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योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

१२६ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः
ज्ञातृज्ञानमयाकारमेनेनान्मन्तरूपिणी² ।
शिवशक्त्यात्मसंघट्टर रूपे शिवशक्त्यात्मनोः प्रकाशविमर्शयोः संघट्टः सामर-
स्यम्, तद्रूपे ब्रह्मणि, "³बृह वृद्धौ" (७३५ भ्वा०) इत्यस्माद् धातोर्बृंहणत्वादात्मैव
ब्रह्मेति ⁴वैयाकरणोक्तरीत्या सर्वप्राणिष्वात्मनि । शाश्वते भूतभविष्यत्कालशा-
लिनि । तत्प्रथाप्रसराश्लेषभुवि । तच्छब्देन प्रकाशात्मा परामृश्यते । श्रीभगवद्गी-
तायाम्—"ॐ तत् सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः” (१७।२३) इति ।
⁵तस्य शिवस्य ⁶प्रकाशमयस्य प्रथा विमर्शशक्तिः, यथा दीपस्य⁷ प्रभा तद्वत्,
तस्याः प्रसरः षट्त्रिंशत्तत्वात्मना परिणामः, तस्याश्लेषः ⁸शिवे तन्मात्रतया
पर्यवसानम्, तस्य भुवि विश्रान्तिस्थाने । अत्र श्रुतिः—"सर्वं खल्विदं ब्रह्म
तज्जलानिति शान्त उपासीत” (छा० उ० ३।१४।१) इति । ऐन्द्रोपलक्ष्ते,
के रूप में ज्ञाता के ज्ञानमय आकार की चिन्ता करने वाले साधक की रक्षा करने
वाली होने से यह विद्या मन्तरूपिणी है ॥१९-२०॥
शिवशक्त्यात्मसंघट्टरूप का अर्थ है शिव और शक्ति स्वरूप प्रकाश और विमर्श का
सामरस्यमय आकार । यह आकार ही ब्रह्म कहलाता है । वृद्धि अर्थ वाली बृह धातु से
यह शब्द बनता है । व्याकरण शास्त्र में ब्रह्म पद की यही व्युत्पत्ति दी गई है । अपने
विस्तार के कारण यह ब्रह्म सभी प्राणियों की आत्मा के रूप में स्थित है । यह शाश्वत है,
भूत, भविष्य और वर्तमान तीनों कालों में विद्यमान है । तत्प्रथा इत्यादि समस्त पद में
विद्यमान तत् शब्द से ब्रह्म का प्रकाशात्मक स्वरूप बोधित होता है । भगवद्गीता में
बताया गया है—"ॐ, तत् और सत्—इन तीन शब्दों से ब्रह्म का बोध होता है" । उस
प्रकाशात्मक ब्रह्मस्वरूप शिव की प्रथा है विमर्श शक्ति । दीपक की प्रभा के समान यह
शक्ति प्रकाशात्मक शिव की प्रभा है । यह प्रभा ही ३६ तत्त्वों के रूप में परिणत हो जाती
है और इसका आश्लेष अर्थात् विलय भी शिव में ही होता है । इसका भाव यह है कि
विमर्श शक्ति सृष्टि दशा में ३६ तत्त्वों के रूप में परिणत होती है और वही संहार दशा में
केवल शिवस्वरूप में पर्यवसित (विलीन) हो जाती है । इस तरह यह प्रकाशात्मक शिव
शक्ति की विश्रामस्थली है । छान्दोग्य श्रुति इसमें प्रमाण है—"यह सब कुछ ब्रह्म है ।
संयत-चित्त साधक को चाहिये कि वह इस प्रकार की भावना करे कि ब्रह्म से ही सब कुछ
पैदा हुआ है, उसी में लीन होने वाला है और उसी की सामर्थ्य से यह सांस ले रहा है" ॥
१. करणा-ख. ग. च. छ. ज. झ । २. णीम्-ख. ग. ने. च. छ. ज. झ. ।
३. बृहि बृंहि-ने. ज. । ४. वैयासिकतन्त्रोक्त-ज. झ. उ. । ५. 'तस्य' नास्ति-ख. ग.
ने. ज. झ. उ. । ६. प्रकाशस्य-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । ७. दीपस्य तत्प्रथायाः
प्रसरः-ख. ने. ज. झ. उ. । ८. शिवेस्तन्मात्रतया-ख. ग. ने. ज. झ. उ. ।

द्वितीयः ] दीपकाभाषानुवादसहितम् १२७
"इदि१ परमैश्वर्ये" (६३ भ्वा०), परमैश्वर्यवानिन्द्रः । अत्र श्रुतिः—"इन्द्रो मायाभिः
पुरुरूप ईयते" (ऋ० ४।७।३३) इति । तत्संबन्धि ऐन्द्रं कर्म, तेनोपलक्षिते । काक-
वद् देवदत्तगृहमितिवद् विश्वसर्जनादिव्यवहारोऽस्योपलक्षणम्, न तु स्वरूपधर्म
इति यावत् । प्रकाशविमर्शसामरस्यरूपे नित्ये विश्वसृष्टिस्थितिसंहारकारिणि
२साक्षिणि तत्प्रकृत्यात्मक३महदैश्वर्यपरामृष्टे परमात्मनि विषये ४ज्ञातृज्ञानमया-
कारमननाद् ज्ञातुरादरनैरन्तर्यपाटवाभ्याससद्भाव५तत्प्रकर्षलक्षणमननात् तन्मया-
कार६भावणालक्षणत्राणान्मन्त्ररूपिणी७ । कोऽर्थः ? उक्तविशेषण८विशिष्टपरप्रकाश-
विषयमननात् स्वसाधकं तन्मयरूपताप्रतिपादनेन त्रायत इति निरुक्त्या तुरीय-
लक्षणमहामन्त्ररूपिणीयमित्यर्थः ॥१९-२०॥

'इदि' धातु का अर्थ परम ऐश्वर्य होता है । इन्द्र शब्द इसी धातु से बना है । इन्द्र परम
ऐश्वर्य सम्पन्न होता है । ऋग्वेद में वर्णन आया है कि "इन्द्र अपनी माया से अनेक रूप
धारण कर लेता है" । यह ब्रह्म भी इन्द्र के समान सभी शक्तियों से सम्पन्न है "कौवा वाला
घर देवदत्त का है" इस वाक्य से देवदत्त के घर की पहचान मात्र कराई जाती है, उस
घर से कौए का कोई नित्य संबन्ध नहीं है; उसी तरह से विश्व की सृष्टि आदि व्यापारों
से ब्रह्म का परिचय मात्र कराया जाता है, ब्रह्म का यह शाश्वत स्वरूपधर्म नहीं है । संक्षेप
में इसका अर्थ यह होगा कि प्रकाशविमर्शसामरस्यस्वरूप, नित्य, विश्व की सृष्टि,
स्थिति और संहार के कर्ता और उसके साक्षी, अपनी शक्ति (प्रकृति) के रूप में महान्
ऐश्वर्य से संपन्न इस परमात्मा के स्वरूप में जो ज्ञाता (साधक) आदर पूर्वक सावधानी
से निरन्तर अपने चित्त को लगाता है और तन्मय होकर उसी में अपनी भावना को केन्द्रित
किये रहता है, तो इस अवस्था में यह शक्ति उसकी रक्षा भी करती है । मनन करने वाले
साधक की रक्षा करने वाली यह शक्ति उस समय मन्त्ररूपिणी हो जाती है, मन्त्र
(श्रीविद्या) का स्वरूप धारण कर लेती है । इसका भाव यह है कि ऊपर बताये गये विशे-
षणों से विभूषित ब्रह्म के परम प्रकाशमय स्वरूप का मनन करने वाले साधक को ब्रह्म-
मयता प्रदान कर उसकी रक्षा करने वाली यह तुरीया स्वरूप महाविद्या मननत्राणरूप
मन्त्र के धर्मों को धारण करती है, अतः मन्त्ररूपिणी कहलाती है ॥ १९-२० ॥

१. 'इदि परमैश्वर्ये' नास्ति-ख. ने. ज. उ. । २. 'साक्षिणि' नास्ति-ख. ग. ने. ज.
झ. उ. । ३. माहैश्वर्य-ने. ज. झ. उ. । ४. 'ज्ञातृज्ञानमयाकारमननाद्' नास्ति-ख. ग.
ने. ज. झ. उ. । ५. मननवत्तस्त-ख. ने. झ. उ. । ६. करण-ख. ने. ज. झ. ।
७. णीमित्यर्थः-ने. । ८. 'विशिष्ट' नास्ति-ख. ज. झ. उ. ।

