कबीर के दोहे
पढ़ि पढ़ि के पत्थर भया, लिख लिख भया जु ईंट कहे कबीरा प्रेम की, लगी न एको छींट
अर्थ
पढ़-पढ़कर मन पत्थर हो गया और लिख-लिखकर ईंट जैसा कठोर हो गया, पर उस पर प्रेम की एक छींट भी नहीं पड़ी।
रोमन अक्षरों में
padhi padhi ke patthar bhaya, likh likh bhaya ju int kahe kabira prem ki, lagi na eko chhint
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