बेताल पच्चीसी
Betal Pachisi
by महाकवि सोमदेव / बेताल भट्ट
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Read in contextपच्चीसवां बेताल
भिक्षु शान्तशील की कथा
राजा विक्रमादित्य अपने कंधे पर शव को लादे हुए उस भिक्षु शान्तशील के पास पहुंचे। कृष्णपक्ष की रात से भयावह हो रहे उस श्मशान में वृक्ष की जड़ के समीप बैठा वह भिक्षु टकटकी लगाए राजा की ही प्रतीक्षा कर रहा था। उसने श्मशान की उस भूमि को रक्त से लीप रखा था। हड्डियों के सफेद चूर्ण से चौक पूरा था और चारों दिशाओं से रक्त से भरे घड़े रख दिये थे। वहां मनुष्य की चरबी से भरा दीपक जल रहा था। पास ही जल रही अग्नि में आहुति दी गई थी।
राजा उस भिक्षु के समीप पहुंचा। शव लेकर आए राजा को जैसे ही उस भिक्षु ने देखा, वह प्रसन्न होकर उठ खड़ा हुआ और राजा की प्रशंसा करता हुआ बोला—‘‘महाराज ! आपने मुझ पर दुष्कर अनुग्रह किया है। वे लोग, जो आपको समस्त राजाओं में श्रेष्ठ कहते हैं, वह उचित ही है क्योंकि एक आप ही हैं जो अपनी चिंता छोड़कर परोपकार कर सकते हैं। विद्वान लोग इसी को बड़ों की महत्ता कहते हैं कि वे लोग जो भी अंगीकार कर लेते हैं, उससे कभी विचलित नहीं होते, चाहे उस प्रयास में उनके प्राण ही क्यों न चले जाएं।’’
ऐसा कहते हुए उस श्रमण ने, जो यह समझ रहा था कि उसका कार्य पूर्ण हो गया, राजा के कंधे से उस शव को उतार लिया। तत्पश्चात् उसने शव को स्नान कराया, उसके शरीर पर लेप किया, माला पहनाई और फिर उसे पूरे हुए चौक में रख दिया। फिर उसने अपने शरीर पर भस्म लगाई, केस का यज्ञोपवीत धारण किया और शवाच्छादन (मुर्दे को ओढ़ाया जाने वाला कफन) पहना, फिर कुछ देर के लिए ध्यानस्थ हो गया।
उस भिक्षु ने मंत्रबल से उस श्रेष्ठ बेताल का आह्वान किया। मनुष्य के शरीर में प्रविष्ट कराने के बाद वह क्रम से उसकी पूजा करने लगा। भिक्षु ने मनुष्य की खोपड़ी से उसे अर्घ्य दिया। मनुष्य के ही दांतों के फूल चढ़ाए और सुगंधित लेप लगाया। उसने मनुष्य की आंखों का धूप दिया और मांस की बलि दी। इस तरह पूजा समाप्त करके उसने पास ही खड़े राजा से कहा—‘‘महाराज, यहां मंत्रों के अधिष्ठाता पधारे हैं। तुम भूमि पर लेटकर इन्हें साष्टांग प्रणाम करो, इससे वे वरदायी देव तुम्हें तुम्हारा मनचाहा वर देंगे।’’
यह सुनते ही राजा को बेताल द्वारा कहे गए शब्दों की याद हो आई। तब उसने भिक्षु से कहा—‘‘भगवन्, मैं ऐसा करना नहीं जानता, अतः पहले आप प्रणाम करके मुझे दिखला दें, तब मैं वैसा ही करूंगा। इसके बाद वह भिक्षु, प्रणाम का ढंग बतलाने के लिए ज्योंही भूमि पर झुका, राजा विक्रमादित्य ने अपनी तलवार से तुरंत ही उसका सिर काट डाला।
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