१२८ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः
ननूक्तविशेषणविशेषिता तुरीयमन्त्ररूपिणीयं¹ किल्लक्षणेत्यत आह—
तेषां समष्टिरूपेण पराशक्तिस्तु मातृका ॥२०॥
“तन्मयीम्” (२।१८) इति पूर्वोक्तमेव । तेषां ब्रह्मादीनां भारत्यादीनां च
सृष्ट्यादिसमष्टिरूपलक्षणेन लक्षिता पराशक्तिः । तुरवधारणे । पराशक्तिरेव,
न तस्य कार्यं करणं च विद्यते न तत्समश्चाभ्यधिकश्च दृश्यते ।
पराऽस्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च ॥
(श्वे० उ० ६।८)
इतिश्रुतिप्रतिपादिता परैव मातृका,
अखिलमनाहतमूर्तिर्मात्युत्तीर्णस्वरूपिणी तरति ।
कायति नानानामप्रपञ्चरूपेण मातृका देवी ॥ (सौ० सु० १।६)
उक्त विशेषणों से विभूषित तुरीय मन्त्ररूपिणी श्रीविद्या के स्वरूप का अब वर्णन
करते हैं—
ब्रह्मा-भारती आदि मिथुनों के सृष्टि आदि समस्त कार्यकलापों को अपने में
समेटे हुए यह परा शक्ति ही मातृका (परा वाणी) है ॥२०॥
तुरीय मन्त्र का स्वरूप पहले (२।१८) बताया गया है । यह मन्त्रस्वरूपिणी तुरीय
विद्या ब्रह्मा-भारती आदि तीन मिथुनों के सभी तीन कृत्यों को अपने में समेटे हुए है ।
इसलिये यही परा शक्ति है । 'तु' शब्द का प्रयोग होने से यह अर्थ निकलता है कि
परा शक्ति में ही यह सामर्थ्य है कि उसमें ये तीनों कृत्य समष्टि रूप में स्थित हैं ।
श्वेताश्वतर उपनिषद् में—
न वह किसी को पैदा करती है और न उसको कोई पैदा करता है । उसकी समानता
करनेवाला जब कोई नहीं है तो भला उससे बढ़कर कौन दिखाई देगा । इस ब्रह्म की
परा शक्ति ही ज्ञान, बल, क्रिया आदि विविध रूपों में सुनी जाती है ॥
इस प्रकार वर्णित यह परा शक्ति ही परा मातृका है । इसका स्वरूप स्वयं व्याख्या-
कार ने अपने ग्रन्थ सौभाग्यसुधोदय में इस तरह से बताया है—
यह परा मातृका देवी अपनी ¹अनाहत मूर्ति से सबको व्याप्त कर लेती है, अपने
उत्तीर्ण स्वरूप से सबसे ऊपर उठ जाती है और इस जगत् में आकर नाना प्रकार के
१. 'इयं' नास्ति—ख. ने. ज. उ. ।
१. अनाहत, हत और उत्तीर्ण पद क्रमशः मध्यमा, वैखरी और पश्यन्ती वाणी के
वाचक हैं । अतः अनाहत मूर्ति का अर्थ होगा मध्यमा वाणी, उत्तीर्णस्वरूपिणी पश्यन्ती
तथा नाना नाम प्रपंचवाली होगी वैखरी वाणी । इस तरह से परा वाणी ही क्रमशः
पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी वाणी का रूप धारण करती हुई संसार में फैली हुई है।

द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १२९
इत्यस्मदुक्तरीत्या ¹परा मातृका पश्यन्ती-मध्यमा-वैखरीरूपेण व्यापृता।
अत्र श्रुतिः—
चत्वारि वाक् परिमिता पदानि तानि विदुर्ब्राह्मणा ये मनीषिणः।
गुहा त्रीणि निहिता नेङ्गयन्ति तुरीयं वाचो मनुष्या वदन्ति॥ इति।
(ऋ० १।१६४।४५)
नामों (शब्दों) का शरीर धारण कर लेती है। इस तरह से माति, तरति और कायति
इन तीन धातुओं से मातृका का स्वरूप बनता है।
परा मातृका ही इस तरह से पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी वाणी का स्वरूप
धारण कर सबमें व्याप्त रहती है। ऋग्वेद में भी इनका वर्णन है—
¹वाणी के चार प्रकार होते हैं। इनके स्वरूप को मनीषी ब्राह्मण ही जान पाते हैं।
वाणी के तीन स्वरूप छिपे हुए हैं। इसके चतुर्थ वैखरीमय स्वरूप का ही मनुष्य
उच्चारण करते हैं॥
१. 'परा' नास्ति-ख. ज. झ. उ. ।

  1. निरुक्त (१३।९) और महाभाष्य (पस्पशाह्निक) में इस मन्त्र की व्याख्या
    मिलती है। सायण ने प्रथमतः निरुक्त के अनुसार इसकी व्याख्या कर बाद में आगम-
    तन्त्रशास्त्र संमत व्याख्या की है। महाभाष्य के व्याख्याकार कैयट ने पूरी तरह से महा-
    भाष्य का अनुसरण किया है, किन्तु नागेश भट्ट व्याकरण संमत व्याख्या देने के बाद आगम-
    तन्त्रशास्त्र संमत व्याख्या भी करते हैं। निरुक्तकार ने यहां आर्ष (सायण के अनुसार
    वेदवादी), वैयाकरण, याज्ञिक, नैरुक्त, ऐतिहासिक (निरुक्त में इस मत को 'एके'
    शब्द से संबोधित किया गया है) और आत्मवादियों के मत के अनुसार चार पदों का
    अलग अलग विवरण दिया है। इस सभी मतों में पूरे मन्त्र की व्याख्या में खींचतान
    करनी पड़ती है। नागेश भट्ट का कहना है कि नाम, आख्यात, उपसर्ग और निपात इन
    चतुर्विध पदों में से, जो कि निरुक्त और व्याकरण में समान रूप से मान्य हैं, प्रत्येक के
    चार चार भेद होते हैं। वाणी के प्रथम तीन भेदों के समान इनके भी प्रथम तीन रूपों
    को विद्वान् ही जान सकते हैं। साधारण जन केवल चतुर्थ रूप से ही अपना व्यवहार चलाते
    हैं। वाणी के परा, पश्यन्ती और मध्यमा नामक तीन भेद जैसे छिपे हुए हैं और चतुर्थ
    वैखरी वाणी से ही सांसारिक व्यवहार चलता है, उसी तरह से नाम, आख्यात, उपसर्ग
    और निपातों के तीन छिपे हुए और एक प्रकट रूप का कहीं भी स्पष्ट उल्लेख नहीं
    मिलता। अतः इस मन्त्र की सायणकृत आगम-तन्त्र संमत व्याख्या ही उचित लगती है,
    जिसको नागेश भट्ट ने भी स्वीकार किया है।
    ९

१३० योगिनीहृदयम् [ मन्त्र संकेत:
१अयमर्थः—ब्रह्मादिभारत्यादिसमष्टिरूपतालक्षणा २पश्यन्ती-मध्यमा-वैखरी-
विस्तारप्रकाशविमर्शसामरस्यरूपा तुरीयमन्त्र३वाच्येति ॥२०॥
नन्वियमकारहकारसामरस्यरूपा परैव तुरीय४मन्त्रविशेषणविशेषिता तुरीय-
पदवाच्येत्युक्तम्, तद्वर्णद्वयं मन्त्रे कुत्र निवसतौति (चेत्५), एतन्मन्त्रस्य तद्वर्ण-
द्वयवाच्यायाः ६परायाश्च कः संबन्ध इत्यत आह—
मध्यबिन्दुविसर्गन्तःसमास्थानमये परे।
कुटिलारूपके तस्याः प्रतिरूपे वियत्कले ॥२१॥
तस्याः परायाः। मध्यबिन्दुविसर्गन्तःसमास्थानमये। मध्यबिन्दुरूध्वं बिन्दु-
रकारहकारसामरस्यरूपः कामाख्यः। तदुक्तं कामकलाविलासे—
“बिन्दुरहङ्कारात्मा रविरेतन्मिथुनसमरसाकारः।
कामः कमनीयतया” (श्लो० ७) इति।
विसर्ग७स्तन्निरासरूपो बिन्दुद्वयात्मकः अःकारः षोडशस्वरः। तदुक्तं तत्रैव—
इसका भाव यह है कि ब्रह्मा-भारती आदि मिथुनों को समष्टि रूप में अपने में समेटे
हुए यह प्रकाशविमर्शस्वरूपिणी परा वाणी ही पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी वाणी का
भी स्वरूप धारण करती है और यही अपने तुरीय स्वरूप में श्रीविद्या नामक परम मन्त्र
के रूप में प्रतिष्ठित है ॥ २० ॥
अकार (प्रकाश) और हकार (विमर्श) के सामरस्यमय स्वरूप वाली यह परा वाणी
ही तुरीय मन्त्र के सभी विशेषणों से संयुक्त होने से तुरीय कही गई है। ये दो वर्ण विद्या
में कहां हैं ? तथा इस मन्त्र और उक्त वर्णों से बोधित होने वाली परा वाणी का परस्पर
क्या संबन्ध है ? इस विषय को अब समझाते हैं—
अकार और हकार नामक ये दो अक्षर मध्यबिन्दु और विसर्ग के बीच में
स्थित हैं। उस परा वाणी का कुटिल आकार वाली अकुल और कुलकुण्डलिनी
में प्रतिबिम्बित स्वरूप ही बिन्दु और कला के नाम से जाना जाता है ॥ २१ ॥
मध्यबिन्दु का अर्थ है ऊर्ध्व बिन्दु, अकार और हकार का समरस स्वरूप काम नाम
का बिन्दु। इसका वर्णन कामकलाविलास में इस तरह से किया गया है—“यह बिन्दु
अहंकार स्वरूप है। इसका नाम रवि है। इसमें दोनों बिन्दु समरस भाव से रहते हैं। यह
समरसभाव सबके लिये कमनीय है, अतः इसे काम भी कहते हैं”। बिन्दुद्वयात्मक विसर्ग
१. एव-ख. ने. ज. उ. । २. परा-पश्यन्तो-ते. । ३. मन्त्रपद-ख. ने. ज. उ. ।
४ 'तुरीयमन्त्रविशेषणविशेषिता' नास्ति-ख. ने. ज. उ. । ५. चेत्पदमनावश्यकम् ।
६. 'परायाः' नास्ति-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । ७. विसर्गश्च बिन्दुन्यासरूपं बिन्दुद्वयं
न त्वकारः । तदुक्तं-खं. ग. ने. उ. ।

२. द्वितीय विश्राम: मन्त्र-संकेत (कादि-हादि विद्या, मातृका एवं वर्ण-संकेत)

