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सर्वकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

पृष्ठ 422, कुल 485 में से

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पृष्ठ 422

३७२ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः
वह्निं रेफम्, मायाम् ईकारम्, १कलां तन्मध्यवर्तिसपरार्धकलां२ रेखा-
रूपाम्, चेतनां३ [बिन्दुम्], बिन्दुश्चैतन्यस्य संस्कारः, वेदनरूपत्वात्। तदुक्तं
परापञ्चाशिकायाम्—"बिन्दुर्वेद्यस्य संस्कारो विसर्गः४ सर्ग इत्यसौ" (श्लो० ३७)
इति। अर्धचन्द्ररोधिनीनादनादान्तांश्च५ पूर्वोक्त(१।३१)लक्षणायां६ ७शक्तौ
लीनान् विभावयेत्। यतोऽयं ८नादो यष्टुस्तदतीतशक्तिलक्षणः, अतः प्रशान्ते-
न्द्रियगोचरं सकलेन्द्रियातीतविषयं तत् प्रशान्तविषुवमित्यनुषङ्गः। तदुक्तं
शैवतन्त्रे—
अकारोकारवर्णौ च ९मकारं बिन्दुमेव च।
नादनादान्तसंज्ञे१० च त्यक्त्वा ब्रह्मादिभिः क्रमात्॥
सप्तमे शक्तिमध्ये तु शिष्यात्मानं विचिन्तयेत्।
प्रशान्तं तद्विजानीयात् प्रशान्तेन्द्रियगोचरम्॥इति॥१८४-१८५॥
वह्नि रेफ को, माया ईकार को, कला ईकार के मध्य में विराजमान रेखा रूप
सपरार्ध कला को और चेतना बिन्दु को कहते हैं। यह बिन्दु चैतन्य का संस्कार करने
वाला है, वेदनरूप है। अतः इसे यहाँ चेतना शब्द से कहा गया है। परापंचाशिका के
अनुसार—"बिन्दु वेद्य जगत् का संस्कार तथा विसर्ग सर्गात्मक (सृष्टिस्वरूप) है"।
वह्नि आदि के साथ अर्धचन्द्र, रोधिनी, नाद और नादान्त का पूर्व (१।३१) प्रद-
र्शित लक्षण वाली शक्ति में लय हो गया है, ऐसी भावना करे। चूँकि यह नाद साधक
की लोकातीत शक्ति का द्योतक है, अतः इसका साक्षात्कार समस्त इन्द्रियों के प्रशान्त
होने पर ही हो सकता है। इस तरह से समस्त इन्द्रियों से अतीत शक्ति कला में लीन
करा देने वाली यह स्थिति प्रशान्तविषुव नाम से जानी जाती है। जैसा कि शैवतन्त्र में
कहा गया है—
अकार, उकार, मकार, बिन्दु, नाद और नादान्त का ब्रह्म प्रभृति १कारणषट्क के
साथ परित्याग कर सप्तम शक्तितत्त्व में शिष्य की आत्मा लीन हो गई है, ऐसी
भावना करे। प्रशान्त इन्द्रियों के द्वारा गृहीत होने वाली यह स्थिति प्रशान्तविषुव कही
जाती है॥१८४-८५॥
१. कालं-ख. ने. झ. उ. । २. कलासंबन्धिरखारूपं-ख. ने. झ. उ. । ३. चेतना
बिन्दुर्वेद्यस्य-ख. ने. झ. । ४. विमर्शः-क. ग. झ. । ५. नादान्ताः-ख. ने. झ. उ. ।
६. लक्षणाः-ख. ने. झ. उ. । ७. 'शक्तौ लीनान् विभावयेत्' नास्ति-ख. ने. उ. ।
८. प्रशान्तो नादयोगो-ख. ने. झ. उ. । ९. मकारो बिन्दुरेव-क. ग. ज. ।
१०. शक्ती च-ख. ने. झ. उ. ।

  1. नेत्रतन्त्र (२२।१९-२०) में ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, ईश्वर, सदाशिव और शिव का
    कारणषट्क के रूप में वर्णन किया गया है और कहा गया है कि इन छहों कारणों को
    छोड़ कर सप्तम निरामय, निरामय पद में साधक को प्रवेश करना चाहिये। यहाँ समस्त