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योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३२५
त्रैलोक्यमोहनादिचक्रत्रये वैखरीमयतावासनामुक्त्वा सर्वसौभाग्यदायकादि-
चक्रत्रये भूतलिपिमध्यमामयवासनामाह—
उन्मेषशक्तिप्रसरैरिरिच्छाशक्तिप्रधानकैः ॥१३६॥
तथैवा¹कुलसंघट्टरुपवर्णचतुष्टयैः ।
वेद्योष्मरूपसौ²द्यर्णमिश्रेच्छाभावितैरपि ॥१३७॥
कुलशक्तिसमावेशरूपवर्णद्वयान्वितैः ।
किया जाता है और उसके विशेषण के रूप में 'भाविवर्णोत्पत्ति' इस समस्त पद को जोड़
दिया जाता है ॥ १३५-१३६ ॥
त्रैलोक्यमोहन आदि तीन चक्रों में वैखरी वर्णों की वासना (भावना) बताई गई है,
अब सर्वसौभाग्यदायक आदि तीन चक्रों में भूतलिपिमय मध्यमा वाणी के वर्णों की वासना
बताते हैं—
अकुलसंघट्टरूप, इच्छाशक्ति प्रधान और उन्मेष शक्ति रूप तीन वर्णों से
और इनके प्रसार रूप चार वर्णों से, मिश्रेच्छाभावित दो वर्णों से, वेद्योष्म रूप
हकार आदि वर्णों से और कुलशक्तिसमावेश रूप दो वर्णों से ¹भूतलिपि के
चतुर्दश वर्णात्मक तीन वर्ग बनते हैं ॥ १३६-१३७ ॥
१. तदेवा-क. ग. । २. सावर्णै-ख. ग. ज. ।

  1. शारदातिलक (७।१-४) के आधार पर ९ वर्ग और ४२ वर्ण वाली भूतलिपि
    का क्रम इस प्रकार बनता है—
    अ इ उ ऋ ऌ प्रथम वर्ग
    ए ऐ ओ औ द्वितीय वर्ग
    ह य र ल व तृतीय वर्ग
    ङ क ख घ ग चतुर्थ वर्ग
    ञ च छ झ ज पंचम वर्ग
    ण ट ठ ढ ड षष्ठ वर्ग
    न त थ ध द सप्तम वर्ग
    म प फ भ ब अष्टम वर्ग
    श ष स नवम वर्ग
    कामकलाविलास की चिद्वल्ली टीका (पृ० ५०) में भूतलिपि पद का अर्थ मिलता है ।
    योगिनीहृदय के प्रस्तुत प्रकरण में मनुकोण, दशारद्वय तथा वसुकोण चक्रों में इस भूतलिपि
    का विन्यास-क्रम बताया गया है । कामकलाविलास (श्लोक २७-३१) में भी यह विषय
    देखा जा सकता है¹।

३२६ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः
अकुलसंघट्टरूपैः । अकुलं ब्रह्मारन्ध्राधोमुखसितसहस्रदलकमलम्, तत्र-
स्थोऽकारः “अकारः सर्ववर्णाग्र्यः प्रकाशः परमः शिवः” इति¹ संकेतपद्धत्युक्तोऽकारः
परमशिवात्मकोऽकुलशब्देन लक्ष्यते । तेन संघट्टः संबन्धः, ²तद्रूपैः । इच्छाशक्ति-
प्रधानकैः । इच्छाशक्तिरिकारः । उन्मेषशक्तिप्रसरैः । उन्मेषशक्तिरुकारः । तदुक्तं
परापञ्चाशिकायाम्—
अनुत्तरेच्छे³ उन्मेष आनन्देशनमूनता ।
क्रियेच्छाज्ञानशक्तीनां सत्ता चोच्छूनता च षट् ।। (श्लो० ३२) इति ।
कोऽर्थः ? मूलोत्थिताया इच्छाशक्तेः ⁴कुलकुण्डलिन्या अकुलस्थेन अकारेण संघट्टे
सत्येकारो जायते । ⁵तस्यैवोन्मेषशक्तिसंघट्टे सत्योकारो जायते । तयोरेवाऽकुल-
ब्रह्मारन्ध्र स्थित अधोमुख श्वेत सहस्रदल कमल को अकुल कहा जाता है । इस कमल
में विद्यमान अकार भी अकुल कहलाता है । संकेतपद्धति के अनुसार यह अकार प्रकाशा-
त्मक परम शिव है और सभी वर्णों का आदि कारण है, अतः यह भी अकुल शब्द से लक्षित
होता है । आगे बताये गये सभी वर्ण इससे संबद्ध है । अकार के बाद इन वर्णों में इच्छा
शक्ति स्वरूप इकार की प्रधानता रहती है और इसके बाद उन्मेष शक्ति स्वरूप उकार
का प्रसार होता है । परापंचाशिका में बताया गया है—
क्रिया, इच्छा और ज्ञान शक्ति की की ¹सत्ता से अनुत्तर (अकार), इच्छा (इकार)
और उन्मेष (उकार) की तथा उच्छूनता (अंकुरण) से आनन्द (आकार), ईशन (ईकार)
और ऊनता (ऊकार) इन छः वर्णों की सृष्टि होती है ॥
ऊपर बताये गये छः वर्णों के बाद चार सन्ध्यक्षरों की उत्पत्ति का क्रम इस प्रकार है—
मूलाधार से उठी कुलकुण्डलिनी रूप इच्छाशक्ति (इकार) का जब अकुल स्थित अकार
से संघट्ट होता है, तो इससे एकार की उत्पत्ति होती है । उसी अकार का उन्मेष शक्ति
(उकार) से संघट्ट होता है, तो ओकार की उत्पत्ति होती है । बाद में इन एकार और
ओकार का अकुल (अकार) से संघट्ट होने पर ऐकार और औकार इन दो स्वरों की
१. त्युक्तरीत्या-क. ग. उ. । २. 'तद्रूपैः''''शक्तिरुकारः' नास्ति-ख. ने. ब. उ. ।
३. च्छा उन्मेषाः-क. । ४. कुलाकुल-ने. उ. । ५. उन्मेषशक्तिरूपायास्तस्या एवाकुल-
संघट्टे-ख. ने. ज. झ. उ. ।

  1. सौभाग्यसुधोदय (१।१८-१९) में सत्ता को शिव का तथा उद्रेक को शक्ति का प्रतीक
    माना गया है । वामा, ज्येष्ठा और रौद्री शक्तियाँ सत्ता के अंश है । इनसे क्रमशः अकार,
    इकार, उकार की अभिव्यक्ति होती है । इच्छा, ज्ञान और क्रिया शक्तियाँ उद्रेक के अंश
    हैं । इनसे क्रमशः आकार, ईकार, ऊकार की अभिव्यक्ति होती है । तदनुसार परापंचाशिका
    में भी इच्छा, ज्ञान और क्रिया शब्द से उपलक्षण के रूप में वामा, ज्येष्ठा और रौद्री
    का भी ग्रहण कर लेना चाहिये ।

तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३२७
संघट्टे सत्येकारैकौकारौ जायेते इत्यर्थः । तदुक्तं परापञ्चाशिकायाम्—
अनुत्तरानन्दशवती इच्छाशक्तौ नियोजिते ।
त्रिकोणमय षट्कोणमिच्छायां रूढिमा गते ॥ (श्लो० २४) इति,
ते एवोन्मेषयोगेन क्रियाशवितस्फुटं वपुः ।
उक्तं शक्तित्रिसंघट्टत्रिशूलं द्वैतघस्मरम् ॥ (श्लो० ३५-३६) इति च ।
मिश्रेच्छाभावितैरपि
इच्छेशनान्तरारूढाः स्फुटास्फुटजगन्मयाः ।
चत्वारः २परतो वर्णाः षण्ढात्मानः प्रचोदिताः ॥ (श्लो० ३३)
निष्पत्ति होती है । संघट्ट (सन्धि) से उत्पन्न होने के कारण ये चार स्वर १सन्ध्यक्षर
कहलाते हैं । परापंचाशिका में यह विषय इस तरह से वर्णित है—
अनुत्तर (अकार) और आनन्द (आकार) शक्ति जब इच्छा शक्ति (इकार) से नियो-
जित होती हैं, तो क्रमशः त्रिकोण (एकार) और षट्कोण (ऐकार) का स्वरूप स्पष्ट हो
उठता है । उन्हीं अनुत्तर (अकार) और आनन्द (आकार) शक्तियों का उन्मेष शक्ति
(उकार) से योग होने पर क्रमशः ओकार और तीन शक्तियों के संघट्ट स्वरूप औकार
की निष्पत्ति होती है । यह त्रिशूल (औकार) सारे द्वैतप्रपंच को भस्म कर देने वाला है ॥
मिश्रेच्छाभावित शब्द का अर्थ भी परापंचाशिका की सहायता से जाना जा सकता
है । वहाँ बताया गया है—
२इच्छा और ईशन के मध्य में आरूढ, स्फुट और अस्फुट (मिश्रित) स्वरूप वाले
आगे के चार वर्ण षण्ढ कहे जाते हैं ॥
१. शक्ती-ख. ने. ज. झ., शक्तेः-मु. । २. पुरतो-ख. ने. ज. झ. उ. ।
१. चार सन्ध्यक्षरों के उत्पत्तिक्रम की तुलना सौभाग्यसुधोदय (१।२२-२३) तथा
तन्त्रालोक (३।९३-९७) से कीजिये । ओकार की त्रिशूलता की उपपत्ति तन्त्रालोक
(३।१०४-१०५) में बताई गई है ।
२. सौभाग्यसुधोदय (१।२०-२१) में चार षण्ढ स्वरों की उत्पत्ति की प्रक्रिया स्पष्ट
की गई है । तदनुसार प्रकाशात्मक अकार का स्वरूप धारण करने वाला परप्रमाता आदि-
शिव अपनी विमर्श शक्ति को जगा कर जब इच्छाशक्ति के सहारे सारे जगत् की सृष्टि
करना चाहता है, तो उस समय उसमें ईशन शक्ति का उदय होने लगता है । इच्छा-
शक्ति के उन्मेष के बाद और ईशन शक्ति के उन्मेष से पहले, अर्थात् दोनों की अन्तराल
अवस्था में मिश्रित स्वरूप वाले चार स्वरों की निष्पत्ति होती है । इनमें ह्रस्व स्वरों क
अभिव्यक्ति में इच्छा (इकार) का और दीर्घ स्वरों की अभिव्यक्ति में ईशन (ईकार) का
योगदान रहता है । शिक्षा ग्रन्थों और व्याकरण शास्त्र में वर्णों के उच्चारण के स्थानों का
वर्णन मिलता है । वहाँ भी इकार और उकार के उच्चारण स्थान के बीच में ऋकार
और ऌकार का स्थान माना गया है ।