द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १३१
'कला च दहनेन्दुविग्रहौ बिन्दू' (श्लो० ७) इति । तयोरन्तः 'कामस्य
कलायाश्च द्वयोरपि मध्ये समास्थानमये २निवासस्वरूपे । परे अहाक्षरे । वर्णाना-
माद्यन्तत्वादन्त्यापेक्षयाऽऽदेरकारस्य परत्वम्, आद्यापेक्षयाऽन्त्यस्य हकारस्य पर-
त्वम् । तेन परे अक्षरे ३वर्णानामाद्यन्ते अकारहकाररूपे ४अक्षरे कथ्येते ।
कुटिलारूपके कुटिले अकुलकुलकुण्डलिन्यौ, कुटिलरूपत्वात् । ५एते एव रूपे ययो-
स्तयोः ६प्रतिबिम्बरूपे वियत्कले । वियच्छब्देन शून्यं लक्ष्यते । तेन वियद् बिन्दुः,
कला बिन्दुद्वयमात्रावती हकारलिपिः । कोऽर्थः ? ७अकारः ८शिवशक्तिसामरस्य-
रूपाकारः तद्भासरूपकलाक्षरावयव ९रूपबिन्दुद्वयान्तर्गतमात्रारूपे निवसति ।
उस मूल बिन्दु से १निकला रस है, जो कि सोलहवें स्वर अःकार का स्वरूप धारण करता
है। इसका नाम कला है। कामकलाविलास में इसका भी स्वरूप वर्णित है—"अग्नि
और चन्द्र (अग्नीषोम) नामक दो बिन्दु इस काम की कलाएं हैं"। इन दोनों के, काम
और कला के मध्य में निवास करने वाले पर अक्षर हैं अकार और हकार । अकार और
हकार की स्थिति वर्णों के आदि और अन्त में है। अन्त में विद्यमान हकार की अपेक्षा से
आदिभूत अकार पर है और प्रथम अकार की अपेक्षा से अन्तिम हकार पर है। इस तरह
से ये दोनों ही अक्षर परस्वरूप हैं। अकुल और कुल ये दोनों कुण्डलिनियां अपने कुटिल
आकार के कारण ही कुण्डलिनी कहलाती हैं। वियत् (बिन्दु) और कला इन्हीं कुण्डलिनियों
में प्रतिबिम्बित परा वाणी का स्वरूप है। वियत् (आकाश) शब्द शून्य का द्योतक है।
अतः शून्याकार बिन्दु यहां वियत् शब्द से बोधित होता है। २बिन्दुद्वयात्मक मात्रा
वाली हकार लिपि यहाँ कला शब्द से जानी जाती है। इसका अभिप्राय यह होगा कि
अकार शिव और शक्ति के सामरस्य स्वरूप का द्योतक है। यह अपने निवास के रूप में
कल्पित कला नामक अक्षर के अवयवभूत बिन्दुद्वय के अन्तर्गत विद्यमान मात्रा में निवास
करता है। परा वाणी स्वरूप ये ही दोनों काम (अकार) और कला (हकार) नामक अक्षर
अकुल और कुलकुण्डलिनी का स्वरूप धर लेते हैं, क्योंकि ये दोनों कुण्डलिनियां परा
१. कामाख्यकलयोर्द्वयोरपि-ख. ने. ज. झ. उ. । २. निरास-क. ग. ने. ।
३. लिपीना-ख । ४. अहाक्षरे-ने. । ५. तत्स्वरूपे तयोः-ख. ने. ज. झ. उ. । ६. प्रतिरूपे
बिम्बरूपे-ज. । ७. 'अकारः' नास्ति-ख. ज. झ. उ. । ८. शिवशक्तिसामरस्यरूपमयोर्ध्व-
बिम्बन्तर्गतो निवसति हकारः, तस्य व्यासरूपकला-ख. ने. ज. झ. उ. । ९. 'रूप' नास्ति-
ख. ने. झ. उ. ।
१. टीकाकार ने यहाँ निरास पद का प्रयोग किया है। इसका अभिप्राय यह है कि
बबूल, पीपल आदि के वृक्षों से जैसे गोंद, लाह आदि का उनके रस के रूप में प्रादुर्भाव
होता है, उसी तरह से काम बिन्दु से उसके रस के रूप में कला (विसर्ग) प्रकट होती है।
२. बिन्दुद्वयात्मक मात्रा वाली हकार लिपि से यहाँ विसर्ग का ग्रहण करना चाहिये ।

१३२ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः
¹अहौ एव द्वे अप्यक्षरे अकुलकुलकुण्डलिनीरूपे पराया रूपे, तदवयवत्वात्, तयोः
परारूपयोः प्रतिबिम्बरूपे ²अहंकाराक्षरैऽकारहकारयोः स्फुरितत्वात् ॥२१॥
मन्त्रनिदान³भूतकामकलायामकारहकारयोः स्थितिं व्युत्पाद्येदानीं मन्त्रे
तद्वर्णद्वयस्य स्थितिमाह—
मध्यप्राणप्रथारूपस्पन्दव्योम्नि स्थिता पुनः ।
मध्यमे मन्त्रपिण्डे तु तृतीये पिण्डके पुनः ॥२२॥
राहुकूटॉद्वयस्फूर्जत्
मध्यमे मन्त्रपिण्डे वाग्भवशक्तिबीजयोर्मध्यगते कामराजबीजाख्ये षडक्षर-
पिण्डे । मध्यप्राणप्रथारूपस्पन्दव्योम्नि स्थिता पुनः⁴ । मध्यप्राणः कामकलाधो-
गतबिन्दुद्वयमध्यगतप्राणो हकारः, तस्य प्रथा पृथुत्वेन प्रतीतिः, श्रुतिगोचरत्वात्,
तद्रूपं स्पन्दव्योम हकारः, तस्मिन् व्योम्नि पुनः स्थिता, हकारस्य विमर्शशक्ति-
स्फूर्तिमयत्वात् । तदुक्तं संकेतपद्धत्याम्—"हकारोऽन्त्यः कलारूपो विमर्शाख्यः
प्रकीर्तितः" इति ।
वाणी की ही अंगभूत हैं और इन परा-स्वरूपा कुण्डलिनियों के प्रतिबिम्ब स्वरूप एक
समरस अहंकाराक्षर से ही अकार और हकार वर्णों की उत्पत्ति होती है ॥ २१ ॥
सभी मन्त्रों की उत्पत्ति में कारणभूत कामकला में अकार और हकार की स्थिति को
स्पष्ट करने के बाद मन्त्र में उन दोनों वर्णों की स्थिति स्पष्ट की जाती है—
मध्यम मन्त्रपिण्ड(कामराज बीज) में मध्यप्राण की प्रथा के रूप में विद्यमान
स्पन्द रूपी व्योम (हकार) में यह स्थित है। तृतीय पिण्ड (शक्ति बीज) में तो
यह राहुकूट में तृतीय स्थान पर विद्यमान सकार के अकार के रूप में स्थित
है ॥२२-२३॥
मध्यम मन्त्रपिण्ड में, वाग्भव और शक्तिबीज के मध्यवर्ती कामराज बीज नामक छः
अक्षरों वाले पिण्ड मन्त्र में, मध्यप्राण, अर्थात् कामकलाक्षर के अधोगत दो बिन्दुओं
के मध्य में स्थित प्राण (हकार) की जो स्थूल रूप में श्रवणेन्द्रिय द्वारा प्रतीति होती है,
उसी को स्पन्द व्योम (हकार) कहा जाता है । इसी स्थूल स्पन्दनात्मक हकार में वह विद्या
स्थित है, अर्थात् इस प्रकार उक्त मन्त्रराज में कामकलागत हकार वर्ण स्थित है, क्योंकि
हकार का स्वरूप विमर्श शक्ति से ही स्फुरित होता है । संकेतपद्धति में यह बताया गया
है—"कलारूप अन्तिम वर्ण हकार विमर्शा नाम से जाना जाता है" ।
१. सतो द्वे द्वे आद्याक्षरे-झ. उ. । २. बिन्द्वाकारा-ग. ने. झ. उ. । ३. निगम-
४. 'पुनः' नास्ति-ख. ने. ज. झ. ।

