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योगतारावली (आदि शङ्कराचार्य - अमनस्क दशा, नादानुसन्धान एवं राजयोग रहस्य सटीक)

Yogataraavali of Adi Shankaracharya with Commentary

आदि शङ्कराचार्य (व्याख्याकार: डॉ. रामशङ्कर भट्टाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished52 पृष्ठ

प्रारंभिक पृष्ठ एवं राजयोग-रहस्य भूमिका

शंकराचार्य कृत
योगतारावली
[ हिन्दी अनुवाद और विशद व्याख्या के साथ ]
रामशंकर भट्टाचार्य
प्रकाशक
भारतीय विद्या प्रकाशन
वाराणसी दिल्ली

सिद्धसिद्धान्तपद्धतिः
(हिन्दी अनुवाद एवं व्याख्या सहित)
गोरक्षनाथ विरचिता
प्रकाशकः
चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान
दिल्ली वाराणसी

शंकराचार्यकृत
योगतारावली
[ हिन्दी अनुवाद और विशद व्याख्या के साथ ]
अनुवादक तथा व्याख्याकार
रामशंकर भट्टाचार्य
( एम. ए ; पीएच-डी.; व्याकरणाचार्य )
Co editor : Encyclopedia of Indian Philosophies
( Vols. on Samkhya & Yoga );
Editor : Purana, All-India Kasiraj Trust.
Varanasi
प्रकाशक
भारतीय विद्या प्रकाशन
वाराणसी दिल्ली

[सील:]
भारतीय विद्या प्रकाशन
संशोधित मूल्य
२०/-
वाराणसी
I.S.B.N., 81-217-0035-3
First Ed. 1987
Price Rs. 10.00
भारतीय विद्या प्रकाशन
१. पो० ब० ११०८, कचौड़ी गली, वाराणसी-२२१००१
२. १. यू० बी० जवाहर नगर, बंग्लो रोड, दिल्ली-११०००७
मुद्रक :
वाराणसी मुद्रण संस्थान
डी० ५१/६२ सूरजकुण्ड, वाराणसी

YOGATĀRĀVALĪ
with Hindi Translations & Notes and a Preface
Ram Shankar Bhattacharya
M.A.; Ph.D.; Vyakaranacharya
Co-editor : Encyclopedia of Indian Philosophies
( Vols. on Samkhya & Yoga );
Editor : Purana, All-India Kasiraj Trust,
VARANASI
BHARATIYA VIDYA PRAKASAN
VARANASI DELHI

I.S.B.N., 81-217-0035-3
First Edition, 1987
Price : Rs. 15.00
Publisher :
BHARATIYA VIDYA PRAKASHAN
Post Box 1108, Kachauri Gali, Varanasi

  1. U. B. Jawahar Nagar, Bungalow Road. Delhi-110007
    Printer :
    VARANASI MUDRAN SANSTHAN
    D. 51/92 Suraj Kund
    Varanasi-( India )

