अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
सूक्त-४ देवता—अध्यात्म, व्रात्य
जो इस बात को जानता है, सभी प्राणी उस के मित्र हो जाते हैं। (११)
सूक्त-४ देवता—अध्यात्म, व्रात्य
तस्मै प्राच्या दिशः.
वासन्तौ मासौ गोप्तारावकुर्वन् बृहच्च रथन्तरं चानुष्ठातारौ.. (१-२)
देवताओं ने उस के लिए वसंत ऋतु के दो महीनों को पूर्व दिशा में रक्षक नियुक्त किया.
बृहत्साम और रथंतर को उस का अनुष्ठान करने वाला बनाया। (१-२)
वासन्तावेनं मासौ प्राच्या दिशो गोपायतो बृहच्च
रथन्तरं चानु तिष्ठतो य एवं वेद.. (३)
जो यह बात जानता है, वसंत ऋतु के दो महीने, पूर्व दिशा की ओर से उस की रक्षा
करते हैं. बृहत् साम और रथंतर उस के अनुकूल हो जाते हैं. (३)
तस्मै दक्षिणाया दिशः
ग्रैष्मौ मासौ गोप्तारावकुर्वन् यज्ञायज्ञियं च वामदेव्यं चानुष्ठातारौ.. (४-५)
दक्षिण दिशा की ओर देवताओं ने ग्रीष्म ऋतु के दो महीनों को उस का रक्षक बनाया
तथा यज्ञायज्ञिय और वामदेव्य को उस का अनुष्ठान करने वाला नियुक्त किया. (४-५)
ग्रैष्मावेनं मासौ दक्षिणाया दिशो गोपायतो यज्ञायज्ञियं च वामदेव्यं चानु
तिष्ठतो य एवं वेद.. (६)
जो इस बात को जानता है, दक्षिण दिशा की ओर से ग्रीष्म ऋतु के दो महीने उस की
रक्षा करते हैं तथा यज्ञायज्ञिय और वामदेव उस के अनुकूल होते हैं. (६)
तस्मै प्रतीच्या दिशः.. (७)
वार्षिकौ मासौ गोप्तारावकुर्वन् वैरूपं च वैराजं चानुष्ठातारौ.. (८)
देवताओं ने पश्चिम दिशा में वर्षा ऋतु के दो महीनों को उस का रक्षक नियुक्त किया
तथा वैरूप और वैराज को उस का अनुष्ठान करने वाला नियुक्त किया. (७-८)
वार्षिकावेनं मासौ प्रतीच्या दिशो गोपायतो वैरूपं च वैराजं चानु तिष्ठतो य
एवं वेद.. (९)
जो इस बात को जानता है, वह पश्चिम दिशा की ओर से वर्षा ऋतु के दो महीनों द्वारा
रक्षित रहता है तथा वैरूप और वैराज उस के अनुकूल रहते हैं. (९)
तस्मा उदीच्या दिशः.. (१०)
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शारदौ मासौ गोप्तारावकुर्वञ्छ्यैतं च नौधसं चानुष्ठातारौ.. (११)
देवताओं ने उत्तर दिशा की ओर से शरद ऋतु के दो महीनों को उस का रक्षक नियुक्त
किया तथा श्येत और नौधस को उस का अनुष्ठान करने वाला बनाया. (१०-११)
शारदावेनं मासावुदीच्या दिशो गोपायतः श्यैतं च नौधसं चानु तिष्ठतो य
एवं वेद.. (१२)
जो यह बात जानता है, उत्तर दिशा की ओर से उस की रक्षा शरद ऋतु के दो महीने
करते हैं तथा नौधस और श्येत उस के अनुकूल बन जाते हैं. (१२)
तस्मै ध्रुवाया दिशः.. (१३)
हैमनौ मासौ गोप्तारावकुर्वन् भूमिं चाग्निं चानुष्ठातारौ.. (१४)
देवताओं ने ध्रुव दिशा अर्थात् पृथ्वी की अथवा नीचे की ओर से हेमंत ऋतु के दो महीनों
को उस का रक्षक नियुक्त किया तथा पृथ्वी और अग्नि को उस का अनुष्ठान करने वाला
बनाया. (१३-१४)
हैमनावेनं मासौ ध्रुवाया दिशो गोपायतो भूमिश्चाग्निश्चानु तिष्ठतो य एवं
वेद.. (१५)
जो इस बात को जानता है, ध्रुव दिशा की ओर से हेमंत ऋतु के दो महीने उस पुरुष की
रक्षा करते हैं. पृथ्वी और अग्नि उस के अनुकूल हो जाते हैं. (१५)
तस्मा ऊर्ध्वाया दिशः.. (१६)
शैशिरौ मासौ गोप्तारावकुर्वन् दिवं चादित्यं चानुष्ठातारौ... (१७)
देवताओं ने ऊर्ध्व दिशा अर्थात् ऊपर की ओर से शिशिर ऋतु के दो महीनों को उस का
रक्षक नियुक्त किया और आकाश तथा सूर्य को उस का अनुष्ठान करने वाला बनाया.
