योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३३० योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः
सन्धिवर्णा ¹व्योमेराग्निजलं धरा" (शा० ति० ७।२)। इति तन्मयं चतुर्दशारचक्र-
मित्यर्थः ।।१३६-१३८।।
सम्प्रदायक्रमायातसौभाग्यदायकशब्दयोर्वासनामाह—
शक्तेः सारमयत्वेन प्रसृतत्वान्महेश्वरि ।।१३८।।
सम्प्रदायक्रमायाताश्चक्रे सौभाग्यदायके² ।
शक्तेरिच्छाशक्तेः कुण्डलिन्याः, सारः प्रसारः, पूर्वोक्तरीत्याऽकुलस्थानस्थाऽ-
नुत्तरशिवसंसर्गः, तन्मयत्वेन तदुत्पन्नतत्वात्, एतेषां वर्णानां तैर्वर्णैः प्रसृतत्वात्
सर्वसंक्षोभिण्यादिशक्तीनां सम्प्रदायक्रमायातत्वम्, "सम्प्रदायो महाबोधरूपो
गुरुमुखे स्थितः" (२।३६) इति पूर्वोक्तरीत्या गुरु³मुखादधिगतत्वाद् वर्णोत्पत्तेः ।
आसां च तन्मयत्वम् । अत एव ⁴ताः सम्प्रदायक्रमायाता इत्यर्थः ।।१३८-१३९।।
¹आगमान्तर (शारदातिलक) में पाँच ह्रस्व स्वर, चार सन्धि वर्ण और आकाश, वायु,
अग्नि, जल तथा पृथिवी वाचक पाँच वर्णों के रूप में इनका उद्धार किया गया है । चतु-
र्दशार चक्र इन चौदह भूतलिपि वर्णों से सम्पन्न है ।।१३६-१३८।।
अब सम्प्रदायक्रमायात और सौभाग्यदायक शब्दों की वासना बताते हैं—
हे महेश्वरि ! कुण्डलिनी शक्ति के प्रसार से उत्पन्न होने के कारण सर्व-
संक्षोभिणी आदि शक्तियों के स्वरूप का ज्ञान सम्प्रदाय से ही, गुरु-परम्परा से
ही प्राप्त हो सकता है । अतः सर्वसंक्षोभिणी आदि सम्प्रदाय योगिनियों की
सौभाग्यदायक चक्र में पूजा करनी चाहिये ।।१३८-१३९।।
शक्ति का, इच्छा शक्ति कुण्डलिनी का, प्रसार ऊपर बताई गई पद्धति से अकुल
स्थानगत अनुत्तर शिव पर्यन्त होता है । कुल कुण्डलिनी और अकुल शिव के संपर्क से ही
समस्त वर्णों की उत्पत्ति मानी जाती है । ऊपर बताये गये चौदह भूतलिपि वर्णों से
सर्वसंक्षोभिणी आदि चौदह शक्तियों का स्वरूप बनता है, इसका ज्ञान सम्प्रदाय क्रम से
ही प्राप्त हो सकता है । यहाँ पहले ही बताया गया है कि सम्प्रदाय क्रम से प्राप्त होने
वाला उत्तम ज्ञान गुरु के मुँह में विद्यमान है (२।२६) । इस तरह से वर्ण की उत्पत्ति
की प्रक्रिया का ज्ञान गुरुमुख से ही प्राप्त हो सकता है और ये सर्वसंक्षोभिणी आदि
१. द्योर्वाय्व-क. ग. ने. । २. कारके-ने. ज. झ. उ. । ३. वक्त्रावगतत्वाद्-ख. ने.
ज. ञ. झ. उ. ४. एताः-ख. झ. ।
- आगमान्तर के नाम से उद्धृत यह श्लोक शारदातिलक (७।२) में मिलता है ।
इससे शारदातिलककार की स्थिति अमृतानन्द से पहले मानी जायगी । इस प्रसंग में
लुप्ता० उपो० के पृ० ४६ की टिप्पणी देखिये । दीपिकाकार के अनुसार शारदातिलक
आगमान्तर है । अतः इसको श्रीसम्प्रदाय का ग्रन्थ नहीं माना जा सकता ।