प्राक्कथन
ब्रह्मानन्दं परमसुखदं केवलं ज्ञानमूर्ति
द्वन्द्वातीतं गगनसदृशं तत्त्वमस्यादिलक्ष्यम् ।
एकं नित्यं विमलमचलं सर्वधीसाक्षिभूतं
भावातीतं त्रिगुणरहितं सद्गुरुं तं नमामि ॥
राजयोग का प्रतिपादक श्लोकबद्ध योगतारावली¹-नामक ग्रन्थ
योगाभ्यासियों में अत्यन्त प्रसिद्ध रहा है। इस ग्रन्थ को शंकराचार्य द्वारा
विरचित माना जाता है। यही कारण है कि विभिन्न प्रकाशकों द्वारा
प्रकाशित शाङ्करग्रन्थावलियों में यह ग्रन्थ अवश्य संयोजित रहता है।
पृथक् रूप से इस ग्रन्थ का प्रकाशन कदाचित् ही देखा जाता है।
यह खेद का विषय है कि प्रस्तुत ग्रन्थ में वर्णित विषय यद्यपि अत्यन्त
उच्चकोटि का है तथा इसकी भाषा भी कहीं-कहीं व्याख्या की अपेक्षा
रखती है, तथापि इसकी कोई प्राचीन संस्कृत टीका प्रचलित नहीं है,
जबकि शंकराचार्यकृत दार्शनिक-विचार-बहुल दक्षिणामूर्ति-स्तोत्र की टीका
१. 'तारावली' शब्द का तात्पर्य विज्ञेय है। ताराओं की संख्या २७ हैं। यदि
ग्रन्थ के मुख्य श्लोक २७ हों तो 'तारा' शब्द का प्रयोग ग्रन्थ-नाम में किया
जा सकता है ( १-२ गौण श्लोक भी ऐसे नामवाले ग्रन्थों में कभी-कभी
रहते हैं)। तारा की तरह नक्षत्र शब्द भी प्रयुक्त होता है। 'शिवपञ्चाक्षर-
नक्षत्रमाला' (शंकराचार्यकृत) में २७ श्लोक हैं ( २७ मुक्ताओं से जो
माला बनती है, वह नक्षत्रमाला कहलाती है, यह ज्ञातव्य है)।

( २ )
उनके शिष्य सुरेश्वराचार्य ने, वेदान्तकेशरी की टीका आनन्दगिरि ने तथा
निर्वाणदशक की टीका मधुसूदन सरस्वती ने लिखी है। टीका न रहने के
कारण इस ग्रन्थ के कुछ वाक्यों का तात्पर्य समझने में कठिनता होती है।
ग्रन्थगत श्लोकों का मुद्रित पाठ भी सर्वत्र शुद्ध प्रतीत नहीं होता। विभिन्न
संस्करणों में श्लोकों के अनेक पाठान्तर दृष्ट होते हैं। अतः प्राचीन हस्त-
लेखों के आधार पर इस ग्रन्थ का एक शुद्धपाठयुत संस्करण प्रस्तुत करना
आवश्यक प्रतीत होता है। शुद्ध पाठों के बिना अर्थनिर्धारण करना सुकर
नहीं है।
इस ग्रन्थ के जो एक-दो व्याख्या-ग्रन्थ (हिन्दी-बंगला में) प्रचलित हैं,
वे बहुत ही साधारण कोटि के हैं। इनमें न पाठों पर उचित विचार किया
गया है और न शब्दों के विवक्षित तात्पर्य के निर्धारण के लिए उचित
प्रयास किया गया है ! प्रस्तुत व्याख्या में योगतारावली में प्रयुक्त शब्दों के
विवक्षित अर्थों का निर्धारण योगग्रन्थों के आधार पर करने की चेष्टा की
गई है तथा कौन पाठ संगत है, इस पर भी विचार किया गया है। हम
समझते हैं कि हठयोगप्रदीपिका की ज्योत्स्नाटीका की तरह एक टीका इस
ग्रन्थ के लिए भी आवश्यक है। कोई अभ्यासशील विद्वान् योगी यदि इस
कार्य को करें तो हम सब उपकृत होंगे।
शङ्कराचार्य इस ग्रन्थ के लेखक हैं—इस प्रसिद्धि में हमें पर्याप्त संशय
है। इस ग्रन्थ का उद्धरण प्राचीन आचार्यों के ग्रन्थों में नहीं मिलता;
अट्ठारवीं शती के शाक्त भास्कर आचार्य (द्र० १७ श्लोक की व्याख्या) तथा
१६-१७ वीं शती के योगी शिवानन्द (द्र० ६ श्लोक की व्याख्या) के
द्वारा इस ग्रन्थ के वाक्य उद्धृत हुये हैं। किंच शंकर-संप्रदाय के किसी
आचार्य के द्वारा अथवा हठयोगादि योगप्रस्थानों के किसी आचार्य के द्वारा
इस ग्रन्थ की टीका न लिखा जाना इसकी शंकरकर्तृकता में दृढ़ संशय
उत्पन्न करता है। यह भी देखा जाता है कि इस ग्रन्थ का वाक्य
'नन्दिकेश्वरकृत तारावली' के नाम से उद्धृत किया गया है (द्र० ६ श्लोक