(१६-१७)
शैशिरावेनं मासावूर्ध्वाया दिशो गोपायतो द्यौश्चादित्यश्चानु तिष्ठतो य एवं
वेद.. (१८)
जो इस बात को जानता है. वह ऊपर की दिशा की ओर से शिशिर ऋतु के दो महीनों
के द्वारा रक्षित होता है. आकाश तथा सूर्य उस के अनुकूल हो जाते हैं. (१८)
सूक्त-५ देवता—रुद्र
तस्मै प्राच्या दिशो अन्तर्देशाद् भवमिष्वासमनुष्ठातारमकुर्वन्.. (१)
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देवताओं ने पूर्व दिशा के कोने से उस की रक्षा के लिए धनुष धारण करने वाले भव
अर्थात् महादेव को उस का अनुष्ठान करने वाला बनाया. (१)
भव एनमिष्वासः प्राच्या दिशो अन्तर्देशादनुष्ठातानु तिष्ठति.
नैनं शर्वो न भवो नेशानः.. (२)
जो इस बात को जानता है, धनुष धारण करने वाले भव अर्थात् महादेव, शर्व, ईशान
उस के अनुकूल रहते हैं. (२)
नास्य पशून् न समानान् हिनस्ति य एवं वेद.. (३)
जो इसे जानता है, उस के अनुकूल रहने वाले पुरुषों और पशुओं की वे हिंसा नहीं
करते. (३)
तस्मै दक्षिणाया दिशो अन्तर्देशाच्छर्वमिष्वासमनुष्ठातारमकुर्वन्.. (४)
देवताओं ने दक्षिण दिशा की ओर से बाण चलाने वाले शर्व अर्थात् शिव को उस का
अनुष्ठान करने वाला बनाया. (४)
शर्व एनमिष्वासो दक्षिणाया दिशो अन्तर्देशादनुष्ठातानु तिष्ठति.
नैनं शर्वो न भवो नेशानः
नास्य पशून् न समानान् हिनस्ति य एवं वेद.. (५)
जो इस बात को जानता है, दक्षिण दिशा के कोण से शर्व, भव और ईशान उस के
अनुकूल रहते हैं. जो पुरुष और पशु उस के अनुकूल होते हैं. शर्व उन की हिंसा नहीं करते.
(५)
तस्मै प्रतीच्या दिशो अन्तर्देशात् पशुपतिमिष्वासमनुष्ठातारमकुर्वन्.. (६)
देवताओं ने पश्चिम दिशा के कोने से बाण फेंकने वाले पशुपति को उस का अनुष्ठान
करने वाला नियुक्त किया. (६)
पशुपतिरेनमिष्वासः प्रतीच्या दिशो अन्तर्देशादनुष्ठातानु तिष्ठति.
नैनं शर्वो न भवो नेशानः.
नास्य पशून् समानान् हिनस्ति य एवं वेद.. (७)
जो इस बात को जानता है, पशुपति पश्चिम दिशा के कोने से उस के अनुकूल रहते हैं.
जो पुरुष और पशु उस के अनुकूल होते हैं, पशुपति उन की हिंसा नहीं करते हैं. (७)
तस्मा उदीच्या दिशो अन्तर्देशादुग्रं देवमिष्वासमनुष्ठातारमकुर्वन्.. (८)
देवों ने पश्चिम दिशा के कोने से धनुष धारण करने वाले पशुपति को इस का अनुष्ठान
करने वाला बनाया. (८)
उग्र एनं देव इष्वास उदीच्या दिशो अन्तर्देशादनुष्ठातानु तिष्ठति
नैनं शर्वो न भवो नेशानः.
