पत्ता बोला वृक्ष से, सुनो वृक्ष बनराय अब के बिछुड़े ना मिलै, दूर पड़ेंगे जाय
गिरता पत्ता पेड़ से कहता है कि इस बार बिछुड़े तो फिर नहीं मिलेंगे, हम बहुत दूर जा पड़ेंगे। यह जीवन का अवसर लौटकर नहीं आता।
पंद्रहवीं सदी के संत कवि। उनकी साखियाँ, सबद और रमैनी गुरु-भक्ति, सच्चे प्रेम और पाखंड के विरोध की सीख देती हैं।
पत्ता बोला वृक्ष से, सुनो वृक्ष बनराय अब के बिछुड़े ना मिलै, दूर पड़ेंगे जाय
गिरता पत्ता पेड़ से कहता है कि इस बार बिछुड़े तो फिर नहीं मिलेंगे, हम बहुत दूर जा पड़ेंगे। यह जीवन का अवसर लौटकर नहीं आता।
कबीर मन निर्मल भया, जैसा गंगा नीर पाछै लागा हरि फिरै, कहत कबीर कबीर
जब मन गंगाजल जैसा निर्मल हो गया, तो प्रभु स्वयं कबीर-कबीर पुकारते हुए पीछे चलने लगे। शुद्ध मन से भगवान स्वयं पास आते हैं।
कबीरा संगत साधु की, हरै और की व्याधि संगत बुरी असाधु की, आठों पहर उपाधि
सज्जन की संगति दूसरों के दुख भी हर लेती है, जबकि दुष्ट की संगति आठों पहर उपद्रव ही देती है।
कबीर संगत साधु की, ज्यों गंधी की बास जो कुछ गंधी दे नहीं, तो भी बास सुबास
सज्जन की संगति इत्र बेचने वाले के पास बैठने जैसी है। वह कुछ न भी दे, तब भी उसकी सुगंध मन को सुवासित कर देती है।
जहाँ दया तहाँ धर्म है, जहाँ लोभ तहाँ पाप जहाँ क्रोध तहाँ काल है, जहाँ क्षमा तहाँ आप
जहाँ दया है वहाँ धर्म है, जहाँ लोभ है वहाँ पाप है। जहाँ क्रोध है वहाँ विनाश है और जहाँ क्षमा है वहाँ स्वयं प्रभु हैं।
साँच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप जाके हिरदै साँच है, ताके हिरदै आप
सत्य के बराबर कोई तप नहीं और झूठ के बराबर कोई पाप नहीं। जिसके हृदय में सत्य है, उसके हृदय में स्वयं प्रभु रहते हैं।
सुख में सुमिरन ना किया, दुख में किया याद कह कबीर ता दास की, कौन सुने फरियाद
जिसने सुख में प्रभु को याद नहीं किया और केवल दुख में याद किया, उसकी फरियाद कौन सुनेगा?
शीलवन्त सबसे बड़ा, सब रतनन की खान तीन लोक की सम्पदा, रही शील में आन
शीलवान, यानी अच्छे आचरण वाला व्यक्ति सबसे बड़ा है। अच्छा आचरण सब रत्नों की खान है; तीनों लोकों की संपदा उसमें समाई है।
रात गँवाई सोय के, दिवस गँवाया खाय हीरा जन्म अमोल सा, कौड़ी बदले जाय
रातें सोने में और दिन खाने में गँवा दिए। हीरे जैसा अनमोल मनुष्य जन्म कौड़ी के भाव जा रहा है।
मन के हारे हार है, मन के जीते जीत कहै कबीर हरि पाइए, मन ही की परतीत
मन से हार मान लो तो हार है और मन से जीत लो तो जीत है। प्रभु भी मन के विश्वास से ही मिलते हैं।
काँकर पाथर जोरि कै, मस्जिद लई बनाय ता चढ़ि मुल्ला बाँग दे, क्या बहरा हुआ खुदाय
कंकड़-पत्थर जोड़कर मस्जिद बना ली और उस पर चढ़कर मुल्ला ज़ोर से अज़ान देता है। क्या खुदा बहरा है? ईश्वर तक पहुँचने के लिए शोर नहीं, सच्चा मन चाहिए।
पाहन पूजे हरि मिलैं, तो मैं पूजूँ पहार ताते ये चाकी भली, पीस खाय संसार
