योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
पृष्ठ 170, कुल 485 में से
संदर्भ में पढ़ें१२० योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः
सैव महाविद्यात्मा माता चतुरन्वयैकविश्रान्तिः ।
चतुराननादिजननी जाता चतुरात्मवर्गफलदात्री ॥
अस्वरविमर्शरूपौ स्वांशौ १हित्वा चतुष्कलौ सैव ।
वामादोच्छादिमयान्यकरोद् द्वन्द्वान्यमूनि चत्वारि ॥
वामांशो ब्रह्मा स्यादिच्छैव तस्य भारती शक्तिः ।
अनयोरेतन्मिथुनं सृष्टिः प्रागन्वयात्म वाग्बीजम् ॥
ज्येष्ठांशो विष्णुः स्याज्ज्ञाना विश्वम्भरा तयोर्मिथुनम् ।
इदमेव दक्षिणान्वयरूपं श्रीकामराजमध्वास्ते ॥
रौद्र्यात्मकस्तु रुद्रः क्रियामयी शक्तिरस्य रुद्राणी ।
युगलमिदं तार्तीयं बीजं २पालयति पश्चिमाम्नायम् ॥
स्यादम्बिकास्वरूपः शम्भुः शान्तात्मिकाऽस्य शक्तिः स्यात् ।
मिथुनमिदं शिवशक्त्योरुत्तरसमयात्म तुर्यमधितिष्ठेत् ॥
जाती है। इस श्लोक में प्रदर्शित अर्थ का व्याख्याकार ने अपने १सौभाग्यसुधोदय नामक
ग्रन्थ में विस्तार किया है, जैसे कि—
वह परा शक्ति ही चारों प्रकार के अन्वयों ( आम्नायों ) की विश्रामस्थली, चतु-
रानन ब्रह्मा आदि की जननी तथा चार प्रकार के वर्ग ( धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष ) का
फल देने वाली माता महाविद्या का स्वरूप धारण कर लेती है ॥ वही परा शक्ति अस्वर
(अकार लिपि) और विमर्श (हकार लिपि) स्वरूप चार-चार कलाओं वाले अपने अंशों
को विभक्त कर वामा आदि के और इच्छा आदि के इन चार-चार मिथुनों की सृष्टि
करती है ॥ ब्रह्मा वामा शक्ति के और भारती इच्छा शक्ति के अंश से उद्भूत हैं। वामा
और इच्छा शक्ति से उत्पन्न यह ब्रह्मा और भारती का युगलस्वरूप सृष्टि, पूर्वाम्नाय
और वाग्भव बीज का अधिपति है ॥ विष्णु ज्येष्ठा शक्ति के और विश्वम्भरा (पृथ्वी)
ज्ञाना शक्ति के अंश से उद्भूत हैं। ज्येष्ठा और ज्ञाना शक्ति से उत्पन्न यह विष्णु और
पृथ्वी का युगलस्वरूप स्थिति, दक्षिणान्वय और कामराज बीज का अधिपति है ॥ रुद्र
रौद्री शक्ति के और रुद्राणी क्रिया शक्ति के अंश से उद्भूत हैं। रुद्र और रुद्राणी का यह
युगल संहार, पश्चिमाम्नाय और तृतीय शक्ति बीज का अधिपति है ॥ शम्भु ( शिव )
अम्बिका शक्ति के और इसकी शक्ति शान्ता शक्ति के अंश से उद्भूत हैं। शिव और
शक्ति का यह युगल उत्तराम्नाय तथा तुरीय अनाख्या तत्त्व का अधिपति है ॥ इस
१. भित्त्वा-ख. ग. ज. झ. उ. । २. जनयति-ग. ने. ज. झ. उ. ।
१. नित्याषोडशिकार्णव के परिशिष्ट (पृ० ३०६-३२१) में प्रकाशित इस ग्रन्थ के
द्वितीय प्रपंच में ये सभी श्लोक पाठान्तर के साथ देखे जा सकते हैं।