नास्य पशून् न समानान् हिनस्ति य एवं वेद.. (९)
देवों ने उत्तर दिशा के कोने से धनुष धारण करने वाले उग्रदेव को इस का अनुष्ठान करने
वाला बनाया. (९)
तस्मै ध्रुवाया दिशो अन्तर्देशाद् रुद्रमिष्वासमनुष्ठातारमकुर्वन्.. (१०)
जो इस बात को जानता है, धनुष धारण करने वाले उग्रदेव उत्तर दिशा के कोने से इस
के पक्ष में रहते हैं, शर्व, भव और ईशान उसे हानि नहीं पहुंचाते. जो पुरुष और पशु इस के
अनुकूल होते हैं, उग्रदेव उन की हिंसा नहीं करते. (१०)
रुद्र एनमिष्वासो ध्रुवाया दिशो अन्तर्देशादनुष्ठातानु तिष्ठति
नैनं शर्वो न भवो नेशानः
नास्य पशून् न समानान् हिनस्ति य एवं वेद.. (११)
ध्रुव दिशा के कोने से देवों ने धनुष धारण करने वाले रुद्र को इस का अनुष्ठान करने
वाला बनाया है. (११)
तस्मा ऊर्ध्वाया दिशो अन्तर्देशान्महादेवमिष्वासमनुष्ठातारमकुर्वन्.. (१२)
बाण धारण करने वाले रुद्र ध्रुव दिशा में इस की रक्षा करते हैं. जो इस बात को जानता
है, शर्व, भव और ईशान उसे हानि नहीं पहुंचाते. जो मनुष्य और पशु इस के अनुकूल होते हैं.
रुद्र उन की हिंसा नहीं करते. (१२)
महादेव एनमिष्वास ऊर्ध्वाया दिशो अन्तर्देशादनुष्ठातानु तिष्ठति.
नैनं शर्वो न भवो नेशानः.
नास्य पशून् न समानान् हिनस्ति य एवं वेद.. (१३)
देवताओं ने ऊपर की दिशा के कोने से धनुष धारण करने वाले महादेव को तेरा
अनुष्ठान करने वाला नियुक्त किया. जो इस बात को जानता है, महादेव ऊपर की दिशा के
कोने से उस की रक्षा करते हैं. जो पुरुष और पशु इस के अनुकूल होते हैं, उन की महादेव
हिंसा नहीं करते हैं. (१३)
तस्मै सर्वेभ्यो अन्तर्देशेभ्य ईशानमिष्वासमनुष्ठातारमकुर्वन्.. (१४)
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देवताओं ने उस की सभी दिशाओं के कोनों से रक्षा करने के लिए धनुष धारण करने
वाले ईशान को अनुष्ठान करने वाला नियुक्त किया. (१४)
ईशान एनमिष्वासः सर्वेभ्यो अन्तर्देशेभ्यो ऽ नुष्ठातानु तिष्ठति नैनं
शर्वो न भवो नेशानः.. (१५)
नास्य पशून् न समानान् हिनस्ति य एवं वेद.. (१६)
जो इस बात को जानता है, ईशान उस की सभी दिशाओं के कोनों से रक्षा करते हैं. जो
पुरुष एवं पशु उस के अनुकूल होते हैं, ईशान भव और शर्व उन की हिंसा नहीं करते.
(१५-१६)
सूक्त-६ देवता—अध्यात्म, व्रात्य
स ध्रुवां दिशमनु व्यचलत्.. (१)
वह व्रात्य ध्रुव दिशा की ओर चल पड़ा. (१)
तं भूमिश्चाग्निश्चौषधयश्च वनस्पतयश्च वानस्पत्याश्च वीरुधश्चानुव्य चलन्..
(२)
पृथ्वी, अग्नि, ओषधि, वनस्पति तथा ओषधियां उस के पीछे चले. (२)
भूमेरश्च वै सो ३ ग्नेश्चौषधीनां च वनस्पतीनां च वानस्पत्यानां च
वीरुधां च प्रियं धाम भवति य एवं वेद.. (३)
जो इस बात को जानता है, वह पृथ्वी, अग्नि, ओषधि एवं वनस्पतियों का प्रिय होता है.
(३)
स ऊर्ध्वां दिशमनु व्यचलत्.. (४)
वह ऊपर की दिशा की ओर चला. (४)
तमृतं च सत्यं च सूर्यश्च चन्द्रश्च नक्षत्राणि चानुव्यचलन्.. (५)
ऋतु, सत्य, सूर्य, चंद्र और नक्षत्र उस के पीछे चले. (५)
ऋतस्य च वै स सत्यस्य च सूर्यस्य च चन्द्रस्य च नक्षत्राणां च
प्रियं धाम भवति य एवं वेद.. (६)
जो इस बात को जानता है वह सूर्य, चंद्रमा तथा नक्षत्र का प्रिय स्थान होता है. (६)
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स उत्तमां दिशमनु व्यचलत्.. (७)
वह उत्तर दिशा की ओर चला. (७)
तमृचश्च सामानि च यजूंषि च ब्रह्म चानुव्यचलन्.. (८)
साम, यजु, ऋचाएं और ब्रह्म उस के पीछे चले. (८)
ऋचां च वै स साम्नां च यजुषां च ब्रह्मणश्च प्रियं धाम भवति य एवं वेद..
