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सर्वकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

पृष्ठ 129, कुल 485 में से

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पृष्ठ 129

प्रथमः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ७९
सैषेति तच्छब्देन चतुःशतीशास्त्रोक्ता (३।६-७) सर्वविद्राविणी मुद्रा परामृश्यते ।
स्फुरितविग्रहा संविद्रूपत्वात् । कोऽर्थः ? ज्येष्ठाप्राचुर्याधारत्वात् स्थितिरूपिणी,
अत एव ऋजुरूपमध्यमातर्जन्यन्वयोः कनिष्ठिकाऽनामिकयोश्च संयोगरूपिणो, कामा-
कर्षिण्यादिरूपत्वात् सर्वानुग्रहकारिणो, तदाधारत्वात् सर्वाशापरिपूरणाख्ये चक्रे
संविद्रूपत्वात् स्फुरितविग्रहा चतुःशतोशास्त्रे प्रतिपादिता सैषा सर्वविद्राविणी मुद्रा
स्थितेत्यर्थः ॥६०-६१॥
सर्वार्कर्षिणीमुद्रामाह—
ज्येष्ठावामासमत्वेन सृष्टेः प्राधान्यमाश्रिता ॥६१॥
आकर्षिणी तु मुद्रेयं सर्वसंक्षोभिणी स्मृता ।
ज्येष्ठावामासमत्वेन ज्येष्ठावामाशक्तिद्वयसामरस्यरूपत्वात् । सृष्टेः प्राधान्य-
माश्रिता । सृष्टिरूपा वामा, स्थितिरूपा ज्येष्ठा । उभयसाम्यात् सृष्टिस्थितिसाधा-
रणीयं वामांशेन वक्रतर्जनीमध्यमाद्वयरूपा, ज्येष्ठांशेन ऋजुसंयुक्तानामिकाकनिष्ठा-
द्वयरूपेत्यर्थः । अत एव वक्राङ्गुलिद्वयरूपत्वाद् आकर्षिणीयं मुद्रा सर्वसंक्षोभिणि
चतुःशतीशास्त्र (३।६-७) में उपदिष्ट सर्वविद्राविणी मुद्रा का ग्रहण होता है, अर्थात् इस
मुद्रा का स्वरूप वहाँ बता दिया गया है । संवित्स्वरूपिणी इस मुद्रा का स्वरूप सर्वाशा-
परिपूरक चक्र में ही स्फुरित होता है । इसका अभिप्राय यह है कि यह मुद्रा ज्येष्ठा
शक्ति पर ही प्रधानतः आधृत होने से स्थितिरूपिणी है । इसीलिये सरल (सीधी)
आकृति वाली मध्यमा-तर्जनी और कनिष्ठा-अनामिका के संयोग से यह बनती है । कामा-
कर्पिणी प्रभृति शक्तियों का प्रतिनिधित्व करने से यह सब पर अनुग्रह करने वाली है ।
सर्वाशापरिपूरक चक्र में विद्यमान शक्तियों की आधारभूत यह शक्ति उसमें संवित् स्वरूप
में स्फुरित होती है । चतुःशतीशास्त्र (३।६-७) में इसी का सर्वविद्राविणी के नाम से
वर्णन है ॥६०-६१॥
सर्वार्कर्षिणी मुद्रा का स्वरूप बताते हैं—
इस आकर्षिणी मुद्रा में ज्येष्ठा और वामा शक्ति की समानता होने पर भी
सृष्टि शक्ति वामा को प्रधानता दी जाती है । सर्वसंक्षोभकर चक्र में यह स्थित
है ॥६१-६२॥
ज्येष्ठा और वामा शक्तियों के सामरस्य से उत्पन्न होने पर भी यह मुद्रा सृष्टि
शक्ति वामा पर प्रधानतः आश्रित है । वामा शक्ति सृष्टि का और ज्येष्ठा शक्ति स्थिति
का प्रतिनिधित्व करती है । इस मुद्रा में दोनों की समान स्थिति है, अर्थात् इस मुद्रा में
सृष्टि और स्थिति शक्ति की समान स्थिति होने से वामांश से वक्र (तिरछी) तर्जनी और
मध्यमा का और ज्येष्ठांश से सरल (सीधी) अनामिका और कनिष्ठा का संयोग बनता
है । इस मुद्रा में दो अंगुलियाँ तिरछी रहती हैं, अतः यह आकर्षिणी कहलाती है और सर्व-