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बेताल पच्चीसी

बेताल पच्चीसी

Betal Pachisi

by महाकवि सोमदेव / बेताल भट्ट

DevanagariHindipublished151 pages

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चौबीसवां बेताल

एक अद्भुत कथा

वह रात किसी राक्षसी के समान थी। श्मशान में यत्र-तत्र जलती हुई चिताएं ही मानो उस राक्षसी की आंखें थीं। ऐसी महाभयानक रात में राजा विक्रमादित्य फिर से शिंशपा-वृक्ष के नीचे पहुंचा और बेताल को नीचे उतार लिया। फिर वह उसे कंधे पर डालकर मौनभाव से अपने गंतव्य की ओर चल दिया। कुछ आगे चलकर बेताल ने पुनः मौन भंग किया—‘‘राजन ! बार-बार की इस आवाजाही से मै तो बिल्कुल ऊब चुका हूं किंतु तुम पर कोई फर्क नहीं पड़ा है। अब मैं तुमसे एक महाप्रश्न पूछता हूं, इसे सुनो। ’’

दक्षिणपथ में धर्मनाम का एक मांडलिक राजा राज करता था। वह राजा बहुत ही सद्गुणी था। उसके बहुत से गोत्रज (परिवारजन) थे। उसकी स्त्री का नाम चंद्रावती था, जो मालवा की रहने वाली थी और वहां के एक संभ्रान्त परिवार में पैदा हुआ थी। राजा को अपनी उस पत्नी से एक ही कन्या उत्पन्न हुई जिसका नाम लावण्यवती था। अपने नाम के अनुरूप ही लावण्यवती सचमुच ही मानो रूप का खजाना थी।

जब वह कन्या विवाह के योग्य हुई, तब राजा के गोत्रजों ने उसके विरुद्ध एक षड्यंत्र रचा। उन्होंने राज्य में फूट डाल दी और राजा धर्मनाम को सिंहासन से उतार दिया। वे उसके खून के प्यासे बन गए। एक रात राजा अपनी पत्नी और पुत्री सहित किसी प्रकार बचकर वहां से निकल भागा। वह अपने साथ बहुत ही उत्तम कोटि के कुछ रत्नों को भी ले जाने में कामयाब हो गया। राज्य से निकलकर राजा अपनी ससुराल मालवा के लिए चल पड़ा। पत्नी और पुत्री के साथ जाता हुआ जब वह विंध्याचल पर्वत के निकट पहुंचा तो रात हो गई। किसी प्रकार वह रात उन सबने उसी जंगल में काटी और भोर होते ही पुनः आगे चल पड़े।

वैभव और ऐश्वर्य में पले-बड़े होने के कारण उन्होंने कभी पैदल सफर नहीं किया था, अतः उनके पांव कांटों से छिल गए थे। इस तरह चलते-चलते वे एक भीलों के गांव में जा पहुंचे। उस गांव के भील चोर-लुटेरे थे। धन के लिए किसी की भी हत्या तक कर देना उनके लिए मामूली बात थी। वस्त्र और आभूषण पहनने वाले राजा को दूर से ही देखकर, वे उन्हें लूटने के लिए अनेक प्रकार के अस्त्र-शस्त्र हाथों में लिए उनकी ओर दौड़ पड़े।

उन्हें देखकर राजा धर्मनाम ने अपनी स्त्री और कन्या से कहा—‘‘ये म्लेच्छ पहले तुम्हारे ही ऊपर आक्रमण करेंगे, अतः तुम दोनों तुरन्त वन में जाकर छिप जाओ। ’’

राजा के ऐसा कहने पर, भय के कारण रानी चंद्रावती अपनी कन्या को साथ लेकर तत्काल वन में चली गई। कुछ देर उपरान्त ही वे लूटेरे भील राजा के पास

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