योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
पृष्ठ 243, कुल 485 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १९३
अष्टधाऽनाहतः प्रोक्तः शून्यादि¹प्रविभागतः ।
शून्यः स्पर्शस्तथा नादो ध्वनिर्बिन्दुस्तथैव च ॥
शक्तिबीजाक्षरं चेति ह्यष्टधाऽनाहतः स्मृतः ।
चत्वारिंशत्सप्तसंख्यो हतः स परिकीर्तितः ॥
क्षकारः कथितो योऽसौ संयोगो² द्विविधः स्मृतः ।
सप्तषष्ट्याख्यमेवं हि मातृकापीठमुत्तमम् ॥
³अनाहतहतोत्तीर्णैस्त्रिभिर्भेदैः समन्ततः ।
स्थितो योऽसौ महापीठो⁴ मातृकाख्यो जयत्यसौ ॥ इति ।
में विराजमान है । शून्य आदि के भेद से 'अनाहत (मध्यमा वाक्)¹ आठ प्रकार का
होता है । शून्य, स्पर्श, नाद, ध्वनि, बिन्दु, शक्ति, बीज, अक्षर ये अनाहत के आठ भेद
होते हैं । ²हत नाद (वैखरी वाक्) के ४७ भेद होते हैं । क्षकार संयुक्ताक्षर है, अतः
इसके दो भेद (क् ष्) हो जाते हैं । ³इन सबको मिलाकर ६७ वर्णों वाले उत्तम मातृका
पीठ की निष्पत्ति होती है । इस प्रकार परा वाणी में समरस रूप से स्थित अकार-हकार
वर्णों से ही अनाहत (मध्यमा), हत (वैखरी) और उत्तीर्ण (पश्यन्ती) के क्रम से त्रिधा
विभक्त होकर यह मातृका पीठ सर्वत्र व्याप्त हो जाता है, सारे वाङ्मय को व्याप्त कर
लेता है ॥
१. प्रतिभेदतः-ख. ने. ज. झ. उ. । २. संयोगादिति सार्वत्रिकः पाठः । अर्थ-
रत्नावलीधृतः पाठोऽत्र स्थापितः । ३. अनाहतहतैर्मन्त्रैस्त्रिभिर्भेदैः समन्ततः-ख. ने. ज.
झ. उ. । ४. पीठमकाराख्यो-ख. ने. ज. झ. उ. ।
- पृ० १२३ की पहली टिप्पणी देखिये । अर्थरत्नावलीकार (पृ० ३६) ने संकेत-
पद्धति के प्रस्तुत श्लोक की नवनादपरक व्याख्या की है । वहीं उद्धृत हंसनिर्णय में स्पष्ट
ही नौ नादों का उल्लेख है । वर्णों की ६७ संख्या तभी पूरी हो सकती है । - अर्थरत्नावलीकार (पृ० ३६) वैखरी वाणी के ४७ भेदों में आकार से लेकर
सकार पर्यन्त वर्णों की गणना करते हैं । अकार और हकार की प्रकाशविमर्शात्मकता के
कारण इनका परा और पश्यन्ती वाणी में समावेश हो जाता है । ककार और षकार
के संयोग से बने क्षकार की अलग से गणना नहीं की जाती और ळकार का वे लकार में
ही अन्तर्भाव मानते हैं । - पश्यन्ती के ११, मध्यमा के ९ और वैखरी के ४७ भेदों के योग से यहाँ मातृका
पीठ के ६७ वर्ण माने गये हैं ।
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