे यह बतलाओ कि दूसरे शरीर में प्रवेश करने से पहले वह योगी क्यों रोया और फिर नाचने क्यों लगा ? मुझे इस बात को जानने का बड़ा कौतूहल हो रहा है।"
बेताल की यह बात सुनकर, शाप से आशंकित और बुद्धिमानों में श्रेष्ठ राजा ने मौन त्याग दिया और बेताल से कहा—"हे बेताल ! इन बातों से उस तपस्वी का जो अभिप्राय था, वह सुनो।
"उस वृद्ध तपस्वी ने सोचा—'इस बूढ़े शरीर के साथ बहुत दिनों तक मैं सिद्धियों की साधना करता रहा हूं। अब मैं इस शरीर का त्याग करने जा रहा हूं जिसे मां-बाप ने बचपन में लाड़-प्यार से पाला था।'
"यही सोचकर वह तपस्वी दुखी हुआ और रोया था क्योंकि शरीर का मोह छोड़ना बड़ा कठिन काम होता है। इसी प्रकार वह यह सोचकर प्रसन्नता से नाच उठा था कि अब वह नए शरीर में प्रवेश करेगा और इससे भी अधिक साधना कर सकेगा।"
शव के शरीर में बैठा हुआ वह बेताल, राजा की यह बातें सुनकर उसके कंधे से उतरकर पुनः उसी शिशपा-वृक्ष पर जा बैठा। राजा विक्रमादित्य ने और अधिक उत्साह से उसे ले आने के लिए फिर उसका पीछा किया।
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चौबीसवां बेताल: एक अद्भुत कथा
चौबीसवां बेताल
एक अद्भुत कथा
वह रात किसी राक्षसी के समान थी। श्मशान में यत्र-तत्र जलती हुई चिताएं ही मानो उस राक्षसी की आंखें थीं। ऐसी महाभयानक रात में राजा विक्रमादित्य फिर से शिंशपा-वृक्ष के नीचे पहुंचा और बेताल को नीचे उतार लिया। फिर वह उसे कंधे पर डालकर मौनभाव से अपने गंतव्य की ओर चल दिया। कुछ आगे चलकर बेताल ने पुनः मौन भंग किया—‘‘राजन ! बार-बार की इस आवाजाही से मै तो बिल्कुल ऊब चुका हूं किंतु तुम पर कोई फर्क नहीं पड़ा है। अब मैं तुमसे एक महाप्रश्न पूछता हूं, इसे सुनो। ’’
दक्षिणपथ में धर्मनाम का एक मांडलिक राजा राज करता था। वह राजा बहुत ही सद्गुणी था। उसके बहुत से गोत्रज (परिवारजन) थे। उसकी स्त्री का नाम चंद्रावती था, जो मालवा की रहने वाली थी और वहां के एक संभ्रान्त परिवार में पैदा हुआ थी। राजा को अपनी उस पत्नी से एक ही कन्या उत्पन्न हुई जिसका नाम लावण्यवती था। अपने नाम के अनुरूप ही लावण्यवती सचमुच ही मानो रूप का खजाना थी।
जब वह कन्या विवाह के योग्य हुई, तब राजा के गोत्रजों ने उसके विरुद्ध एक षड्यंत्र रचा। उन्होंने राज्य में फूट डाल दी और राजा धर्मनाम को सिंहासन से उतार दिया। वे उसके खून के प्यासे बन गए। एक रात राजा अपनी पत्नी और पुत्री सहित किसी प्रकार बचकर वहां से निकल भागा। वह अपने साथ बहुत ही उत्तम कोटि के कुछ रत्नों को भी ले जाने में कामयाब हो गया। राज्य से निकलकर राजा अपनी ससुराल मालवा के लिए चल पड़ा। पत्नी और पुत्री के साथ जाता हुआ जब वह विंध्याचल पर्वत के निकट पहुंचा तो रात हो गई। किसी प्रकार वह रात उन सबने उसी जंगल में काटी और भोर होते ही पुनः आगे चल पड़े।
