योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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परशिवरविकर २०, १८२ का. वि. ४ | पूर्णाभिषेककर्ता ९ कु. त. १३.१२९
परसादाख्यसंप्राप्तिः ४४ स्व. सं. | पूर्वाद्युत्तरपर्यन्तं ३०४ स्व. सं.
पराक्रमपरो भुङ्क्ते ८२, १००, ३७८ | पृथिवीतत्त्वमाख्यातं १५७ म. स्व. सं.
प. प. ५० | पृथिवीमण्डलं पीतं १७९ स्व. सं.
परानन्दस्वरूपं १७२ स्व. भै. | पृथ्व्यादिव्योमतत्त्वा १५७ म. स्व. सं.
परापरविभागेन ३०५ स्व. सं. | प्रकाशैकघने धाम्नि २२३ सु. वा. ३७
परास्य शक्ति १६, १२८ श्वे. उ. ६.८ | प्रतिकिञ्जल्कसंस्थाभिः ३६ स्व. सं.
परिवार्य स्थिताश्चैताः ४३ स्व. सं. | प्रतिफलितं तज्ज्योतिः ६१ सौ. सु. ५.६
पवगँण पुनः कुम्भो २४० अमृ. | प्रतिफलितं पर ६१ सौ. सु. ४.१
पशवस्त्रिप्रकारास्तु १८१ स्व. सं. | प्रतिभायाः परोल्लासो ३०१ सं. प.
पशवस्त्रिप्रकाराः स्युः १६३ स्व. सं. | प्रतिरुचिरुचिरे २०, १८२ का. वि. ४
पशुभिः क्षुद्रकर्मस्थै ३७८ | प्रत्यक्षगोचरं देवं ३९३ तन्त्रा.
पश्चिमोत्तरपौरस्त्य ३४९ नि. षो. | प्रत्यङ्मुखेन मनसा २२७ अ. स्त. १९
१.१७९ | प्रत्ययैकतानता २२८, ३०० यो. सू. ३.२
पस्पन्दे स स्पन्दः १४६ सौ. सु. १.२८ | प्रत्येकमंशभेदेन ९३ सं. प.
पातालादिषु लोकेषु २७८ सु. वा. २३ | प्रदानैस्तर्पणैः सम्यग् २९७, ३७७
पात्रे त्वासवमापूर्य २९० स्व. सं. | सु. वा. ३९
पार्थिवं पङ्कजं ह्येतत् ३७, ३२९ स्व. सं. | प्रमातृमेयप्रमिति २७२ स्व. सं.
पिण्डरूपस्य मन्त्रस्य ५२ वि. भै. ४२ | प्रयत्नस्तदवाप्तौ ११२ द. रू. १.२०
पिण्डं कुण्डलिनी ५९ स्व. सं. | प्रलयाकलनामान १६३ स्व. सं.
पिण्डे मुक्ता पदे मुक्ता ३२२ ज्ञा. का. | प्रबहृच्छ्वासहस्तेन २८६ प. क्र.
१.४ | प्रविष्टेऽन्तः सीधुरसे २९९ क्रमो.
पिण्डो वाचकविस्तरस्य १५२, ३६० | प्रशान्तं तद्विजानीयात् ३७२ शै. त.
अ. व. | प्रश्नोत्तरपरैर्वाक्यै ४ स्व. त. ८.३१
पिनाकिनं च खड्गीशं २९१ स्व. सं. | प्रसुप्तभुजगाकारा ५८ स्व सं.
पुनरञ्ज्यञ्जनबिन्दु १२४ सौ. सु. | प्रसुतामृतरश्म्योघ २९२ सौ. हृ. ७
२.२४ | प्राप्नोति सात्त्विका १८८ स्व. सं.
पुनरेव कामपीठे ६१ सौ. सु. ५.६ | प्रामाण्यप्रवणत्रिशक्ति २९८ अ. व.
पुरुष एवेदं सर्वं १६७ ऋ. १०.९०.२ | प्रोक्ता वह्निकलामन्त्रा २८७ स्व. सं.
पुरुषादिकमायान्तं १६९ स्व. सं. | फट्कारी दशपत्रेषु २३९ स्व. सं.
पुरैः परिवृतोऽसंख्यै ४५ स्व. सं. | बन्दिनी भद्रकाली च २३९ स्व. सं.
पुर्यष्टकशरीराश्च १६४ स्व. सं. | बलिः पूजोपहारेऽपि २७६ नि.
पूर्णपीठं च तन्मध्ये ३८ स्व. सं. | बहुधा ह्यागमैर्भिन्नाः ९९ रघु. १०.२६