योगतारावली (आदि शङ्कराचार्य - अमनस्क दशा, नादानुसन्धान एवं राजयोग रहस्य सटीक)
Yogataraavali of Adi Shankaracharya with Commentary
आदि शङ्कराचार्य (व्याख्याकार: डॉ. रामशङ्कर भट्टाचार्य) द्वारा
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अनुवाद—(योगीगण) कहते हैं कि कण्ठ, उदर और पायुमूल में
(यथाक्रम जालन्धरबन्ध, ओड्ड्यानबन्ध एवं मूलबन्ध का अभ्यास करना
चाहिये । ये तीन बन्ध यदि भलीभाँति ज्ञात (अर्थात् अनुष्ठित हो तो
दुःखदायी कालपाश के द्वारा बन्धन कैसे हो सकता है ? (अर्थात् बन्धन
नहीं हो सकता) ?
व्याख्या—श्लोकगत ओड्ड्यानक ( जालन्धर + ओड्ड्यानक ) शब्द
जिस बन्ध को कहता है उसके नाम में एकरूपता नहीं मिलती । ह० यो० प्र०
२।४५ में उड्डियानक शब्द है ('क' स्वार्थ में तद्धित प्रत्यय है ) । प्रस्तुत ग्रन्थ
के श्लोक ६ में उड्डीन या ओड्ड्यान शब्द है। कहीं कहीं उड्डीयन और
उड्डीयान' शब्द प्रयुक्त हुये हैं । यह निश्चित है कि यह शब्द 'उद् + डी (ङ्)'
से निष्पन्न है; इसका 'उड्डियान' रूप ही संगत प्रतीत होता है । उड्डियान का
नामान्तर 'आकर्षणबन्ध' है ।
उड्डीयान--तस्मादुड्डीनाख्योऽयम्-ह० यो० प्र० ३।५५—ज्योत्स्ना--
'उत्पूर्वात् डीङ् विहायसा गतौ इत्यस्मात् करणे ल्युट्' । पर इस नियम से
उद् + डी + अन ( ल्युट् ) = उड्डयन' होगा, उड्डीयन' ( ३।५५ में प्रयुक्त ) नहीं
होगा । अतः उड्डीयन शब्द के लिए पृथक् प्रयत्न करना होगा ।
ह० यो० प्र० ३।५६-उड्डीनं कुरुते यस्मात्...उड्डीयानं तदेव स्यात् ।
उड्डीन शब्द कर्णपर्व ४१।२६ में प्रयुक्त है तथा व्याकरणग्रन्थ में भी है
( द्र० काश० धातु० १।५५९ ) ।
उड्डियान—इसके बहुत प्रयोग हैं । (ह० यो० प्र० ३।७४; २।४५
(उड्डियानक); २।४७ टीका ( उड्डियान ) ।
योगशास्त्र में नाना प्रकार के बन्ध कहे गये हैं, जिनमें जालन्धर ( नामान्तर
कण्ठमुद्रा, ) उड्डियान तथा मूल प्रसिद्धतम हैं । इनके विवरण के लिए
ह० यो० प्र०, घेरण्डसंहिता आदि द्रष्टव्य हैं ।
कालपाश--कालरूपी पाश; पाश वह जिससे किसको बाँधा जा सके ।
द्र० ह० यो० प्र० ३।२४ ( कालपाशमहाबन्ध.... ) ।