वैभव और ऐश्वर्य में पले-बड़े होने के कारण उन्होंने कभी पैदल सफर नहीं किया था, अतः उनके पांव कांटों से छिल गए थे। इस तरह चलते-चलते वे एक भीलों के गांव में जा पहुंचे। उस गांव के भील चोर-लुटेरे थे। धन के लिए किसी की भी हत्या तक कर देना उनके लिए मामूली बात थी। वस्त्र और आभूषण पहनने वाले राजा को दूर से ही देखकर, वे उन्हें लूटने के लिए अनेक प्रकार के अस्त्र-शस्त्र हाथों में लिए उनकी ओर दौड़ पड़े।
उन्हें देखकर राजा धर्मनाम ने अपनी स्त्री और कन्या से कहा—‘‘ये म्लेच्छ पहले तुम्हारे ही ऊपर आक्रमण करेंगे, अतः तुम दोनों तुरन्त वन में जाकर छिप जाओ। ’’
राजा के ऐसा कहने पर, भय के कारण रानी चंद्रावती अपनी कन्या को साथ लेकर तत्काल वन में चली गई। कुछ देर उपरान्त ही वे लूटेरे भील राजा के पास
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यहाँ चित्र में दिए गए हिंदी पाठ का प्रतिलेखन (transcription) है:
पहुंच गए और अपने अस्त्र-शस्त्रों से राजा पर टूट पड़े। राजा ने अपनी समस्त शक्ति से उनका मुकाबला किया। उसने अपने तीरों से अनेक लुटेरों को मार गिराया, पर अन्ततः लुटेरों ने उस पर सामूहिक रूप से आक्रमण किया और उसे मारकर उसके शरीर के समस्त आभूषण उतारकर ले गए।
दूर वन में छिपी हुई रानी और उसकी पुत्री ने यह दृश्य देखा तो प्राणों के भय से वह वहां से भाग निकलीं और दूर के घने जंगल में चली गई। उस जंगल में एक सरोवर के समीप वृक्ष के नीचे बैठकर वह दोनों विलाप करने लगीं। इसी बीच उस वन के निकट रहने वाला, घोड़े पर सवार कोई राजा आखेट करने के लिए अपने पुत्र के साथ उधर आ निकला। उस राजा का नाम था चंद्रसिंह और उसके पुत्र का नाम सिंहपराक्रम था। धूल में उभरे हुए उन मां-बेटी के पदचिन्ह देखकर चंद्रसिंह ने अपने पुत्र से कहा—‘‘हम दोनों इन सुन्दर और उत्तम रेखाओं वाले पद-चिन्हों का अनुसरण करते हुए आगे बढ़ते हैं। ये चिन्ह अवश्य ही दो महिलाओं के हैं। यदि वे स्त्रियां हमें मिल जाएं तो उनमें से एक को तुम ब्याह लेना।’’
पिता की बात सुनकर उसका पुत्र सिंहपराक्रम बोला—‘‘उन स्त्रियों से जिसके छोटे-छोटे पैर हैं, मैं उसी के साथ विवाह करूंगा। अवश्य ही वह स्त्री कम उम्रवाली है और मेरे योग्य है। दूसरी बड़े पैरों वाली से आप विवाह कर लेना।’’
पुत्र की बात सुनकर उसका पिता बोला—‘‘तुम यह कैसी बातें करते हो पुत्र। तुम्हारी माता को मरे अभी कुछ ही दिन तो बीते हैं। वैसी योग्य गृहणी को खोकर अब मुझे किसी और की कामना कैसे हो सकती है?’’
