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सर्वकोश
“गुरु कुम्हार शिष कुंभ है, गढ़ि गढ़ि काढ़ै खोट” — कबीर

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कबीर के दोहे

गुरु कुम्हार शिष कुंभ है, गढ़ि गढ़ि काढ़ै खोट अन्तर हाथ सहार दै, बाहर बाहै चोट

अर्थ

गुरु कुम्हार है और शिष्य घड़ा। जैसे कुम्हार भीतर से हाथ का सहारा देकर बाहर से चोट करता है, वैसे ही गुरु प्रेम से सँभालते हुए शिष्य की कमियाँ दूर करता है।

रोमन अक्षरों में

guru kumhaar shish kumbh hai, gadhi gadhi kaadhai khot antar haath sahaar dai, baahar baahai chot

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