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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

Page 746 of 1063

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Page 746

वह अनादिष्ट दिशा की ओर चल पड़ा. (१६)
तमृतवश्चार्तवाश्च लोकाश्च लौक्याश्च मासाश्चार्धमासाश्चाहोरात्रे चानुव्य
चलन्.. (१७)
ऋतुएं, पदार्थ, लोक, मास, पक्ष, दिवस और रात्रि उस के पीछेपीछे चलने लगे. (१७)
ऋतूनां च वै स आर्तवानां च लोकानां च लौक्यानां च मासानां चार्धमासानां
चाहोरात्रयोश्च प्रियं धाम भवति य एवं वेद.. (१८)
जो इस बात को जानता है, वह पुरुष ऋतुओं, पदार्थों, लोक, मासों, पक्षों, दिवसों और
रात्रियों का प्रिय धाम बनता है. (१८)
सो ऽ नावॄत्तां दिशमनु व्यचलत् ततो नावत्स्यैन्नमन्यत.. (१९)
वह अनावृत दिशा की ओर चला. (१९)
तं दितिश्चादितिश्चेडा चेन्द्राणी चानुव्यचलन्.. (२०)
इडा, इंद्राणी, दिति और अदिति उस के पीछेपीछे चलीं. (२०)
दितेश्च वै सो ऽ दितेश्चेडायाश्चेन्द्राण्याश्च प्रियं धाम भवति य एवं वेद..
(२१)
जो इस बात को जानता है. वह पुरुष इडा, इंद्राणी, दिति और अदिति का प्रिय धाम
बनता है. (२१)
स दिशो ऽ नु व्य चलत् तं विराडनु व्यचलत् सर्वे च देवाः सर्वाश्च देवताः..
(२२)
उस ने दिशाओं की ओर गमन किया. विराट्, अदिति देव और देवता उस के पीछेपीछे
चलने लगे. (२२)
विराजश्च वै स सर्वेषां च देवानां सर्वासां च देवतानां. प्रियं धाम भवति य
एवं वेद.. (२३)
जो इस बात को जानता है, वह विराट और सभी देवों का प्रिय धाम होता है. (२३)
स सर्वानन्तर्देशाननु व्यचलत्.. (२४)
वह सभी अंतर्दिशाओं की ओर चला. (२४)
तं प्रजापतिश्च परमेष्ठी च पिता च पितामहश्चानुव्यचलन्.. (२५)
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