( ३ )
की व्याख्या) । इस प्रकार यह सिद्ध होता है कि इस ग्रन्थ को शंकर-
विरचित मानना संशयास्पद है ।
यदि नन्दिकेश्वर नामक किसी आचार्य के द्वारा यह ग्रन्थ विरचित हो
तब भी इस प्रश्न का समाधान ढूंढना होगा कि क्यों यह ग्रन्थ शंकराचार्य
की कृति के रूप में प्रसिद्ध हुआ ? नन्दिकेश्वर का परिचय भी निर्धारणीय
है । पुराणों में जिस शिलाद ऋषि के पुत्र नन्दिकेश्वर का चरित है २
( जिनका मानव शरीर जीवित अवस्था में ही दैव शरीर में परिणत हो
गया था; द्र० व्यासभाष्य २।१२-१३ ) वे इस ग्रन्थ के रचयिता हैं, ऐसा
मानने का कोई आधार नहीं है ।
ग्रन्थकार ने श्रीशैल ( श्रीपर्वत ) में निवास करने की उत्कट इच्छा
व्यक्त की है ( श्लोक २८ ) । लेखक का दक्षिणभारत का निवासी होना
इससे ज्ञापित होता है ।
प्रस्तुत संस्करण का मुख्य वैशिष्ट्य यह है कि हमने श्लोकों के
अर्थनिर्धारण में कहीं भी निराधार कल्पना का आश्रय नहीं लिया तथा
व्याख्या में अनावश्यक विस्तार भी नहीं किया । श्लोक-प्रयुक्त शब्दों का
अर्थ अन्यान्य योगग्रन्थों के आधार पर ही किया गया है—यह सहृदय
पाठक देख सकते हैं । व्याख्या में जो सामग्री संकलित की गई है उसके
आधार पर पाठक स्वयं भी श्लोकों के अर्थों का निर्धारण करने में समर्थ
होंगे—ऐसा हम समझते हैं; साथ ही हम यह भी चाहते हैं कि पाठक स्वयं
हमारी व्याख्या की युक्तायुक्तत्व की परीक्षा करें । हमें यह कहने में कोई
भी संकोच नहीं है कि ग्रन्थोक्त कुछ विषय सर्वथा स्पष्ट नहीं हैं । इस
२. द्र० शिवपु० ३।६ अ०; स्कन्दपु० केदारखण्ड ५।१११-११३; स्कन्दपु०
काशीखण्ड ११।१०६; वराहपु० १४४।१६७; वराहपु० २१३।६९-७१;
कूर्मपु० १।४३।१२८; २।४१।१७-४२ । विशद विवरण के लिए मेरा
'Nandin-a yogin' शीर्षक निबन्ध (Journal of the Yoga
Institute, Bombay, Vol. XXVII. 8 में प्रकाशित ) पठनीय है ।

( ४ )
अस्पष्टता का एक हेतु है—श्लोकों के अशुद्ध पाठ--यह कहना अनुचित
नहीं होगा। यह भी निवेदनीय है कि हम चूँकि स्थूलरूप से योग का मनन-
मात्र करते हैं, अतः अयोग्यता के कारण भी हमारी व्याख्या में कहीं-कहीं
भ्रान्ति हो सकती है।
पाठकों की सुविधा के लिए एक 'शब्दसूची' भो ग्रन्थान्त में दी गई है।
पाठक देखेंगे कि ग्रन्थगत कई शब्द विरल-प्रयुक्त हैं। हठसंकेतचन्द्रिका,
हठतत्त्वकौमुदी ( सुन्दरदेवकृत ) आदि विस्तृत ग्रन्थों के प्रकाशन होने पर
इन शब्दों के अर्थों को समझने में सुविधा होगी। इति
गुरुपूर्णिमा रामशंकर भट्टाचार्य
११-७-१९८७
डी० ३८/८ हौजकटोरा, वाराणसी