पत्थर पूजने से हरि मिलते तो मैं पूरा पहाड़ पूज लेता। उससे तो घर की चक्की भली है, जिसका पिसा आटा संसार खाता है। कबीर दिखावे की पूजा पर चोट करते हैं।
ज्यों नैनन में पूतली, त्यों मालिक घट माहिं मूरख लोग न जानहिं, बाहर ढूँढन जाहिं
जैसे आँख में पुतली है, वैसे ही प्रभु हृदय में बसते हैं। मूर्ख लोग यह नहीं जानते और उन्हें बाहर ढूँढते फिरते हैं।
कबीरा गर्व न कीजिए, कबहूँ न हँसिए कोय अजहूँ नाव समुद्र में, ना जानौं का होय
कभी घमंड न करो और किसी की हँसी न उड़ाओ। तुम्हारी नाव अभी समुद्र में है, पता नहीं आगे क्या हो।
करता था तो क्यूँ रहया, अब करि क्यूँ पछिताय बोवै पेड़ बबूल का, आम कहाँ ते खाय
जब बुरे काम कर रहे थे तब क्यों नहीं रुके, अब क्यों पछताते हो? बबूल का पेड़ बोकर आम कहाँ से खाओगे।
कबीर सूता क्या करै, जागि न जपै मुरारि एक दिनाँ भी सोवणाँ, लंबे पाँव पसारि
हे मन, सोकर क्या करेगा? जागकर प्रभु का नाम जप। एक दिन तो पाँव पसारकर हमेशा के लिए सोना ही है।
लूट सके तो लूट ले, राम नाम की लूट पाछे फिर पछताओगे, प्राण जाहिं जब छूट
राम नाम का खज़ाना खुला है, जितना लूट सको लूट लो। प्राण छूट जाने के बाद पछताने से कुछ नहीं होगा।
सतगुरु की महिमा अनंत, अनंत किया उपगार लोचन अनंत उघाड़िया, अनंत दिखावणहार
सतगुरु की महिमा अनंत है और उनके उपकार भी अनंत हैं। उन्होंने ज्ञान की आँखें खोलकर अनंत प्रभु के दर्शन करा दिए।
कबिरा ते नर अंध हैं, गुरु को कहते और हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रूठे नहिं ठौर
वे लोग अंधे हैं जो गुरु को साधारण समझते हैं। भगवान रूठें तो गुरु शरण देते हैं, पर गुरु रूठ जाएँ तो कहीं ठिकाना नहीं।
गुरु बिन ज्ञान न उपजै, गुरु बिन मिलै न मोष गुरु बिन लखै न सत्य को, गुरु बिन मिटै न दोष
गुरु के बिना न ज्ञान होता है, न मोक्ष मिलता है। गुरु के बिना न सत्य दिखता है और न दोष मिटते हैं।
यह तन विष की बेलरी, गुरु अमृत की खान सीस दिये जो गुरु मिलै, तो भी सस्ता जान
यह शरीर विष की बेल जैसा है और गुरु अमृत की खान हैं। सिर देकर भी सच्चा गुरु मिल जाए तो यह सौदा सस्ता है।
गुरु कुम्हार शिष कुंभ है, गढ़ि गढ़ि काढ़ै खोट अन्तर हाथ सहार दै, बाहर बाहै चोट
गुरु कुम्हार है और शिष्य घड़ा। जैसे कुम्हार भीतर से हाथ का सहारा देकर बाहर से चोट करता है, वैसे ही गुरु प्रेम से सँभालते हुए शिष्य की कमियाँ दूर करता है।
सब धरती कागद करूँ, लेखनी सब बनराय सात समुद्र की मसि करूँ, गुरु गुन लिखा न जाय
पूरी धरती को कागज़, सारे वनों को कलम और सातों समुद्रों को स्याही बना लूँ, तब भी गुरु के गुण पूरे नहीं लिखे जा सकते।
जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाहिं प्रेम गली अति साँकरी, तामें दो न समाहिं
जब तक अहंकार था, तब तक हरि नहीं मिले; अहंकार मिटा तो हरि मिल गए। प्रेम की गली इतनी सँकरी है कि उसमें 'मैं' और प्रभु दोनों नहीं समा सकते।