३२८ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः
इति परापञ्चाशिकोक्तरीत्याऽकुलेशानाभ्यां मिश्रेण भाविताः षण्ढात्मानः स्थूल-
वर्णाः, तैरपि । तत्र ह्रस्वद्वयमेव ग्राह्यम् । अत एवाऽकुल एको वर्णः, इच्छात्मको
द्वितीयः, उन्मेषोऽपरः, परं षण्ढं ह्रस्वद्वयं च, एकार-ऐकार-ओकार-औकाराश्चेति
नव स्वरा भवन्ति । वेद्योष्मरूपसाद्यवर्णैः१
सत्तावाचिनि बीजे तु सादिमायान्तिमं जगत् ।
विलुप्तप्रत्ययाकारमेवैतत् परिशिष्यते ॥ (श्लो० ४४)
इति परापञ्चाशिकोक्तरीत्या वेद्यस्य षट्त्रिंशत्तत्त्वात्मनः संकल्परूपा ऊष्माणः,
“शषसहा ऊष्माणः” इति तन्त्रान्तरवचनात् । एवम्भूतः स आदियस्य हकारस्य
स एव वेद्योष्मरूपसादिर्हंकारः, तदाद्यवर्णैः । अत्रैक आदिशब्दोऽध्याहार्यः । कुल-
शक्तिसमावेशरूपवर्णद्वयान्वितैः । कुलशक्तिः कुण्डलिनी, तस्याः समावेश उदय-
विश्रान्तिस्थानद्वयम् आधारब्रह्मरन्ध्रमयम्, तद्रूपं वर्णद्वयं लकारवकारात्मकम् ।
इस तरह से अकुल और ईशान के मिश्रण से षण्ढ संज्ञा वाले चार स्थूल वर्णों (ऋ
ॠ ऌ ॡ) की उत्पत्ति होती है । उनमें से यहाँ दो ह्रस्व वर्णों का ग्रहण होता है । इस
तरह से यहाँ पहला वर्ण अकुल (अकार), दूसरा इच्छात्मक इकार और तीसरा उन्मेष
(उकार) है, इसके बाद षण्ढ अक्षरों में से ह्रस्व ऋकार और ऌकार तथा इसके बाद
एकार, ऐकार, ओकार, औकार—ये नौ स्वर यहाँ गृहीत होते हैं । इसके बाद वेद्योष्मरूप
सादि (हकार आदि) वर्णों की स्थिति मानी जाती है । परापंचाशिका में ही बताया
गया है—
सत्तावाचक बीज सकार में हकार से १ककार पर्यन्त सारा जगत् छिपा हुआ है ।
इसमें सत्तावाचक सकार ही बचा रहता है, बाकी सब इसी में विलीन हो जाते हैं ॥
तदनुसार छत्तीस तत्त्व वाले इस वेद्य जगत् के संकल्प स्वरूप हैं ऊष्म वर्ण । व्याक-
रण शास्त्र में श ष स ह ये चार अक्षर ऊष्म कहे जाते हैं । वेद्योष्म रूप सादि वर्ण यहाँ
हकार है, क्योंकि सकार उस हकार के आदि में है। सादि शब्द से हकार का ग्रहण
हो जाता है । पुनः यहाँ आदि पद का अध्याहार कर हकारादि अर्थ करना पड़ता है ।
इनके साथ कुलशक्ति समावेश रूप दो वर्णों की और स्थिति रहती है । कुलशक्ति का
अर्थ है कुण्डलिनी । उसके समावेश के, अर्थात् उदय और विश्रान्ति के दो स्थान हैं—
आधार और ब्रह्मरन्ध्र । कुलशक्ति का उदय लकार और विश्रान्ति वकार में होती है ।
१. सावर्णैः—ख. ग. ज. ।

  1. तन्त्राभिधान (पृ० ३५-४०) में संगृहीत मातृकानिघण्टु (श्लो० १९) में माय
    शब्द से ककार का ग्रहण किया गया है ।

तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३२९
"आधारपङ्कजं पीतं चतुष्पत्रं सुकेसरम्" इत्यादिना "पार्थिवं पङ्कजं ह्येतत्"
इत्यन्तेन स्वच्छन्दसंग्रहोक्तरीत्याऽऽधारपङ्कजस्य पार्थिवात्मकतया लकारः ।
ब्रह्मरन्ध्रे १यवादूर्ध्वं कुलपद्मं महेश्वरि ।
श्वेतं सुकेसरोपेतं सहस्रारमधोमुखम् ॥
३इत्यादिना
व्यापिनी ४केवला शक्तिरमृत्यौघप्रवर्षिणी ।
इत्यन्तेन स्वच्छन्दसंग्रहोक्तरीत्याऽमृतमयो वकारः । एतद्वर्णद्वयान्वितैः । कोऽर्थः ?
कुलशक्तेरिच्छात्मिकायाः कुण्डलिन्या उन्मेषात् षट्चक्रपञ्चगगनद्वादशग्रन्थिभेद-
क्रमेणाकुलसमावेशाद् अ इ उ ऋ ऌ ए ऐ ओ औ ह य र व ल इति वर्ण-
चतुर्दशकमुत्पद्यते । तदुक्तमागमान्तरे५ भूतलिप्युद्धारप्रसङ्गे—"पञ्च ह्रस्वाः

स्वच्छन्दसंग्रह में आधार पंकज पीत वर्ण, चार पत्र और सुकेसर वाला बताया गया है
और कहा गया है कि यह पंकज पार्थिव है। इसके लिये इसका बीज लकार है। स्वच्छन्द-
संग्रह के ही—
हे महेश्वरि ! ब्रह्मरन्ध्र में एक जौ ऊपर १कुल पद्म है, यह श्वेत वर्ण का है, सुन्दर
केसर से सुशोभित है और अधोमुख सहस्रदल वाला है। अमृत की घनघोर वर्षा करने
वाली केवल व्यापिनी शक्ति यहाँ स्थित है॥
इन वचनों के अनुसार अमृतमय बीज वकार माना जाता है। इन दो वर्णों के साथ
हकार आदि अक्षरों की भी यहाँ स्थिति मानी जाती है। इसका अभिप्राय यह है कि
कुलशक्ति, अर्थात् इच्छाशक्तिस्वरूपाणी कुण्डलिनी शक्ति के उन्मेष से, २षट्चक्र, पंच-
गगन, द्वादश ग्रन्थि को भेद कर अकुल कमल में प्रवेश करने पर अ इ उ ऋ ऌ ए ऐ ओ
औ ह य र व ल इन चौदह वर्णों की उत्पत्ति होती है। भूतलिपि के उद्धार के प्रसंग में

१. वतया-ख. ने. झ. उ. । २. ध्रुवादूर्ध्वं-क. ग. । ३. 'इत्यादिना' नास्ति-क. ग.
उ. । ४. केवलं शश्वद''''षिणम्-क. । ५. मसारे-ज., मागारे-झ. उ. ।
१. पृ० ३५ पर उद्धृत स्वच्छन्दसंग्रह के वचन के अनुसार ऊर्ध्वमुख सहस्रदल पद्म
की संज्ञा कुल तथा अधोगत सहस्रदल की संज्ञा अकुल है। प्रस्तुत वचन उसके विपरीत
अधोमुख सहस्रदल कमल को कुल नाम देता है। अन्यत्र शक्ति को कुल तथा शिव को
अकुल कहा गया है। तदनुसार ब्रह्मरन्ध्र स्थित कमल की अकुल संज्ञा ही होनी चाहिये ।
दीपिकाकार ने भी पृ० ३२६ पर यही व्याख्या की है। 'यवादूर्ध्वेदुकुल' पाठ मानने पर
यह विसंगति दूर हो सकती है ।
२. छः चक्र, पाँच गगन (शून्य) तथा बारह ग्रन्थियों का विवरण योगशास्त्र के
अनेक ग्रन्थों में दिया गया है। नेत्रतन्त्र के सप्तम अधिकार में भी इनका वर्णन है।

