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आयुर्वेद दर्शन

Ayurveda Darshan

by वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक

Source: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (origin)

DevanagariHindipublished235 pages
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परिशिष्ट

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काम क्रोध लोभ मान इष्यां इषं इनकी असत्यवृत्ति से रहित और भूत मात्र में समदृष्टि रखने वाले होते हैं।

(२) आर्ष कायः—ये भजन वेदाध्ययन, व्रत होम, ब्रह्मचर्य, अतिथिसेवा इनमें रत रहते हैं। बुद्धिमान् और ज्ञान विज्ञान सम्पन्न होते हैं। इनके मद, मान राग, द्वेष, रोष आदि शांत रहते हैं।

(३) ऐंद्र कायः—ये ईश्वर प्रिय, यज्ञ कर्ता, तेजस्वी, ओजस्वी, शूर, दूरदर्शी और धर्मार्थकामों का समान उपयोग करने वाले होते हैं। इनका कहा सब मानते हैं।

(४) वाम्य कायः—ये स्मृतिमान्, ऐश्वर्यशाली और राग द्वेष मोह रहित होते हैं। ये लिखित नियमों के तथा प्रसंग के अनुसार काम करते हैं।

(५) वरुण कायः—ये शूर, धीर, स्वच्छ, अस्वच्छता द्वेषी, यज्ञकर्ता, जलविहारप्रिय, सुख कर्ता और योग्य स्थल में भ्रम व प्रसन्नता व्यक्त करने वाले होते हैं।

(६) कौबेर कायः—ये शुचिर्भूत, धर्मार्थपरायण, सुखविहारकर्ता, बहुपश्चिवार और योग्य स्थल में मानोपभोगाकांक्षी होते हैं। इनके राग व प्रसाद स्पष्ट होते हैं।

(७) गांधर्व कायः—ये नृत्य, गीत, वाद्य, स्तुति, कविता, कथा, इतिहास, पुराण इनमें कुशल होते हैं। इनको स्त्री, वस्त्राभूषण, फूल व सुगन्ध प्रिय रहते हैं। ये किसी से ईषां द्वेष नहीं रखते।

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आयुर्वेद दर्शन

राजसुसत्व, रोषाशयुक्त रहता है। यह दैत्य, राक्षस, पैशाच, सारंग, प्रेत, व शकुन इस तरह छः प्रकार का है। तदनुसारः—

(१) दैत्य कायः—ये शूर, भयंकर, परोक्षप्रसाहिण्य, ऐश्वर्यशाली, उग्र, निर्दय, बहुभोजी और आपमतलक्षी होते हैं।

(२) राक्षस कायः—ये क्रोधी, क्रूर, सुकृषड, मांसप्रिय, निद्रालु, छिद्रान्वेषी, मेहेनती व ईर्ष्यायुक्त होते हैं। अपमान या नीचापन इनको बिलकुल सहन नहीं होता।

(३) पैशाच कायः—ये महा आलसी, लंपट, स्त्रियों में बड़ी बड़ी बातें बनाने वाले, अपवित्र, पवित्रताद्वेषी, डर बताने वाले, किंतु डरपोक, सर्वभक्षी और अनाचारी होते हैं।

(४) सारंग कायः—ये क्रोधी, शूर, मिडर, क्रूर, तीखे मिजाज, ताडवाज, जासूस, झूठ समझने वाले और मितहाराविहार होते हैं।

(५) प्रेत कायः—ये सुकृषड, क्षुद्रस्वभाव, क्षुद्राचार, क्षुद्रोपचार, निंदक, स्वार्थी, अतिलोभी और हर काम में अयोग्य होते हैं।

(६) शकुन कायः—ये सदा वासनायुक्त, सदा खान-पान-रत, अतिधर चित्त, अपमानासहिण्य, उडाऊ, और धन-संचय न करने वाले होते हैं।

तामस सत्व में मोह का अंश रहता है। यह पशु, मत्स्य और चनस्वति इन तीन प्रकारों का रहता है। तदनुसारः—

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परिशिष्ट

२१५

(१) पशु कायः—ये झगडाड़, दरिद्रवेण, निर्दित आहाराविहार, अतिव्यभिचारी, और निद्राछ होते हैं।

(२) मात्स्य कायः—ये डरपोक, मूर्ख, भुक्खड, अस्थिर चित्त, सर्वदा कामक्रोध रत, भटकने वाले और जलप्रिय होते हैं।

(३) वनस्पति कायः—ये आलसी, सुक्खड, व हीन ज्ञानेन्द्रिय होते हैं।

उक्त सब प्रकार एक ही पुरुष में रह सकते हैं किन्तु एक समय में नहीं रह सकते। अभ्यास से इनमें परिवर्तन भी हो सकता है।