योगतारावली (आदि शङ्कराचार्य - अमनस्क दशा, नादानुसन्धान एवं राजयोग रहस्य सटीक)
Yogataraavali of Adi Shankaracharya with Commentary
आदि शङ्कराचार्य (व्याख्याकार: डॉ. रामशङ्कर भट्टाचार्य) द्वारा
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प्राणभेदेषु प्राणायामेन निरुद्धेषु कारणमात्रेण रूपेण वर्तमानेषु जीवनमात्रं कार्यं
निर्वर्त्यंते नाकुञ्चन-प्रसारणादिकं कार्यान्तरम् ( २।१।२० ) ।
उत्थापिताधारहुताशनोल्कैर्
आकुञ्चनैः शश्वदपानवायोः¹ ।
सन्तापिताच्² चन्द्रमसः स्रवन्तीं
पीयूषधारां पिबतीह धन्यः॥७॥
[ १. अपानवायौ ( पाठा० )--यह भ्रष्ट पाठ है। सन्तापिते; संप्रापिते
( पाठा० ) ]
अनुवाद—अपान वायु का निरन्तर ( बारबार ) आकुञ्चन होने के
कारण आधार ( मूलाधार चक्र ) से जो अग्नि की शिखा निर्गत होती है,
उससे चन्द्र सन्तापित होता है । इस सन्तापित चन्द्र से क्षरित सुधा का
पान जो साधक करता है, वह इस लोक में धन्य है ।
व्याख्या—मूलाधार-स्थित अग्नि--ह० यो० प्र० ३।६६ से इस अग्नि की
सत्ता ज्ञात होती है । यह अग्नि जाठरअग्नि का ही विकसित रूप है (द्र० ज्योत्स्ना-
टीका ) । जठराग्नि के इस विकास में समान वायु का पर्याप्त सहयोग रहता है ।
यही कारण है कि योगी का शरीर जलता हुआ-सा प्रतीत होता है; द्र०
समानजयाज् ज्वलनम् ( योगसू० ३।४० ); प्रज्वलन्निव लक्ष्यते योगी
( भास्वती ) ।
मूलाधारस्थित अग्नि की उल्का ( = शिखा ) का स्पष्ट उल्लेख योगियाज्ञ०
१२।१ में मिलता है ( शिखां समालोक्य पावकस्य ) । अपानवायु का जो आकुञ्चन
है, वह वस्तुतः मूलाधार का आकुञ्चन है; द्र० अधस्तात् कुञ्चनेनाशु...
( ह० यो० प्र० २।४६ ) । अपानवायु का आकुञ्चन ह० यो० प्र० ३।६२-६३ में
उक्त हुआ है ।