३३० योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः
सन्धिवर्णा ¹व्योमेराग्निजलं धरा" (शा० ति० ७।२)। इति तन्मयं चतुर्दशारचक्र-
मित्यर्थः ।।१३६-१३८।।
सम्प्रदायक्रमायातसौभाग्यदायकशब्दयोर्वासनामाह—
शक्तेः सारमयत्वेन प्रसृतत्वान्महेश्वरि ।।१३८।।
सम्प्रदायक्रमायाताश्चक्रे सौभाग्यदायके² ।
शक्तेरिच्छाशक्तेः कुण्डलिन्याः, सारः प्रसारः, पूर्वोक्तरीत्याऽकुलस्थानस्थाऽ-
नुत्तरशिवसंसर्गः, तन्मयत्वेन तदुत्पन्नतत्वात्, एतेषां वर्णानां तैर्वर्णैः प्रसृतत्वात्
सर्वसंक्षोभिण्यादिशक्तीनां सम्प्रदायक्रमायातत्वम्, "सम्प्रदायो महाबोधरूपो
गुरुमुखे स्थितः" (२।३६) इति पूर्वोक्तरीत्या गुरु³मुखादधिगतत्वाद् वर्णोत्पत्तेः ।
आसां च तन्मयत्वम् । अत एव ⁴ताः सम्प्रदायक्रमायाता इत्यर्थः ।।१३८-१३९।।
¹आगमान्तर (शारदातिलक) में पाँच ह्रस्व स्वर, चार सन्धि वर्ण और आकाश, वायु,
अग्नि, जल तथा पृथिवी वाचक पाँच वर्णों के रूप में इनका उद्धार किया गया है । चतु-
र्दशार चक्र इन चौदह भूतलिपि वर्णों से सम्पन्न है ।।१३६-१३८।।
अब सम्प्रदायक्रमायात और सौभाग्यदायक शब्दों की वासना बताते हैं—
हे महेश्वरि ! कुण्डलिनी शक्ति के प्रसार से उत्पन्न होने के कारण सर्व-
संक्षोभिणी आदि शक्तियों के स्वरूप का ज्ञान सम्प्रदाय से ही, गुरु-परम्परा से
ही प्राप्त हो सकता है । अतः सर्वसंक्षोभिणी आदि सम्प्रदाय योगिनियों की
सौभाग्यदायक चक्र में पूजा करनी चाहिये ।।१३८-१३९।।
शक्ति का, इच्छा शक्ति कुण्डलिनी का, प्रसार ऊपर बताई गई पद्धति से अकुल
स्थानगत अनुत्तर शिव पर्यन्त होता है । कुल कुण्डलिनी और अकुल शिव के संपर्क से ही
समस्त वर्णों की उत्पत्ति मानी जाती है । ऊपर बताये गये चौदह भूतलिपि वर्णों से
सर्वसंक्षोभिणी आदि चौदह शक्तियों का स्वरूप बनता है, इसका ज्ञान सम्प्रदाय क्रम से
ही प्राप्त हो सकता है । यहाँ पहले ही बताया गया है कि सम्प्रदाय क्रम से प्राप्त होने
वाला उत्तम ज्ञान गुरु के मुँह में विद्यमान है (२।२६) । इस तरह से वर्ण की उत्पत्ति
की प्रक्रिया का ज्ञान गुरुमुख से ही प्राप्त हो सकता है और ये सर्वसंक्षोभिणी आदि
१. द्योर्वाय्व-क. ग. ने. । २. कारके-ने. ज. झ. उ. । ३. वक्त्रावगतत्वाद्-ख. ने.
ज. ञ. झ. उ. ४. एताः-ख. झ. ।

  1. आगमान्तर के नाम से उद्धृत यह श्लोक शारदातिलक (७।२) में मिलता है ।
    इससे शारदातिलककार की स्थिति अमृतानन्द से पहले मानी जायगी । इस प्रसंग में
    लुप्ता० उपो० के पृ० ४६ की टिप्पणी देखिये । दीपिकाकार के अनुसार शारदातिलक
    आगमान्तर है । अतः इसको श्रीसम्प्रदाय का ग्रन्थ नहीं माना जा सकता ।

तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३३१
निरन्तरप्रथोरूपसौभाग्यबलयोगतः ॥१३९॥
अन्वर्थसंज्ञके देवि अणिमासदृशाः² शुभाः ।
सर्वसंक्षोभिणीपूर्वा देहाक्षादिशुद्धिदा ॥१४०॥
ईशित्वसिद्धिरपि च प्रोक्तरूपे पुरत्रये ।
योगादिक्लेशभेदेन सिद्धा त्रिपुरवासिनी ॥१४१॥
एताः सम्पूजयेद् देवि सर्वाः सर्वोपचारकैः ।
अणिमासदृशाः "तास्तु रक्ततरा वर्णैः” (३।११५) इत्यादिपूर्वोक्ता³ अणिमा-
सिद्धिसदृशरूपाः । सर्वसंक्षोभिणीपूर्वाः “सर्वसंक्षोभिणी शक्तिः” (१।१६५)
इत्यादिचतुःशतीशास्त्रोक्ताः । निरन्तरप्रथा⁴ शिवा द्वैतभावना, ⁵सैव सौभाग्यम्,
परमसुभगपरमप्रेमास्पदपरशिवाभेदगोचरत्वात्, तदेव बलं शक्तिः, तद्योगातः
अनित्याशुचिरूपपरमदुर्भगसंवंजुगुप्साभेदलक्षणसंसारपरिपन्थिपरमप्रेमास्पदसर्व-
स्पृहणीयपरमसुभगपरमशिवाहन्तालक्षणसौभाग्यप्रतिपादकशक्तिसंयोगात् । अन्वर्थ-
शक्तियां उन्हीं वर्णों से अभिव्यक्त होती हैं, अतः इन शक्तियों को सम्प्रदाय योगिनियों
के नाम से जाना जाता है ॥१३८-१३९॥
हे देवि ! अणिमा सिद्धि के समान रूपवाली और कल्याणकारिणी सर्वसंक्षो-
भिणी आदि शक्तियाँ निरन्तर प्रथा रूप सौभाग्य-बल से सम्पन्न होने के कारण
अन्वर्थसंज्ञक सौभाग्यदायक चक्र में पूजी जाती हैं। देह, इन्द्रिय आदि को विशुद्ध
करने वाली ईशित्व सिद्धि को, प्रोक्तरूप पुरत्रय में योग आदि के क्लेशों का भेदन
करने वाली त्रिपुरवासिनी की और इन सब देवियों की पहले बताये गये सभी
प्रकार के उपचारों से सविधि पूजा करनी चाहिये ॥१३९-१४२॥
अणिमा आदि सिद्धियों के विषय में पहले (३।११५) बताया गया है कि इनका वर्ण
चटक लाल है। वैसा ही रूप इन सर्वसंक्षोभिणी आदि देवियों का भी है। इनके नाम
चतुःशती शास्त्र (१।१६५-१६८) में बताये गये हैं। निरन्तर प्रथा का अर्थ है शिवा द्वैत-
भावना । इसी का नाम है सौभाग्य, क्योंकि परम सुभग परम प्रेमास्पद परम शिव से यह
अभेद स्थापित करने वाला है। इस सौभाग्य के बल (शक्ति) के योग से, अनित्य अशुचि-
रूप परम दुर्भग सभी के लिये जुगुप्सा (घृणा) के योग्य भेददृष्टिप्रधान इस संसार के
परिपन्थी (शत्रु) परम प्रेमास्पद सर्वस्पृहणीय परम सुभग परम शिव के साथ अभेद दृष्टि
को स्थापित करने वाली परम सौभाग्य को प्राप्त कराने वाली शक्ति के सम्पर्क से, अन्वर्थ
१. प्रथा-क. ग. । २. सदृशीः-ख. ने. च. छ. ज. झ. । ३. क्ताणिमादिसिद्धि-
सदृशीः-ख. ने. ज. झ. उ. । ४. प्रथा-क. ग., अन्तरभेदो निरन्तरप्रथा-ख. ने. ज.
झ. उ. । ५. 'सैव' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. ।