इस पर उसके पुत्र सिंहपराक्रम ने उत्तर दिया—‘‘पिताजी, आप ऐसा न कहें। मैने जिस स्त्री के पदचिन्ह देखकर उसे अपने लिए पसंद किया है, उसे छोड़कर दूसरी स्त्री को आप अपनी भार्या अवश्य बनाएं, आपको मेरे प्राणों की सौगन्ध’’। फिर दोनों, पैरों के निशान देखते हुए धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगे।
जब वे दोनों विलाप करती हुई उन मां-बेटी के निकट पहुंचे तो दोनों स्त्रियां सहमकर चुप हो गईं। उन्होंने उन बाप-बेटे को भी कोई लुटेरा ही समझा था। लेकिन जब राजा ने उन्हें अपना परिचय देकर निर्भय होने के लिए आश्वस्त किया, तब वे दोनों स्त्रियों को अपने घोड़े पर बिठाकर अपने महल ले आए। महल में पहुंचकर उन पिता-पुत्र में आपस में यह वार्तालाप हुआ कि अब उन स्त्रियों के साथ विधिपूर्वक विवाह कर लेना चाहिए। दिए गए वचन के अनुसार राजा चंद्रसिंह के पुत्र सिंहपराक्रम ने रानी चंद्रावती को अपनी पत्नी बनाया क्योंकि उसी के पैर छोटे थे, जबकि राजा चंद्रसिंह को उसकी बेटी लावण्यवती से विवाह करना पड़ा क्योंकि उसके पैर बड़े थे। इस प्रकार पैरों की गड़बड़ी से उन पिता-पुत्रों ने क्रमशः बेटी और माता से विवाह कर लिया। चंद्रावती अपनी ही बेटी की बहू बन गई। समय पाकर उन दोनों को पुत्र एवं कन्याएं उत्पन्न हुईं और फिर उनके भी बेटी-बेटे हुए।
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रात्रि के समय मार्ग में जाते हुए बेताल ने इस प्रकार यह कथा सुनाकर राजा विक्रमादित्य से पुनः पूछा—‘‘राजन्, यदि तुम जानते हो तो यह बतलाओ कि उन मां-बेटियों को, पुत्र एवं पिता के द्वारा क्रमशः जो सन्तानें पैदा हुईं, उनका आपस में क्या संबंध हुआ ? यदि जानते हुए भी तुमने नहीं बतलाया, तो तुम्हें पहले कहा हुआ ही शाप लगेगा। ’’
यह सुनकर राजा विक्रमादित्य सोच में पड़ गया। उन्होंने बहुत सोचा-विचारा किंतु बेताल के उस प्रश्न का कोई भी उत्तर उनकी समझ में नहीं आया। अतः वह चुप्पी साधे मौन भाव से आगे बढ़ता रहा। मृत पुरुष के शरीर में प्रविष्ट और राजा के कंधे पर बैठा बेताल इस पर मन-ही-मन हंसा और सोचने लगा—‘इस महाप्रश्न का उत्तर इस राजा को मालूम नहीं है, फिर भी यह प्रसन्न है और सावधानीपूर्वक पैर रखता हुआ निरंतर आगे बढ़ रहा है। यह राजा बड़ा पराक्रमी है, इसलिए वंचित होने के योग्य नहीं है। इसके अतिरिक्त वह भिक्षु मेरे साथ जो चाल चल रहा है, वह इतने से ही चुप नहीं रहेगा। इसलिए मैं उस दुरात्मा को ही उपायपूर्वक वंचित करूंगा और उसकी सिद्धि इस राजा के लिए सुलभ कर दूंगा, क्योंकि भविष्य में इसका कल्याण होने वाला है।’
ऐसा सोचकर बेताल ने राजा से कहा—‘‘राजन्, इस भयानक रात में, इस श्मशान में बार-बार आते-जाते तुमने बहुत कष्ट उठाया है, फिर भी तुम अपने निश्चय से नही डिगे, तुम सुख पाने के योग्य हो। मैं तुम्हारे इस आश्चर्यजनक धैर्य से संतुष्ट हुआ। अतः अब तुम इस शव को ले जाओ, मैं इसमें से चला जाता हूं। लेकिन जाने से पहले तुम्हारी भलाई के लिए मैं जो तुमसे कहना चाहता हूं, उसे सुनो और उसके अनुसार ही कार्य करो।’’