द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १३३
तृतीये पिण्डके शक्तिबीजाख्ये चतुरक्षरपिण्डे । पुनस्त्वर्थे १ द्वितीयबीजवत्
स्फुटीभावेन न स्फुरति, किन्तु राहुकूटाद्वयस्फूर्जत् । राहुकूटः शषसहानां वर्णानां
२वर्गकूतो वर्णसमूहः । यथा पञ्चकूटः षट्कूट इति । राहुकूटेऽद्वयो वर्णो द्वितीया-
दन्यस्तृतीयः सकारः, तद्गर्गतृतीयवर्णत्वात् । षोढान्यासे शषसहा राहुवर्गः । अत्रैव
वक्ष्यति—"वक्त्रे शादिचतुर्वर्णैः सहितं राहुमेव च" (३।२५) इति । पुना राहु-
कूटाद्वयस्फूर्जदिति । राहुकूटे तृतीयसकारोपरि अविभागेन स्फूर्जत् प्रकाशमानं
सकलवर्णाद्यमनुत्तर ३मक्षरम् । तदुक्तं संकेतपद्धत्याम्—"अकारः सर्ववर्णाद्यः
प्रकाशः परमः शिवः" इति । ४कोऽर्थः ? परावयवभूतावकारहकारावेव काम-
कलोर्ध्वबिन्दौ मात्रायां च स्थित्वा पुनः स्थूलभावमासाद्य पृथग्भूतौ कामराज-
बीजान्तर्गतककारलकारमध्यगतहकारे शक्तिबीजादि ५गतसकारादूर्ध्वगताकारे
६चाधिवसत इत्यर्थः ॥२२-२३॥
ननु ७प्रथमपिण्डे विद्यमानेऽपि मध्यपिण्डे तृतीयपिण्डे च परावयवभूतयोरकार-
हकारयोः ८कथमवस्थानमुक्तम् ? प्रथमबीजे किमिति नोक्तम् ? उच्यते—दक्षिण-
शक्ति बीज नामक चार अक्षरों वाले तृतीय पिण्ड मन्त्र में तो द्वितीय बीज के समान
अक्षर की प्रतीति स्पष्ट नहीं होती, किन्तु राहुकूट में, अर्थात् श ष स ह नामक वर्णों के
कूट (समूह) में, विद्यमान तृतीय वर्ण सकार के ऊपर अविभक्त रूप में स्थित सभी वर्णों
के प्रथम अक्षर अकार के रूप में प्रकाशमान है। संकेतपद्धति में भी बताया गया है—
"अकार सभी वर्णों में प्रथम है। यही प्रकाशात्मक परम शिव का प्रतीक है"। पंचकूट
षट्कूट आदि शब्द पाँच, छः आदि संख्या वाले वर्णसमूह को कहते हैं। राहुकूट स ष स
ह इन चार वर्णों के समूह से बना राहुवर्ग है। आगे (३।३४) राहुवर्ग के नाम से ही इन
चार वर्णों का परिचय दिया गया है। राहुकूट (राहुवर्ग) का अद्वय अर्थात् दो से भिन्न
तीसरा वर्ण सकार है। इस प्रकरण का वास्तविक अभिप्राय यह है कि परा वाणी के अवयव
भूत अकार और हकार ही कामकलागत ऊर्ध्वबिन्दु और मात्रा में सूक्ष्म रूप से स्थित हैं।
फिर स्थूल रूप में आकार ये अलग अलग हो जाते हैं और कामराज बीज में विद्यमान
ककार और लकार के बीच में हकार के रूप में और शक्ति बीज के प्रारंभ में स्थित सकार
के आगे अकार के रूप में अपनी स्थिति बना लेते हैं ॥ २२-२३ ॥
यहाँ प्रश्न उठता है कि प्रथम पिण्ड के रहते हुए ही उसको छोड़कर यहाँ मध्य पिण्ड
और तृतीय पिण्ड में परा वाणी के अवयवभूत अकार-हकार की स्थिति कैसे बता दी
१. श्चार्थः-ख. ग. ने. झ. । २. वर्गः । तथा च पञ्चकूटं षट्कूटमिति । राहुकूटे-
क. ज. झ. उ. । ३. त्तराक्षरम्-ख. ने. ज. झ. उ. । ४. 'कोऽर्थः' नास्ति-ख. ग. ने.
ज. झ. उ. । ५. भूत-क. ख. ग. । ६. च निव-ख. ने. ज. झ. उ. । ७. 'प्रथमपिण्डे
विद्यमानेऽपि' नास्ति-क. ख. ग. । ८. कथमवस्थानमुच्यते-ख. ने. ज. झ. उ. ।

स्रोतःपक्षपातिन्याः सौभाग्यदेवतायाः परायाः परापरशक्तिप्रधानत्वात् स्थितेश्च
परापरशक्त्यैधिष्ठितत्वान्मध्यबीजस्य स्थितिरूपत्वात् तत्र विमर्शकरेवस्थान-
मुक्तम् । शिवस्य संहाररूपत्वाच्छक्तिबीजस्य च संहारात्मकत्वात् प्रकाशस्य
तत्रावस्थानमुक्तं विशेषेण । सामान्यतस्तु वाग्भवे । अत एव तदक्षरद्वयसंबन्धात्
तद्विश्व²मयत्वं परायाः कथितमित्याह—
चलत्तासंस्थितस्य तु ।
धर्माधर्मस्य वाच्यस्य विषामृतमयस्य च ॥२३॥
वाचकाक्षरसंयुक्तैः³ कथिता विश्वरूपिणी ।
तेषां समष्टिरूपेण पराशक्तिं तु मातृकाम् ॥२४॥
गई ? प्रथम बीज में इनका निरूपण क्यों नहीं किया गया ? इसका उत्तर यह है कि परा
शक्तिस्वरूपिणी सौभाग्यविद्या की उपासना प्रधान रूप से दक्षिणाम्नाय की पद्धति से होती
है। यहाँ परापर शक्ति प्रधान मानी गयी गई है। स्थिति नामक कृत्य को यह परापर शक्ति
ही सम्पन्न करती है। मध्य बीज भी स्थिति का प्रतिनिधि माना गया है। इसीलिये सब
से पहले यहाँ मध्य बीज में विमर्श शक्ति की, हकार की स्थिति बताई गई है। शिव
संहार का अधिष्ठाता है। शक्ति बीज भी संहार का प्रतिनिधि है। अतः संहारात्मक
प्रकाश की, प्रकाशात्मक शिव के प्रतिनिधि अनुत्तर अकार की स्थिति संहारात्मक शक्ति
बीज में यहाँ बाद में बताई गई है। इस प्रकार अकार और हकार की उक्त विशेष स्थिति
द्वितीय तथा तृतीय बीज में ही है। वाग्भव बीज में इनकी स्थिति सामान्य रूप में ही
है। अब आगे यह बताया जा रहा है कि इन्हीं दो अक्षरों से संबद्ध होकर यह विश्वोत्तीर्ण
परा वाणी विश्वमय हो जाती है, ३६ तत्त्वों वाले विश्व का रूप धारण कर लेती है—
स्पन्दावस्था की ओर उन्मुख, विष (संसार) और अमृत (मोक्ष) मय धर्म
(शिव) और अधर्म (शक्ति) रूपी वाच्य अर्थ जब वाचक अक्षरों से संवलित हो
जाता है, तो यह ¹विश्वोत्तीर्ण महाविद्या विश्वमय हो जाती है। तब तीन-तीन
संख्या वाले सभी पदार्थों की समष्टिस्वरूपिणी यह परा मातृका तीन कूटों का
१. शक्त्यन्वित-ख. ने. ज. झ. उ. । २. रूपत्वं-क. ख. ने. ज. झ. । ३. संयोगात्-
क., संबन्धात्-ङ ।

  1. विश्वोत्तीर्ण और विश्वमय तत्त्व की चर्चा हम पहले (पृ० १५ की टिप्पणी)
    कर चुके हैं। यहाँ उसी विषय की स्पष्ट चर्चा हुई है। इससे यह निश्चित हो जाता है
    कि शाक्त-मत, विशेष कर त्रिपुरादर्शन, तत्त्व को विश्वमयता का ही प्रतिपादक न
    होकर इस प्रसंग में पूरी तरह से त्रिक मत का अनुसरण करता है।

द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १३५
कूटत्रयात्मिकां देवीं समष्टिव्यष्टिरूपिणीम् ।
आद्यां शक्तिं भावयन्तो भावार्थं १ इति मन्वते ॥२५॥
चलतो भावश्चलत्ता, तस्यां संस्थितस्य । चलत्वं नामात्र नश्वरत्वम् । अत्र
विशिष्टक्रियाविद्याचक्रतत्त्वादिसकलप्रपञ्चावस्थितस्य धर्माधर्मस्य पूर्वोक्त(१।६७)-
निर्वचनधर्माधर्मपदवाच्यस्य शिवशक्तिद्वयस्य । विषामृतमयस्य च । विषं संसारः,
मोहहेतुत्वात् । अमृतं मृतं मरणं तद्रहितत्वान्मुक्तिः । अत्र श्रुतिः—"तमेवं विद्वान-
मृत इह भवति" (तै० आ० ३।१।३) इति । तन्मयस्य, तदुभयहेतुत्वात् । तयो-
र्वाच्यस्याभिधेयस्य वाचकाक्षर२संयुक्तैस्तदुभयात्मकशिवशक्तिमयवाच्यवाचकाकार-
हकारसंयोगाद् विश्वरूपिणी विद्याचक्रतत्त्वादिमयरूपिणी । अत एव च तेषां
सर्वेषां समष्टिरूपेण त्रित्रिमयेन सर्वेण पराशक्ति विश्वोत्तीर्णस्य परशिवस्य
मातृकामुक्त(२।२०)निर्वचनाम् । ३कूटत्रयात्मिकां वाग्भवकामराजशक्ति४बीजा-
त्मिकाम् । देवीं प्रकाशविमर्शसामरस्यरूपाम् । अत एव समष्टिव्यष्टिरूपिणीं
स्वरूप धारण कर व्यष्टिरूपिणी बन जाती है। इस तरह से समष्टि और व्यष्टि
स्वरूपिणी इस आद्या शक्ति की ऊपर बताई गई विधि से भावना करना ही
भावार्थ कहलाता है ॥२३-२५॥
चलने वाला स्वभाव चलता (स्पन्दनशीलता) कहलाता है। यहाँ चलता का अर्थ
नश्वरता है। इस चलता में जो संस्थित हैं, विशिष्ट क्रिया, विद्या, चक्र, तत्त्व आदि समस्त
स्पन्दनशील नश्वर प्रपंच में जो भलीभाँति बैठे हुए हैं, वे धर्म और अधर्म पद के वाच्य
शिव और शक्ति अपनी मोहकता के कारण इस विषमय संसार के और मरण धर्म से
रहित अमृत पद, मुक्ति के भी प्रदाता हैं। वाच्य (अभिधेय) स्वरूप का जब वाचक अक्षरों से
संयोग हो जाता है, अर्थात् शब्द और अर्थ इन दोनों रूपों में विद्यमान शिव और शक्ति जब
वाच्य रूप में स्थित होकर इनके वाचक अकार और हकार अक्षरों से संयुक्त हो जाते हैं,
तो यह परा विद्या विद्या, चक्र, तत्त्व आदि का स्वरूप धारण कर विश्वमय बन जाती है,
विश्व में उतर आती है। धर्म पद शक्ति का और अधर्म पद शिव का वाचक है, इसकी
व्युत्पत्ति पहले (१।६७) बता चुके हैं। अमृत पद मुक्ति का वाचक है, इसमें यहाँ तैत्ति-
रीयारण्यक का प्रमाण दिया गया है। इस प्रकार यह विश्वोत्तीर्ण परा शक्ति विश्वमय हो
जाती है। इसी लिए तीन तीन संख्या वाले उन समस्त पदार्थों की समष्टिरूपिणी यह
विश्वोत्तीर्ण शिव की पराशक्ति मातृका, जिसका निर्वचन पहले (२।२०) किया जा चुका
है, वाग्भव, कामराज और शक्ति बीज स्वरूप तीन कूटों वाली प्रकाश-विमर्श के सामरस्य
से परिपूर्ण देवी का स्वरूप धारण कर लेती है। इन दो विशेषताओं के कारण ही यह
१. र्थमिति-क. ख. ने. उ. । २. संयोगात्-क. ग. । ३. 'कूटत्रयात्मिकाम्' नास्ति-
४. त्मिकां - क. ख. ग. घ.

