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सर्वकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

पृष्ठ 292, कुल 485 में से

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पृष्ठ 292

२४२ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः
अट्टहासं च विरजं राजगृहं¹ महापथम् ।
कोलापुरमेलापुरं ²कालेशं तु जयन्तिका ॥३७॥
उज्जयिनीं³ विचित्रं च क्षीरकं हस्तिनापुरम् ।
ओड्डीशं च प्रयागाख्यं षँष्ठी मायापुरी तथा ॥३८॥
जलेशं मलयं शैलं मेरुं गिरिवरं तथा ।
माहेन्द्रं वामनं चैव हिरण्यपुरमेव च ॥३९॥
महालक्ष्मीपुरोड्याणे छायाछैत्रमतः परम् ।
एते पीठाः समुद्दिष्टा मातृकारूपकाः स्थिताः ॥४०॥
एते पीठाः समुद्दिष्टा गृहीतनामानः पीठाः । मातृकारूपकाः स्थिताः मातृका
रूपं येषां ते मातृकारूपकाः । क्रमेणादिक्षान्तानामेकैकं वर्णमेकैकस्यादावुक्त्वा तत्त-
द्वर्ण⁶स्थानेषु पीठानां न्यासं कुर्यादित्यर्थः । [⁷पीठानां मातृकामयताकथनं गणेशा-
दीनामप्युपलक्षणम् । वर्गवर्णानामादौ वैखर्यक्षराण्यागमान्तरसंवादाद् विभज्य योज्यानीत्यर्थः]
॥३४-४०॥
गोकर्ण, मारुतेश्वर, अट्टहास, विरज, राजगेह, महापथ, कोलापुर, एलापुर, कालेश,
जयन्तिका, उज्जयिनी, चित्रा, क्षीरक, हस्तिनापुर, ओड्डीश, प्रयाग, षष्ठी,
मायापुर, जलेश, मलयशैल, मेरुगिरि, माहेन्द्र, वामन, हिरण्यपुर, महालक्ष्मीपुर,
ओडयाण, छायाछत्र—ये पचास पीठ हैं। मातृकाओं के साथ इनका न्यास किया
जाता है ॥३४-४०॥
इस तरह से यहाँ ¹पचास पीठों के नाम बताये गये हैं। ये सब मातृका वर्णों के
ही प्रतिरूप हैं, अर्थात् वैखरी मातृका के एक-एक वर्ण से एक-एक पीठ की उत्पत्ति हुई
है, अतः इन पीठों में वर्ण प्रतिबिम्बित हैं। इसीलिये क्रमशः अकार से क्षकार पर्यन्त एक-
एक वर्ण का उच्चारण कर उन-उन वर्णों के स्थानों में ही इन पीठों का भी न्यास करना
चाहिये । [पीठों को जैसे यहाँ मातृकामय कहा है, उसी तरह से गणेश, ग्रह, नक्षत्र
आदि की भी मातृकामयता माननी चाहिये । वर्ग वर्णों के आरंभ में वैखरी वर्णों के संयो-
जन की विधि अन्य आगमों से जाननी चाहिये] ॥३४-४०॥
१. गेहं-क. ग.। २. ओड्डारं-च. छ. ज. झ.। ३. न्यपि चित्रा च-क. ग., चित्राख्यं-
ड. । ४. षष्ठं मायापुरं-क. ग. । ५. पुर-ड. उ. । ६. 'वर्ण' नास्ति-ख. ने. ज. झ. ।
७. 'पीठानां ॰॰॰नीयर्थः' नास्ति-ख. ज. झ. ब. उ. ।
१. पीठ ५० है या ५१, इस विषय में अपनी व्याख्या में भास्करराय ने अन्तिम
पक्ष का समर्थन किया है। उपोद्घात में इस विषय पर विचार करने का प्रयत्न
किया जायगा।