बेताल ने आगे कहा—‘‘हे राजन् ! तुम जिस दुष्ट भिक्षु के लिए मनुष्य का यह शरीर लेकर जा रहे हो, वह आज इस शरीर में मेरा आह्वान करके पूजा करेगा। पूजा करने के बाद वह दुष्ट तुम्हारी ही बलि चढ़ाने की इच्छा से तुमसे कहेगा कि—‘भूमि पर पड़कर साष्टांग प्रणाम करो।’ तब उस समय तुम उस भिक्षु से कहना—‘पहले तुम करके दिखलाओ, फिर मैं वैसा ही करूंगा।’ तत्पश्चात् जब वह भूमि में पड़कर प्रणाम करके तुम्हें दिखलाए, उसी समय तुम तलवार से उसका मस्तक काट देना। तब विद्याधरों का जो ऐश्वर्य वह प्राप्त करना चाहता है, वह तुम्हें मिल जाएगा। उसकी बलि देकर तुम पृथ्वी का भोग करोगे। ऐसा नहीं करोगे तो तुम्हारी बलि चढ़ा देगा। मैंने इसी कारण तुम्हारे इस कार्य में इतनी देर तक विघ्न डाला था। जाओ, तुम्हें सफलता प्राप्त हो।’’ इतना कहकर राजा के कंधे पर लदे मृत शरीर से निकलकर बेताल चला गया।
बेताल की बातों से प्रसन्न हुए राजा विक्रमादित्य भी उस शव को लादे वट-वृक्ष की ओर चल पड़ा जहां उस भिक्षु ने उसे पहुंचने के लिए कहा था।
148 ▢ बेताल पच्चीसी
पच्चीसवां बेताल: भिक्षु शान्तशील की कथा
पच्चीसवां बेताल
भिक्षु शान्तशील की कथा
राजा विक्रमादित्य अपने कंधे पर शव को लादे हुए उस भिक्षु शान्तशील के पास पहुंचे। कृष्णपक्ष की रात से भयावह हो रहे उस श्मशान में वृक्ष की जड़ के समीप बैठा वह भिक्षु टकटकी लगाए राजा की ही प्रतीक्षा कर रहा था। उसने श्मशान की उस भूमि को रक्त से लीप रखा था। हड्डियों के सफेद चूर्ण से चौक पूरा था और चारों दिशाओं से रक्त से भरे घड़े रख दिये थे। वहां मनुष्य की चरबी से भरा दीपक जल रहा था। पास ही जल रही अग्नि में आहुति दी गई थी।
राजा उस भिक्षु के समीप पहुंचा। शव लेकर आए राजा को जैसे ही उस भिक्षु ने देखा, वह प्रसन्न होकर उठ खड़ा हुआ और राजा की प्रशंसा करता हुआ बोला—‘‘महाराज ! आपने मुझ पर दुष्कर अनुग्रह किया है। वे लोग, जो आपको समस्त राजाओं में श्रेष्ठ कहते हैं, वह उचित ही है क्योंकि एक आप ही हैं जो अपनी चिंता छोड़कर परोपकार कर सकते हैं। विद्वान लोग इसी को बड़ों की महत्ता कहते हैं कि वे लोग जो भी अंगीकार कर लेते हैं, उससे कभी विचलित नहीं होते, चाहे उस प्रयास में उनके प्राण ही क्यों न चले जाएं।’’
ऐसा कहते हुए उस श्रमण ने, जो यह समझ रहा था कि उसका कार्य पूर्ण हो गया, राजा के कंधे से उस शव को उतार लिया। तत्पश्चात् उसने शव को स्नान कराया, उसके शरीर पर लेप किया, माला पहनाई और फिर उसे पूरे हुए चौक में रख दिया। फिर उसने अपने शरीर पर भस्म लगाई, केस का यज्ञोपवीत धारण किया और शवाच्छादन (मुर्दे को ओढ़ाया जाने वाला कफन) पहना, फिर कुछ देर के लिए ध्यानस्थ हो गया।
उस भिक्षु ने मंत्रबल से उस श्रेष्ठ बेताल का आह्वान किया। मनुष्य के शरीर में प्रविष्ट कराने के बाद वह क्रम से उसकी पूजा करने लगा। भिक्षु ने मनुष्य की खोपड़ी से उसे अर्घ्य दिया। मनुष्य के ही दांतों के फूल चढ़ाए और सुगंधित लेप लगाया। उसने मनुष्य की आंखों का धूप दिया और मांस की बलि दी। इस तरह पूजा समाप्त करके उसने पास ही खड़े राजा से कहा—‘‘महाराज, यहां मंत्रों के अधिष्ठाता पधारे हैं। तुम भूमि पर लेटकर इन्हें साष्टांग प्रणाम करो, इससे वे वरदायी देव तुम्हें तुम्हारा मनचाहा वर देंगे।’’