१३६ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः
सामरस्याकारेण समष्टिरूपिणीं कूटत्रयात्मना व्यष्टिरूपिणीमिति। आद्यां शक्तिं
सकलजगदादित्येति पूर्वोक्त(२।१३)क्रमेण भावयन्तो योगिनो भावार्थं
मन्वते ॥२३-२५॥
भावार्थमुक्त्वेदानीं सम्प्रदायार्थमाह—
सम्प्रदायो महाबोधरूपो गुरुमुखे स्थितः।
विश्वाकारप्रथायास्तु महत्त्वं च यदाश्रयम् ॥२६॥
सम्यग् याथाथ्येन कर्णे शिष्यस्य प्रदीयत इति सम्प्रदायः। महाबोधरूपः
महतो देशकालाकारैरनवच्छिन्नस्य प्रकाशस्य बोधः परिज्ञानं रूपं यस्य तादृशः।
गुरुमुखे स्थितः
१गृणीते तत्त्वमात्मीयमात्मीकृतजगत्त्रयम्।
उपायोपेयरूपाय शिवाय गुरवे नमः॥
इत्यभियुक्तवचनोक्तरीत्या २स्वात्मपरमार्थप्रकटनपरो गुरुः, तस्यैव मुखे स्थितः,
समष्टिव्यष्टिरूपिणी है, अपने सामरस्यमय स्वरूप के कारण समष्टिरूपिणी और कूट-
त्रयात्मक रूप के कारण व्यष्टिरूपिणी है। आद्यशक्ति की व्युत्पत्ति पहले (२।१३) बताई
गई है। उस आद्या शक्ति को यहाँ बताये गये क्रम से श्रीविद्या के प्रत्येक अक्षर के अर्थ
के रूप में भावना करने को ही योगी जन भावार्थ मानते हैं ॥२३-२५॥
भावार्थ का उपदेश कर अब 'सम्प्रदायार्थ' का वर्णन करते हैं—
महाबोध रूपी सम्प्रदायार्थ गुरु के मुख में स्थित है, क्योंकि तीन बीजों का
स्वरूप धारण कर विश्वमय बनी श्रीविद्या का रहस्य वहीं छिपा हुआ है ॥२६॥
सम्प्रदाय शब्द का अर्थ है सम्यक् विधिपूर्वक जो शिष्य के कान में दिया जाता है।
यह सम्प्रदाय महाबोध रूप है, देश, काल, आकार से अपरिच्छिन्न महान् प्रकाशात्मक
शिव का परिज्ञान कराना इसका लक्ष्य है। यह गुरु के मुख में स्थित है। किसी अभि-
युक्त ने गुरु को इस तरह से प्रणाम निवेदन किया है—
सारे जगत् को अपनी ही आत्मा के रूप में देखने-दिखाने वाले अपने ज्ञान को जो
अपने शिष्य के कान में शब्द के रूप में देता है और जो स्वयं शिवस्वरूप भी है, उपाय
बताने वाला और उपेय (प्राप्तव्य) भी जो स्वयं ही है, उस गुरु को मैं प्रणाम करता हूँ ॥
इस तरह से स्वात्मस्वरूप के वास्तविक अभिप्राय को गुरु ही प्रकट करता है। यह
ज्ञान शिवस्वरूप गुरु के मुख में ही रहता है, किसी अन्य के मुख में नहीं। इसका
१. गृणते-ग. ने. ज. झ. ड. । २. आत्मपरमात्मप्रक-ख. ने. ज. ड. ।
[श्लोक संख्या २६ से ४१ तक सम्प्रदायार्थ का वर्णन किया गया है।]

द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १३७
नान्यस्यानाकलितागमशास्त्रस्यानधिगताखिलवेद^१वेदाङ्गस्यानवधारितपरमार्थस्य
^२परप्रतारणपरस्य मुखे स्थितः । अत्र प्रमाणवचनम्—
सर्वज्ञो हि शिवो वेत्ति सदसच्चेष्टितं नृणाम् ।
तेनासौ नानुगृह्णाति किञ्चिज्ज्ञस्य गुरोर्गिरा ॥ इति ।
अत्र गुरोरिति गुरुमानिनः, किञ्चिज्ज्ञस्य गुरुत्वाभावात् । ^३विश्वाकारप्रथायाः ।
विश्वं शिवादिक्षित्यन्तं षट्त्रिंशत्तत्त्वात्मकम्, तदाकारप्रथा चिच्छक्तिः, अत्र श्रुतिः--
"स ईक्षत लोकान्नु सृजा इति" (ऐ० उ० १।१) इति, तस्या महत्त्वं ^४तदाकार-
कारित्वम्, यदाश्रयम् । कोऽर्थः ? परशिवसामरस्यरूपाया^५ बीजत्रयरूपेण परिण-
ताया विश्वमयतावासना गुरुमुखेनैव लभ्यत इत्यर्थः ॥२६॥
विश्वाकारप्रथायास्तु महत्त्वं च यदाश्रयमित्यस्यैवार्थं विवृण्वन् वक्तव्यार्थस्य
महत्त्वाद्यन्तसावधानतया त्वया श्रोतव्यमित्याह—
अभिप्राय यह है कि जिसने आगम शास्त्र का और वेदांगसहित समस्त वेदों का अध्ययन
नहीं किया है तथा जिसने परमार्थ तत्त्व का विचार नहीं किया है, जो दूसरों को मात्र
ठगने में लगा रहता है, उसके पास से यह ज्ञान नहीं मिल सकता । निम्न श्लोक इसमें
प्रमाण है—
शिव सर्वज्ञ है । वह मनुष्यों की सभी अच्छी और बुरी हरकतों को जानता है ।
इसलिये वह अल्पज्ञ गुरु की वाणी के द्वारा किसी पर अनुग्रह नहीं करता ॥
इस श्लोक में विद्यमान गुरु शब्द उस मिथ्याभिमानी गुरु के लिये प्रयुक्त हुआ है,
जो दूसरों को ठगने में लगा है, क्योंकि अल्पज्ञ व्यक्ति सही अर्थ में गुरु नहीं हो
सकता । यह विश्व शिव से लेकर पृथिवी पर्यन्त ३६ तत्त्वों से बना है । चिच्छक्ति ही
इस विश्व का रूप धारण कर लेती है । ऐतरेयोपनिषद् कहती है—'उस ब्रह्म ने विचार
किया कि मैं इस विश्व की सृष्टि करूँ' । विश्वमय बनी इस चिच्छक्ति के स्वरूप को
पहचानना गुरुकृपा पर ही निर्भर है । इसका भाव यह है कि परशिव के साथ सामरस्य
रूप में अवस्थित परा वाणी ही तीन बीजों वाली श्रीविद्या के रूप में परिणत होती है ।
उसके इस विश्वमय स्वरूप को समझने-विचारने की कुंजी गुरुमुख से ही प्राप्त हो
सकती है ॥२६॥
अब शिव पूर्व श्लोक के उत्तरार्ध की स्पष्ट व्याख्या करना चाहते हैं । यह विषय
अत्यन्त गम्भीर है, अतः भगवान् सावधानी से सुनने का निर्देश दे रहे हैं—
१. वेदान्त-क. ख. ग. उ. । २. 'परप्रतारण' नास्ति-ख. ने. ज झ. । ३. 'विश्वा-
कारप्रथायाः' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । ४. तदाकारत्वं-ख. ज. झ. उ. । ५. रूपायाः

