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सर्वकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

पृष्ठ 227, कुल 485 में से

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पृष्ठ 227

द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १७७
गुरोराज्ञा१प्रभावेण केवलं निष्प्रपञ्चकम् ।
निरीक्ष्यैतादृशाद्वैतचिदम्बुधिसुधार्द्रया ॥
यथा विशुद्धः २शिष्योऽपि लीयेतानन्दचिद्धनः ।
इत्यादिवाक्योक्तरीत्या ३तस्य गुरोर्निरीक्षणं निखिलपाशच्छेदनसमर्थम् । तत्सा-
मर्थ्यंवशाद् विशुद्धः शिष्यो भक्तिनम्रः प्रत्युत्पन्नपरमशिवाहंभावनावेशः प्रत्यह-
मादरनैरन्तर्यपट्वभ्यासवशात् शङ्कोन्मेषाकलङ्कितः । शङ्का संकोचः संसारि-
त्वाभिमानः, तस्योन्मेषः पुत्रभार्यादिबाह्यार्थाभिरतिः, तेनाकल्ङ्कितो विगताहं-
ममताभिमानः, आत्मनश्च शिवात्मतां भावयेत् । जपाकुसुमसामीप्यविगमात्
स्फटिकस्य नैर्मल्यमिवात्माद्वैतभावनावभावितगुरुकटाक्षपातपाटितपाशपटलः परि-
पूर्ण४स्वभावः स्यादित्यर्थः ॥ ५०-५१ ॥
गुरु की आज्ञा के प्रभाव से, अर्थात् गुरु की कृपादृष्टि से प्राप्त ज्ञान की सहायता
से शिष्य केवल निष्प्रपञ्च स्वात्मस्वरूप को पहचान लेता है । गुरु जब इस तरह की अद्वैत
ज्ञानरूपी समुद्र से निकली सुधा (अमृत) के समान करुणा भरी दृष्टि से शिष्य को देखता
है, तो सभी प्रकार के मलों से छुटकारा मिल जाने से विशुद्ध स्वभाव वाला शिष्य भी
अपने आनन्दमय चिद्धन स्वरूप में लीन हो जाता है ॥
स्पष्ट है कि ऐसे गुरु की कृपादृष्टि सभी प्रकार के पाशों के उन्मूलन में समर्थ है ।
गुरु के उस सामर्थ्य से विशुद्ध स्वभाव का हुआ शिष्य भक्तिपूर्वक विनम्र भाव से मैं
परमशिव स्वरूप ही हूँ, इस प्रकार की अपने में अभिव्यक्त भावना को प्रतिदिन निरन्तर१
आदरपूर्वक गहरे अभ्यास के द्वारा जगाये रखने में समर्थ होकर शंका के उन्मेष से
अस्पृष्ट रह कर स्वयं अपनी भी शिवरूप में भावना करे । शंका का अर्थ है संकोच, अपने
को सांसारिक जीव के संकुचित स्वरूप में देखना । जब यह संकोच प्रबल हो जाता है,
तो सांसारिक जीव पुत्र, भार्या आदि बाह्य विषयों में अनुरक्त हो जाता है । शिष्य को
चाहिये कि वह इस शंका के उन्मेष से अपने को अस्पृष्ट रखे, अहन्ता और ममता
के अभिमान को छोड़ दे और अपनी शिवात्मता को भावना को जगावे । जपा पुष्प के
हटा लेने पर जैसे स्फटिक निर्मल हो जाता है, उसी तरह अद्वैत भावना के अभ्यास और
गुरु की कृपादृष्टि के पड़ने से शिष्य का सारा पाशजाल छिन्न-भिन्न हो जाता है तथा
उसका परिपूर्ण स्वभाव, शिवभाव प्रकाशित हो जाता है । इस प्रकार शिव में, गुरु में
और अपने में भी शिवात्मता दृष्टि की भावना का निरन्तर अभ्यास ही निगर्भाथ कह-
लाता है ॥५०-५१॥
१. पालनेन-ख. ने. ज. उ. । २. शिष्यस्तु-ने. ज. झ. उ. । ३. 'तस्य' नास्ति-ख.
ने. ज. झ. उ. । ४. स्वभावं पश्येदि-क. ।
१. इस प्रसंग में पातंजल योग दर्शन के- "तत्र स्थितौ यत्नोऽभ्यासः, स तु दीर्घकाल-
नैरन्तर्यसत्कारासेवितो दृढभूमिः" (१।१३-१४) ये दो सूत्र स्मरणीय हैं ।