सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

पृष्ठ 80, कुल 485 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 80

३० योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेतः
शिष्टं चक्रमाह—
ज्येष्ठारूपचतुष्कोणं वामारूपभ्रमित्रयम् ।
ज्येष्ठाशक्तिरूपाणि चतुष्कोणानि १चतुरस्राणि २त्रीणि यस्य तज्ज्येष्ठारूप-
चतुष्कोणम् । वामाशक्तिरूपं भ्रमित्रयं वृत्तत्रयं यस्य तत् । भ्रमित्रयशब्देन
तदन्तरालस्थितपद्मद्वयमपि लक्ष्यते । अत्र वक्ष्यति३—‘‘पद्मद्वयेन चान्यः स्याद्
भूगृहत्रितयेन च’’ (१।७४) इति । अत्र वामारूपभ्रमित्रयं ज्येष्ठारूप-
चतुष्कोणमिति पाठे युक्तेऽप्यम्बिकादिशक्तिपाठक्रमा४ज्ज्येष्ठारूपचतुष्कोणं वामा-
रूपभ्रमित्रयमित्युक्तं देवेन ।
अब बचा हुआ चक्र इस प्रकार उपदिष्ट है—
इस श्रीचक्र का चतुष्कोण ज्येष्ठाशक्तिमय और वृत्तत्रय वामाशक्तिमय
है ।
इस श्रीचक्र के तीन चतुरस्र ज्येष्ठा शक्ति के विस्फार से और वृत्तत्रय वामा शक्ति
के विस्फार से प्रकट होते हैं। भ्रमित्रय (वृत्तत्रय) शब्द से उनके बीच में विद्यमान
अष्टदल और षोडशदल पद्मों का भी ग्रहण किया जाता है। १आगे (१।७४) इस विषय
को स्पष्ट किया जायगा । श्रीचक्र में भ्रमित्रय की पहले तथा चतुरस्र की बाद में स्थिति
है, किन्तु यहाँ चतुरस्र का पहले तथा भ्रमित्रय का बाद में वर्णन है । इसका कारण
यह है कि यहाँ पर अम्बिका प्रभृति चार शक्तियों की श्रीचक्र में स्थिति बताई२ गई
है। उन शक्तियों के क्रम में ज्येष्ठा की पहले और वामा की बाद में स्थिति होने से
उनके अनुसार चक्रों के क्रम को बदल दिया गया है।
१. चतुरस्ररूपाणि यस्य–ख. ग. ने. ज. । २. 'त्रीणि' नास्ति–झ. उ. । ३. वक्ष्यते
च–ख. ग. घ. ने. झ. उ. । ४. क्रमायाततया–ख झ. ।

  1. आगे (१।७३-७५) परिपूर्ण महाचक्र की त्रिविध भावना का वर्णन करते हुए
    वृत्तत्रय के अन्तरालवर्ती अष्टदल और षोडशदल पद्मों का उल्लेख किया गया है ।
  2. श्रीचक्र की अम्बिकारूपता का १४वें श्लोक में, रौद्रीरूपता का १८वें और
    ज्येष्ठा एवं वामारूपता का वर्णन १९वें श्लोक में है। यहाँ अम्बिका, रौद्री, ज्येष्ठा और
    वामा नामक चार शक्तियों के क्रम के आधार पर श्रीचक्र के क्रम में परिवर्तन कर दिया
    गया है, अर्थात् श्रीचक्र के विस्तार के क्रम में वृत्तत्रय की पहले तथा चतुष्कोण की
    स्थिति बाद में है, किन्तु शक्तिक्रम में रौद्री शक्ति की प्राथमिकता के आधार पर चतु-
    रस्र का उल्लेख यहाँ पहले कर दिया गया है ।