१३८ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः
शिवशक्त्याद्यया मूलविद्यया परमेश्वरि ।
जगत्कृत्स्नं तयो व्याप्तं शृणुष्वावहिता प्रिये ॥२७॥
शिवः अकारः, शक्तिर्हकारः, तावाद्यौ हेतुभूतौ यस्याः सा, तथाविधया
पूर्वोक्तरीत्या प्रथाभूतया मूलविद्यया कृत्स्नं २जगदुक्तरूपं व्याप्तम् । शृणुष्वावहिता
अत्यन्तसावधाना शृणुष्व ॥२७॥
विद्यायां३ विश्वव्याप्तिमेव प्रतिजानीते—
पञ्चभूतमयं विश्वं तन्मयी सा सँदाऽनघे ।
तन्मयी मूलविद्या च तत्तथा कथयामि ते ॥२८॥
पञ्चभूतमयं विश्वं भूतानि पृथिव्यप्तेजोवाय्वाकाशास्तन्मयं५ विश्वम् उक्त-
हे परमेश्वरि ! शिव (अकार) और शक्ति (हकार) से उत्पन्न यह मूलविद्या
सारे जगत् को कैसे व्याप्त किये हुए है, इस बात को अब तुम बहुत सावधानी से
सुनो ॥२७॥
यहाँ शिव शब्द अकार का और शक्ति शब्द हकार का वाचक है । ये ही दोनों
वर्ण उस मूलविद्या के कारण हैं, अर्थात् इन्हीं दो वर्णों के विस्तार से मूलविद्या का
स्वरूप बनता है। इस मूलविद्या का जब विस्तार होता है, तो यह ३६ तत्त्वों से बने
इस सारे जगत् को व्याप्त कर लेती है। कैसे व्याप्त कर लेती है, यही अब मैं बताने
जा रहा हूं। इस विषय को तुम बहुत सावधानी से सुनो ॥२७॥
अब विद्या की इस विश्वव्याप्ति को ही बताते हैं—
यह विश्व पंचभूतमय है। हे अनघे ! वह परा देवता भी पंचभूतमयी है और
यह मूलविद्या परा देवता और पंचभूत दोनों का बोध कराती है, इसी विषय को
अब मैं तुम्हें कह रहा हूँ ॥२८।
यह विश्व १पंचभूतमय है, पृथिवी, जल, तेज, वायु और आकाश इन भूतों से बना
१. यथा-ख. ग. च. छ. ने. ज. झ. । २. जगदेवभूतं यथा व्याप्तमुक्तप्रकारेण
रूपेणेति, अत एव तास्ववहिता अत्यन्त-ख. ने. ज. झ. उ. । ३. यां विश्वव्याप्तं तत्त्वमेव-
ख. ने. ज. झ. उ. । ४. सदानी-ख. ग. ने. ज., सनातनी-छ. झ. । ५. 'तन्मयं'
नास्ति-ख. ने. झ. उ. ।
१. शिव पंचमंत्रतनु है। पाशुपत मत के अनुसार वामदेव आदि पाँच मंत्रों से ही
पाँच तत्त्वों के रूप में पंचमहाभूतों की उत्पत्ति मानी जाती है। इनका स्वरूप अन्य
दर्शनों में प्रतिपादित स्वरूप से भिन्न है। आगे स्वयं दीपिकाकार ने स्वच्छन्दसंग्रह के
प्रमाण देकर इस बात को सिद्ध किया है। आगे ग्रन्थ में द्रष्टव्य है। (२८ पृ. १५८ से १७२)

द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १३९
(१।४१) लक्षणम् । १सा परा सौभाग्यदेवता तन्मयी पञ्चभूतात्मिका । मूलविद्या-
ऽपि तन्मयी तद्वाचिका देवतावाचिका पञ्चभूतवाचिका च । अत एव तदुभयमयी ।
तत्प्रकारं कथयामीत्यर्थः । “तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः संभूतः । आकाशाद्
वायुः । वायोरग्निः । अग्नेरापः । अद्भ्यः पृथिवी" (तै० उ० २।१।१) इत्युपनिष-
दुक्तरीत्या प्रकाशात्मकात् परमशिवात् पञ्चभूतानामुत्पत्तिः, २विमर्शात्मिकायाः
शक्तेस्तद्वाचकानां विद्यावर्णानामुत्पत्तिरिति हि स्थितिः ॥२८॥
एवं स्थितेऽस्याः किं वाच्यं किं वाचकमिति शङ्कां परिहरन् वर्णभूतसृष्टि-
प्रतिपादनपुरःसरं विश्वमयतामेवाह—
हकाराद् व्योम संभूतं ककारात्तु प्रभञ्जनः ।
रेफादग्निः सकाराच्च जलतत्त्वस्य संभवः ॥२९॥
हुआ है। पहले (१।४१) बताया जा चुका है कि शिव से पृथ्वी पर्यन्त ३६ तत्त्वों का
समष्टिभूत नामरूपात्मक जगत् ही विश्व है। सौभाग्यदेवता परा भगवती महात्रिपुर-
सुन्दरी है। यह परा सौभाग्यदेवता पंचभूतमयी बन जाती है। उस सौभाग्यदेवता
की वाचिका सौभाग्यविद्या भी तन्मयी हो जाती है, अर्थात् परा देवी की पंचभूतात्मकता
के कारण यह विद्या पांच भूतों को भी सौभाग्यदेवता के साथ ही प्रतीति कराने लगती
है। इसीलिये यह सौभाग्यविद्या सौभाग्यदेवता और पंचभूत दोनों की वाचिका है। यह
कैसे होता है, उसी को मैं कह रहा हूँ। तैत्तिरीयोपनिषद् का कहना है—“उस ब्रह्म-
स्वरूप आत्मा से आकाश की उत्पत्ति हुई ! आकाश से वायु, वायु से अग्नि, अग्नि से
जल और जल से पृथ्वी उत्पन्न हुई"। इस उपनिषद् के प्रमाण से प्रकाशात्मक¹ परम
शिव से पांच महाभूतों की उत्पत्ति हुई और विमर्शात्मक शक्ति से इन पांच महाभूतों के
वाचक विद्यागत वर्णों की उत्पत्ति हुई, यही वास्तविक स्थिति है ॥२८॥
विद्यागत वर्णों और पांच भूतों के इस वाच्यवाचकभाव संबन्ध को स्पष्ट करते हुए
अब बताया जा रहा है कि विद्यागत वर्णों से ही पंचभूतों की सृष्टि होती है और इस
तरह से यह विद्या विश्व के रूप में अपना विस्तार कर लेती है—
हकार से आकाश की उत्पत्ति होती है। ककार से वायु, रेफ से अग्नि और
१. लक्षणा-क. ग. ज. । २. विश्वात्मिकाया विमर्शशक्तेः-क. ग. ।
भावों में तेजस्तत्त्व की, विद्या, ईश्वर और सदाशिव में वायुतत्त्व की तथा शक्ति और
शिव में व्योम तत्त्व की अभिव्याप्ति है। पंचतत्त्वदीक्षा के प्रसंग में स्वच्छन्दतन्त्र (५।१३)
में इन पाँच तत्त्वों की व्याप्ति निवृत्ति, प्रतिष्ठा आदि कलाओं की व्याप्ति के अनुसार
बताई है। प्रायः सभी शैवशास्त्र के ग्रन्थों में दीक्षा के प्रसंग में यह विषय वर्णित है।

  1. प्रकाशविमर्शात्मक यामल स्वरूप का संक्षिप्त विवेचन विज्ञानभैरव भाषानुवाद
    की पृ० ४-९ की टिप्पणी में देखिये ।

१४० योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः
लकारात् पृथिवी जाता तस्माद् विश्वमयी च सा ।
हकाराद् व्योम संभूतं प्रथमं विमर्शशक्तेराकाशवाचको हकारो जातः,
^१हकारानन्तरं तद्वाच्यं व्योम प्रकाशात्मनः परशिवात् संभूतम् । पश्चाद् वायु-
वाचकः ककारो जातः ककारानन्तरं ककारवाच्यः प्रभञ्जनः संजातः । तत्पश्चा-
दग्निवाचको रेफः संजातः, तदनन्तरं रेफवाच्योऽग्निः ^२संजातः । ततो
जलतत्त्ववाचकः सकारः संजातः, ^३तदनन्तरं तद्वाच्यजलतत्त्वस्य संभवः ।
तदनन्तरं पृथिवीवाचको लकारो जातः, ^४तदनन्तरं तद्वाच्या पृथिवी जातेत्यर्थः ।
^५तस्मात् शिवशक्तिसामरस्यरूपपरावयवप्रकाशविमर्शाभ्यां ^६पञ्चमहाभूतानि
तद्वाचकान्यक्षराणि च यस्माज्जातानि, तस्मात्तदुभयसामरस्यरूपा सा परा
स्वावयवभूतवर्ण^७मयी विश्वमयीत्यर्थः । तदुक्तं कामकलाविलासे—
'स्फुरितारुणाद् बिन्दोर्नादब्रह्माङ्कुरो^८ रवो व्यक्तः ।
तस्माद् गगनसमीरणदहनोदकभूमिवर्णसंभूतिः ॥९॥
सकार से जलतत्त्व उत्पन्न होता है। लकार से पृथिवी पैदा होती है। इस तरह
से वह परा देवी विश्वमय हो जाती है ॥२९-३०॥
हकार से व्योम पैदा हुआ, अर्थात् पहले विमर्श शक्ति से आकाशवाचक हकार वर्ण
की और तब उस हकार के वाच्य व्योम की उत्पत्ति प्रकाशात्मक परम शिव से हुई ।
बाद में वायु का वाचक ककार और तदनन्तर ककार के वाच्य वायु की उत्पत्ति हुई ।
इसके बाद अग्नि का वाचक रेफ और उस रेफ का वाच्य अग्नि उत्पन्न हुआ । इसी क्रम
से जलतत्त्व का वाचक सकार और तब सकार के वाच्य जलतत्त्व की और तब पृथिवी-
वाचक लकार और लकार के वाच्य पृथिवीतत्त्व की उत्पत्ति हुई । इस तरह से शिव और
शक्ति के सामरस्यमय स्वरूप परा भगवती के प्रकाश और विमर्श नामक अवयवों से
पांच महाभूत और उनके वाचक अक्षरों की भी उत्पत्ति होती है, अतः शिवशक्तिसामरस्य-
स्वरूपा परा भगवती के ये पाँच महाभूत और उनके वाचक वर्ण अवयव हैं । इस तरह से
यह परा भगवती ^१शब्दात्मक और अर्थात्मक विश्व का स्वरूप धारण कर लेती है ।
कामकलाविलास में भी इस विषय का वर्णन किया गया है—
१ तदनन्तरं-ने. ज. झ. उ. । २. संभूतः। पुनर्जलतत्त्व-ख. ने. ज. झ. उ. ।
३. सकाराज्जलतत्त्वं संभूतम्-ख. ने. ज. झ. उ. । ४. लकारात् पृथिवी-ख. ने. झ. उ. ।
५. यस्मात्-ख. ने. ज. झ. उ. । ६. पञ्चभूतानि पञ्चभूताक्षराणि च जातानि-ख. ने.
ज. झ. उ. । ७ मयविश्व-ख. ने. ज. । ८. स्फुटिता-क. ग. मु. । ९. ह्वयो-ख. ने.
ज. झ. ।

  1. शास्त्रों में षडध्व के विवेचन के प्रसंग में इस विषय की चर्चा आई है।
    विज्ञान भैरव के २५वें श्लोक की व्याख्या में यह विषय देखा जा सकता है।