३३२ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः
संज्ञकेऽनुकूलार्थाक्षरशालिनि¹ संज्ञावति सौभाग्यदायके² चक्रे, सम्पूजयेदि-
त्यनुषङ्गः।
देहः षट्त्रिंशत्तत्त्वसमुदायलक्षणः। तच्छब्देन तदहन्ताभिमानी प्रमाता लक्ष्यते।
अक्षाणि इन्द्रियाणि प्रमाणानि। आदिशब्दाद् विषयाः प्रमेयरूपा गृह्यन्ते। तेषां
विशुद्धि³श्चिदेकविश्रान्तिः, तत्प्रदा। तस्यां विशुद्धौ यष्टुरीश्वरत्वं⁴ स्वातन्त्र्यं
सिद्ध्यति। सा चात्र प्रोक्तरूपे प्रमातृप्रमाणप्रमेयक्षणे पुरत्रये⁵ चिन्निवास-
स्थानत्वात्। अत्रैव वक्ष्यति— "मातृमानप्रमेयाणां पुराणां परिपोषिणी" (३।५०)
इति। योगादिक्लेशभेदेन। "आत्मा मनसा संयुज्यते, मन इन्द्रियेण, इन्द्रियमर्थेन,
इन्द्रियाणां प्राप्यकारित्वनियमात् ततोऽप्यर्थसन्निकृष्टेनेन्द्रियेण" इति तन्त्रान्त-
रोकरीत्या मातृमानमेयेषु तत्तद्रूपेण चिन्मरीचीनां प्रसरस्तत्समवायो योगः, स
एवादिक्लेशः। असङ्गाद्वयापरिच्छिन्नसंविदात्मनो मानसेन्द्रियविषयात्मना बहि-
संज्ञा वाले, अर्थ के अनुकूल अक्षरों की संज्ञा वाले, अर्थात् ऊपर वर्णित सौभाग्य को सच-
मुच देने वाले सौभाग्यदायक चक्र में सर्वसंक्षोभिणी आदि देवियों की पूजा करनी चाहिये।
छत्तीस तत्त्वों का समुदाय देह है। देह शब्द से यहाँ उसमें अपनापन देखने वाला
प्रमाता लक्षित होता है। अक्ष अर्थात् इन्द्रियाँ, इनसे प्रमाण लक्षित होता है। आदि शब्द
से प्रमेय स्वरूप विषयों का ग्रहण किया जाता है। इन सबकी विशुद्धि का अर्थ है इनकी
एकमात्र चित्स्वरूप में विश्रान्ति। इस विशुद्धि के हो जाने पर साधक की ईश्वरता सिद्ध
हो जाती है, वह परम स्वतन्त्र हो जाता है। यह ईशित्व सिद्धि ऊपर बताये गये प्रमाता,
प्रमाण, प्रमेय स्वरूप पुरत्रय में चित्स्वरूप का आलोक फैला देती है। यहीं आगे बताया
जायगा—"माता, मान और प्रमेय लक्षण तीनों पुरों का यह पालन करने वाली है"।
न्यायदर्शन¹ में बताया गया है—"आत्मा मन से, मन इन्द्रिय से और इन्द्रिय अर्थ से
संयुक्त होती है। इन्द्रियों का यह नियम है कि वे वस्तु के पास पहुँच कर उसका ग्रहण
करती हैं। इस तरह से यह आत्मा अन्ततः अर्थसन्निकृष्ट इन्द्रिय से संयुक्त हो जाता
है"। इस तरह माता, मान और मेय के रूप में चिन्मरीचियों का प्रसार ही यहाँ संयोग
कहा जाता है। त्रिपुटी (माता, मान और मेय) का यह योग ही सबसे बड़ा क्लेश है। असंग,
अद्वय, अपरिच्छिन्न, संवित्स्वरूप आत्मा पर मन, इन्द्रिय और विषय की यह बाहरी छाया
ही सब प्रकार के दुःखों को जन्म देती है। इस क्लेश का यह शक्ति भेदन कर देती है।
१. शालिसंज्ञा-ख. ने. उ. । २. कारके-ख ने. ज. झ. उ. । ३. विवेक-
ख. ने. ज. झ. उ. । ४. रीशित्वं-ख. ने. झ. । ५. त्रयेऽपि निवा-ख. ने. ज. झ. ।

  1. इस उद्धरण का आधा अंश न्यायभाष्य (१।१।४) में आनुपूर्वी से मिलता है।
    पूरा उद्धरण वहाँ उपलब्ध नहीं है।

तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३३३
रूपराग एव हि क्लेशः क्लिष्टत्वम्, तद्भेदेन । प्रत्यङ्मुखतया तदैकरस्येन
परप्रमातृविश्रान्तिर्भेदः । तदुक्तं परापञ्चाशिकायाम्—
⁠१सर्वसंविन्नदीभेदभिन्नविश्रान्तिभूमये ।
⁠नमः प्रमातृवपुषे२ शिवचैतन्यसिन्धवे३ ॥ इति ।
स्तोत्रावल्यामपि—
⁠“यत्र यत्र मिलिता मरीचयस्तत्र तत्र विभुरेव जृम्भते” इति ।
सिद्धा त्रिपुरवासिनी । पूर्वोक्तपुरत्रयविश्रान्तिरूपिणी चतुर्थचक्रेश्वरी । एताः पूज्या
आवरणदेवताः सिद्धिचक्रेश्वरीयुताः । सर्वाः सर्वोपचारैर्गन्धादिभिः पूजयेत्
॥१३९-१४२॥
यहाँ भेदन शब्द का अर्थ है पराङ्मुख इन्द्रियों को प्रत्यङ्मुख बना कर, उनके द्वारा
उत्पन्न की गई भेददृष्टि को समरसता में समेट कर परम प्रमातृ पद में विश्राम दिलाना ।
१परापंचाशिका में कहा गया है—
⁠समस्त संवित्स्वरूपिणी नदियों के भेद को जिस भूमि में विश्रान्ति मिल गई, उस
परम प्रमाता स्वरूप शिव चैतन्य रूपी सिन्धु (समुद्र) को मैं नमन करता हूँ ॥
⁠२स्तोत्रावली में भी बताया गया है—
⁠जहाँ जहाँ मरीचियाँ मिलती हैं, अर्थात् बाह्य इन्द्रियां जिन जिन विषयों को ग्रहण
करती हैं, सर्वत्र भगवान् शिव का ही स्वरूप भासित होता है ॥
⁠यह विश्राम दिलाने वाली देवी यहाँ सिद्धा त्रिपुरवासिनी कही गई है । ऊपर बताये
गये पुरत्रय को परम स्वरूप में समरस कर देने वाली यह देवी चतुर्थ चक्र की स्वामिनी
हैं । ईशित्व सिद्धि और चक्रेश्वरी के साथ इस चक्र में चौदह आवरण देवताओं की पूजा
सर्वविध गन्ध आदि उपचारों से करनी चाहिये ॥१३९-१४२॥
⁠१. सर्वचित्तादिकाद् भेदाद्-ख. ने. ज. झ. उ. । २. विघये-ख. ने. ज. उ. ।
३. सिद्धये-ख. ने. ज. उ. ।
⁠1. परापंचाशिका के नाम से उद्धृत यह श्लोक मुद्रित ग्रन्थ में अथवा उसकी किसी
भी मातृका में हमें अब तक उपलब्ध नहीं हुआ ।
⁠2. उत्पलभट्ट की मुद्रित शिवस्तोत्रावली में यह श्लोक उपलब्ध नहीं है ।
पृ० २११ की पहली टिप्पणी देखिये ।

३३४ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः
पञ्चमचक्रपूजां सवासनामाह—
सदातनानां नादानां नवरन्ध्रस्थितात्मनाम् ॥१४२॥
महासामान्यरूपेण व्यावृत्तध्वनिरूपिणी ।
अस्थिरस्थिरवेद्यानां छायारूपैर्दशार्णकैः ॥१४३॥
कुलकौलिकयोगिन्यः सर्वसिद्धिप्रदायिकाः ।
सदातनानां यावच्छरीरभावितानाम्। नादानाम् अविकृतशून्यस्पर्शनाद-
ध्वनिबिन्दुशक्तिबीजाक्षराख्यानाम्। नवरन्ध्रस्थितात्मनाम्। नवरन्ध्राणि नवा-
धाराणि सुषुम्नान्तर्गतगगन^२भागरूपाणि ^३आधारस्वाधिष्ठानमणिपूरानाहत-
तदूर्ध्ववज्रपद्मकण्ठलम्बिकाविशुद्धाज्ञाख्यानि। तदुक्तं स्वच्छन्दसंग्रहे—
^४आधारं स्वाधिष्ठानं च मणिपुरमनाहतम्।
मध्यमं वज्रकण्ठं च लम्बिकां च विशुद्धिकाम् ॥
आज्ञां च ^५नवकं विद्धि षट्चक्राणि त्रिहीनकम्। इति।
वासना के साथ अब पंचम चक्र की पूजाविधि बताते हैं—
नवरन्ध्र स्थित सनातन नौ नादों और एक महासामान्य स्वरूप समष्टिनाद
के भेद से दशधा विभक्त स्वरूप वाली यह पंचम चक्रेश्वरी देवी पहचानी जाती
है। यह पहले अपने अस्थिर और स्थिर वेद्यों के छाया स्वरूप दस वर्णों के रूप
में तथा बाद में समस्त सिद्धियों को देने वाली कुलकौलिक योगिनियों के रूप में
प्रकट होती है॥ १४२-१४४॥
^१अविकृत, शून्य, स्पर्श, नाद, ध्वनि, बिन्दु, शक्ति, बीज और अक्षर नामक नौ नाद
सनातन हैं। जब तक शरीर है, तब तक इनका निरन्तर नदन होता रहता है। ये नव-
रन्ध्रों में स्थित हैं। सुषुम्ना नाडी के मध्यगत आकाश में आधार, स्वाधिष्ठान, मणिपूर,
अनाहत, ^२तदूर्ध्व वज्रपद्म, कण्ठ, लम्बिका, विशुद्ध और आज्ञा नामक जो नौ आधार हैं,
उन्हीं को यहाँ नवरन्ध्र कहा गया है। स्वच्छन्दसंग्रह में इनके नाम ये हैं—
आधार, स्वाधिष्ठान, मणिपूर, अनाहत, मध्यम वज्र, कण्ठ, लम्बिका, विशुद्धिका
और आज्ञा। इन नौ में से तीन को हटा देने पर षट्चक्र बच जाते हैं॥
१. चक्र-ज.। २. नाभासरूपत्वात्-ख. ने. ज. झ. उ.। ३. 'आधार...ज्ञाख्यानि'
नास्ति-ख. ज. ब. उ.। ४. मूलाधारं स्वाधिष्ठानं-ज.। ५. नवके-ख. ज. उ. ।
१. संकेतपद्धति में आठ ही नाद गिनाये गये हैं। पृ० १९३ की पहली टिप्पणी
देखिये। यहाँ गिनाये गये अविकृत नाद की नवम निर्विशेष नाद से अभिन्नता मानी जा
सकती है।
२. नवाधारों के यहाँ दिये गये नामों के विषय में उपोद्घात में विचार किया जायगा।

तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३३५
तेषु स्थितात्मनां तेषाम् । महासामान्यरूपेण । महत् आद्यन्तरहितं निर्विशेषध्वनि-
लक्षणं सामान्यं समष्टिः, तद्रूपेण । व्यावृत्तध्वनिरूपिणी । एवं व्यावृत्तो विभक्तो
दशधा ध्वनिः, तद्रूपिणी, अविकृतादिनादमयसूक्ष्ममध्यमारूपिणीत्यर्थः । अस्थिर-
स्थिरवेद्यानाम् । अस्थिरवेद्यानि कर्मेन्द्रियगोचरतया क्रियारूपाणि वचनादान-
गमनविसर्गानन्दाख्यानि, स्थिरवेद्यानि ज्ञानेन्द्रियगोचराः शब्दस्पर्शरूपरसगन्धाः,
तेषामस्थिरस्थिरवेद्यानाम् । छायारूपैः प्रतिबिम्बभूतैः । दशार्णकैः ततवर्गद्वयदशार्णैः,
आविष्कृता इति शेषः । कुलकौलिकयोगिन्यः । अत एव कुलस्य देहस्यावयव-
भूतानि दशेन्द्रियाणि कुलशब्देनोच्यन्ते, १तत्संबन्धात् तद्ग्राह्यदशविषयाः कौलिका
इत्युच्यन्ते, तैर्योगः संबन्धः कार्यकारण२भावलक्षणो यासां ताः कुलकौलिक-
योगिन्यः ।
ननु भूतलिप्युद्धारक्रमेण३ क्रमप्राप्तौ कवर्गचवर्गौ, कथं टतवर्गौ ४तस्मिन्
दशारे व्युत्क्रमेण कथ्येते ? उच्यते—चतुर्दशारदशारद्वयचक्राणां स्थितिरूपत्वाद्
भूतलिपेर्मध्यमावयवत्वान्मध्यमायाश्च स्थितिरूपत्वात् स्थितिक्रमोऽयं ५वर्ग-
इन नौ आधारों में नौ प्रकार के नाद स्थित हैं । दसवां नाद इन सबकी महासमष्टि
है । आदि और अन्त से रहित होने से यह महान् और निर्विशेष ध्वनि स्वरूप होने से
सामान्य, अर्थात् समष्टि स्वरूप है । इस तरह दशधा विभक्त नाद ही इस पंचम चक्रे-
श्वरी का स्वरूप है । यह देवी अविकृत आदि दस नादों वाली है । यही सूक्ष्म मध्यमा
वाणी का भी स्वरूप है । कर्मेन्द्रियों से सम्पन्न होने वाली वचन, आदान, गमन, विसर्ग
और आनन्द नामक क्रियाएँ अस्थिर वेद्य तथा ज्ञानेन्द्रियों से गृहीत होने वाले शब्द,
स्पर्श, रूप, रस और गन्ध नामक विषय स्थिर वेद्य कहलाते हैं । इन अस्थिर और स्थिर
वेद्यो के प्रतिबिम्बभूत दस वर्ण टवर्ग और तवर्ग हैं । इनसे कुलकौलिक योगिनियों का
आविष्कार होता है । कुल (शरीर) की अवयवभूत दस इन्द्रियां भी कुल शब्द से बोधित
होती हैं । इन इन्द्रियों से संबद्ध बाह्य दस विषय कौलिक कहे जाते हैं । इन कुलों और
कौलिकों से जिनका कार्यकारणभाव संबन्ध है, वे कुलकौलिक योगनियां हैं ।
प्रश्न उठता है कि भूतलिपि का उद्धार यहाँ बताया जा रहा है । तदनुसार
पूर्वोक्त १४ वर्णों के उद्धार के बाद कवर्ग और चवर्ग का उद्धार बताया जाना चाहिये ।
उस क्रम को बदल कर यहाँ टवर्ग और तवर्ग का उद्धार कैसे किया जा रहा है ? इसका
समाधान यह है कि चतुर्दशार और द्विदशार (बाह्यदशार और अन्तर्दशार) ये तीनों
१. तत्संग्राह्या दश–ख. ने. ज. झ. उ. । २. 'भाव' नास्ति–ख. ने. ज. झ. उ. ।
३. क्रमे–ख. ने. ज. झ. उ. । ४. अस्मिन्–क. । ५. वर्गन्यासः–ख. ने. ज. झ. उ. ।

३३६ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः
व्यत्ययः। अत एव च तत्कारणभूतसूक्ष्ममध्यमात्मना नादमयत्वसंज्ञाकथनमस्य
चक्रस्य।
सर्वसिद्धिप्रदायिकाः। सर्वस्य पूर्वोक्तस्य ज्ञानकर्मेन्द्रियविषयजातस्य, सिद्धिः
प्रतीतिः प्रमातृविश्रान्तिः, तल्लक्षणायाः सिद्धेः२ प्रदायिकाः ॥१४२-१४४॥
३तासां ध्यानमाह—
श्वेताम्बरधराः श्वेताः श्वेताभरणभूषिताः । ४॥१४४॥
स्पष्टम्५ ॥१४४॥
सर्वार्थसाधकचक्र६व्युत्पत्तिमाह—
७मन्त्राणां स्वप्रथारूपयागादन्वर्थसंज्ञके।
सर्वसिद्धिप्रदाह्यास्तु चक्रे सर्वार्थसाधके ॥१४५॥
चक्र स्थिति रूप हैं। भूतलिपि मध्यमा वाणीमय है और मध्यमा भी स्थिति रूप है। अतः
इस स्थिति क्रम को बताने के लिये यहाँ वर्गों का क्रम बदल दिया गया गया है। इसी-
लिये इन वर्गों की कारणभूत सूक्ष्म मध्यमा वाणी की नादात्मकता के आधार पर इस
पंचम चक्र की भी नादात्मकता प्रतिपादित होती है।
ये योगिनियां ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रियों के सभी विषयों की सिद्धि को प्रदान करने
वाली हैं, अर्थात् अपने प्रमातृपद मे इनको विश्राम देकर सब तरह से कृतार्थ कर देती
हैं ॥ १४२-१४४ ॥
अब इनका ध्यान बताते हैं—
इनका वर्ण श्वेत है। ये श्वेत वस्त्र और श्वेत आभूषणों से सुशोभित
हैं ॥ १४४ ॥
इसका अर्थ स्पष्ट है ॥ १४४ ॥
सर्वार्थसाधक चक्र की व्युत्पत्ति बताते हैं—
मन्त्रों के स्वप्रथारूप सभी प्रयोजनों को यह सिद्ध कर देता है, अतः
अर्थ के अनुरूप नाम वाले इस सर्वार्थसाधक चक्र में सर्वसिद्धिप्रदा आदि
योगिनियाँ निवास करती हैं ॥१४५॥
१. मानादमयसंज्ञा-ख. ने. ज. झ. उ.। २. 'सिद्धेः' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. ।
३. आसां-ख. ने. ज. झ. उ.। ४. श्वेता वराभयकराः-ख. ने. च. छ. ज. झ.।
५. स्पष्टमेतत्-ज.। ६. चक्रोत्पत्ति-ख. ने. ज. झ. उ.। ७. स्वप्रथामननत्राणयोगा-
ख. ने. च. छ. ज.।

तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३३७
'सर्वसिद्धिप्रदाद्याः “सर्वसिद्धिप्रदा देवी” (१।१६९) इत्यादिचतुःशती-
शास्त्रोक्ताः। मन्त्राणां पूर्वोक्त(२।१)निर्वचनानां मननत्राणवताम्, स्वप्रथारूपयोगात्,
स्वस्य शिवात्मनः साधकस्य, २प्रथा शिवाहम्भावभावना, तदेव मननत्राणनम्,
तद्योगात्। अन्वर्थसंज्ञके सर्वार्थसाधकपदानुकूलार्थवत्संज्ञाशालिनि शिवाहम्भाव-
भावनालक्षणमननात् सर्वेषां स्वसाधकानामर्थं परमप्रयोजनं मोक्षं साधयतीति
विशेषात् सर्वार्थसाधकचक्रे, संस्थिता इति शेषः ॥१४५॥
स्वनाम³पदार्थव्युत्पत्तिपुरःसरमेतच्चक्रेश्वरी⁴माह—
लोकत्रयसमृद्धीनां हेतुत्वाच्चक्रनायिका।
त्रिपुराश्रीमहेशानि मन्त्रशुद्धिभवा पुनः ॥१४६॥
वशित्वसिद्धिराख्याता एताः सर्वाः समर्चयेत्।
५लोकयतीति लोकः, लोकनं लोकः, लोक्यत इति लोक इति व्युत्पत्त्या
लोकत्रयस्य मातृमानमेयलक्षणस्य समृद्धीनां ६परिपूर्णप्रमातृविश्रान्तिलक्षणानां


आदि शब्द से सर्वसिद्धिप्रदा के साथ चतुःशती शास्त्र (१।१६९-१७१) में वर्णित अन्य
शक्तियों का भी ग्रहण होता है। मन्त्रों के निर्वचन के प्रसंग में पहले (२।१) बताया जा
चुका है कि मन्त्रों का मनन करने से वे साधक की रक्षा करते हैं। साधक अपने स्वरूप
को भूल जाता है, मन्त्र उसको अपने शिवस्वरूप का बोध करा देते हैं। इसी को मन्त्रों
की मनन-त्राणता कहते हैं। यह सर्वार्थसाधक चक्र अपने पद के अनुकूल अर्थ, अभीष्ट
पदार्थ को देकर अपने नाम को सार्थक बना देता है, अर्थात् मैं शिव ही हूँ, इस तथ्य का
मनन करने वाले सभी साधकों के परम प्रयोजन मोक्ष को सिद्ध कर देता है। इसीलिये
इस चक्र में सर्वसिद्धिप्रदा आदि शक्तियां निवास करती हैं ॥१४५॥
अपने नामपद की व्युत्पत्ति के साथ इस चक्र की स्वामिनी का वर्णन करते है—
हे महेशानि ! तीनों लोकों की समृद्धि को देने वाली इस चक्र की स्वामिनी
त्रिपुराश्री कहलाती है। मन्त्र की शुद्धि के सम्पन्न होने पर यह साधक को
वशित्व सिद्धि प्रदान करती है। इन सबकी यहाँ पूजा करनी चाहिये ॥१४६-१४७॥
लोक शब्द की कर्ता, कर्म और करण व्युत्पत्ति के आधार पर माता, मान और मेय-
लक्षण लोकत्रय का ग्रहण होता है। इस विषय का वर्णन पहले (१।८२) भी किया जा
चुका है। इन तीनों की समृद्धि यही है कि परिपूर्ण प्रमातृस्वरूप में पूरी तरह से विश्राम