यह सुनते ही राजा को बेताल द्वारा कहे गए शब्दों की याद हो आई। तब उसने भिक्षु से कहा—‘‘भगवन्, मैं ऐसा करना नहीं जानता, अतः पहले आप प्रणाम करके मुझे दिखला दें, तब मैं वैसा ही करूंगा। इसके बाद वह भिक्षु, प्रणाम का ढंग बतलाने के लिए ज्योंही भूमि पर झुका, राजा विक्रमादित्य ने अपनी तलवार से तुरंत ही उसका सिर काट डाला।
बेताल पच्चीसी ❏ 149
राजा ने उसका सीना फाड़कर उसका हृदय-कमल भी निकाल लिया और वह सिर और हृदय-कमल बेताल को अर्पित कर दिया।
श्मशान के भूत-प्रेतों ने प्रसन्न होकर राजा को साधुवाद कहा। संतुष्ट होकर बेताल ने भी उस मनुष्य शरीर के अंदर से कहा—‘‘राजन ! यह भिक्षु विद्याधरों के जिस इन्द्रपद की कामना करता था, वह अब भूमि साम्राज्य का भोग कर लेने के बाद तुम्हें प्राप्त होगा। मेरे द्वारा तुम्हें बहुत कष्ट उठाना पड़ा है, अतः तुम अभीष्ट वर मांगो।‘’
बेताल के ऐसा कहने पर राजा उससे बोला—‘‘वैसे तो आपकी प्रसन्नता से ही मुझे समस्त अभिमत प्राप्त हो गए हैं, तथापि हे योगेश्वर ! आपका वचन अमोघ है इसलिए मै इतना ही मांगता हूं कि अनेक कथाओं के मनोरम आरंभ से चौबीस और यह अंतिम पच्चीसवीं कथा, ये सभी समूचे विश्व में प्रसिद्ध हों और सदैव ही आदरणीय रहें।‘’
राजा की इस याचना के बाद बेताल ने कहा—‘‘हे राजन ! ऐसा ही होगा। किंतु इससे अधिक मैं जो कुछ चाहता हूं, तुम उसे सुनो। पहले की जो चौबीस कथाएं हैं, वे और अंतिम पच्चीसवीं कथा, यह सारी कथावली संसार में ‘बेताल पच्चीसी’ के नाम से प्रसिद्ध होगी। लोग इनका आदर करेंगे और कल्याणदायिनी भी होगी। जो कोई आदरपूर्वक इसका एक भी श्लोक पढ़ेगा अथवा जो इसे सुनेगा, ऐसे दोनों प्रकार के लोग शीघ्र ही पापमुक्त हो जाएंगे। जहां-जहां भी ये कथाएं पढ़ी-सुनी जाएंगी, वहां यक्ष, बेताल, डाकिनी, राक्षस आदि का प्रभाव नहीं पड़ेगा।‘’ इतना कहकर वह बेताल उस मनुष्य-शरीर से निकलकर योगमाया के द्वारा अपने अभीप्सित लोक को चला गया।
तत्पश्चात् भगवान शिव, जो राजा से प्रसन्न हो गए थे, देवताओं सहित वहां साक्षात् प्रकट हुए। उन्होंने राजा विक्रमादित्य को प्रणाम करते हुए आदेश दिया—‘‘वत्स, तुम धन्य हो कि तुमने इस धूर्त तपस्वी को मार डाला। जो हठपूर्वक विद्याधरों का महाचक्रवर्ती पद प्राप्त करना चाहता था। म्लेच्छ रूप में अवतीर्ण असुरों को शांत करने के लिए मैंने ही तुम्हें सिरजा है। अतः द्वीपों और पातालों सहित इस धरती के समस्त भोगों का उपभोग करके जब तुम इनसे ऊब जाओगे, तब अपनी ही इच्छा से उन सब सुखों का त्याग करके तुम मेरे निकट आ जाओगे। अब मेरे द्वारा प्रदत्त यह ‘अपराजित’ नाम का खड्ग स्वीकार करो। इसकी कृपा से तुम्हें वह सब सुख प्राप्त होंगे, जो मैंने तुम्हें बताए हैं।‘’
यह कहकर भगवान शिव ने वह खड्ग राजा को दे दिया और वचन-रूपी पुष्पों से पूजित होकर वे अन्तर्ध्यान हो गए।
अब तक रात बीत चुकी थी, सवेरा हो रहा था। राजा ने देखा कि सारे कार्य समाप्त हो चुके हैं; अतः वह अपने नगर लौट गया।
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