द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १४१
अथ विशदादपि बिन्दोर्गगननिलवह्निवारिभूमिजनिः ।
एतत्पञ्चक'विकृतिर्जगदिदमण्वाद्यजाण्डपर्यन्तम् ॥१०॥
माता मानं मेयं बिन्दुत्रयभिन्न२बीजरूपाणि ।
धामत्रयपीठत्रयशक्तित्रयभेदभावितान्यपि च ॥१३॥
तेषु क्रमेण लिङ्गत्रितयं तद्वच्च मातृकात्रितयम् ।
इत्थं त्रितयमयी सा तुरीयपीठादिभेदिनी विद्या ॥१४॥ इति ॥२९-३०
नन्वेवंविधक्रमेण विद्यायां वर्णाः किमिति न स्थिताः ? उच्यते—सत्यमेवं-
विधक्रमो न भवति, तथापि पूर्वोक्तसृष्टिस्थितिसंहारानाख्यावभासनार्थं विद्याया-
मक्रमेण वर्णाः पठ्यन्ते । तेन भूतवर्णक्रमो वर्णवासनाक्रमं बाधितुं नोत्सहते,
अरुण (रक्त) बिन्दु में स्फुरण (स्पन्दन) होने पर नादब्रह्म (शब्दब्रह्म) रूपी अंकुर
से शब्द की पश्यन्ती आदि के क्रम से अभिव्यक्ति होती है। इसी शब्द से गगन, पवन,
ज्वलन, सलिल और पृथिवी के वाचक वर्णों की उत्पत्ति होती है॥ अब शुक्ल बिन्दु में
स्पन्दन होने पर गगन, अनिल, वायु, जल और भूमि इन पाँच भूतों की सृष्टि होती
है। इन पाँच महाभूतों के परिणामस्वरूप अणु से लेकर ब्रह्माण्ड पर्यन्त समस्त जगत् की
सृष्टि पूरी हो जाती है॥ माता (ज्ञाता) महेश्वर, मान (ज्ञान) विद्या, मेय (ज्ञेय)
भगवती त्रिपुरसुन्दरी—ये तीनों स्वरूप रक्त, शुक्ल और मिश्र बिन्दुओं के रूप में
विभक्त तुरीय स्वरूप को, समष्टि स्वरूप को जानने के साधन हैं। तीन धाम, तीन
बीज, तीन शक्तियाँ इत्यादि रूपों में भी इनकी भावना की जाती है॥ इन्हीं में क्रम से
तीन लिङ्गों और तीन मातृकाओं की भी भावना की जाती है। इस तरह से इन तीन-
तीन संख्या वाले पदार्थों का स्वरूप धारण करने वाली यह विद्या वास्तव में तुरीय स्थान
में रहती है और इस तरह तुरीय धाम, पीठ आदि में निवास करने वाली यह परा विद्या
तीन संख्यावाले सारे प्रपंच को तिरोहित कर देती है ॥२९-३०॥
यहाँ प्रश्न उठता है कि यदि विद्या के वर्णों से ही पाँच महाभूतों की उत्पत्ति हुई
है, तो विद्या में वर्णों का क्रम वही होना चाहिये ? प्रश्नकर्ता की बात सही है कि विद्या में
वर्णों का वह क्रम नहीं है, जिस क्रम से पाँच भूतों की सृष्टि हुई है, तो भी सृष्टि,
स्थिति, संहार और अनाख्या क्रम की ऊपर चर्चा आई है। इसी क्रम से विद्या में वर्णों
की स्थिति है। वर्णों की भावना इसी क्रम से की जाती है, अतः वासना क्रम ही यहाँ
प्रधान है। वर्णों की वासना के इस क्रम को भूतों की उत्पत्ति बताने वाला वर्णों का
क्रम बाधित नहीं कर सकता, क्योंकि यहाँ वर्णों की वासना ही प्रधान है, भूत क्रम
गौण। पुनः प्रश्न उठता है कि तब विद्या में पाँच ही अक्षर होने चाहिये, जिनसे
१. विकृति-क०। २. रूपिणम्-क०। ३. सा तु-क०। ४. सृष्टीत्यादि-ख०।

१६२ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः
वासनावत्त्वाद् वर्णानाम् । ननु तर्हि भूत¹संख्याकान्यक्षराणि किमिति न भवन्ति,
अन्यान्यपि बहूनि श्रूयन्त एवेत्यत आह—
गुणाः पञ्चदश प्रोक्ता² भूतानां तन्मयी शिवा ॥३०॥
भूतानां पञ्चानां व्याप्यव्यापकभावेन पञ्चदश गुणाः स्युः । अतस्तन्मयी
तदात्मिका तत्संख्यावर्णवतीयं विद्या, शिवा शोकमोहमयसंसाररूपाऽमङ्गलपरि-
पन्थिपरमाद्वैतप्रथा³परमार्थरूपा, परममङ्गलात्मकत्वात् ॥३०॥
ननु विद्याक्षरसंख्यया⁴ यावन्तः परिगणिताः पदार्थाः⁵, किं तन्मयतावासना
वक्तुं शक्यते ? ⁶इत्यत आह—
यस्य यस्य पदार्थस्य या या शक्तिरुदीरिता ।
सा सा सर्वेश्वरी देवी स स सर्वो महेश्वरः ॥३१॥
लोके यस्य यस्य पदार्थस्य ⁷यत्किञ्चित्करणसामर्थ्यलक्षणा या या शक्ति-
र्विद्यते, सा सा शक्तिः सर्वेश्वरी देवी सर्वस्य शिवादिक्षित्यन्त⁸स्येश्वरी निया-
पाँच महाभूतों की उत्पत्ति होती है । यहाँ तो और भी बहुत से वर्ण सुनाई पड़ते हैं ?
इस प्रश्न का अब उत्तर देते हैं—
पाँच भूतों के पन्द्रह गुण होते हैं । अतः पंचभूतमयी यह कल्याणी विद्या भी
पन्द्रह अक्षरों वाली है ॥३०॥
पाँच भूतों की व्याप्यता और व्यापकता के आधार पर इनमें गुणों की संख्या १५
हो जाती है। अतः पंचभूतात्मिका यह विद्या भी उतने ही संख्या के वर्णों वाली है।
यह विद्या शिवा है, शोक और मोह से भरे इस अमंगलमय संसार का समूल नाश कर
देने वाले परम अद्वय ज्ञान के वास्तविक स्वरूप को प्राप्त करा देने वाली यह विद्या परम
मंगलमय है ॥३०॥
अब प्रश्न उठता है विद्या के इन पन्द्रह अक्षरों से क्या सभी ३६ पदार्थों की विद्या-
मयता की भावना की जा सकती है ? इसका उत्तर है—
जिस जिस पदार्थ को जो जो शक्ति कही गई है, उनमें की सभी शक्तियाँ
सर्वेश्वरी परा देवी और सभी पदार्थ महेश्वर शिव के स्वरूप हैं ॥३१॥
लोक में जिस जिस पदार्थ की जो जो कार्य करने की सामर्थ्य प्रसिद्ध है, वे सब
शक्तियाँ (सामर्थ्य) सर्वेश्वरी देवी के, शिव से लेकर पृथिवी पर्यन्त समस्त पदार्थों का
१. संख्ययैवाक्षराणि-ख. ने. झ. उ. । २. ख्याताः-ख., शाख्याताः-ग. च. छ.
ज. झ. । ३. प्रथारूपपरममङ्गलार्थत्वात्-ख. ने. ज. झ. उ. । ४. संख्याया-क. ग. झ. ।
५. 'पदार्थाः' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । ६. इत्याह-ख. ने. ज. झ. उ. । ७. या या
शक्तिः किञ्चित्-ख. ने. ज. झ. उ. । ८. स्येशान-क. ख. ने. ज. झ. उ. ।

द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १४३
मिका देवी परा, स स सर्वः पदार्थो महेश्वरो विश्वजगन्नियामकः परमशिवः ।
^१लोके यद्यद्वस्तु यत्किञ्चित्करणसामर्थ्यशालि तत्सामर्थ्यरूपेण परैव परिणता,
तत्तत्सामर्थ्यवद्वस्तुरूपेण परमशिवः परिणत इति वक्तुं शक्यते । किं वक्तव्यमेत-
दुभयमयविद्यावर्णसमानसंख्यावत्पदार्थरूपेण तावेव परिणतावित्यर्थः । तदुक्त-
मभियुक्तैः—
त्वं चन्द्रिका शशिनि तिग्मरुचौ रुचिस्त्वं
त्वं चेतनासि पुरुषे पवने बलं त्वम् ।
त्वं स्वादुताऽसि सलिले शिखिनि त्वमूष्मा
निःसार^२मम्ब निखिलं त्वदृते यदि स्यात् ॥ इति ॥३१॥
(अ० स्त० २०)
नियमन करने वाली परा देवी के और वे सब पदार्थ महेश्वर के, सारे जगत् का नियमन
करने वाले परम शिव के स्वरूप हैं । लोक में जिस किसी वस्तु में जो कुछ विशेष कार्य
करने की शक्ति दिखाई पड़ती है, वह सामर्थ्य परा शक्ति का ही परिणाम है और उस
उस सामर्थ्य से सम्पन्न पदार्थ परम शिव का परिणाम है । अर्थात् प्रत्येक पदार्थ का
अपना स्वरूप परम शिव का और उस पदार्थ की सामर्थ्य परा शक्ति का परिणाम है,
उनसे अभिन्न है । इस प्रकार प्रत्येक पदार्थ शिवमय और उसकी सामर्थ्य शक्तिमय है ।
ऐसी स्थिति में यह कौन असंभव बात है कि शिवशक्तिमय इस विद्या के वर्णों के और
समान संख्या वाले पदार्थों के रूप में परम शिव और परा शक्ति ही परिणत होते हैं ।
^१अम्बास्तव में कहा गया है—
तुम चन्द्रमा में चाँदनी के रूप में, सूर्य में प्रभा के रूप में, पुरुष में चेतना के रूप
में, पवन में वेग के रूप में, जल में स्वाद के रूप में और अग्नि में उष्णता के रूप में
निवास करती हो । ओ मा ! तुम्हारे बिना यह सारा जगत् सूना हो जायगा ॥३१॥
१. सर्वलोके-ख. ज. झ. उ. । २. मेतदखिलं-ख. ने., मेव-ज. झ. ।