१. 'सर्व''''साधकस्य' नास्ति-ख. ने. ज. ब. उ.। २. स्वप्रथा-ख. ने. ज. उ.।
३. मर्थवदुत्पत्ति-ख. ने. उ.। ४. चक्रेशी-ख. ने. ज. झ. उ.। ५. लोकयतोति,
लोक्यतेनेनेति, लोक्यत-ख. ने. ज. क. उ.। ६. परप्रमातृ-ख. ने. ज. झ. उ.।
२२

३३८ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः
हेतुत्वात् त्रिपुराश्रीः पञ्चमचक्रेश्वरी¹ पूज्येत्यर्थः । मन्त्राणां शुद्धिनम "अकुले
विषुसंज्ञे च" (१।२५) इत्यादिपूर्वोक्तरीत्या ²उन्मन्यन्तकाललयलक्षणोच्चारणेन
³चिन्मयताभावना । तादृशमन्त्रशुद्ध्या स्वसाधकस्य वशित्वं ⁴सकलजगत्सर्जने
रक्षणे संहारे च ⁵स्वातन्त्र्यं सिद्ध्यतीति तादृशी परशिवताप्राप्तिः । सा चास्मिन्
चक्रे वशित्वसिद्धिरिति । एताः सर्वा आवरणदेवताश्चक्रेश्वरोसिद्धिसंयुताः
समर्च्चयेत् ।।१४६-१४७।।
षष्ठचक्रपूजां सवासनामाह—
ऊर्ध्वाधोमुखया देवि कुण्डलिन्या प्रकाशिताः ॥१४७॥
कुलेच्छया बहिर्भावात् कादिवर्णप्रथामर्याः ।
निगर्भयोगिनीवाच्याः स्वरूपावेशरूपके ॥१४८॥
सर्वावेशकरे चक्रे सर्वरक्षाकरे पराः ।
सर्वज्ञाद्याः स्थिताः
प्राप्त कर ले, समरसाकार हो जाय । यह देवी इस समृद्धि को देती है, इसीलिये इस पंचम
चक्र की स्वामिनी का नाम त्रिपुराश्री है । इसी की इस चक्र में पूजा की जाती है । मन्त्रों
की शुद्धि पहले (१।२५) बताई गई पद्धति से उन्मनी पर्यन्त कलाओं में काल की मात्राओं
को विलीन करते हुए उच्चारण के समय चिन्मय स्वरूप की भावना से होती है । मन्त्र
की इस तरह से शुद्धि हो जाने पर यह देवी अपने साधक को वशिता सिद्धि प्रदान करती
है । इससे साधक जगत् को सृष्टि, रक्षा और संहार करने में समर्थ हो जाता है, उसे
परशिवता की प्राप्ति हो जाती है। इसी पंचम चक्र में यह वशिता सिद्धि भी रहती है ।
इसीलिये त्रिपुराश्री और वशिता सिद्धि के साथ सर्वसिद्धिप्रदा आदि सभी आवरण देवताओं
की यहाँ पूजा करनी चाहिये ।।१४६-१४७।।
अब वासना के साथ षष्ठ चक्र की पूजाविधि बताते हैं—
हे देवि ! ऊर्ध्वमुख और अधोमुख कुण्डलिनी के द्वारा प्रकाशित, कुल के
निर्माण की इच्छा से बहिर्भूत परा शक्ति ककारादि दस वर्णों और सर्वज्ञा आदि
दस निगर्भयोगिनियों के रूप में सर्वरक्षाकर चक्र में अभिव्यक्त होती है ।
परा शक्ति इस स्वरूप में आविष्ट हो जाती है, अतः इसे सर्वावेशकर चक्र भी
कहते हैं ।।१४७-१४९।।
१. चक्रेशी—ख. ने. ज. झ. उ. । २. उन्मनीपर्यन्तं कलाबीजलक्षणो—ख. ने. ज. झ. उ. ।
३. चिन्मयान्तर्भावनं मातृमन्त्रशुद्ध्यादौ—ख. ने. झ. उ. । ४. सर्वजगतप्रसवे सर्वजगत्संहारे
च—ख. ने. ज. झ. ब. उ. । ५. स्वायत्तत्वं सिद्धयति, तादृशपरशिवप्राप्तिः-क. ग. ।
६. मयी—क. ग. । ७. बाच्या—क. ग. । ८. सर्वरक्षाकरे चक्रे सर्वाविशकरे—ख. ने. च.
छ. ज. झ. उ. ।

तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३३९
ऊर्ध्वाधोमुखया "यदोल्लसति" (४।१२) इत्यादिश्चतुःशतीशास्त्रोक्तरीत्याऽ-
कुलस्थ१परपुरुषप्राप्तये ऊर्ध्वमुखया, पुनरधोमुखया २विश्वसृष्टये मूलाधारं
प्रविशन्त्या कुण्डलिन्या, प्रकाशिता अभिव्यञ्जिताः, कारणे सत्त्वात् । कुलेच्छया
कुलमुक्तलक्षणं मातृमानमेयरूपम्, तत्रेच्छया तन्निर्माणेच्छया । बहिर्भावात्
कादिवर्णप्रथामयाः३ । षट्त्रिंशत्तत्त्वसंकलनरूपतत्त्वत्रयमयमातृमानमेयलक्षण-
४कुलनिर्माणेच्छया अकुलस्थपरशिवाद् बहिः प्रसृतया समस्ततत्त्ववर्णगर्भिण्या
कुण्डलिन्या ककारादिदशवर्णप्रथारूपा निर्मितेत्यर्थः । निगर्भयोगिनीवाच्या
निगर्भयोगिन्य इति वचनाः५, "निगर्भोऽपि महादेवि शिवगुर्वात्मगोचरः" (२।४८)
इति पूर्वोक्तरीत्याऽद्वैत६प्रथालक्षणपरप्रमातृयोगो यासां ता योगिन्यो विषयेन्द्रिय-
संसर्गलक्षण७दशेन्द्रियवृत्तयश्चिन्मरीचयो निगर्भयोगिन्यः । स्वरूपावेशरूपके
स्वरूपस्य साधक८स्यात्मनः प्रमातुरावेशः परशिवोऽहमिति मतिः । आवेशो हि
लोके ब्रह्मराक्षसोऽहमितिवत् पराहन्ताप्रथा, तद्रूपके तन्निरूपके । अत एव सर्वा-
वेशकरे । "यत्र यत्र मनो याति" (श्लो० ११३), "यत्र९ यत्राक्षमार्गेण चैतन्यं
चतुःशती शास्त्र (४।१२) की पद्धति से कुण्डलिनी शक्ति अकुल पुरुष की प्राप्ति के
लिये ऊर्ध्वमुख होती है और विश्व की सृष्टि के लिये पुनः अधोमुख होकर मूलाधार में
प्रविष्ट हो जाती है । निगर्भयोगिनियों की सृष्टि इसी क्रम से होती है। माता, मान
और मेय लक्षण कुल के निर्माण की जब इसकी इच्छा होती है, तो यह बाहर निकलती
है और ककार आदि वर्णों के रूप में प्रथित हो जाती है। इसका अभिप्राय यह है कि
छत्तीस तत्त्वों को जब हम संकलित करते हैं, तो माता, मान और मेय रूप तीन तत्त्वों में
वे उपसंहृत हो जाते हैं । इस लोकत्रय के निर्माण की इच्छा से कुण्डलिनी नामक परा शक्ति
अकुल पद्म में स्थित परशिव से अलग हो कर बाहर निकलती है, तो समस्त तत्त्वों और
वर्णों को अपने में समेटे हुए इस कुण्डलिनी से ककार आदि दस वर्ण आविर्भूत होते हैं और
ये ही निगर्भयोगिनियों के नाम से प्रथित होते हैं । निगर्भ पद के विषय में पहले (२।४८)
बताया जा चुका है । अद्वैतप्रथास्वरूप परप्रमाता शिव के साथ जिनका योग है, वे
विषय और इन्द्रियों के संसर्ग से समुद्भूत दस विषयों की वृत्तियाँ, चिच्छक्ति की किरणें
निगर्भयोगिनी के नाम से प्रख्यात होती हैं । स्वस्वरूप का आवेश साधक की आत्मा में
'मैं पर शिव ही हूँ' इस तरह की बुद्धि के रूप में होता है । जैसे लोक में ब्रह्मराक्षस से
आविष्ट व्यक्ति अपने को ब्रह्मराक्षस ही मानता है, उसी तरह पराहन्ता से भरा हुआ
१. 'स्थ' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । २. स्वसृष्टये-ख. ज. उ., स्वहृदये-ने. ।
३. मयी-क. ग. । ४. 'कुल' नास्ति-ने. झ. उ. । ५. वचनात्-ख. ने. ज. उ. ।
६. अद्वैतलक्षणपरप्रमातृयोग आसां ता-ख. ने. ज. ब. उ. । ७. लक्षणा-ख. ने. ज. झ. उ. ।
८. कात्मनः-ख. ने. ज. झ. उ. । ९. तत्र तत्रेति सार्वत्रिकः पाठः ।

