योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३६५
इदानीमवस्थापञ्चकभावनां क्रमेण विवक्षन्नादौ जागरितावस्थाभावना-
माह—
प्रबोधकरणेष्व१ऽथ जागरत्वेन भावनम् ॥१७६॥
वह्नौ देवि महाजाग्रदवस्था त्विन्द्रियद्वयैः ।
इन्द्रियद्वयैः ज्ञानकर्मेन्द्रियद्वयैः२ दशैन्द्रियैः, प्रमातु३र्व्यवहारो जागरणणं
प्रबोधो जागर इत्युच्यते । ४तत्करणस्य प्रकाशस्य जागरत्वेन भावनम् । ५अन्तः-
प्रकाशके वह्नौ तार्तीयबीज६शिखरवर्तिनि रेफे, महाजाग्रदवस्था सार्वकालिक-
निद्राक्षयलक्षणा परप्रबोधदशा भावनीयेत्यर्थः ॥१७६-१७७॥
अब पाँच अवस्थाओं की भावना का क्रमशः वर्णन करना चाहते हैं । सबसे पहले
उनमें से जागरित अवस्था की भावना बताते हैं—
ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों के द्वारा प्रबोध के करण प्रकाश की जागरा-
वस्था के रूप में भावना की जाती है । अतः हे देवि ! वह्नि में महाजाग्रदवस्था
की भावना करनी चाहिये ॥१७६-१७७॥
इन्द्रियद्वय का अर्थ है ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रिय नामक दस इन्द्रियाँ । इनकी सहा-
यता से जो प्रमाता का व्यवहार चलता है, उसी को जागरण, प्रबोध, जागर आदि
शब्दों से कहा जाता है । इस प्रबोध का करण प्रकाश है । इसी की जागर दशा के रूप
में भावना की जाती है । इस प्रकाश का वाचक वर्ण वह्नि, अर्थात् तृतीय बीज के
शिखर में स्थित रेफ है । इस रेफ में महाजाग्रदवस्था की भावना करनी चाहिये । ऐसा
करने से सदा सदा के लिये निद्रा दशा समाप्त हो जाती है और परम प्रबोध की
स्थिति सदा बनी रहती है ॥१७६-१७७॥
१. णार्थस्य-ख. ने. छ. ज. । २. न्द्रियैर्दशभिः प्र-ख. ने. ज. झ. उ. । ३. जाग्रद्
व्यव-क. ग. झ. उ. । ४. तत्कार-ख. ने. ज. झ. उ. । ५. अतः प्रकाशवाचके-क. ग. ।
६. 'शिखर' नास्ति-ख. ने. झ. ।
व्याख्या से इसके अभिप्राय की संगति नहीं बैठ पाती । उक्त व्याख्या से मूल के अक्षरों
की तथा दीपिका के अभिप्राय की संगति बैठ जाती है । जैसे कि हकार, रेफ, ईकार,
बिन्दु, अर्धचन्द्र, रोधिनी, नाद, नादान्त, शक्ति, व्यापिका, समना और उन्मना—ये
बारह स्थान हैं । इनमें प्रथम तीन के बाद बिन्दु की स्थिति है, द्वितीय तीन के बाद
नादान्त की तथा तृतीय तीन के बाद उन्मना की स्थिति है । इस तरह से तीन तीन को
छोड़ने पर तीन शून्य बन गये । एक एक को छोड़कर तीन शून्य बनाते समय हम पूर्व के
तीन शून्य स्थानों को छोड़ देंगे । तब हकार के बाद रेफ में, अर्धचन्द्र के बाद रोधिनी
में और शक्ति के बाद व्यापिका में तीन शून्यों की भावना करेंगे । इस क्रम से अन्ततः
एक एक स्थान को छोड़ने पर छः शून्य बन जाते हैं और मूल श्लोक के पदों का लाक्षणिक
अर्थ नहीं करना पड़ता ।