योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १३९
(१।४१) लक्षणम् । १सा परा सौभाग्यदेवता तन्मयी पञ्चभूतात्मिका । मूलविद्या-
ऽपि तन्मयी तद्वाचिका देवतावाचिका पञ्चभूतवाचिका च । अत एव तदुभयमयी ।
तत्प्रकारं कथयामीत्यर्थः । “तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः संभूतः । आकाशाद्
वायुः । वायोरग्निः । अग्नेरापः । अद्भ्यः पृथिवी" (तै० उ० २।१।१) इत्युपनिष-
दुक्तरीत्या प्रकाशात्मकात् परमशिवात् पञ्चभूतानामुत्पत्तिः, २विमर्शात्मिकायाः
शक्तेस्तद्वाचकानां विद्यावर्णानामुत्पत्तिरिति हि स्थितिः ॥२८॥
एवं स्थितेऽस्याः किं वाच्यं किं वाचकमिति शङ्कां परिहरन् वर्णभूतसृष्टि-
प्रतिपादनपुरःसरं विश्वमयतामेवाह—
हकाराद् व्योम संभूतं ककारात्तु प्रभञ्जनः ।
रेफादग्निः सकाराच्च जलतत्त्वस्य संभवः ॥२९॥
हुआ है। पहले (१।४१) बताया जा चुका है कि शिव से पृथ्वी पर्यन्त ३६ तत्त्वों का
समष्टिभूत नामरूपात्मक जगत् ही विश्व है। सौभाग्यदेवता परा भगवती महात्रिपुर-
सुन्दरी है। यह परा सौभाग्यदेवता पंचभूतमयी बन जाती है। उस सौभाग्यदेवता
की वाचिका सौभाग्यविद्या भी तन्मयी हो जाती है, अर्थात् परा देवी की पंचभूतात्मकता
के कारण यह विद्या पांच भूतों को भी सौभाग्यदेवता के साथ ही प्रतीति कराने लगती
है। इसीलिये यह सौभाग्यविद्या सौभाग्यदेवता और पंचभूत दोनों की वाचिका है। यह
कैसे होता है, उसी को मैं कह रहा हूँ। तैत्तिरीयोपनिषद् का कहना है—“उस ब्रह्म-
स्वरूप आत्मा से आकाश की उत्पत्ति हुई ! आकाश से वायु, वायु से अग्नि, अग्नि से
जल और जल से पृथ्वी उत्पन्न हुई"। इस उपनिषद् के प्रमाण से प्रकाशात्मक¹ परम
शिव से पांच महाभूतों की उत्पत्ति हुई और विमर्शात्मक शक्ति से इन पांच महाभूतों के
वाचक विद्यागत वर्णों की उत्पत्ति हुई, यही वास्तविक स्थिति है ॥२८॥
विद्यागत वर्णों और पांच भूतों के इस वाच्यवाचकभाव संबन्ध को स्पष्ट करते हुए
अब बताया जा रहा है कि विद्यागत वर्णों से ही पंचभूतों की सृष्टि होती है और इस
तरह से यह विद्या विश्व के रूप में अपना विस्तार कर लेती है—
हकार से आकाश की उत्पत्ति होती है। ककार से वायु, रेफ से अग्नि और
१. लक्षणा-क. ग. ज. । २. विश्वात्मिकाया विमर्शशक्तेः-क. ग. ।
भावों में तेजस्तत्त्व की, विद्या, ईश्वर और सदाशिव में वायुतत्त्व की तथा शक्ति और
शिव में व्योम तत्त्व की अभिव्याप्ति है। पंचतत्त्वदीक्षा के प्रसंग में स्वच्छन्दतन्त्र (५।१३)
में इन पाँच तत्त्वों की व्याप्ति निवृत्ति, प्रतिष्ठा आदि कलाओं की व्याप्ति के अनुसार
बताई है। प्रायः सभी शैवशास्त्र के ग्रन्थों में दीक्षा के प्रसंग में यह विषय वर्णित है।
- प्रकाशविमर्शात्मक यामल स्वरूप का संक्षिप्त विवेचन विज्ञानभैरव भाषानुवाद
की पृ० ४-९ की टिप्पणी में देखिये ।