  1. पञ्चस्तवी के विषय में हम अन्यत्र (आगम और तन्त्रशास्त्र, पृ० ८६-८७) लिख
    चुके हैं कि लघुस्तव के कर्ता धर्माचार्य ही इसके रचयिता हैं । इन पाँच स्तवों में से
    तीन स्तवों (लघुस्तव, चर्चास्तव और सकलजननीस्तव) के पंडित हरभट्ट शास्त्री कृत
    पाण्डित्यपूर्ण टीका के साथ कश्मीर के प्रसिद्ध विद्वान् पंडित श्री दीनानाथ यक्ष द्वारा
    संपादित संस्करण प्रकाश में आ चुके हैं । यह दुःख का विषय है कि बाकी के दो स्तव
    (घटस्तव और अम्बास्तव) अभी प्रकाशित नहीं हो सके । अम्बास्तव का अठारहवां श्लोक
    (लक्ष्मीवशीकरण) भोज के सरस्वतीकण्ठाभरण (निर्णयसागर प्रेस, द्वितीय संस्करण,
    पृ० ३०६-३०७) में उद्धृत है।

१४४ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः
ननु भूतगुणमयी शिवेत्युक्तम्, शिवाया तत्संख्या कुत ²इत्यत आह—
व्याप्ता पञ्चदशार्णैः सा विद्या भूतगुणात्मिका ।
पञ्चभिश्च तथा षड्भिश्चतुर्भिरपि चाक्षरैः ॥३२॥
सा शिवा ³परैव विद्या, वाच्यवाचकयोरभेदात्⁴ । पञ्चभिरक्षरैर्वाग्भव-
बीजस्यावयवैः, षड्भिरक्षरै कामराजबीजस्यावयवैः, चतुर्भिरक्षरैः शक्तिबीजस्या-
वयवैः । न क्षरन्तीत्यक्षराणि, तेषां नित्यत्वात् । ⁵स्वांशैर्नाशरहितैः पञ्चदशार्णे-
र्व्याप्ता, अत एव ⁶भूतगुणात्मिका ॥ ३२ ॥
बीजत्रयमक्षरशो विभज्य भूतगुणात्मकतावासनामुक्त्वेदानीमक्षराण्यरवयवशो
विभज्य षट्त्रिंशत्तत्त्वात्मकतावासनामाह—
स्वरव्यञ्जनभेदेन सप्तत्रिंशत्प्रभेदिनी ।
सप्तत्रिंशत्प्रभेदेन षट्त्रिंशत्तत्त्वरूपिणी ॥ ३३ ॥
तत्त्वातीतस्वभावा च विद्यैषा भाव्यते सदा ।
इस पर प्रश्न उठता है कि विद्या में तो पन्द्रह अक्षर हैं, तब यहाँ ३६ संख्या कहाँ से
आवेगी ? इसका उत्तर आगे देते हैं—
वह भूतगुणात्मिका विद्या पन्द्रह वर्णों से व्याप्त है । यह पाँच, छः और चार
अक्षरों के तीन बीजों में विभक्त है ॥३२॥
वाच्य और वाचक की अभिन्नता के कारण परा शक्ति और परा विद्या में कोई
भेद नहीं है। पाँच अक्षर वाग्भव बीज के, छः अक्षर कामराज बीज के और चार अक्षर
शक्ति बीज के अवयव हैं। अक्षर शब्द का अर्थ है जिसका क्षरण (नाश) न हो। अक्षर
नित्य हैं, अतः इनका क्षरण नहीं होता। यह विद्या इन नाशरहित पन्द्रह वर्णों से व्याप्त
है, इसलिये प्रधानतः यह भूतगुणात्मिका कहलाती है ॥३२॥
इस प्रकार यहाँ तीन बीजों के क्रम से अक्षरों का विभाग और उनकी पन्द्रह भूत-
गुणों के रूप में भावना को बताने के बाद अब इन अक्षरों के भी अवयवों का विभाग कर
कर उनकी ३६ तत्त्वों के रूप में वासना बताई जा रही है—
स्वर और व्यंजन के भेद से यह विद्या ३७ अवयवों वाली हो जाती है।
विद्या के ये सैंतीस अवयव परा देवी के छत्तीस तत्त्वों वाले विश्वमय स्वरूप का
और एक तत्त्वातीत विश्वोत्तीर्ण स्वरूप का बोध कराते हैं। इस तरह से
श्रीविद्या की सदा इन्हीं रूपों में भावना करनी चाहिये ॥३३-३४॥
१. शिवायाः-ख. ज. झ. उ. । २. इत्याह-ज. झ. उ. । ३. परैवाम्बिका या वाच्य-
ख. ने. ज. झ. उ. । ४. रभेदिनी-ख. ने. ज. झ. उ. । ५. एवंविधस्वांशैः-ख. ने.ज.
झ. उ. । ६. भूतात्मिका-ख. ने. ज. झ उ. ।

द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १४५
स्वरव्यञ्जनभेदेन प्रथमबीजेऽकारचतुष्टयमीकारश्चेति पञ्च स्वराः, शिष्टानि
षड् व्यञ्जनानि, एवमेकादश । द्वितीयबीजेऽकारपञ्चकमीकारश्चेति षट् स्वराः,
शिष्टानि व्यञ्जनानि सप्त, एवं त्रयोदश । तृतीयबीजेऽकारत्रयमीकारश्चेति
चत्वारः स्वराः, शिष्टानि व्यञ्जनानि पञ्च, एवं नव । इत्येवं विभागेनाक्षरावयवा-
स्त्रयस्त्रिंशत् । बीजत्रयान्ते बिन्दवस्त्रय इति षट्त्रिंशत् । तत्समष्टिरेका । एवं
सप्तत्रिंशत्प्रभेदिनो विद्या समष्टिरूपा । एवं सप्तत्रिंशत्प्रभेदेन षट्त्रिंशत्तत्त्व-
रूपिणी तत्त्वातीतस्वभावा च विद्यैषा । व्यष्टिसमष्टिभेदेन षट्त्रिंशत्तत्त्वात्मिका
तदतीता (च) इयम् । षट्त्रिंशत्तत्त्वान्यवयवभूतानि, तेषां रूपवती, सप्तत्रिंशत्प्र-
भेदेन तत्त्वातीतस्वभावा च । स्वस्य भावः स्वभावः, शिवस्य यादृशो भावस्तादृशोऽ-
स्या¹ इति भावयितव्यमित्यर्थः । तत्त्वानां लक्षणानि मयैव सौभाग्यसुधोदये
निरूपितानि । यथा—
स्वर और व्यंजन के भेद से विद्या में ३७ वर्ण होते हैं । जैसे प्रथम बीज में
चार अकार और ईकार मिलकर पाँच स्वर हुए, बाकी छः व्यंजन हैं । इस तरह से
प्रथम बीज में ११ अक्षर हुए । द्वितीय बीज में पाँच अकार और ईकार मिल कर छः
स्वर हुए, बाकी सात व्यंजन हैं । दोनों मिलकर द्वितीय बीज में १३ अक्षर हुए । तीसरे
बीज में तीन अकार और ईकार मिलकर चार स्वर और बाकी पाँच व्यंजन हैं । इस
तरह से यहाँ अक्षरों की संख्या ९ हुई । सब मिलाकर अक्षरों की संख्या ३३ हुई । तीन
बीजों के अन्त में तीन बिन्दु हैं । इनको भी मिलाने से यह संख्या छत्तीस हुई । इन
सबकी समष्टि भी एक है । इस तरह से यह समष्टि विद्या ३७ भेद वाली है । इन ३७
भेदों के कारण यह विद्या ३६ तत्त्वों वाली और तत्त्वातीत स्वभाव वाली भी है ।
व्यष्टि रूप में यह ३६ तत्त्वों वाली और समष्टि रूप में तत्त्वातीत है । यह ३६ तत्त्वों
को अपना अवयव बनाकर उनका स्वरूप धारण कर लेती है और ३७ वें स्वरूप में
प्रवेश कर उनसे ऊपर उठ जाती है, तत्त्वातीत विश्वोत्तीर्ण स्वरूप धारण कर लेती है ।
स्वभाव शब्द का अर्थ है अपना भाव । अपना, अर्थात् शिव का जैसा स्वरूप है वैसा ही
स्वरूप इस विद्या का भी है, ऐसी भावना करनी चाहिये । तत्त्वों के लक्षण मैंने ही
¹सौभाग्यसुधोदय में बताये हैं । जैसे कि—
१. स्याः स्वभाव-ख. ने. ज. उ. ।

  1. यह विस्तृत उद्धरण भी नित्याषोडशिकार्णव के परिशिष्ट (पृ० ३०६-३२१) में
    प्रकाशित इस ग्रन्थ के प्रथम प्रपंच (श्लो० २८-४८) में पाठभेदों के साथ उपलब्ध है ।
    इस ग्रन्थ का प्रथम संस्करण सन् १९६८ में प्रकाशित हो चुका था । यह खेद का विषय
    है कि कश्मीर ग्रन्थमाला में सन् १९१४ में प्रकाशित श्री जगदीश चन्द्र चटर्जी के
    'कश्मीर शैविज्म' के तथा सन् १९३८ में प्रकाशित सटीक प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (पृ० १६३-
    १०