व्यज्यते प्रभोः” (श्लो० ११४) इति विज्ञानभैरवभट्टारकोक्तरीत्या सर्वत्र ¹तदावेश-
तदभेदेन स्फुरणं करोतीति सर्वावेशकरे चक्रे षष्ठे चक्रे सर्वरक्षाकरे। काकेभ्यो
दधि रक्षतामितिवत् प्रतिकूलपदार्थादुपहतिपरिहारो रक्षा नाम। सर्वस्माद् भेद-
प्रपञ्चलक्षणात् परिपन्थिनो रक्षा परशिवाभेदप्रतीतिरूपा, तत्करे। पराः पर-
शिवाद्धैतप्रतिपादनपरत्वा²दुत्कृष्टाः। सर्वज्ञाद्या "सर्वज्ञा सर्वशक्तिश्च" (१।१७३)
इत्यादिचतुःशतीशास्त्रोक्ताः स्थिताः ॥१४७-१४९॥
तासां ध्यानमाह—
एताः सह पुस्ताक्षमालिकाः ॥ १४९ ॥
पुस्तं पुस्तकम्। शिष्टं स्पष्टम् ॥१४९॥
व्यक्ति अपने को पर शिव ही मानने लगता है। इस आवेश दशा का निरूपक है यह चक्र।
इसीलिये इसको सर्वावेशकर कहते हैं। विज्ञानभैरव भट्टारक ने बताया है—¹“जहाँ
जहाँ मन जाता है”, “इन्द्रिय मार्ग से जहाँ जहाँ प्रभु का चैतन्य व्यक्त होता है, सर्वत्र
प्रभु का ही स्वरूप दिखाई पड़ता है”। इस तरह से सर्वत्र भगवान् के ही स्वरूप को
अभिन्न रूप से भासित कराने वाला यह सर्वावेशकर नामक षष्ठ चक्र सर्वरक्षाकर भी
कहलाता है। काक (कौआ) से दधि (दही) की रक्षा करो, ऐसा कहने पर जैसे सभी
प्राणियों से रक्षा करने का अभिप्राय निकलता है, उसी तरह से यह चक्र भी सभी विप-
रीत परिस्थितियों से साधक की रक्षा करता है। समस्त भेदप्रपंचरूप प्रतिकूल पदार्थों
(शत्रुओं) से रक्षा का अभिप्राय शिव के साथ अभेद प्रतीति की प्रथा का निरन्तर
विस्तार है। यह चक्र इसी रक्षा का संपादक है। सर्वज्ञा आदि शक्तियों का यहाँ ‘पराः’
विशेषण इस लिये दिया गया है कि परमशिव के साथ अद्वैत संबन्ध का प्रतिपादन करने
के कारण ये शक्तियाँ उत्कृष्ट मानो जातो हैं। चतुःशती शास्त्र (१।१७३-१७५) में इन
सर्वज्ञा आदि दस शक्तियों के नाम बताए गये हैं ॥१४७-१४९॥
अब इनका ध्यान बताते हैं—
इन सभी के हाथों में पुस्तक और अक्षमाला है ॥१४९॥
पुस्त का अर्थ पुस्तक है। बाकी का अर्थ स्पष्ट है ॥१४९॥
१. तत्पदावेशस्तदभेदेन स्वस्यैव स्फु-ख. झ. उ. । २. त्वात् सर्वो-ख. ।

  1. विज्ञानभैरव के दो श्लोकों के अंश यहाँ उद्धृत हैं। भाषानुवाद में इनका विस्तृत
    विवेचन देखा जा सकता है।

तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३४१
नामव्युत्पत्तिपुरःसरं १चक्रेशीमाह—
मातृमानप्रमेयाणां पुराणां परिपोषिणी ।
त्रिपुरामालिनी ख्याता चक्रेशी सर्वमोहिनी ॥ १५० ॥
२परसंवित्स्पन्दरूपत्वान्मातृमानमेयान्येव पुराणि, तेषां पुराणां परिपोषिणी
प्रधानेनोपबृंहिणी। अत एव त्रिपुरामालिनी ख्याता निरुक्ता। ३चक्रेशी षष्ठचक्रेशी
सर्वमोहिनी। ४एतत्कृतमोहवशादेव हि मातृमानप्रमेयरूपा ५प्रथा। तदुक्तं परा-
पञ्चाशिकायाम्—"६स्वाङ्गरूपेषु ७भावेषु मायातत्त्वं विभेदधीः" (श्लो० २१)
इति ॥१५०॥
विद्याशक्तिविशुद्धिं च सिद्धिं प्राकाम्यसंज्ञिताम् ।
एताः सर्वोपचारेण पूजयेद् देवताः क्रमात् ॥ १५१॥
मन्त्राः पुरुषवाच्याधिष्ठिताः, विद्याः स्त्रीरूपवाच्याधिष्ठिताः। अत एव
नाम की व्युत्पत्ति के साथ चक्रेश्वरी का वर्णन करते हैं—
माता, मान और प्रमेय लक्षण पुरत्रय की यह पोषिका है। इसीलिये यह
सर्वमोहिनी चक्रेशी त्रिपुरामालिनी कहलाती है ॥ १५०॥
माता, मान और प्रमेय लक्षण पुरत्रय परा संवित् का ही स्पन्दन है। इन तीन पुरों
को यह त्रिपुरामालिनी परिपुष्ट करती है, प्रधानतः इनका उपबृंहण करती है। इसीलिये
यह इस नाम से प्रसिद्ध है। यह षष्ठ चक्र की स्वामिनी सबको मोह में डाले रहती है।
यह चक्रेशी जिस मोह को पैदा करती है, उसी के कारण माता, मान और प्रमेय स्वरूप
पुरत्रय की कल्पना सजीव हो उठती है। परापंचाशिका में बताया गया है—"यह सारा
भाव जगत् शिव का अपना ही स्वरूप है। मायातत्त्व के ही कारण इनमें परस्पर भेदबुद्धि
जग जाती है" ॥१५०॥
इस षष्ठ चक्र में त्रिपुराविद्या की शक्ति से प्राप्त हुई प्राकाम्य नामक सिद्धि
के साथ चक्रेशी की और आवरण देवताओं की भी सभी उपचारों से पूजा
करे ॥१५१॥
१पुरुष-देवता के वाचक मन्त्र और स्त्री-देवता की वाचक विद्या कहलाती है। इसी
१. चक्रेश्वरो—क. ग.। २. 'पर''''बृंहिणी' इत्यस्य स्थाने 'सर्वेषां स्वप्रथाप्रदानेनोप-
बृंहिणी' इति पाठः—ख. ने. ज. ब. उ.। ३. चक्रे षष्ठचक्रे—क. ग.। ४. अत एव
तत्कृत—ख. ने. ज. उ.। ५. भेदप्रथा—झ.। ६. स्वांश—क. ग.। ७. भानेषु—क. ग.,
भागेषु—ख. ने. ज. झ. उ.।
१. ऋजुविमर्शिनी (पृ० ४२-४३) मूल तथा टिप्पणी देखिये।

३४२ योगिनीहृदयम् [पूजासंकेतः
विद्याशक्तेः सौभाग्यविद्यावर्णवाच्यायाः षट्त्रिंशत्तत्त्वमय्या विशुद्धिस्तदतीत-
परचिल्लक्षणा, तद्रूपाम्। प्राकाम्यसंज्ञितां१ सिद्धिं कामना२नुरूपलक्षणाम्। तदुक्तं
महाकविभिः-
द्रवः संघातकठिनः स्थूलः सूक्ष्मो लघुर्गुरुः।
व्यक्तो व्यक्तेतरश्चासि३ प्राकाम्यं ते विभूतिषु ॥ इति।
(कु० स० २।११)
एता देवताः४, क्रमात् प्रथमम् आवरणदेवताः, पश्चाच्चक्रेशीम्, ततः सिद्धि-
मिति क्रमात्। सर्वोपचारेण। जाता५वेकवचनम्। ६सर्वोपचारैः पूजयेदि-
त्यर्थः ॥१५१॥
सप्तमचक्रे पूजां सवासनामाह-
निरुद्धवायुसंघट्टस्फुटितग्रन्थिमूलतः।
हृदयान्तरसंवित्तिशून्यपुर्यष्टकात्मना ॥१५२॥
लिये विद्याशक्ति की, अर्थात् सौभाग्यविद्या नामक पंचदशाक्षरी विद्या की, जो कि
छत्तीस तत्त्वों की समष्टिरूपिणी है, विशुद्धि तब होती है, जब कि तत्त्वातीत परचित्स्व-
रूप में वह एकाकार हो जाय। इसी अवस्था में साधक अपनी कामनाओं के अनुरूप
प्राकाम्य नामक सिद्धि को प्राप्त कर सकता है। इस सिद्धि के विषय में महाकवि कालि-
दास ने कहा है-
हे ब्रह्मन्! द्रव रसात्मक नदी, समुद्र आदि, संघातकठिन पर्वत आदि, स्थूल, सूक्ष्म
लघु, गुरु, व्यक्त (कार्य) और अव्यक्त (कारण) इन सभी स्वरूपों में आप विद्यमान हैं।
यह सब आपकी प्राकाम्य नामक सिद्धि का प्रसाद है। अर्थात् ये सब परस्पर विरोधी गुण
प्राकाम्य नामक सिद्धि के प्रसाद से ही आप में विद्यमान हैं॥
इसका अभिप्राय यह है कि प्राकाम्य नामक सिद्धि के मिल जाने पर साधक उक्त
सभी स्वरूपों को अपनी इच्छा के अनुसार प्राप्त कर सकता है। इस चक्र में उक्त देव-
ताओं की क्रम से पूजा करनी चाहिये। १पहले आवरण देवताओं की, बाद में चक्रेशी की
और तब सिद्धि की, इस क्रम से सभी उपचारों से इनकी पूजा करनी चाहिये ॥१५१॥
अब सातवें चक्र में वासना के साथ पूजाविधि बताते हैं-
निरुद्ध वायु के संघट्ट से जिसको ग्रन्थियाँ खुल गई हैं, ऐसे मूलाधार चक्र से
उठ कर हृदय पद्म में स्थित संवित्ति में जो सूक्ष्म पुर्यष्टक के रूप में स्थित हैं,
१. संज्ञिकां-क. ग.। २. नारूप-क. ग. उ.। ३. श्चापि-क. ग.। ४. इतः परम्-
'सर्वज्ञाद्याश्चक्रेशीसिद्धियुताः' इत्यधिकं-ख. ने. ज. झ. उ.। ५. वेकत्वम्-ख. ज. झ.।
६. सर्वैरूप-ख. ने. झ.।
१. इस पूरे प्रकरण में पूजा का यही क्रम जानना चाहिये।

तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३४३
बीजरूपस्वरकलास्पृष्टवर्गानुसारतः ।
रहस्ययोगिनीर्देवीः¹ संसारदलनोज्ज्वले ॥१५३॥
सर्वरोगहरे चक्रे संस्थिता वीरवन्दिते ।
वशिन्याद्याः
²निरुद्धयोः परिहृतस्वैराचारयोः, वायोः प्राणापानयोः, संघट्टात् "गुद-
माकुञ्च्य बहुशः प्राणापानौ निरुध्य च । संयोज्य ते" इत्यभियुक्तवचनोक्तरीत्या
संयोगात्, स्फुटितो ग्रन्थिः सुषुम्नान्तर्गतमूलाधारकमलपर्यन्तं वसन्, तादृशं मूलं
मूलाधारम् । ततो हृदयान्तरसंवित्तिशून्यपुर्यष्टकात्मना । "ध्यायन् भुजगाकृतिं
हुङ्कारविह्वलज्योतिः पवनक्षेपमनोभिर्गमयेदूर्ध्वम्" इत्यभियुक्तवचनोक्तरीत्या मूला-
दुत्थितायाः ³कुण्डलिनीरूपायाः "ततो हृदयपद्मान्तः स्फुरन्तीं सांविदीं⁴ कलाम्"
(सु० ३४) इत्यभियुक्तवचनोक्तरीत्या हृदयान्तरे स्फुरन्त्याः संवित्तेश्चिदात्मनः,
चितिश्चत्तं च चैतन्यं चेतना⁵द्वयकर्म च ।
जीवः कला ⁶शरीरं च सूक्ष्मं पुर्यष्टकं मतम् ॥
उन वशिनी आदि देवियों की बीजरूप स्वर-कलाओं से संस्पृष्ट वर्गों का उच्चा-
रण करते हुए पूजा करे । हे वीरवन्दिते ! ये वशिनी आदि रहस्ययोगिनी देवियाँ
संसार के दलन में समर्थ सर्वरोगहर चक्र में निवास करती हैं ॥१५२-१५४॥
जिनकी मनमानी गति को रोक दिया गया है, उन प्राण और अपान वायुओं के संघट्ट
से ग्रन्थियों का भेदन हो जाता है, अर्थात् "गुदा का संकोच कर और बार-बार प्राणायाम
के अभ्यास से प्राण और अपान की गति को नियन्त्रित कर इनको एक में मिला देना चाहिये"
किसी प्रामाणिक व्यक्ति के द्वारा बताई गई इस विधि से प्राण और अपान का संयोजन
करने पर सुषुम्ना नाडी के अन्तर्गत मूलाधार आदि चक्रों में विद्यमान ग्रन्थियाँ टूट जाती
हैं । तब मूलाधार से उठकर कुण्डलिनी शक्ति, हृदय में स्थित संवित्ति ही शून्य (सूक्ष्म)
पुर्यष्टक का स्वरूप धारण कर लेती है । इस प्रसंग में किसी अभियुक्त ने कहा है—"भुजग
(सर्प) के समान आकृति वाली कुण्डलिनी शक्ति का ध्यान करते हुए, हुंकार से इस कुण्ड-
लिनी रूप दीपशिखा को कंपाते हुए, पवन की गति के साथ मन का संयोजन कर
इसको ऊपर उठाये" । इसी तरह से मूलाधार से उठी इस कुण्डलिनी शक्ति का शिवानन्द
मुनि के शब्दों में हृदयपद्म में स्फुरित हो रही संवित्ति कला के रूप में ध्यान करे ।
हृदय में स्फुरित हो रही इस संवित्ति कला से ही स्वच्छन्दसंग्रह में वर्णित सूक्ष्म पुर्यष्टक
का स्फुरण होता है, जैसे कि—
१. देवि-ख. ने. च. छ. ज. झ. ड. । २. 'निरु''''दुर्लक्ष्यत्वात्' नास्ति-ख. ने. ज. ड. ।
३. कुण्डलिन्याः-झ. । ४. संविदं-झ. । ५. नेन्द्रिय-झ. । ६. च देवेशि-क. ग. झ. ।

३४४ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः
इति स्वच्छन्दसंग्रहोक्तरीत्या सूक्ष्मपुर्यष्टकानां सूक्ष्मतया दुर्लक्ष्यत्वा¹च्छून्य[त्व]-
मिति। “हृत्पुण्डरीकं पुरमध्यसंस्थम्” (म० ना० ८।१६) इति ²श्रुत्युक्तरीत्या
पुरं शरीरं चिदष्टकरूपं शून्यशरीरं शून्यपुर्यष्टकम्, तदात्मना तद्रूपेण³, संस्थिता
इत्यनुषङ्गः। “द्विधेयं मातृका देवी बीजयोन्यात्मना स्थिता” (श्लो० ४०) इति
परापञ्चाशिको⁴क्तरीत्या बीजरूपाः ⁵“स्वरा अकारादिविसर्गान्ताः कलाः षोडश,
ताभिः स्पृष्टा अवर्गेण युता वर्गाः कचटतपयशाः, तेषाम् अनुसारतः “अवर्गः प्रथमो
देवि वशिनो तत्र संस्थिता” (१।७७-८०) इत्यादिचतुःशतीशास्त्रोक्ताः⁶, “उद्धरेत्
प्रथमं रेफम्” (१।८१-८६) इत्यादिचतुःशतीशास्त्रोद्धृतस्वस्वबीजानुसारतः क्रमात्
स्वस्ववर्गान्ते स्वस्वबीजमुच्चार्य पूजयेदित्यर्थः ।
चिति, चित्त, चैतन्य, ज्ञानेन्द्रिय, कर्मेन्द्रिय, जीव, कला और शरीर इन आठ तत्त्वों
को सूक्ष्म पुर्यष्टक माना जाता है ॥
यह सूक्ष्म पुर्यष्टक अपनी सूक्ष्मता के कारण बहुत कठिनाई से दिखायी पड़ता है,
इसीलिये इसको 'शून्य' नाम से जाना जाता है। “हृदय पुण्डरीक (पद्म) पुर (शरीर) के
मध्य में स्थित है” इस श्रुतिवचन के अनुसार चिदष्टकरूप यह शून्य-शरीर सूक्ष्म पुर्यं-
ष्टक के नाम से प्रथित है। इनकी अधिष्ठात्री वशिनी आदि देवियाँ यहीं निवास करती
हैं। परापंचाशिका में बताया गया है- “यह मातृका देवी बीज और योनि के भेद से
द्विधा विभक्त हो जाती है”। ¹बीजरूप हैं अकार से विसर्ग पर्यन्त सोलह स्वर । इस
सोलह कलाओं वाले अवर्ग के साथ क च ट त प य श के वर्ग के क्रम से इनका उद्धार
किया जाता है। “हे देवि! पहला अवर्ग है, इसमें वशिनी स्थित है” इत्यादि क्रम से
चतुःशती शास्त्र (१।७७-८०) में इनका उद्धार बताया गया है। वहीं (१।८१-९६)
“पहले रेफ का उद्धार करे” इत्यादि क्रम से इनके बीजों का भी उद्धार किया गया है।
तदनुसार सूक्ष्म पुर्यष्टक की स्वामिनी वशिनी आदि आठ शक्तियों की अपने अपने वर्ग के
अन्त में अपने अपने बीजों का उच्चारण करते हुए ²पूजा करे।
१. सूक्ष्ममत्र शून्यमित्युच्यते-ख. ने. ज. झ. उ. । २. श्रत्युक्त्या-ख. ने. ज. झ. उ. ।
३. णैताः-ख. ने. ज. झ. उ. । ४. कोक्त्या-ने. । ५. आदित्वरा अकारादिविसर्गान्ताः
षोडशस्वराः कलाः, ताभिः-ख. ने. ज. उ. । ६. कत्वात्-ख. ने. ज. झ. उ. ।

  1. दीपिकाकार ने पहले (२।३७) ककार आदि व्यंजनों को बीज माना है और वहाँ
    चिद्गगनचन्द्रिका के अतिरिक्त परापञ्चाशिका के प्रस्तुत श्लोक को भी प्रमाण के
    रूप में उद्धृत किया है। पृ० १५४ की टिप्पणी देखिये ।
  2. शुभगोदय (पृ० २८६-२८७) में इसी क्रम से पूजाविधि बताई गई है।