(९)
जो इस बात को जानता है, वह साम, यजु, ऋचा और ब्रह्म का प्रिय धाम होता है. (९)
स बृहतीं दिशमनु व्यचलत्.. (१०)
उस ने बृहती दिशा में गमन किया. (१०)
तमितिहासश्च पुराणं च गाथाश्च नाराशंसीश्चानुव्य चलन्.. (११)
पुराण, इतिहास तथा मनुष्यों की प्रशंसात्मक गाथाएं उस के पीछेपीछे चलीं. (११)
इतिहासस्य च वै स पुराणस्य च गाथानां च नाराशंसीनां च
प्रियं धाम भवति य एवं वेद.. (१२)
इस बात को जो जानता है, वह पुराण, इतिहास तथा गाथाओं का प्रिय धाम बनता है.
(१२)
स परमां दिशमनु व्यचलत्.. (१३)
उस ने परम दिशा की ओर प्रस्थान किया. (१३)
तमाहवनीयश्च गार्हपत्यश्च दक्षिणाग्निश्च यज्ञश्च यजमानश्च पशवश्चानुव्य
चलन्.. (१४)
आहवनीय, गार्हपत्य तथा दक्षिण अग्नियां उस के पीछेपीछे चलीं. (१४)
आहवनीयस्य च वै स गार्हपत्यस्य च दक्षिणाग्नेश्च यज्ञस्य च यजमानस्य च पशूनां च
प्रियं धाम भवति य एवं वेद.. (१५)
जो इस बात को जानता है, आहवनीय, गार्हपत्य और दक्षिण नाम की अग्नियों का वह
प्रिय धाम बनता है. (१५)
सो ऽ नादिष्टां दिशमनु व्यचलत्.. (१६)
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वह अनादिष्ट दिशा की ओर चल पड़ा. (१६)
तमृतवश्चार्तवाश्च लोकाश्च लौक्याश्च मासाश्चार्धमासाश्चाहोरात्रे चानुव्य
चलन्.. (१७)
ऋतुएं, पदार्थ, लोक, मास, पक्ष, दिवस और रात्रि उस के पीछेपीछे चलने लगे. (१७)
ऋतूनां च वै स आर्तवानां च लोकानां च लौक्यानां च मासानां चार्धमासानां
चाहोरात्रयोश्च प्रियं धाम भवति य एवं वेद.. (१८)
जो इस बात को जानता है, वह पुरुष ऋतुओं, पदार्थों, लोक, मासों, पक्षों, दिवसों और
रात्रियों का प्रिय धाम बनता है. (१८)
सो ऽ नावॄत्तां दिशमनु व्यचलत् ततो नावत्स्यैन्नमन्यत.. (१९)
वह अनावृत दिशा की ओर चला. (१९)
तं दितिश्चादितिश्चेडा चेन्द्राणी चानुव्यचलन्.. (२०)
इडा, इंद्राणी, दिति और अदिति उस के पीछेपीछे चलीं. (२०)
दितेश्च वै सो ऽ दितेश्चेडायाश्चेन्द्राण्याश्च प्रियं धाम भवति य एवं वेद..
(२१)
जो इस बात को जानता है. वह पुरुष इडा, इंद्राणी, दिति और अदिति का प्रिय धाम
बनता है. (२१)
स दिशो ऽ नु व्य चलत् तं विराडनु व्यचलत् सर्वे च देवाः सर्वाश्च देवताः..
(२२)
उस ने दिशाओं की ओर गमन किया. विराट्, अदिति देव और देवता उस के पीछेपीछे
चलने लगे. (२२)
विराजश्च वै स सर्वेषां च देवानां सर्वासां च देवतानां. प्रियं धाम भवति य
एवं वेद.. (२३)
जो इस बात को जानता है, वह विराट और सभी देवों का प्रिय धाम होता है. (२३)
स सर्वानन्तर्देशाननु व्यचलत्.. (२४)
वह सभी अंतर्दिशाओं की ओर चला. (२४)
तं प्रजापतिश्च परमेष्ठी च पिता च पितामहश्चानुव्यचलन्.. (२५)
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